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भारत आध्यात्मिक पर्व

भारत की वह अनोखी धरती जिसका स्वयं सुर्य परिचय देता हों। जिसका बहता हुआ जल भी किसी कवि की प्रेरणा बनता हो, जहां उगता हर अन्न का कण ऊर्जा का रोम रोम में देश भक्ति का संचार कराता हो। भारत की भूमि शौर्य का परिचय देती है, तो विशाल हृदय का दर्शन कराती है। भारत को जानना हैं, तो भारत के आध्यात्म के ज्ञान को आत्मसात् करना होगा। तब जाकर आप भारत को समझ पाएंगे। भारत केवल देश नहीं अपितु जीवन जीने तरीका है, जो मानव निर्माण का कार्य करता है, योग का संदेश देकर समस्त संसार को मार्ग दिखाने का कार्य करता है। भारत जगद्गुरू है। भारत को गुरू की नजरिया से देखने का प्रयास तो करो! अपने जीवन की समस्या का सुलझते पाएंगे। भारत की वह दिव्य ज्ञान गाथा हमे बोध कराती है, अनंत की शक्ति का। वह भारत भूमि जिसकी धरा पर निरंतर ब्रम्ह अवतरण का प्राकट्य होता हो। भारत को समझना और गर्व करना किसी दिव्य अनुभूति से कम नहीं है। जहां की सत्ता राम की उपासक हो, वेद जहां पूजे जातें हो, गुरुकुलो की शिक्षा अपने आप में स्वयं का बोध कराती हो, यह स्वरुप भारत माता हो। आज़ादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य पर हमे भारत की पहचान उसे लौटानी है। दिव्य संकल्प गूंज रहा है, जहां की संस्कृती हमे बुला रही है।

हमारा देश भारत हजारों वर्षों से आध्यात्मिक जगदगुरु रहा है। चार धामों की अवधारणा भारत में ही है। नौ बार इस भूमि पर भगवान ने जन्म लिया हैं। सैकड़ों ऋषि-मुनियों ने क्यों वेद-पुराणों की रचना भारत की धरती पर की हैं। और हजारों साधु-संतों ने अपनी वाणी से इस देश की धरती को गुंजायमान किया। यह सबकुछ क्या मात्र एक संयोग है या फिर इनके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण हैं? यह एक विचारणीय विषय है।अध्ययन करने से पता चलता है कि यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं। सबसे मुख्य कारण भारत की भौगोलिक स्थिति है। भारत पृथ्वी के उस विशिष्ट भू-भाग पर स्थित है जहाँ सूर्य और बृहस्पति ग्रह का विशेष प्रभाव पड़ता खगोल व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य और बृहस्पति मनुष्य की आध्यात्मिकता के कारक माने जाते हैं। सूर्य व बृहस्पति से आनेवाली विशेष तरंगों का विकिरण भारत के भूभाग को गहन रूप से प्रभावित करता है। इस कारण भारत में आध्यात्मिकता का वातावरण बना रहता है। ऐसे में प्रेम, दया, सहिष्णुता यदि भारत की भूमि में कूट-कूटकर भरी है तो आश्चर्य कैसा?

विश्व अधिकतर देशों में तीन या चार ऋतुएँ होती हैं, पर भारत एक ऐसा देश है जहाँ छह ऋतुएँ-ग्रीष्म, वर्ण, शरद, शीत, वसंत व पतझड़ संभवतः इतनी ऋतुएँ अन्य किसी देश में नहीं होतीं। (पाकिस्तान, बंगलादेश भी कभी इसी भूभाग के अंग थे) ऋतुओं का सीधा संबंध सूर्य और पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति से होता है। यह तथ्य वैज्ञानिक भी मानते हैं। ऋतु परिवर्तन का प्रभाव मनुष्य के मन, मस्तिष्क व शरीर तीनों पर पड़ता है। ऋतु परिवर्तन के साथ प्रकृति अपनी लय बदलती है और हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति की परिवर्तित लय से कैसे अपने तन-मन की लय को जोड़कर रखना है, यह विज्ञान जान लिया था। वे जानते थे कि ऋतु बदलने के साथ मनुष्य के शरीर का रसायन भी बदल जाता है। इसलिए उन्होंने ऋतु परिवर्तन के साथ कई पर्व और त्योहार जोड़ दिए, जिनके दौरान मनुष्य उपवास रखकर अपने शरीर के रसायन पर नियंत्रण रखता था। यही नहीं, उपवास के बाद क्या खाना चाहिए, इसका भी उन्होंने प्रावधान किया। इन सबके पीछे वैज्ञानिक तथ्य यह था कि मनुष्य अपने शरीर की लय को प्रकृति की लय से जोड़कर रखे ध्यान देनेवाली बात है कि हिंदू पर्व और त्योहार प्रायः विशेष दिनों पूर्णिमा, अमावस्या या शुक्ल पक्ष के दौरान ही मनाए हैं।



हमारे ऋषि-मुनियों ने एकादशी के दिन उपवास रखने पर बहुत जोर दिया है। इसके पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण है। मनुष्य के शरीर में एक महीने के दौरान लगभग दो बार उसका रसायन प्रभावित होता है। दस दिन भोजन करने से जो पौष्टिक रस शरीर में बनता है, एकादशी के दिन मानव शरीर उसे अपने अलग-अलग अंगों को बाँटता है। शरीर उस रस को सुचारू रूप से बाँट सके, इसलिए एकादशी के दिन उपवास की मान्यता है शरीर का इतना बारीक अध्ययन अभी तक आधुनिक वैज्ञानिकों ने नहीं किया है, इसलिए वे उपवास के पीछे जो वैज्ञानिक गहराई है, उसे नहीं समझते और इस प्रकार की बातों को ‘व्यर्थ’ की संज्ञा दे देते हैं। उपवास की विधि केवल भारत में ही हैं।

प्राचीन काल में ऋतु-फल के सेवन पर सनातन पद्धति में बहुत बल दिया जाता था। इसके पीछे का विज्ञान यह था कि प्रकृति ऋतु परिवर्तन के समय जो फल देती है, उसमें पैदा होनेवाले फल व सब्जियों में विशेष प्रकार का रसायन होता है, जो वे सूर्य से लेते हैं, वह रसायन मनुष्य के शरीर और स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक एवं महत्व पूर्ण होता हैं।

ऋतु काल में यदि कोई मनुष्य पंद्रह दिन लगातार १०-१२ जामुन का सेवन करे तो उसके अग्न्याशय को शक्ति मिलती है और वह डायबिटीज का रोगी नहीं बनेगा। इसी प्रकार, ऋतुकाल में यदि कोई व्यक्ति दिन में पीपल के वृक्ष के ५ फल नित्य खाए तो उसकी स्मरण शक्ति तीव्र हो जाती हैं। ये सब बातें अंधविश्वास नहीं अपितु वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं। आयुर्वेद यह परीक्षण हजारों वर्ष पूर्व कर चुका था भारत!!

खेद की बात तो यह है कि आजकल तो ऋतु-फल का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है, क्योंकि कृत्रिम खाद व इंजेक्शनों द्वारा पूरे साल मौसम-बेमौसम की सब प्रकार की फल-सब्जियाँ उपलब्ध रहती हैं। पहले प्राकृतिक खाद का इस्तेमाल होता था और ऋतु व प्रकृति दोनों का स्वाभाविक प्रभाव फल-सब्जियों पर पड़ता था। इसलिए उनके सेवन से ही लाभ होता था। यह एक वैज्ञानिक सत्य है, कोई अंधविश्वास नहीं। यही कारण है कि फिर से आर्गेनिक फल-सब्जियाँ उगाई जाने लगी हैं, पर वे इतनी महंगी हैं कि आम आदमी की पहुँच से दूर हैं।

ऋतु परिवर्तन के समय मनुष्य के शरीर के रसायन बदलते हैं, साथ ही उसके शरीर में स्थित विशेष सूक्ष्म शरीर के चक्रों पर भी असर होता है। इसलिए ऋषि-मुनि उन दिनों उसी चक्र पर अधिक ध्यान देते थे जिस पर ऋतु विशेष का प्रभाव पड़ता था और वे इस प्रकार अपना आध्यात्मिक विकास करते थे। इस प्रकार भारत की छह ऋतुएँ हमारे आध्यात्मिक विकास में सहयोगी रही हैं। भारत को समझना हैं तो भारत को जीना होगा।

भारत की आध्यात्मिकता के पीछे एक और बड़ा कारण यह है कि यहाँ दो महत्त्वपूर्ण पर्वत श्रृंखलाएँ हैं- एक अरावली और दूसरी हिमालय यह एक अनुमोदित सत्य है कि अरावली विश्व की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला है और हिमालय विश्व की सबसे तरुण यह कोई मात्र संयोग नहीं है कि दुनिया की प्राचीनतम व तरुण दोनों श्रृंखलाएं भारत में ही हैं। इसके पीछे भी प्रकृति का अपना प्रयोजन है।

अरावली संसार १ की सबसे परिपक्व पर्वत श्रृंखला होने के कारण प्रकृति के ‘अग्नि-तत्त्व’ का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि ‘हिमालय’ प्रकृति के जल तत्त्व का द्योतक है। मनुष्य शरीर के लिए ये दोनों तत्त्व अति आवश्यक हैं। दोनों पर्वत शृंखलाओं ने भारत की संस्कृति को अपनाने में अपना विशेष योगदान दिया है। जिन लोगों ने अपने आध्यात्मिक विकास के लिए जल तत्व को प्रधानता दी, वे जीवन के रहस्यों की खोज में हिमालय की गोद में चले गए और वहाँ प्रकृति के रहस्यों को खोजा व जाना। जिन जिज्ञासुओं ने अग्नि तत्त्व को प्रधानता दी, ये अरावली के आँचल में चले गए और तपस्या की हिमालय के मनीषी ऋषि कहलाए और अरावली के मुनि पर दोनों ने ही जीवन के रहस्यों का विज्ञान खोजा और जाना।



अरावली और हिमालय के अतिरिक्त भारत की सप्त नदियों ने यहाँ के जनमानस को बड़ा प्रभावित किया है। इन सप्त नदियों में अलग-अलग देवताओं के तत्त्व प्रधान हैं, जैसे गंगा में शिव, गोदावरी में राम, यमुना में कृष्ण, सिंधु में हनुमान, सरस्वती में गणेश, कावेरी में दत्तात्रय और नर्मदा में माँ दुर्गा के तत्व विद्यमान हैं। सप्त नदियों में गंगा सबसे विशिष्ट है, जिसकी महत्ता विस्तार शिव की जटा कराती है। एक और ध्यान देने योग्य बात यह है कि सूर्य और चंद्र ग्रहण के समय इन नदियों में स्नान करना आध्यात्मिक दृष्टि से उत्तम माना गया है, क्योंकि उस समय सूर्य व चंद्रमा का पृथ्वी पर विशेष गुरुत्व आकर्षण होता है हिंदू मनीषियों ने उस समय विशेष मंत्रों का जाप भी बताया है।

भारत के कुछ पेड़-पौधों ने भी भारत की आध्यात्मिकता में बड़ा योगदान दिया है। तुलसी का पौधा भारत के घर आँगन का एक अभिन्न अंग रहा है। वैज्ञानिक भी अब इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि तुलसी एक बहुत हो संवेदनशील पौधा है। यदि तुलसी के आस-पास थोड़ी सी भी नकारात्मक या तीव्र गंध हो तो यह पौधा मुरझा जाता है। जिन घरों में तुलसी का पौधा नहीं लगता या पनपता या मुरझा जाता है तो समझ लीजिए कि उस घर का वातावरण दूषित है। इस दृष्टि से तुलसी का पौधा घर की आध्यात्मिकता का मापदंड भी है नीम का वृक्ष भी घर के आस-पास की नकारात्मकता को दूर करने में सहायक होता है। पीपल के वृक्ष की तो बात ही निराली है। यह वृक्ष भारतीय संस्कृति और इतिहास दोनों का अभिन्न अंग है। संभवतः इसीलिए भारत के सर्वोत्तम पुरस्कार ‘भारत रत्न’ को काँस्य से बने पीपल के पत्ते के रूप में प्रदान किया जाता है। यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि वातावरण की शुद्धि के लिए ऑक्सीजन बहुत आवश्यक है, पर शायद हममें से कई यह नहीं जानते कि पीपल एक ऐसा वृक्ष है जो चौबीसों घंटे प्राणदायी ऑक्सीजन छोड़ता है। संसार की समस्त वनस्पतियों की बात करें तो वृक्षों में पीपल और पौधों में केवल तुलसी ही ऐसे हैं जो रात-दिन ऑक्सीजन देते हैं। भारत के प्राचीन मनीषियों ने इसीलिए इन दोनों को चुनकर समाज का अंग बनाया यह चयन कोई संयोग नहीं था, अपितु वैज्ञानिक कारणों से उन्होंने ऐसा किया। यह बात अलग है कि आज हम इनके महत्त्व को किताबो में रखा है।कहते हैं, इन दोनों वनस्पतियों का आध्यात्मिक दृष्टि से भी काफी महत्त्व है। तुलसी के सतत उपयोग और पीपल के आस-पास रहने तथा उसके स्पर्श से मनुष्य के सात्त्विक गुणों का विकास होता है और शारीरिक व मानसिक क्षमता भी बढ़ती है। इस प्रकार भारत की आध्यात्मिकता के पीछे उसकी भौगोलिक विशिष्ट स्थिति, अरावली व हिमालय पर्वत शृंखलाओं सप्त नदियों, छह ऋतुओं तथा विशेष वनस्पतियों का बहुत बड़ा हाथ है। इन्हीं कारणों से भारत में आध्यात्मिकता सदा से बनी रही है। वर्तमान समय में भी अन्य देशों की अपेक्षा भारत में आध्यात्मिकता अधिक है। ऐसे में यदि अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान आदि से लोग शांति की खोज में भारत आ रहे है तो आश्चर्य कैसा? भारत की जनता निरंतर भारत माता की उपासक हैं, शक्ति नवरात्र का दर्शन भी भारत की शक्ति है। इस लिए भारत विश्वगुरु हैं। भारत माता का निरंतर गुनगान हो।

नमो नमो हे भारत माता।

नमो नमो हे भारत माता।
नमो नमो हे भारत माता।।

प्राची से उगता हुआ नारायण आदित्य भास्कर हो,
धरती का चुम्बन लेती हुई प्रकाशपुंज की लालिमा हो
भारत के भोर का प्रथम स्वर हो,
कण कण में ऊर्जा सा “राम राम राम ” हो।।

नमो नमो हे भारत माता।
नमो नमो …

अखंड भारत का प्रचंड संकल्प
शिव की जटाओं में समाया उत्तर भारत हो।
महाकाल को समर्पित दक्षिण भारत
वेद की ऋचाओं से अलंकृत मंत्र भारत माता हो।।

नमो नमो हे भारत माता।
नमो नमो…

मातृशक्ति उपासक नमो भारत,
लक्ष्मी अन्नपूर्णा नमो भारत।
काली दुर्गा स्वरूप नमो भारत,
शक्ति कुण्डलिनी आध्यात्म नमो भारत।।

नमो नमो हे भारत माता।
नमो नमो…

प्रताप सा शौर्य हो,संभाजी जैसा पुत्र हो,
प्रचंड आभा सा तिलक विट्ठल विट्ठल हो।
प्रणव से मंत्रमुद्ध हो, ऋषियों के तेज सा सूर्य हो
आव्हान तुम्हारा ओ भारत माता,
अभय हस्त मेरे शीश पर हो।

नमो नमो हे भारत माता।
नमो नमो…

मेरुदंड में प्राण प्रवाहित हो,
चेतनाशक्ति रूपी भारत माता ऊर्ध्वरेता हो।
साधना हो अखंडित बीज मंत्रों से अनुष्ठान हो,
ओ भारत माता आपसे ही पूर्ण आपमें पूर्णाहुति हो।।

नमो नमो हे भारत माता ।
नमो नमो…

यज्ञकुंड जैसा समर्पित जीवन हो,
प्राणों की मंत्रयुक्त आहुति हो।
अग्नि सा तेज समाया,
ओ भारत माता तुम्हारी साधना हो।

नमतैस्ये नमतैस्ये भारत माता हो ,
नमतैस्ये नमतैस्ये भारत माता हो।।

यही दिव्य भाव भारत माता को समर्पित हो।

परिवर्तन ही सत्य हैं!

हमारा एक पल कुछ ही देर में मिनटों का स्वरूप ले लेता है। मिनटों से घंटो का, वही घंटे दिन और रात में परिवर्तित हो जाते है। दिन और रातों का यह समय साल बनकर उभर कर आता हैं। कुछ साल बीतते है, वह आयुष्य का रूप साकार करने लगते हैं। मानव का आयुष्य काल चक्र में बंधा हुआ है। कल यही नियम परिवर्तन है।मानव जाति विनाश की ओर अग्रसर हो रही है। मानव जीवन एक व्यस्त रोगी सा प्रतित होता नजर आता है। यह विश्व की सुन्दर रचना सर्व शक्तिमान प्रभु ने की हैं। वही हमारा निर्माता है तो विनाश कर्ता भी वही है। हमे समझना है, मानव का अस्तित्व क्या है? मनुष्य जन्म का प्रयोजन क्या है?

किसी वस्तु के संबंध में विचार करने के लिए यह आवश्यक है। कि उसकी कोई मूर्ति हमारे मनःक्षेत्र में हो। बिना कोई प्रतिमूर्ति बनाये मन के लिए किसी भी विषय में सोचना असम्भव है। मन की प्रक्रिया ही यही है कि पहले वह किसी वस्तु का आकार निर्धारित कर लेता है, तब उसके बारे में कल्पना शक्ति काम करती है। समुद्र भले ही किसी ने न देखा हो, पर जब समुद्र के बारे में कुछ सोच-विचार किया जाएगा, तब एक बड़े जलाशय की प्रतिमूर्ति मनःक्षेत्र में अवश्य रहेगी। भाषा-विज्ञान का यही आधार है। प्रत्येक शब्द के पीछे आकृति रहती है। ‘कुत्ता’ शब्द जानना तभी सार्थक है, जब ‘कुत्ता’ शब्द उच्चारण करते ही एक प्राणी विशेष की आकृति सामने आ जाए। न जानी हुई विदेशी भाषा को हमारे सामने कोई बोले तो उसके शब्द कान में पड़ते हैं, पर वे शब्द चिड़ियों के चहचहाने की तरह निरर्थक जान पड़ते हैं। कोई भाव मन में उदय नहीं होता कारण यह है कि शब्द के पीछे रहने वाली आकृति का हमें पता नहीं होता। जब तक आकृति सामने न आए, तब तक मन के लिए असम्भव है कि उस संबंध में कोई सोच विचार करे।

ईश्वर या ईश्वरीय शक्तियों के बारे में भी यही बात है। चाहे उन्हें सूक्ष्म माना जाए या स्थूल, निराकार माना जाए या साकार, इन दार्शनिक और वैज्ञानिक मामलो में पड़ने से मन को कोई प्रयोजन नहीं। उससे यदि इस दिशा में कोई सोच-विचार का काम लेना है, तो कोई आकृति बनाकर उसके सामने उपस्थित करनी पड़ेगी। अन्यथा वह ईश्वर या उसकी शक्ति के बारे में कुछ भी न सोच सकेगा। जो लोग ईश्वर को निराकार मानते हैं, वे भी ‘निराकार’ का कोई न कोई आकार बनाते हैं। आकाश जैसा निराकार, प्रकाश जैसे तेजोमय, अग्नि जैसा व्यापक, परमाणुओं जैसा अदृश्य। आखिर कोई न कोई आकार उस निराकार का भी स्थापित | करना ही होगा। जब तक आकार की स्थापना न होगी, मन, बुद्धि और चित्त से उसका कुछ भी संबंध स्थापित न हो सकेगा।

इस सत्य को ध्यान में रखते हुए निराकार, अचिन्त्य बुद्धि से अलभ्य, वाणी से अतीत, परमात्मा का मन से संबंध स्थापित करने के लिए भारतीय आचार्यों ने ईश्वर की आकृतियाँ स्थापित की हैं। इष्टदेवों के ध्यान की सुन्दर दिव्य प्रतिमाएँ गढ़ी हैं। उनके साथ दिव्य वाहन, दिव्य गुण, स्वभाव एवं शक्तियों का संबंध किया है। ऐसी आकृतियों का भक्तिपूर्वक ध्यान करने से साधक उनके साथ एकीभूत होता है, दूध और पानी की तरह साध्य और साधक का मिलन होता है। भृङ्गी, झींगुर को पकड़ कर ले जाती है और उसके सामने भिनभिनाती है, झींगुर उस गुंजन को सुनता है और उसमें इतना तन्मय हो जाता है कि उसकी आकृति बदल जाती है और झींगुर भृङ्गी बन जाता है। दिव्य कर्म स्वभाव वाली देवाकृति का ध्यान करते रहने से साधक में भी उन्हीं दिव्य शक्तियों का आविर्भाव होता है। जैसे रेडियो यन्त्र को माध्यम बनाकर सूक्ष्म आकाश में उड़ती फिरने वाली विविध ध्वनियों को सुना जा सकता है, उसी प्रकार ध्यान में देवमूर्ति की कल्पना करना आध्यात्मिक_रेडियो स्थापित करना है, जिसके माध्यम से सूक्ष्म जगत् में विचरण करने वाली विविध ईश्वर शक्तियों को साधक पकड़ सकता है। इसी सिद्धान्त के अनुसार अनेक इष्टदेवों की अनेक आकृतियाँ, साधकों को ध्यान करने के लिए बताई गई हैं। जहाँ अन्य प्रयोजनों के लिए अन्य देवाकृतियाँ हैं वहाँ इस विश्व ब्रह्माण्ड को ईश्वरमय देखने के लिए ‘विराटरूप’ परमेश्वर की प्रतिमूर्ति विनिर्मित की गई है। मनुष्य की सारी आत्मोन्नति और सुख-शान्ति इस बात पर निर्भर है कि उसका आन्तरिक और बाह्य जीवन पवित्र एवं निष्पाप हो, समस्त प्रकार के क्लेश, दुःख, अभाव एवं विक्षोभों के कारण मनुष्य के शारीरिक और मानसिक पाप हैं। यदि वह इन पापों से बचता जाता है तो फिर और कोई कारण ऐसा नहीं जो उसकी ईश्वर प्रदत्त अनन्त सुख-शान्ति में बाधा डाल सके। पापों से बचने के लिए ईश्वरीय भय की आवश्यकता होती है। ईश्वर सर्वत्र व्यापक है इस बात को जानते तो सब हैं, पर अनुभव बहुत कम लोग करते हैं। जो मनुष्य यह अनुभव करेगा कि, ईश्वर मेरे चारों ओर छाया है और वह पाप का दण्ड अवश्य देता है। जिसके यह भावना अनुभव में आने लगेगी, वह पाप न कर सकेगा। जिस चोर के चारों ओर सहस्र पुलिस घेरा डाले खड़ी हो और हर तरफ से उस पर आँखें गड़ी हुई हों, वह ऐसी दशा में भला किस प्रकार चोरी करने का साहस करेगा ?

परमात्मा की आकृति चराचरमय ब्रह्माण्ड में देखना ऐसी साधना है, जिसके द्वारा परमात्मा के अनुभव करने की चेतना जागृत हो जाती है। यही विश्वमानव की पूजा है, इसे ही विराट् दर्शन कहते हैं। रामायण में भगवान् राम ने अपने जन्म-काल में कौशल्या को विराट् रूप दिखलाया था। उत्तराखण्ड में काकभुशुण्ड जी के संबंध में वर्णन है कि वे भगवान् के मुख में चले गये तो वहाँ सारे ब्रह्माण को देखा। भगवान कृष्ण ने भी इसी प्रकार कई बार विराट् रूप दिखाये। मिट्टी खाने के अपराध से मुँह खुलवाते समय यशोदा को विराट् रूप दिखाया, महाभारत के उद्योग पर्व में दुर्योधन ने भी ऐसा ही रूप देखा। अर्जुन को भगवान् ने युद्ध के समय विराट्रूप दिखाया, जिसका गीता के ११ वें अध्याय में सविस्तार वर्णन किया गया है।

इस विरारूप को देखना हर किसी के लिए सम्भव है। अखिल (विश्व ब्रह्माण्ड में परमात्मा की विशालकाय मूर्ति देखना और उसके अन्तर्गत उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गों के रूप में समस्त पदार्थों को देखने, प्रत्येक स्थान को ईश्वर से ओत-प्रोत देखने की भावना करने से भगवद् बुद्धि जागृत होती है। और सर्वत्र प्रभु की सत्ता से व्याप्त होने का सुदृढ़ विश्वास होने से मनुष्य पाप से छूट जाता है। फिर उससे पाप कर्म नहीं बन सकते। निष्पाप होना इतना बड़ा लाभ है कि उसके फलस्वरूप सब प्रकार के दुःखों से छुटकारा मिल जाता है। अन्धकार के अभाव का नाम है प्रकाश और दुःख के अभाव का नाम है- आनन्द । विराट् दर्शन के फलस्वरूप निष्पाप हुआ व्यक्ति सदा अक्षय आनन्द का उपभोग करता है।

मनुष्य वह है, जो सर्व शक्तिमान परमपिता परमात्मा के तेज और वैभव का सर्वोच्च प्रतीक है। परम पिता परमात्मा ने अपना सभी कौशल्य शक्ति को एक जगह क्रेंद्रित कर के इस बड़े ब्रम्हांड की रचना की हैं। ईश्वर हमारे लिए ही है, और यह रचना हम सभी के लिए है। वही मनुष्य आज आत्महत्या का आश्रय लेता प्रतीत होता है। नकारात्मकता मनुष्य को निरूत्तसाह बना रही है। यही विनाश का कारण है। यही विचार संस्कृति का अपहरण कर रहा हैं। शिव रूप साकार इस सृष्टि को नष्ट करने का कुचलने का प्रयास मानव द्वारा हो रहा हैं। इस समय निर्माण कर्ता परमात्मा कैसे शांत रहे? इस समय भगवान श्रीकृष्ण की वो, “यदा यदा हि धर्मस्य” प्रतिज्ञा की पुनः वृत्ति तो होकर रहेगी। कालचक्र अपने परिवर्तन में मग्न है, परिवर्तन ही अखंड है। परिवर्तन ही नियम हैं। भगवान सही समय पर युग अवतरण की बेला को जाग्रत करते रहते हैं। जिस समय परेशानी के बादल मंडराते रहते है, उस समय भगवंत किसी ना किसी रूप में हमारी मदद करने के लिए आते है, और अवतार धारण करते है। यह संतुलन संभालने के सुक्ष्म सृष्टि में दिव्य चेतना का निर्माण होना संभव होता है। सृष्टि निर्माण के आदि काल में केवल पानी ही था। इसका उल्लेख कुछ ग्रंथो ,पुराणों में मिलता है। उस समय मत्स्यावतार का अवतरण हुआ था। उसके बाद अनेकों अवतारो की श्रृंखला का अवतरण इस धरा पर निरन्तर चलता आ रहा हैं। जब जब इस धरा पर हलचल बढ़ती हैं, तो उस उग्ररूप धरि भगवान नृसिंह को कैसे भुल सकते है? उनका पराक्रम अपने ही चरम स्थान पर मंडराता हुआ प्रतित होता हैं। उस समय संस्कृती की आदिम अवस्था को ध्यान में रखते हुए मानव और सिंह का जो समन्वय रूप नृसिंह अवतार हुआ था। दृष्टता को कुचलने के लिए यह अवतार धारण हुआ हैं। जब पशुसुलभ प्रवृत्ति बढ़ती है,और स्वार्थ की भावना बढ़ती हैं,अंहकार का नाश करने के लिए दान शुरो को प्रवृत्त करने के लिए वामन अवतार का आगमन इस धरती पर हुआ। भगवान परशुराम ,मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम प्रभु, श्रींकृष्ण, बुद्ध इन महापुरुषों के अवतार इसी क्रम में हुए हैं। इन भगवतीय सत्ता का पुनः अवतरण अत्याचार का समूल नाश करने के लिए हुआ था,और यही उद्देश रहा होगा। भगवान् परशुराम ने सामंतवादी राजेशाही को घुटने टेकने पर मजबूर किया तो , प्रभू श्रीरामचंद्र जी ने मर्यादा का पालन करते हुए अनीति का विरोध किया। धर्मतत्व में अनेक विकृति को देखते हुए भगवान बुद्ध ने धर्म व्यवस्था को महत्व देकर ” धम्म शरणम् गच्छामि” का अहसास समस्त मानव जाति को करवाया।

इन सभी अवतारों का प्रयोजन एक ही है, दृष्टो का सर्वनाश और धर्म की स्थापना।आज की स्थिति कुछ भिन्न दिखाई पड़ती है। यह काल दृष्ट असुरो का नही है। यह काल भ्रष्ट लोगों का दिखाई पड़ता है। इस लिए शस्त्र युक्त भगवान् की अवतरण का समय नहीं अपितु दृष्टो के नाश के लिए युगचण्डी का साक्षात्कार होना अनिवार्य है। विकारों को जीतकर भावना में अंश मात्र रहे हुए भ्रष्ट वृत्ति का नाश करना महत्व पूर्ण है। यह जटिल कार्य संपन्न करने के लिए भगवती आद्यशक्ति को अवतरित होना होगा। यह समय युगपरिवर्तन के रणांगन में जो “धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे” इस विशाल भूभाग पर है, उसी का दूसरा नाम है “जनमानस”। इसी क्षेत्र में परिष्कार, परिवर्तन, शुद्धिकरण की आवश्यकता होगी। यह क्षेत्र सेनापति का होगा। सेनापति का ध्येय होगा, जनमानस ,समष्टि मन अंत कारण की शुद्धता और विकास। आज की समस्या का समाधान बाहरी खोज के ऊपर नहीं हो सकता है। वैचारिक और भावनीक प्रवाह को बदलकर उनको सही दिशा देना ही यही विकल्प सही होगा। तभी विचारो की उच्च श्रृंखला ओ का नया परिवर्तन संभव होगा। बुद्धि में सदबुद्धि का विकास बीज अंकुर लेगा यही आध्यात्म का जीवन लक्ष्य हैं। आध्यात्म विकास में मुख्य तत्व जो कार्य करता है, वो है “गायत्री”। गायत्री मंत्र दिव्य शक्तियों से ओतप्रोत हैं। गायत्री मंत्र के चौबीस रूप चौबीस अक्षरों में मिले हुए हैं। आध्यात्म का वह प्राण उदगम मेरुदंड हैं। यज्ञोंपवित भी गायत्री हैं। “ब्रम्हविद्या” तत्वज्ञान और ब्रम्हवर्चस के तपविधान का उगम केंद्र है गायत्री।

इस महाशक्ति का उदगम विश्व पटल पर भारत भूमि है सामान्यत इसी क्षेत्र पर उसका सर्वाधिक प्रभाव देखा गया हैं।अन्य क्षेत्र पर उसका प्रभाव कम अधिक प्रमाण में देखा जाता है। आध्यात्म के अधिक प्रभाव उसके उच्च भाव में देखा जाता है। परमाणु कितना भी सुक्ष्म रहता है, पर उसकी भीतर रहने वाली शक्ति की गति उससे भिन्न होती हैं। गायत्री मंत्र भी परमाणु की तरह ही हैं।गायत्री मंत्र केवल 24 अक्षरों का प्रतित होता हुए भी,उस मंत्र का अतुल्य सामर्थ्य उसके भीतर मौजूद है।

इस मंत्र के दो पक्ष है।

1. ज्ञान

2. विज्ञान

ब्राम्ही चेतना इसी दो रूपों में प्रकट हुई हैं। ज्ञान पक्ष उच्च कोटि का तत्त्वज्ञान, ब्रह्मविद्या, ॠतंभरा प्रज्ञा के नामों से प्रसिद्ध है। मानव की ईच्छा ,आकांक्षा, श्रद्धा भावना इनको उत्कृष्ट गति देने के लिए ज्ञान पक्ष का उपयोग होता है। मानवी IQ का विकास भी इसी आधार पर होता है। गायत्री के दूसरे विज्ञान पक्ष उपासना और साधना की अनेकों विधियो से भरा हुआ है। ऐरोस्पेस में मानवी सत्ता की महान संभावना प्रसूप्त स्थिति में हैं। जिनको एक तरीके से “टू कॉपी” कहना पड़ेगा। इसी प्रसुप्त सामर्थ्य को जाग्रत कर अनेक चमत्कार करना संभव हैं। मनुष्य सामान्यता 5 फिट, 6 फिट और 50 kg और 60 kg के आसपास खतापिता रहता प्रतित होता हैं और जीवन जीता हैं। पर उसकी चेतना, उसकी मूलसत्ता उसके अंतः करण में गुप्त तरीके से निवास करती है। उस चेतना के विकास के लिए जिस तरीके का वातावरण ,संस्कार रहते है, उसी स्वरूप में चेतना धारण करती है। व्यक्ति की गति और अधोगति उसके अंतः करण की चेतना पर आधारभूत होते है। चेतना विकास के लिए केवल भौतिक वस्तुओं से उसका विकास संभव नहीं है।चेतना विकास के लिए सचेतन उपचार ही सफल है। इसे “आध्यात्म विज्ञान” कहते है। उपासना का अर्थ है, मनुष्य की महानता इंद्रिय नियंत्रण अर्थात प्रत्याहार में हैं। तभी उपासना फलद्रूप और परिपक्व होती है। यही शक्ति अवतरण की कल्याणी वेला त्रिपदा नाम से तीन धाराओं के स्वरूप में प्रवाहित होगी। जो महास्वरस्वती, महालक्ष्मी, महाकाली के रूप में उदय होगी। तिन्ही शक्तियों की उपस्थिति में मंत्ररूप में अंतः करण का विकास और आध्यात्म नवस्फूरण का अंकुर उगेगा। आज विकृति अपने चरम स्थान पर मंडराती हुई है। अनास्था, अश्रद्धा को खत्म करने के लिए चेतना विकास और जनमानस परिष्कार यही उत्तम उपाय है। यही उज्ज्वल भविष्य का केंद्र है। यही ब्राम्ही चेतना का अवतरण श्रद्धा और सद्भावना की प्रतिस्थपना के रूप में दिखाई पड़ रही है। यही कोलाहल ब्रम्ह अवतरण का सही समय है। यही युगशक्ति प्रथम ब्रम्ह रूप में अवतरित हुई हैं। यह ब्रम्ह शक्ति आगे भावना के स्तर पर विभाजित हुई जिसे सात ऋषियों के नामों से पहचाना जाता हैं। वही सप्तश्री सृष्टि के परम वैदिक वैज्ञानिक के रूप में सिद्ध हुए। प्रस्तुत गायत्री मंत्र में विनियोग उदघोष गायत्री छंद, सविता देवता और विश्वामित्र ऋषि का उल्लेख मिलता है। यह युग अवतरण की श्रृंखला अपितु भिन्न दिखाई पड़ती है, परंतु अलंकारिक दृष्टि से यही मुख्य संदर्भ है। अध्यात्म और विज्ञान के विग्रह जिस सर्वनाशी संभावना का सूत्र पात किया है। उसकी प्रथम झाँकी आस्था संकट के रूप में सामने है। आदर्शवादी मूल्यों के गिर जाने से मनुष्य विलासी, स्वार्थी ही नहीं अपराधी बनता और गरिमा को निरन्तर खोता चला जा रहा है। उसके पतन-पराभव तो हुआ ही है, समूचे समाज को समस्याओं, विपत्तियों और बिभीषिकाओं का सामना करना पड़ रहा है। अभी पानी गुनगुना भर हुआ है, अगले दिनों जब वह उबलेगा, भाप बनेगा और बन्द बर्तन को फाड़ कर विस्फोटक रौद्र रूप का परिचय देगा तो दिल दहलाने वाली आशंकायें सामने आ खड़ी होंगी। आवश्यकता है कि समय रहते समाधान सोचा जाय और विपन्न वर्तमान के भयानक भविष्य का रूप धारण करने से पूर्व ही स्थिति को संभाल लिया जाय ।

अध्यात्म की अपनी शाश्वत सत्ता है किन्तु विज्ञान ने भी अपनी सामयिक प्रौढ़ता उत्पन्न कर ली है। दोनों लड़ेंगे तो सुन्द-उपसुन्द दैत्य बन्धुओं की तरह एक दूसरे का विनाश करके अन्ततः ऐसी रिक्तता उत्पन्न करेंगे जिसे फिर से भर सकना असम्भव नहीं तो अत्यधिक कठिन अवश्य होगा। विग्रह को सहयोग में बदल देना है, तो कठिन काम, पर उसे किसी न किसी प्रकार करना ही होगा। इसके अतिरिक्त महामरण ही एकमात्र विकल्प है। अस्तु उसे किया ही जाना चाहिए, करना ही चाहिए। देव और दैत्य मिलकर समुद्र मन्थन करने में तत्पर हुए और चौदह बहुमूल्य रत्न उपलब्ध करने के अधिकारी बने। उसी उपाख्यान की पुनरावृत्ति के रूप में अध्यात्म और विज्ञान को परस्पर सहयोग करने और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनायें साकार करने पर सहमत किया जा सकता है।

सूर्य नमस्कार

सूर्य रश्मि चिकित्सा

सूर्य का महत्त्व समझाने के लिए हमारे धर्म ग्रंथों में अनादि काल से वर्णन है। परंतु एक बात पक्की है कि यह हमें प्राचीन समय से अपनी ओर आकर्षित करता आया है। हम पिछले युगों में जाएँ या आज के युग की बात करें, सूर्य हमेशा जीवनदायिनी ऊर्जा देता आया है। सूर्य के बारे में जानने के लिए आज का वैज्ञानिक दिन-रात एक कर रहे हैं, जबकि हमारे ऋषि-मुनि इसकी दिव्यता और उसका उपयोग करना भी जानते थे। सूर्य मात्र हमारे शरीर को ही नहीं हमारे सूक्ष्म शरीर को भी अपनी चैतन्य शक्ति से जीवंतता प्रदान करता है। वैज्ञानिक इसे आग का गोला कहें अथवा कोई ग्रह परंतु प्राचीन काल में ही इसके अनेक रहस्यों को हमारे मनीषियों ने समझ लिया था और उसका उपयोग करने
की कला को जन-कल्याण तक पहुँचाया था परंतु अब सूर्य का ज्ञान लुप्तप्राय है।

यहाँ पर हम थोड़ी सी चर्चा सूर्य के रहस्य को समझाने के लिए करना चाहते हैं, ताकि हम जब सूर्य नमस्कार करें तो हमारे मन में श्रद्धा, लगन और आस्था प्रकट हो और हम उससे लाभान्वित हो सकें।
पाठकगण शायद जानते हों कि बनारस में एक बहुत बड़े संत हुए हैं।
जिनका नाम था स्वामी विशुद्धानंद परमहंस और उनके शिष्य थे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचार्य गोपीनाथ कविराज। चूँकि कथानक काफ़ी विस्तृत है, अतः हम सिर्फ इतना बताना चाहेंगे कि उन्होंने हिमालय के किसी गुप्त आश्रम (ज्ञानगंज आश्रम) में जाकर 12 वर्ष की कठिन साधना की। इसके बाद सन् 1920 के आस-पास वापस बनारस आकर सूर्य विज्ञान का चमत्कार इस पूरे विश्व को बताकर आश्चर्यचकित कर दिया था। लोगों ने दाँतों तले अंगुलियाँ दबा लीं थीं। सैकड़ों शिष्यों के सामने वे सूर्य विज्ञान द्वारा एक वस्तु को दूसरी वस्तु में रूपांतरित कर दिया करते थे, जैसे कपास को वे फूल, पत्थर, ग्रेनाइट,हीरा, लकड़ी आदि कुछ भी बनाकर दिखा देते थे। यहाँ तक कि उन्होंने एक बार मृत चिड़िया को जीवित कर दिया था। यह आश्रम आज भी हिमालय में स्थित है। यह वृत्तांत लेखक पॉल वंटन की पुस्तक मे है। यह दृष्टांत बताने के पीछे यह उद्देश्य हैं की सूर्य के प्रति आपकी जिज्ञासा और आस्था बढ़े। ताकि हम उस सुर्य से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर सकें।

सूर्य नमस्कार की एक आवृत्ति में 12 स्थितियाँ हैं। प्रत्येक आसन का -अपना एक मंत्र है। प्रत्येक क्रिया का अपना एक लाभ है। हम तो इतना कहेंगे कि नया जीवन चाहिए, तो सूर्य नमस्कार कीजिए।
प्रतिदिन नियम से किया जाने वाला सूर्य नमस्कार अन्य व्यायामों की अपेक्षा ज्यादा लाभकारी है। सूर्य देव का वर्णन हम जितना करें, कम है। अतः हम सूर्य देव को नमस्कार करने की पद्धति का वर्णन करेंगे।
सूर्य नमस्कार करने का मुख्य कारण संभवतया उसके द्वारा जीवनदायिनी ऊर्जा मिलना और उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना रहा है। सूर्य में स्थापित अकृत्रिम प्रतिमा को या यूँ कहें कि सूर्यदेव को अर्ध्य समर्पित करने का प्रचलन आदिकाल से रहा है, जब इस भारत-भूमि के प्रथम चक्रवर्ती राजा भरत सूर्य में स्थित जिनालयों को नमस्कार किया करते थे। किन्हीं कारणों से इसका प्रचार-प्रसार अधिक नहीं हो पाया परंतु दक्षिण भारत के आचार्यों ने इसे आत्मसात् किया और इस विद्या को जीवंत रखा। जब वे शेष भारत के तीर्थों पर भ्रमण हेतु आते तो वहाँ भी नित्यकर्म में सूर्य नमस्कार करते थे। तीर्थ स्थानों की जनता उन्हें देखकर सूर्य नमस्कार की विधि का अनुसरण करती थी। इस प्रकार पुनः संपूर्ण भारत वर्ष में सूर्य नमस्कार का प्रचार-प्रसार हुआ।

शिवाजी महाराज को उनके गुरु समर्थ रामदास ने सूर्य नमस्कार की विधि सिखाई जिसका उन्होंने अभ्यास किया और परिणामस्वरूप उनका शरीर एवं चरित्र इतिहास में अद्वितीय है। शिवाजी महाराज ने अपने सैनिकों को सूर्य नमस्कार की विधि सिखाई और इस प्रकार सूर्य नमस्कार की विधि का प्रचार-प्रसार बढ़ा। ‘सूर्य नमस्कार’ के द्वादश आदर्श बीज मंत्र एवं क्रिया मंत्र होने के कारण बारह अंकों के सूर्य नमस्कार की वैज्ञानिकता बढ़ जाती है।

महत्त्व हमारे ऋषियों ने मंत्र और व्यायामसहित एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जिसमें सूर्योपासना का भी समन्वय हो जाता है। इसे सूर्यनमस्कार कहते हैं। इसमें कुल १० आसनों का समावेश है। हमारी शारीरिक शक्ति की उत्पत्ति, स्थिति तथा वृद्धि सूर्य पर आधारित है। जो लोग सूर्यस्नान करते हैं, सूर्योपासना करते हैं वे सदैव स्वस्थ रहते हैं। सूर्यनमस्कार से शरीर की रक्तसंचरण प्रणाली, श्वास-प्रश्वास की कार्यप्रणाली और पाचन प्रणाली आदि पर अधिक प्रभाव पड़ता है। यह अनेक प्रकार के रोगों के कारणों को दूर करने में मदद करता है। सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास से शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति के साथ विचारशक्ति और स्मरणशक्ति तीव्र होती है। पश्चिमी वैज्ञानिक गार्डनर रॉनी ने कहा: “सूर्य श्रेष्ठ औषध है। उससे सर्दी, खाँसी, न्यूमोनिया और कोढ़ जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।” डॉक्टर सोले ने कहा : “सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है उतनी संसार की अन्य किसी चीज़ में नहीं।”

आदित्य ह्रदय

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।

केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ।।



सवितृमण्डल के भीतर रहनेवाले, पद्मासन में बैठे हुए, केयूर, मकर कुण्डल, किरीटधारी तथा हार पहने हुए, शंख-चक्रधारी, स्वर्ण के सदृश देदीप्यमान शरीवाले भगवान नारायण का सदा ध्यान करना चाहिए।’ (आदित्य हृदय : १३८)

गायत्री मंत्र के भाष्य का विस्तार चार वेद हैं। वेद के हर एक मंत्र एक एक छंद ,ऋषि और देवता है। उनका स्मरण कर विनियोग करना आवश्यक है। इसी तरह गायत्री मंत्र के भी छंद गायत्री है, ऋषि विश्वामित्र, और देवता सविता है। सविता का अर्थ होता है “सुर्य”। गायत्री ही सुर्य की अधिष्ठात्री देवता हैं। सूर्य उपासना को ” सूर्य नमस्कार” के नाम से जाना जाता हैं। मानवी शरीर प्रकृति का अद्भुत वरदान है। इसी शरीर में मातृसत्ता का जागरण होता हैं। इस मातृभाव को हमे सहेज कर रखना होगा। इस शरीर को निरोगी रखना का हमारा परम कर्तव्य हैं। शरीर के भीतर मौजूद अनंत ऊर्जा को योग्य रूप देना होगा। सूर्य उपासना का अंतिम चरण सूर्य ध्यान होता हैं। जो गायत्री के उस मातृशक्ति को शरीर के उन अंगों पर स्थापित करना होता है। मातृशक्ति उपासना का श्रेष्ठ उदाहरण और क्या हो सकता हैं? सूर्य तेज अग्नि का प्रतीक है। ध्यान इस सुंदर प्रक्रिया में प्रकाश के तेजोवलय से समन्वय स्थापित करने पर ही गायत्री की पूर्णाहुति संपन्न होती है। यज्ञाग्नि में आहुति देने से गायत्री पुरश्चरण का अभिन्न अंग माना जाता है। सूर्य उपासना केवल कल्पना नहीं अपितु सविता और सावित्री को शरीर में स्थापित करने का अनोखा विज्ञान है। अग्नि तत्व का प्रतीक है “सूर्य देवता”, और चेतन का स्थूल रूप है “सविता”। इस सूर्य नमस्कार का मुख्य उद्देश है, इस जड़ शरीर के द्वारा चेतनात्मक प्रशिक्षण संस्कारो को जाग्रत करना है। ब्रम्ह तेज को सविता कहा जाता है। यह सविता शक्ति ब्रम्हाण्डीय चेतना का रूप हैं। यह प्रखर तेज सविता सर्वत्र व्याप्त है। उस परम शक्ति आत्मचेतना से घनिष्ठता साध्य करने के लिए प्रतीक रूप में सूर्यस्वरुप अग्निपिंड की उपासना अनिवार्य हैं। सूर्य उपासना यह ब्रम्ह तेज अवतरण की प्रक्रिया का वह बीज है, जिसे आत्मचेतना को दिव्य भूमि पर अंकुरित करना होता है। पृथ्वी को आत्मा और सुर्य को ब्रम्ह तेज की उपमा दी गईं है। पृथ्वी और सुर्य का समन्वय “सुर्य नमस्कार” साधना से ही संभव है। जिसे कुण्डलिनी विज्ञान में मूलाधार से चेतना सुषुम्ना मार्ग से होती हुई कपाल तक की जागरण प्रक्रिया है “सुर्य नमस्कार”। पृथ्वी पर जो जीवन का आधार है, वह केवल सूर्य की ऊर्जा से प्राप्त हुआ है। सूर्य इस जगत की आत्मा है।

जिस प्रकार से पृथ्वी पर सूर्य केंद्र से जीवनी शक्ति का वर्षाव होता है, वैसे ही आत्मारूपी इस शरीर पर ब्रम्ह तेज प्राण सत्ता का वर्षाव होता हैं, सुर्य नमस्कार से। इसी उपासना से अंतः करण शुद्धता होती हैं। इस में कोई संशय नहीं है। वह सुर्य शक्ति अर्थात् सविता, यहीं प्रत्यक्ष में “ब्रम्हतेज” हैं। शास्त्रोंकारो ने गायत्री सद्बुद्धि , रितंभरा प्रज्ञा की देवता है तो प्राण और सविता इसी प्रयोजन की पुर्तता करते है। शास्त्र वचन में इसे त्रिकोण भूमिति जैसा सम्बध जताया है।

“यो वै सः ऐषा सा गायत्री”।

शतपथ (1/3/5/15)

जो प्राण हैं वही “गायत्री” अंतः चेतना है।

“प्राण एव सविता विद्युदेव सविता”

शतपथ (7/7/9)

प्राण भी सविता है, विद्युत भी सविता है।

यहा कुछ समझने वाली बात यह हैं , की सविता अर्थात तेज भौतिक अग्नि वा प्रकाश यह तो हैं, इसका मुख्य उद्देश है, अंतः चेतना ब्रम्हतत्व स्वरूप हैं। सविता के उस परम तेजस्वी तेज ब्रम्ह तत्त्व के शिवाय और दूसरा कोई तेज नही हो सकता है। यही चेतना रूपी प्रकाश सविता सूर्य विश्व जीवन के ज्ञान का केंद्र माना जाता हैं, साथ ही साथ भौतिक विज्ञान का भी केंद्र यही हैं। इसकी धारना करना मुनष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन है। चार वेद में जो मंत्र,ऋचा आदि हैं वह अंतः चेतना सविता शक्ति का विवेचन ही हैं। सूर्य उपासना, सुर्य नमस्कार यह तप साधना हैं। तपग्नी के साथ श्रद्धा का अनोखा स्थान इस उपासना को संपन्न बनाते हैं। यही सविता देवता सब के उपास्य, लक्ष्य और इष्ट हैं। जो प्रत्येक श्वास से मित्र बनकर कुंभक में हिरण्यगर्भ का दर्शन मेरुदंड में चेतना का संचार होकर आदिदेव भास्कर को नमन कर रेचक श्वास के साथ अपनी प्रतीति प्रदान कराता है। इसके लिए पुरुषार्थ का अनोखा जोड़ अनिवार्य है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने सविता देवता की उपासना पद्धति का वर्णन किया है। सूर्यध्यान में अवर्णित भाव को पल्लवित किया है, “मैं ओमकार स्वरूप भगवान को नमस्कार करता हूं। हे भगवान! आप समस्त विश्व की आत्मा और काल स्वरूप हो। समस्त प्राणी चर अचर में आपका ही निवास हैं। यह सुंदर भाव भगवान को अर्पित किए है।

सूर्य उपासना

यही सूर्य देवता असमान्य रहस्यमय शक्ति का उपयोग यंत्र के माध्यम से उपभोग लिया जा रहा है। अपारंपरिक ऊर्जा का स्रोत के रूप में इस ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा हैं। यह केवल ऊर्जा का ही नहीं अपितु अनेक शक्तियों का भण्डार है। जिसमे भौतिक विज्ञान के light theropy और ultra sound theropy ( मंत्र विज्ञान ) का ज्ञान समाया है। अगणित जीवनीशक्ति को निरोगी जीवन जीने के लिए महत्व पूर्ण है। इस का संपर्क संबंध स्थापित करके सानिध्य प्राप्त कराने में सक्षम हैं। यह शक्ति भौतिक प्रयोजन अंतः विकास गायत्री शक्ति कहलाती हैं। सुर्य नमस्कार का यह चक्र उस धन्यवाद के भाव को प्रज्वलित करता है जो,

नमस्ते देवी गायत्री , सावित्री त्रिपदेक्षरे

        (वशिष्ठ संहितार्थ वांत्रिक)

यह तीनों पदों की गायत्री , सावित्री देवी तुम्हे नमन।

यह सुर्य उपासना की अलग अलग श्वास पूरक , रेचक से लेकर भिन्न भिन्न शारिरिक स्थितिया वैज्ञानिक आधार हैं। नमस्कारासन से भुंजगासन से हस्तोतादासन अन्य अनेक योगासन की दिव्य श्रृंखला षटकुक्षी है। षटकुक्षी का अर्थ होता हैं , षटचक्रों का जागरण। सुर्य उपासना सुर्य नमस्कार से शरीर के भीतर के शक्ति केंद्र का जागरण होता हैं। मां कुण्डलिनी षटचक्रों का भेदन करती ब्रम्हारंध्र में गमन करती है। इस लिए यह षटकुक्षी का द्वार कहा जाता है। मंत्र के साथ जब यह साधना 12 अंगों में पूर्ण की जाती है तो, प्राण शक्ति का उत्थापन इस विद्या के द्वारा किया जाता है। इन्ही मंत्रो में प्राणशक्ति अभिभूत है। परिणामी साधक जब सिद्धि मार्ग पर अग्रसेर होता है, तो परब्रम्ह महाप्राण वह अपने वह अपने शरीर में अंतः करण में धारण करने की विधि है सुर्य नमस्कार। जब यह महाप्राण शरीर क्षेत्र में अवतरित होता हैं तो, साधक को आरोग्य, आयुष्य तेज ,ओज, बल, पराक्रम पुरूषार्थ प्राप्त होता हैं। मन क्षेत्र में उत्साह , स्फूर्ति, प्रफुल्लता ,साहस , एकाग्रता, स्थिरता , धैर्य, संयम इ. दिव्य गुणों का साक्षीदार बनाता है। परमात्मा का प्रधिनिधि सम्मान साधक को प्राप्त होता है। यही आत्मकल्याण ध्येयप्राप्ति का राजमार्ग है। सुर्य उपासना साक्षात महाप्राण को साधना ही है, यही सर्वत्र चर अचर हैं।

हर सुबह नया जन्म हर रात एक मृत्यु।

मानव जीवन में समय का अलग ही महत्व है। समय किसी के भी वश में नहीं है। समय का चक्र निरंतर चलता रहता है। समय के साथ जीवन को जीना ही सफल माना जाता है। भारत के प्राचीन वैदिक काल की संस्कृती अपने चरम पर ज्ञान का प्रवाह करती प्रतित होती है। जिस संस्कृती ने समय को ही साधना अभिन्न अंग मानकर संध्या का दर्जा दिया हुआ है। समय का सद्पुयोग कैसे किया जाता है ? यह संस्कृति समस्त मानव जाति को परिचय देती है।

सायंकाल की संध्या और प्रातःकाल की संध्या में क्या करें? क्या करना चाहिए, क्या विचार करना चाहिए? आपको इन दोनों समयों में आत्मबोध और तत्त्वबोध की साधना करनी चाहिए। प्रातः काल जब आप उठा करें, तो एक नए जीवन का अनुभव किया करें। यह अनुभव किया कीजिए कि रात को सोने का अर्थ है-‘पिछले जन्म की समाप्ति और उस दिन की मौत’। सवेरे उठने का अर्थ है ‘नया जन्म’। ‘जब आँख खुली तब नया जन्म’ आप यह अनुभव कर लिया करें, तो मजा आ जाए। आप हर दिन सवेरे यह अनुभव किया कीजिए कि हमारा नया जन्म हो गया। अब नए जन्म में क्या करना चाहिए? आपकी सारी बुद्धिमानी इस बात पर टिकीहुई है कि आपने अपनी जीवन-संपदा का किस तरीके से उपयोग किया? यह मानना सही नहीं है कि ,यह जन्म केवल सोशल मीडिया के लिए मिला हुआ है। नहीं! यह जीवन फ्री में नहीं मिला हुआ है, इसलिए मिला हुआ है कि आप इस जीवन की संपदा को ठीक तरीके से इस्तेमाल करें। यह आपकी परीक्षा है। परीक्षा में जो पास हो जाते हैं, अगली कक्षा में उनके नाम चढ़ा दिए जाते हैं। फिर पास हो जाते हैं, तो और अगली क्लास में प्रवेश दिए जाते हैं।
यह जो पहली परीक्षा भगवान ने आपको मनुष्य का जीवन देकर ली है, उसमें आपका एक ही फर्ज हो जाता है कि आप इसका अच्छे से अच्छा उपयोग करके दिखाएँ। बस भगवान ने यही अपेक्षा की है आप से, यही उम्मीद है और यही वह चाहता है। आप लोग विश्वास रखें, इससे भगवान कभी प्रसन्न नहीं हो सकता।

इससे आपको जीवन-संशोधन करने में कार्य-निवारण करने में तो सहायता मिल सकती है, लेकिन जहाँ तक भगवान की प्रसन्नता का ताल्लुक है, वहाँ सिर्फ एक बात है कि आपको जो बहुमूल्य मनुष्य का जीवन दिया गया था, उस जीवन का आपने किस तरीके से और कहाँ उपयोग किया? बस यही एक प्रश्न है, दूसरा कोई प्रश्न नहीं है। जब आपको यह दिया गया है, तो विश्वास रखें कि भगवान ने अपनी बहुमूल्य संपत्ति आपके हाथ कर दी। इससे बड़ी संपत्ति भगवान के खजाने में और कोई नहीं है। मनुष्य के जीवन से बढ़कर और क्या हो सकता है ? आप दूसरे प्राणियों पर नजर डालिए । किसी के भी खाने का ठिकाना नहीं है, कोई कहीं है, तो कोई कहीं है, न बोल सकता है, न लिख सकता है। किंतु आपको सारी सुविधाओं से भरा हुआ जीवन इसलिए दिया गया है कि आप उसका अच्छे से अच्छा उपयोग करके दिखाएँ। क्या अच्छा उपयोग हो सकता है जीवन का ? इसके दो ही अच्छे उपयोग हैं, एक आप स्वयं को ऐसा बनाएँ, जिसको कि आदमी कहा जा सकता है। दूसरों के सामने आपका उदाहरण इस तरीके से पेश होना चाहिए कि जिसको देख करके दूसरे आदमियों को प्रकाश मिले, रोशनी मिले या पीछे चलने का मौका मिले और आपकी अंतरात्मा का कायाकल्प करती हुई साफ और स्वच्छ बनती चली जाए। यह आपका स्वार्थ है। और परमार्थ ? परमार्थ यह है कि भगवान की इस विश्ववाटिका में, जिसमें आपको काम करने के लिए भेजा गया है, उसमें आप एक अच्छे तरीके से काम करें। भगवान को साथियों की जरूरत है, इंजीनियरों की जरूरत है, ताकि उनके इतने बड़े बगीचे, इतने बड़े कारखाने की सुव्यवस्था करने में वे हाथ बँटा सकें। आपको हाथ बँटाने के लिए पैदा किया गया है, खुशामदें करने के लिए नहीं, नाक रगड़ने के नहीं, चापलूसी करने के लिए नहीं,मिठाई, उपहार भेंट करने के लिए नहीं पैदा किया गया। आपको सिर्फ इसलिए पैदा किया गया है कि बेहतरीन जिंदगी जिएँ और भगवान के काम में हाथ बंटाएँ।

आमतौर से आदमी काम की बातें भूल जाते हैं और बेकार को बातें, सब याद रखते हैं। आपको सवेरे उठते ही प्रातःकाल बेड पर पड़े-पड़े यह ध्यान करना चाहिए कि आज हमारा नया जन्म हुआ है और हमको इतनी बड़ी कीमत मिली, संपत्ति मिली कि जिसकी तुलना में और किसी प्राणी को कोई चीज नहीं मिली। आप अपने आप को सौभाग्यवान महसूस कीजिए, भाग्यशाली अनुभव कीजिए। यह अनुभव कीजिए कि हमारे बराबर भाग्यशाली कोई नहीं। अभावों की बात, चिंता की बात, कठिनाइयों की बात आप सोचते रहते हैं, लेकिन यह क्यों नहीं सोचते कि आप कितने शक्तिशाली हैं कि इतना बड़ा जीवन आपको भगवान ने दिया। आप अपने भाग्य को सराहें और सराहना के साथ-साथ एक और बात ध्यान में रखें। आप एक ऐसी ‘स्कीम’ बनाएँ, ‘योजना’ बनाएँ, जिससे इस जीवन का अच्छे से अच्छा उपयोग करना संभव हो सके।

जीवन सँवारने के सूत्र

यह प्रयोग एक दिन के जीवन से करना चाहिए। जिस दिन आप सोकर उठें, उसी दिन आप यह याद रखिए कि बस हमारे लिए एक ही दिन जिंदगी का है और इस आज के दिन को अच्छे से अच्छा बनाकर दिखाएँ। बस, इतने क्रम को दैनिक जीवन में सम्मिलित कर लें, तो इसे रोज-रोज अपनाते हुए आप अपनी सारी जिंदगी को अच्छा बना सकते हैं। एक-एक दिन को हिसाब से जोड़ देने का मतलब होता है, सारे समय और सारी जिंदगी को ठीक तरह सुव्यवस्थित बना देना। आप प्रातः काल उठा कीजिए और यह ध्यान किया कीजिए कि हर दिन नया जन्म और हर दिन नई मौत’ को आप प्रातः काल से सायंकाल तक कैसे प्रयोग करेंगे? इसके लिए सुबह से ही उठकर टाइमटेबिल बना लेना चाहिए कि आज आप क्या करेंगे, कैसे करेंगे और क्यों करेंगे ? क्रिया के साथ में आप चिंतन को जोड़ दीजिए। चिंतन और क्रिया को जोड़ देते हैं, तो दोनों से एक समग्र स्वरूप बन जाता है। आप शरीर से काम करते रहें, मगर कोई उद्देश्य न हो अथवा अगर आप उद्देश्य ऊँचे रखें, लेकिन उसे क्रियान्वित करने का कोई मौका न हो, तो दोनों ही बातें बेकार हो जाएँगी।

इसलिए, सवेरे उठते ही जहाँ आप अपने मनुष्य जीवन पर गौरव का अनुभव करें, वहाँ एक बात और साथ-साथ में चालू कर दें, सुबह प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक का एक ऐसा टाइमटेबिल बनाएँ जिसकी कि सिद्धांतवादी कहा जा सके, आदर्शवादी कहा जा सके। इसमें भगवान की हिस्सेदारी रखिए। शरीर के लिए भी गुजारे का समय निकालिए, भगवान के लिए भी गुजारे का समय निकालिए। आपके जीवन में भगवान भी तो हिस्सेदार है, उसके लिए भी तो कुछ करना है। आपका शरीर ही सब कुछ थोड़े ही है, आत्मा भी तो कुछ है। आत्मा के लिए भी तो कुछ किया जाना चाहिए। सब कुछ शरीर को ही खिलाने पिलाने के लिए करेंगे क्या ? ऐसा क्यों करेंगे ? आत्मा का कोई औचित्य नहीं है क्या? आत्मा की कोई इज्जत नहीं है क्या? आत्मा का कोई मूल्य नहीं है क्या? आत्मा से आपका कोई संबंध नहीं है क्या ? अगर है तो फिर आपको ऐसा करना पड़ेगा कि साथ-साथ दिनचर्या में आदर्शवादी सिद्धांतों को मिलाकर रखना पड़ेगा।

अपनी दिनचर्या ऐसी बनाइए जिसमें आपके पेट भरने की भी गुंजाइश हो और अपने कुटुंब के, परिवार के लोगों के लिए भी गुंजाइश हो। लेकिन साथ-साथ में एक और गुंजाइश होनी चाहिए कि अपनी आत्मा को संतोष देने के लिए और परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए कार्यों का और विचारों का भी समावेश हो। आप स्वाध्याय का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। आप सेवा का दैनिक जीवन में स्थान रखिए, आप उपासना का दैनिक जीवन में स्थान रखिए। इन सब बातों का समन्वित जीवन का अभ्यास कर लें, तो वह प्रातः काल वाला संध्यावंदन पूरा हो
जाएगा। जीवन की अनुभूति, जीवन की महत्ता की अनुभूति के साथ-साथ में सोते समय तक की सारी कार्यविधि का निर्धारण अगर आप कर लेते हैं, तो फिर आपकी उन-उन खुराफातों से बचत हो जाएगी, जो कि आप व्यवस्थित जीवन के अभाव में करते रहते हैं। जो आदमी व्यस्त है, वह एक निर्धारित लक्ष्य में लगा रहता है। जो आदमी खाली है अर्थात जो शरीर से खाली होगा, तो उसका दिमाग भी खाली होगा और दिमाग का खाली होना शैतान की दुकान है। इसलिए अपना दिमाग शैतान की दुकान न होने पाए और आपका शरीर खाली रहने की वजह से दुष्प्रवृत्तियों में न लगने पाए, इसके लिए बहुत अधिक आवश्यक है कि आप व्यस्तता से भरा हुआ टाइमटेबिल और कार्यक्रम बना लें और उस पर चलें। न केवल टाइमटेबिल बना लें, वरन यह भी हर समय ध्यान रखें कि जो सवेरे कार्यपद्धति बनाई गई थी, वह ठीक तरीके से प्रयोग होती भी है कि नहीं।

आप अपने टाइमटेबिल में विश्राम का समय भी नियत रखें। यह कोई नहीं कहता कि विश्राम मत रखिए, लेकिन विश्राम भी एक समय से होना चाहिए, टाइम से होना चाहिए और एक विधि से होना चाहिए। चाहे जरा सा काम किया और फिर विश्राम, जरा सा काम और फिर विश्राम, ऐसे कोई काम होते हैं क्या ? काम करने की शैली ही कर्मयोग है। कर्मयोग को अगर आप ज्ञानयोग में मिला दें, संध्यावंदन में मिला दें, तो मजा आ जाए, सारी की सारी दिनचर्या को आप भगवान का कार्य मानकर चलें, तो फिर समझिए आपकी प्रातःकाल की संध्या पूर्ण हो गई। इसके बाद अब सायंकाल की संध्यावंदन का नंबर आ गया। आप सायंकाल की संध्या उस समय किया कीजिए, जब आप सोया करें। जब भी सोएँ नौ बजे, ग्यारह बजे, बारह बजे, सोना तो आखिर है ही आपको। जब सोएँगे, तो यह बात भी सही है कि आप नींद की गोद में अकेले ही जाएँगे। ठीक है, बच्चे बगल में सोते हों तो क्या और कोई सोता हो तो क्या, परंतु नींद तो आपको अकेले ही को आएगी न दो को तो एक साथ नहीं आ सकती? आप सुबह उठेंगे, तो अकेले उठेंगे न, दो तो एक साथ नहीं उठ सकते? यह आपका एकांत जीवन है। सायंकाल को सोते समय आप उस एकांत जीवन में ऐसे विचार किया कीजिए कि हमारे जीवन का अब समाप्ति का समय आ गया है, अंत आ गया। अंत को लोग भूल जाते हैं। आदि को भूल जाते हैं बस मध्य में ही उलझे रहते हैं।

यदि आपको मनुष्य जन्म का सौभाग्य मिला हुआ हैं, और उसको ठीक तरीके से उपयोग करने का निर्धारण और अंत ? अंत वह है जिसमें भगवान के दरवाजे पर जाना ही पड़ेगा, भगवान की कोर्ट में पेश होना ही पड़ेगा, इससे कोई बचत नहीं हो सकती। आपको भी दूसरों की तरह मरना ही पड़ेगा और मरना भी चाहिए। यह नहीं हो सकता कि आपके मरने का कोई दिन न आए, जरूर आएगा, निश्चित आएगा। जब आपके मरने का दिन आएगा, तो फिर क्या होगा? तब आपको यहाँ से जाने के बाद में सीधे भगवान के दरबार में जाना पड़ेगा और सिर्फ एक बात का जवाब देना पड़ेगा कि आपने इस जिंदगी का कैसे इस्तेमाल किया? अगर आपने ठीक तरीके से इस्तेमाल नहीं किया है, तो भगवान आपसे बेहद नाराज होंगे, भले ही आपने अनुष्ठान किया हो,

इसलिए रात्रि को सोते समय यह ख्याल किया कीजिए कि अब हमारे जीवन का अंत है और अंत को अगर आप ध्यान कर लें तब ? तब फिर आप चौंक पड़ेंगे। जिंदगीभर आदमी न जन्म को याद करता है, न मौत को याद करता है। अगर मौत को याद करे, तो मजा आ जाए। सिकंदर जब मरने को हुआ, तो उसने सब लोगों को बुलाया और कहा कि हमारा सब माल-खजाना हमको दीजिए, हम साथ लेकर के जाएँगे। क्योंकि बड़ी मेहनत से भी कमाया है और बड़ी बेईमानी से भी कमाया है। उसने जो कमाया था, लोगों ने वह सब उसके सामने रख दिया। सिकंदर कहने लगा कि इसे हमारे साथ भेजने का इंतजाम करो। लोगों ने कहा, यह कैसे हो सकता है? यह सब चीजें तो यहीं की थीं और यहीं पड़ी रह जाएँगी। आप तो बेकार ही कहते हैं कि यह हमारे साथ जाएगा। आपके साथ तो आपका पुण्य और पाप जाएगा और कुछ नहीं जा सकता। काश! हमें हर पल मौत याद रहे।

सिकंदर फूट-फूटकर रोने लगा। उसने कहा कि अगर मुझे यह मालूम होता कि मेरे साथ में केवल पुण्य-पाप ही जाने वाला है, तो मैं इस छोटीसी जिंदगी को गुनाहों से भरी हुई न बनाता। फिर मैं भगवान बुद्ध के तरीके से जिया होता, सुकरात के तरीके से जिया होता, ईसा के तरीके से जिया होता। ऐसी गलती क्यों कर डाली? इस संपदा को, जिसकी मुझे जरूरत नहीं थी, उसी को मैं इकट्ठा करता रहा। यह क्यों करता रहा? मौत तो होनी ही है। उसको जब मौत याद आई, तो वह बार-बार यही बोला, मरते वक्त मेरे दोनों हाथ ताबूत से बाहर निकालकर रखना। उसने अपने सैनिकों से कहा कि आप लोग जब हमें दफनाने के लिए जाएँ, तो हमारे दोनों हाथ हमारे जनाजे से बाहर निकाल देना, ताकि लोग यह देखें कि सिकंदर खाली हाथ आया था और खाली हाथ चला गया। यह वैराग्य श्मशान घाट में ही बन सकता है। श्मशान घाट की एवं मौत की याद आपको आ जाए, तो आप निश्चित ही जो घिनौनी जिंदगी जी रहे हैं, उसकी कतई इच्छा नहीं होगी। फिर आप यह कहेंगे कि इस नए मौके का अच्छे से अच्छा उपयोग क्यों न कर लिया जाए।

फिर आप क्या करेंगे? फिर आप अपना टाइमटेबिल और अपनी नीति ऐसी बनाएँगे जैसे कि राजा परीक्षित ने बनाई थी। राजा परीक्षित को मालूम पड़ गया था कि आज से सातवें दिन साँप काट खाएगा। उसने यह निश्चय किया कि इन सात दिनों का अच्छे से अच्छा उपयोग करेंगे। उन्होंने भागवत कथा का अनुष्ठान किया और दूसरे अच्छे कर्म किए। इससे उनकी मुक्ति हो गई।

सात दिन में तो सबको ही साँप काटने वाला है। आपको भी सात दिन में ही काटेगा। कुल सात ही दिन तो होते हैं न, मौत का साँप इन्हीं दिनों में तो काटता है। सातवें दिन के बाद आठवाँ दिन कहाँ है? इसलिए आप भी राजा परीक्षित के तरीके से विचार कर सकते हैं कि हमारी बची हुई जिंदगी, जो मौत के दिनों के बीच में बाकी रह गई है, इसका हम अच्छे से अच्छा कैसे उपयोग कर सकते हैं? सायंकाल को आप विचार किया कीजिए कि उसका कैसे अच्छे से अच्छा उपयोग किया जाए। सायंकाल को दिनभर के कार्यों की समीक्षा किया कीजिए और समीक्षा करने के बाद में यदि लगे कि हमने गलती की या नहीं की। यदि की है, तो उसके लिए अपने को तुच्छ नहीं समझे, धमकाइए नहीं, वरन अपने आपको इस बात के लिए रजामंद कीजिए कि जो कुछ आज कमियाँ रह गईं अथवा गलतियाँ हो गईं, वह कल नहीं रहेंगी। कल हम उसी कमी को पूरा कर लेंगे, गलती को सुधार लेंगे। फिर क्या हो जाएगा? कमी की पूर्ति हो जाएगी। अगली बार गलती नहीं होगी, काम बहुत अच्छा हो जाएगा। गलतियों से सीखें, आत्मचिंतन करते रहें।

इस तरह प्रातःकाल जिस तरीके से आपने आज की नीति का निर्धारण किया था, उसी तरीके से आज की गलतियों का और आज की सफलताओं का अनुमान लगाते हुए कल की बात की आप तैयारी कर सकते हैं कि कल हमको कैसे जीना है? यह सब आप रात को सोने से पहले तय कर लेंगे, तो दूसरे दिन आपको सफलता मिलेगी, चिंतन करेंगे, तो थोड़ा कठिन पड़ेगा। इसलिए हर दिन सोते समय में, मौत की गोद में, नींद की गोद में जाते समय यह विचार लेकर जाया करें कि अब हम इस संसार से चले और भगवान के यहाँ गए। ऐसी स्थिति में फिर आपको क्या करना चाहिए? लगाव को कम करना चाहिए। लोगों से, वस्तुओं से आपका लगाव जितना ज्यादा होगा, आप उतना ही ज्यादा कष्ट पाएँगे। आप लगाव को कम कीजिए। लगाव ही ज्यादा कष्टकारक है, जिम्मेदारियों का निभाना ज्यादा कष्टकारक नहीं है। जिम्मेदारियाँ तो आपको निभानी ही चाहिए। आप अपनी जिम्मेदारी माता के प्रति निभाइए, पत्नी के प्रति निभाइए, बच्चों के प्रति निभाइए और समाज के प्रति निभाइए, लेकिन लगाव आपको बहुत हैरान कर देगा। हमारा ही बच्चा है, यह आप क्यों कहते हैं? यह क्यों नहीं सोचते और कहते कि भगवान का बच्चा है।

आप रात्रि को जब सोया करें और मौत को जब याद किया करें, तो साथ में दो बातें और भी याद कर लिया करें कि हम खाली हाथ जा रहे हैं। लालच हमारे साथ जाने वाला नहीं है और मोह भी हमारे साथ जाने वाला नहीं है। हर प्राणी अपने संस्कार लेकर आया है और अपने संस्कार लेकर चला जाएगा। फिर आप उनके मालिक कैसे हुए? संपत्ति जितनी आप खा सकते हैं और जितनी इस्तेमाल कर सकते हैं, उतनी ही तो ले सकते हैं। बाकी जमीन पर ही छोड़नी पड़ेगी, चाहे संबंधियों के लिए छोड़ें, चाहे उत्तराधिकारियों के लिए छोड़ें और चाहे पुलिस वालों के लिए छोड़ें। तो जब छोड़नी ही पड़ेगी, तो आप उन लोगों के लिए क्यों नहीं छोड़ते, जो कि इसके हकदार हैं। आप उतना ही क्यों न कमाएँ, जिससे कि आप ईमानदारी के साथ अपने लोक और परलोक को बनाए रखें। आप अपने खर्चे उतने ही क्यों न रखें, जिससे कि सीमित आजीविका में ही आदमी का गुजारा चल सकता है।

त्याग, वैराग्य, भक्ति तब आती है, जब आदमी मृत्यु का स्मरण करता है। आप मृत्यु का स्मरण कीजिए। मृत्यु का स्मरण करना बहुत जरूरी है। ॐ कृतो स्मरः…..। किसको याद करो, मौत को याद करो। ‘भस्मीभूतमिदं शरीरं’ अर्थात यह शरीर भस्मीभूत होने वाला है।

आप इस मरने वाले शरीर के बारे में ध्यान रखें कि यह कल या परसों मिट्टी में मिलने वाला है। फिर हम क्यों ऐसे गलत काम करें, जिससे हमारी परंपरा बिगड़ती हो, पीछे वालों को कहने का मौका मिलता हो, धिक्कारने का मौका मिलता हो और आपकी आत्मा को असंतोष की आग में जलने का मौका मिलता हो। आप मत कीजिए ऐसा काम। ये दोनों शिक्षाएँ आपको नया जीवन और नई मौत के स्मरण करने से मिल सकती हैं और कोई तरीका नहीं है। आप इन दो संध्यावंदन को भूलिए मत। दूसरे समय पर कीजिए। प्रातः काल तो यह चिंतन और मनन कीजिए–’नया जन्म नई मौत’ ‘और हर दिन को नया जन्म और हर रात को नई मौत।’ इस मौत और जिंदगी के झूले में आप झूलते हुए अपने, कर्त्तव्य और बुद्धिमत्ता के बारे में विचार करेंगे, तो ऐसी हजारों बातें मालूम पड़ेंगी, जिसके आधार पर आपका जन्म सार्थक हो सके और आप अध्यात्मवाद के सच्चे अनुयायी और उत्तराधिकारी बन सकें।

‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ की मान्यता लेकर जीवनक्रम बनाकर चला जाए तो वर्तमान स्तर से क्रमश: ऊँचे उठते चलना सरल पड़ेगा। मस्तिष्क और शरीर की हलचलें अंतःकरण में जड़ जमाकर बैठने वाली आस्थाओं की प्रेरणा पर अवलंबित रहती हैं। आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य इस संस्थान को प्रभावित एवं परिष्कृत करना ही होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में वही साधना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, जिसमें उठते ही नए जन्म की और सोते ही नई मृत्यु की मान्यता को जीवंत बनाया जाता है।

प्रातः बिस्तर पर जब आँख खुलती है तो कुछ समय आलस को दूर करके शय्या से नीचे उतरने में लग जाता है। प्रस्तुत उपासना के लिए यही सर्वोत्तम समय है। मुख से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पर यह मान्यता चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमाना चाहिए कि “आज का एक दिन पूरे जीवन की तरह है, इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक भी क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाना चाहिए।” सोचा जाना चाहिए कि “ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं, वरन विशुद्ध अमानत है, जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने, स्वर्ग और मुक्ति का आनंद इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पूरा होता है, जब ईश्वर की इस सृष्टि को अधिक सुंदर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उपलब्ध जीवन-संपदा का उपयोग किया जाए। उपयोग के लिए यह सुर-दुर्लभ अवसर मिला है।
नींद का त्यागकर नित्य कर्म में लग जाना चाहिए। थोड़ी गुंजाइश हो तो उठने से लेकर सोने के समय तक की दिनचर्या इसी समय बना लेनी चाहिए। यों नित्य कर्म करते हुए भी दिनभर का समय विभाजन कर लेना कुछ कठिन नहीं है। ऊर्जा के साथ काम निपटाए जाएँ तो कम समय में अधिक काम हो सकता है। उदासी से ही समय का भारी अपव्यय होता है, योजनाबद्ध दिनचर्या बनाई जाए और उसका मुस्तैदी से पालन किया जाए तो ढेरों समय बच सकता है। एक काम के साथ दो काम हो सकते हैं। जैसे आजीविका उपार्जन के बीच खाली समय में स्वाध्याय तथा मित्रों से परामर्श हो सकता है। परिवार व्यवस्था में मनोरंजन का पुट रह सकता है। निद्रा, नित्य कर्म, स्वाध्याय, उपासना, आदि कार्यों में कौन, कब, किस प्रकार कितना समय देगा? यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य-प्रमाद में एक क्षण नष्ट नहीं करना चहिए, और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें, जिनमें आत्मकल्याण, परिवार निर्माण एवं लोकमंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे।

जल्दी सोने और जल्दी उठने का नियम जीवन-साधना में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बनाना ही चाहिए। ब्राह्ममुहूर्त का समय अमृतोपम है, उस समय किया गया हर कार्य बहुत ही सफलता पूर्वक संपन्न होता है। जो भी अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य प्रतीत होता हो, उसे उसी समय में करना चाहिए। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए संभव है जो रात्रि को जल्दी सोते हैं। इस मार्ग में जो अड़चनें हों उन्हें बुद्धिमत्तापूर्वक हल करना चाहिए, किंतु जल्दी सोने और जल्दी उठने की परंपरा तो अपने लिए ही नहीं पूरे परिवार के लिए बना ही लेनी चाहिए। रात्रि को सोते समय वैराग्य एवं संन्यास जैसी स्थिति बनानी चाहिए। बिस्तर पर जाते ही यह सोचना चाहिए कि निद्राकाल एक प्रकार का मृत्यु विश्राम है। आज का नाटक समाप्त, कल दूसरा खेल खेलना है। परिवार ईश्वर का उद्यान है उसमें अपने को कर्त्तव्यनिष्ठ वक्ति की भूमिका निभानी थी। शरीर, मन, ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा करने के लिए मिले जीवन-रथ के दो पहिये हैं, इन्हें सही राह पर चलाना था।

प्रातः उठते समय नए दिन की मान्यता जीवनोद्देश्य की स्पष्टता तथा सुव्यवस्थित दिनचर्या बनाने का कार्य संपन्न करना चाहिए। रात्रि को सोते समय मृत्यु का चिंतन, आत्मनिरीक्षण, पश्चात्ताप और कल के लिए सतर्कता, वैरागी एवं संन्यासी जैसी मालिकी त्यागने की हलकी-फुलकी मनःस्थिति लेकर शयन किया जाए। दिनभर हर घड़ी ऊर्जा और आनंद के साथ प्रस्तुत कार्यों को निपटाया जाए। भीतरी दुर्भावनाओं और बाहरी दुष्प्रवृत्तियों के उभरने का अवसर आते ही उनसे जूझ पड़ा जाए और निरस्त करके ही दम लिया जाए। यह है वह जीवन-साधना जिसमें चौबीसों घंटे निमग्न रहकर इसी जीवन में स्वर्ग जैसे उल्लास, आनंद और मुक्ति जैसे आनंद का हर घड़ी अनुभव करते रहा जा सकता है।

जिस दिन प्यासा रहना होगा??

आज की पीढ़ी अनेक समस्या से घिरी हुई है। आज की जनरेशन रोगों से , मानसिक तनाव, शारीरिक समस्या में जकड़ी हुई हैं। सामाजिक मूल्य को खत्म किया जा रहा हैं। जीवन को भौतिक सुख के नज़रिए से देखा जा रहा है। जिस कारण वश प्राकृतिक आपदा, समस्या, तापमान में बढ़ोतरी, मानसिक विकृति से भरा आज समाज नजर आता हैं। जिसके परिणाम स्वरूप कही जगह पर बादल फटने का प्रकार होता है, तो कही जगह पर सुखा पड़ा रहता है। जैसे मानो प्रतीत होता है प्रकृति ने अपना बैलेंस खो दिया। मानव कुदरत के सामने उंगली खड़ी कर उसे चुनौती दे रहा है। पर्यावरण दिवस सिर्फ कागज पर मनाए जाता है। मां प्रकृति हमे हर समय हमारी मदद करती है। हम उसे धन्यवाद देने की जगह उसे समस्या देने का काम आज मानव जाति के द्वारा हो रहा है। ग्लोबल वार्मिग यह कोई सामान्य समस्या नहीं है। यह बड़ी आपदा के रूप में सामने आई है, इसे सावधान रहकर निपटना चाहिए।

संसार में एक ओर जनसंख्या की वृद्धि हो रही है, दूसरी और कारखाने और उद्योग-धंधे बढ़ रहे हैं। इन दोनों ही अभिवृद्धियों के लिए पेयजल की आवश्यकता भी बढ़ती चली जा रही है। पीने के लिए, नहाने के लिए, कपड़े धोने के लिए, रसोई एवं सफाई के लिए हर व्यक्ति को, हर परिवार को पानी चाहिए। जैसे-जैसे स्तर ऊँचा उठता जाता है, उसी मात्रा से पानी की आवश्यकता भी बढ़ती है। खाते-पीते आदमी अपने निवास स्थान में पेड़-पौधे, फल-फूल, घास-पात लगाते हैं, पशु पालते हैं। इन सबके लिए पानी की माँग और बढ़ती है। गर्मी के दिनों में भी ज्यादा छिड़काव के लिए पानी चाहिए।

कारखाने निरंतर पानी माँगते हैं। जितना बड़ा कारखाना उतनी बड़ी पानी की माँग । भाप पर चलने वाले थर्मल पॉवर प्लांट तथा दूसरी मशीनें पानी की अपेक्षा करती हैं। संशोधन और शोध संस्थान में भी ढेरों पानी की मात्रा का उपयोग प्रयोग के लिए होता है। शहरों में फ्लश , सीवर लाइनें तथा नाली आदि की सफाई के लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ती है। कृषि और बागवानी का सारा दारोमदार ही पानी पर ठहरा हुआ हरियाली एवं वन संपदा पानी पर ही जीवित हैं। पशु पालन में बिना पानी के चल नही सकता। चारा-पानी अनिवार्य रूप में चाहिए और भी न जाने कितने ज्ञात-अज्ञात आधार हैं, जिनके लिये पानी की निरंतर जरूरत पड़ती हैं।

यह सारा पानी बादलों से मिलता है। पहाड़ों पर जमने वाली बर्फ, जिसके पिघलने से नदियाँ बहती हैं, वस्तुतः बादलों का ही अनुदान है। सूर्य की गर्मी से समुद्र द्वारा उड़ने वाली भाप बादलों के रूप में भ्रमण करती है। उनकी वर्षा से नदी-नाले, कुएँ, तालाब, झरने-बहने लगते है। उन्हीं से उपरोक्त आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ वृक्ष वनस्पतियों की, अन्न, शाक, पशु वंश की जो वृद्धि होती चली जा रही है, उसने पानी की माँग को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ा दिया है। यह माँग दिन-दिन अधिकाधिक उग्र होती जा रही है। बादलों के अनुदान से ही अब तक सारा काम चलता रहा है। सिंचाई के साधन नदी, तालाब, कुँओं से ही पूरे किये जाते हैं। इनके पास जो कुछ है, बादलों की ही देन है। स्पष्ट है कि बादलों के द्वारा जो कुछ दिया जा रहा है, वह आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कम पड़ता है। संसार भर में पेयजल अधिक मात्रा में प्राप्त करने की चिंता व्याप्त है, ताकि मनुष्यों की पशुओं की, वनस्पतियों की, कारखानों की आवश्यकता को पूरा करते रहना संभव बना रहे।

बादलों पर किसी का नियंत्रण नहीं। वे जब चाहें जितना पानी बरसायें। उन्हें आवश्यकता पूरी करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। वे बरसते भी हैं, तो अंधाधुंध बेहिसाब। वर्षा में वे इतना पानी फैला देते हैं कि पृथ्वी पर उसका संग्रह कर सकना संभव नहीं होता और वह बहकर बड़ी मात्रा में समुद्र में जा पहुँचता है। इसके बाद शेष आठ महीने आसमान साफ रहता है। गर्मी के दिनों में तो बूँद-बूँद पानी के लिए तरसना पड़ता है। इन परिस्थितियों में मनुष्यों को जल के अन्य साधन-स्रोत तलाश करने के लिए विवश होना पड़ रहा है, अन्यथा कुछ ही दिनों में जल संकट के कारण जीवन दुर्लभ हो जायेगा। गंदगी बहाने, हरियाली उगाने और स्नान-रसोई के लिए भी जब पानी कम पड़ जायेगा, तो काम कैसे चलेगा ? कारखाने किसके सहारे अपनी हलचल जारी रखेंगे ?

अमेरिका की आबादी लगभग तीस करोड़ है। वहाँ कृषि एवं पशुपालन में खर्च होने वाले पानी का खर्च प्रति मनुष्य के पीछे प्रतिदिन तेरह हजार गैलन आता है। घरेलू कामों में तथा उद्योगों में खर्च होने वाला पानी भी लगभग इतना ही बैठता है। इस प्रकार वहाँ हर व्यक्ति के पीछे २६ हजार गैलन पानी की नित्य जरूरत पड़ती है। यहाँ की आबादी विरल और जल स्रोत बहुत हैं, तो भी चिंता की जा रही है, कि आगामी शताब्दी में पानी की आवश्यकता एक संकट के रूप में सामने प्रस्तुत होगी। भारत की आबादी अमेरिका की तुलना में लगभग तीन गुनी अधिक है, किंतु जल साधन कहीं कम हैं। बड़े शहरों में अकेले मुंबई को ही लें, तो वहाँ की जरूरत 40 करोड़ गैलन हो पाती है। यही दुर्दशा न्यूनाधिक मात्रा में अन्य शहरों की है। देहाती क्षेत्र में अधिकांश कृषि उत्पादन वर्षा पर निर्भर है। जिस साल वर्षा कम होती है, उस साल भयंकर सूखे का सामना करना पड़ता है। मनुष्यों और पशुओं की जान पर बन आती है। यदि इन क्षेत्रों में मानव उपार्जित जल की व्यवस्था हो सके, तो खाद्य समस्या का समाधान हो सकता है।

नये जल-आधार तलाश करने में दृष्टि समुद्र की ओर ही जाती है। धरती का दो-तिहाई से भी अधिक भाग समुद्र से डूबा पड़ा है; किंतु वह है खारा। जिसका उपयोग उपरोक्त आवश्यकताओं में से किसी की भी पूर्ति नहीं कर सकता। इस खारे जल को पेय किस प्रकार बनाया जाय, इसी केंद्र पर भविष्य में मनुष्य जीवन की आशा इन दिनों केंद्रीभूत हो रही है। इस संदर्भ में राष्ट्रसंघ ने एक आयोग नियुक्त किया था, जिसने संसार के ४६ प्रमुख देशों में दौरा करके जल समस्या और उसके समाधान के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट का सारांश राष्ट्रसंघ ने प्रगतिशील देशों में खारे पानी का शुद्धीकरण’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है, जिसमें प्रमुख सुझाव यही है कि समुद्री जल के शुद्धीकरण पर अधिकाधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। यो वर्षा के जल को समुद्र

रोकने के लिए तथा जमीन की गहराई में बहने वाली अदृश्य नदियों का पानी ऊपर खींच लाने को भी महत्त्व दिया गया है और कहा गया है कि बादलों के अनुदान तथा पर्वतीय बर्फ के रूप में जो जल मिलता है, उसका भी अधिक सावधानी के साथ सदुपयोग किया जाना चाहिए।

उत्तर और दक्षिण ध्रुव-प्रदेशों के निकटवर्ती देशों के लिए एक योजना यह है कि उधर समुद्र में सैर करते-फिरने वाले हिम पर्वतों को पकड़ कर पेय जल की आवश्यकता पूरी की जाए, तो यह अपेक्षाकृत सस्ता पड़ेगा और सुगम रहेगा। संसार भर में जितना पेयजल है, उसका ८० प्रतिशत भाग ध्रुव-प्रदेश एंटार्कटिक के हिमावरण (आइसकैप) में बँधा पड़ा है। इस क्षेत्र में बर्फ के विशालकाय खंड अलग होकर समुद्र में तैरने लगते हैं और अपने ही आकार मे हिम द्वीप जैसा बना लेते हैं। वे समुद्री लहरों और हवा के दबाव से इधर-उधर सैर-सपाटे करते रहते हैं। दक्षिण ध्रुव के हिम पर्वतों को गिरफ्तार करके दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया और अफ्रीका में पानी की आवश्यकता पूरी करने के लिए खींच लाया जा सकता है। इसी प्रकार उत्तर ध्रुव के हिम पर्वत एक बड़े क्षेत्र की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं, यद्यपि उसमें संख्या कम मिलेगी।

अमेरिका के वैज्ञानिक डॉ० विलियम कैंबेल और डॉ० विल्फर्ड वीकस ने इसी प्रयोजन के लिए कैंब्रिज, इंग्लैंड में बुलाई गई एक इंटरनेशनल सिंपोजियम आन दि हाइड्रोलॉजी ऑफ ग्लेशियर्स में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा था—हिम पर्वतों को पकड़ने की योजना को महत्त्व दिया जाना चाहिए, ताकि पेयजल की समस्या को एक हद तक सस्ता समाधान मिल सके। भू-उपग्रहों की सहायता से फोटो लेकर यह पता लगाया जा सकता है, कि किस क्षेत्र में कैसे और कितने हिम पर्वत भ्रमण कर रहे हैं ? इन पर्वतों का 85 प्रतिशत भाग पानी में डूबा रहता है और शेष 20 प्रतिशत सतह से ऊपर दिखाई पड़ता है। इन्हें पाँच
एवं हजार मील तक घसीटकर लाया जा सकता है। इतना सफर करने में उन्हें चार-पाँच महीने लग सकते हैं। यह खर्चा और सफर की अवधि में अपेक्षाकृत गर्म वातावरण में बर्फ पिघलने लगना यह दो कारण यद्यपि चिंताजनक हैं, तो भी कुल मिलाकर वह पानी उससे सस्ता ही पड़ेगा, जितना कि हम जमीन पर रहने वालों को औसत हिसाब से उपलब्ध होता है।

हिसाब लगाया गया है कि ऐमेरी से आस्ट्रेलिया तक ढोकर लाया गया हिम पर्वत दो-तिहाई गल जायेगा और एक-तिहाई शेष रहेगा। रास से दक्षिण अमेरिका तक घसीटा गया हिम पर्वत 15 प्रतिशत ही शेष रहेगा। धीमी चाल से घसीटना अधिक लाभदायक समझा गया है, ताकि लहरों का प्रतिरोध कम पड़ने से बर्फ की बर्बादी अधिक न होने पाये। ७८ हजार हार्सपावर का एक टग जलयान आधा नाट की चाल से उसे आसानी के साथ घसीट सकता है। अपने बंदरगाह से चलकर हिम पर्वत तक पहुँचने और वापस आने में जो खर्च आयेगा और फिर उस बर्फ को पिघलाकर पेयजल बनाने में जो लागत लगेगी, वह उसकी अपेक्षा सस्ती ही पड़ेगी, जो म्युनिसपेलिटियाँ अपने परंपरागत साधनों से जल प्राप्त करने में खर्च करती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि बर्फ का जल, डिस्टिल्ड वाटर स्तर का होने के कारण स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी, स्वच्छ और हानिकारक तत्त्वों से सर्वथा रहित होगा। उसके स्तर को देखते हुए यदि लागत कुछ अधिक हो, तो भी उसे प्रसन्नतापूर्वक सहन किया जा सकता है। दूसरा उपाय यह सोचा गया है कि समुद्र के किनारे अत्यंत विशालकाय अणु भट्टियाँ लगाई जाएँ, उनकी गर्मी से कृत्रिम बादल उत्पन्न किये जाएँ, उन्हें ठंडा करके कृत्रिम नदियाँ बहाई जायें और उन्हें रोक-बाँधकर पेयजल की समस्या हल की जाए।

तीसरा उपाय यह है कि वर्षा का जल नदियों में होकर समुद्र में पहुँचता है, उसे बाँधों द्वारा रोक लिया जाए और फिर उनसे पेय जल की समस्या हल की जाए।दूसरे और तीसरे नंबर के उपाय जोखिम भरे हैं। अत्यधिक गर्मी पाकर समुद्री जलचर मर जायेंगे, तटवर्ती क्षेत्रों का मौसम गरम हो उठेगा और ध्रुव प्रदेशों तक उस गर्मी का असर पहुँचने से जल प्रलय उत्पन्न होगा और धरती का बहुत बड़ा भाग जलमग्न हो जायेगा। इतनी बड़ी अणु भट्टियाँ अपने विकरण से और भी न जाने क्या-क्या उपद्रव खड़े करेंगी ? तीसरे उपाय से यह खतरा है कि जब समुद्रों में नदियों का पानी पहुँचेगा ही नहीं, तो वे सूखने लगेंगे। खारापन बढ़ेगा और उस भारी पानी से बादल उठने ही बंद हो जायेंगे, तब नदियों का पानी रोकने से भी क्या काम चला ? ध्रुवों के घुमक्कड़ हिम द्वीप भी बहुत दूर तक नहीं जा सकते। उनका लाभ वे ही देश उठा सकेंगे, जो वहाँ से बहुत ज्यादा दूर नहीं हैं।

उपरोक्त सभी उपाय अनिश्चित एवं अधूरे हैं; पर इससे क्या ? पेय जल की बढ़ती हुई माँग तो पूरी करनी ही पड़ेगी। अन्यथा पीने के लिए, कृषि के लिए, कारखानों के लिए, सफाई के लिए भारी कमी पड़ेगी और उस अवरोध के कारण उत्पादन और सफाई की समस्या जटिल हो जाने से मनुष्य भूख, गंदगी और बीमारी से त्रसित होकर बेमौत मरेंगे।

यह सारी समस्याएँ बढ़ती हुई आबादी पैदा कर रही है। मनुष्य में यदि दूरदर्शिता होती, तो वह जनसंख्या बढ़ाने की विभीषिका अनुभव करता और उससे अपना हाथ रोकता; पर आज तो न यह होता दीखता है और न पेय जल का प्रश्न सुलझता प्रतीत होता है। मनुष्य को अपनी मूर्खता का सर्वनाशी दंड, आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। अनुमान है कि यह विषम परिस्थिति अगले दशक के अंत तक संसार के सामने गंभीर संकट के रूप में उपस्थित होगी।

आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान

भारत को आयुर्वेद की अमूल्य देन है।आयुर्वेद एक जीवन जीने का सात्विक तरीका हैं। समग्र स्वस्थ जीवन जीना मानव जीवन का आधिकार है। भारतीय चिकित्सा पद्धति मां प्रकृति का आशीर्वाद है।जो निरोगी जीवन को प्रदान करती है ,साथ ही साथ निरोगी विचारो को बल देती है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति एक तरीका है, जो आहार को औषधि के रूप सेवन करने का आदेश देता है। आयुर्वेद चिकित्सा एक एक मात्रा चिकित्सा है जो मानव शरीर को धन्यवाद देना जानती है। शरीर को ईश्वर का अनमोल उपहार मानती है।आहार को ही अमृत मानकर पूर्ण स्वस्थ समाज का निर्माण करने का सामर्थ्य आयुर्वेद चिकित्सा में ही हैं। यह पद्धति वर्तमान में जीना सिखाती है। हमारा जीवन कैसा हो? , हम किस तरीके से विचार करे?। हमारा जीवन जीने का उद्देश क्या होना चाहिए ?? यह शिक्षा हमे देती है आयुर्वेद। आयुर्वेद द्वारा ही समस्या का समाधान करना संभव है! यह पद्धति में शुद्ध भावना को स्विकार किया जाता है। आपके भाव के ऊपर ही आपका जीवन है।शुद्ध भावना ही आयुर्वेद का मूल मंत्र है। इसलिए यह सबसे सफल है।


भारतीय चिकित्सा बहुत प्राचीन है; लेकिन इसमें छिपे समग्र स्वास्थ्य के अर्थ को आज हर जगह स्वीकार किया जा रहा है। इसका मतलब है कि स्वास्थ्य का मतलब बीमारियों से छुटकारा पाना नहीं है, बल्कि जीवन को एक संपूर्ण अर्थ देना है।जीवन का नया कायाकल्प करना हैं। बीमारी सिर्फ एक लक्षण है और यह प्रकृति में विकृति से पैदा करती है। इसलिए हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में उपचार रोग को नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि रोग के कारण को नष्ट करने के लिए किया जाता है। हमारे देश में स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच रखने वाले लोगों की संख्या इतनी कम है कि इसे वैश्विक औसत से तुलना करके आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि हम चिकित्सा देखभाल को कितना महत्व देते हैं, जो स्वस्थ जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि आज हमारे देश में जितने डॉक्टर उपलब्ध हैं, वे ग्रामीण क्षेत्रों में जाने को तैयार नहीं हैं; क्योंकि उनके व्यवसाय को बढ़ने कोई जगह नहीं है। जब कोई व्यवसाय चिकित्सा जैसे शुद्ध सेवा क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो निश्चित है कि ऐसी चिंताजनक स्थिति देश पर आएगी और फिर मानव स्वास्थ्य महत्वपूर्ण नहीं होगा लेकिन पैसा कमाना महत्वपूर्ण होगा। यही कारण है कि हमारे देश में इतने महंगे अस्पताल होने के बावजूद लोगों के बुनियादी स्वास्थ्य में कोई अंतर नहीं है। एलोपैथी जैसी चिकित्सा पर पूरी तरह निर्भर रहने से इस समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है; ऐसा इसलिए है क्योंकि उस उपचार पद्धति का मुख्य सिद्धांत न केवल किसी भी बीमारी को तुरंत ठीक करना है बल्कि किसी भी तरह से गंभीर बीमारी को दबाने के लिए भी है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब दवाओं का असर कम होने लगता है तो आपके सिर पर डिप्रेशन की बीमारी फिर से उभरने लगती है। इतना ही नहीं, शरीर पर इन तीव्र दवाओं के दुष्प्रभाव, रोगी को फिर से विभिन्न नई चुनौतियों का सामना करने के लिए मजबूर करते हैं। इसके विपरीत भारतीय चिकित्सा में पहले रोग के कारण का पता लगाया जाता है और फिर उसके कारण का उपचार किया जाता है।

इसी वजह से पश्चिमी दुनिया में भी जहां एलोपैथी को सबसे अच्छा इलाज माना जाता है, वहां अब वैकल्पिक चिकित्सा को अपनाने का प्रयास किया जा रहा है। पिछले दशक में शुरू हुई स्वास्थ्य सेवा की वैश्विक लहर के प्रभाव आज अधिक व्यापक होते जा रहे हैं। उस वैश्विक लहर का लक्ष्य आम आदमी को बेहतर जीवन का लाभ पहुंचाना, इलाज के तरीकों और मरीजों के बीच बेहतर संबंध बनाना और कम कीमत में बेहतर इलाज मुहैया कराना था। एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि वैकल्पिक उपचार रोगी को जीवन का एक नया तरीका प्रदान करते हैं। इसलिए, रोगी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होता है और खुद को स्वस्थ रखने के लिए दृढ़ संकल्पित होता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में आम जनता अब प्राकृतिक चिकित्सा की ओर आकर्षित हो रही हैं। इस नई पद्धति को एकीकृत चिकित्सा कहा जा रहा है। आज दुनिया की एक बड़ी आबादी वैकल्पिक चिकित्सा की ओर आकर्षित है और इसके विस्तार के लिए नई नींव विकसित की जा रही है। कनाडा में 70 फीसदी, फ्रांस 75 फीसदी, ऑस्ट्रेलिया 45 फीसदी और अमेरिका 10 फीसदी इस तरीके को अपना रहे हैं। इसके अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका में, डीन ओर्निश ने जीवनशैली से संबंधित बीमारियों से बचने और जनता तक पहुंचने की व्यवस्था करने का एक नया तरीका तैयार किया है। तथ्य-आधारित शोध के माध्यम से, उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की है कि यदि किसी व्यक्ति की सात्विक और सकारात्मक भावनाएं जागृत होती हैं, तो हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियों को प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रित किया जा सकता है।

डीन ओर्निश ने अपने वैकल्पिक उपचारों को मान्य करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन फ्रांसिस्को में निवारक चिकित्सा अनुसंधान संस्थान की स्थापना की। इस कार्य के लिए यूके में डॉ. जॉर्ज लोविथ ने उन्हें सर्वोत्तम चिकित्सा तकनीक विकसित करने में मदद की है। यदि हम अपनी प्राचीन चिकित्सा और पारंपरिक चिकित्सा के विशाल भंडार का उपयोग करना सीखें, तो इसका चिकित्सा के क्षेत्र पर बहुत बड़ा और दूरगामी प्रभाव हो सकता है। विश्व स्तर पर वैकल्पिक चिकित्सा को अपनाने की यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा सर्वोत्तम है। आज दुनिया भर में कई चिकित्सक इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं, कि उपचार के माध्यम से केवल स्वस्थ शरीर प्राप्त करना संभव नहीं है, लेकिन बीमारी के कारणों को संबोधित करके स्वस्थ जीवन की नींव को मजबूत करना संभव है। जब तक हमारे देश में, इस पद्धति और चिकित्सा के सिद्धांत को अपनाया जाता है, तब तक लोग स्वस्थ और खुश रहे।

लेकिन फिर जब इस देश में पश्चिमी चिकित्सा, एलोपैथी की शुरुआत हुई, तो हमारी प्राचीन चिकित्सा प्रणाली की उपेक्षा की गई और एक तरह का अवसाद पैदा हो गया। आज यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपनी प्राचीन चिकित्सा के अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारे देश में जब भी स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार करने के लिए ,जब एक योजना बनाई जाती है, तो आधुनिक चिकित्सा के लिए एक बड़ी राशि आवंटित की जाती है; लेकिन हमारी प्राचीन व्यवस्था का कोई ठोस समाधान नहीं है और न ही पर्याप्त वित्तीय प्रावधान। इसके लिए हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है। इसके लिए हमारी प्राचीन और गौरवशाली चिकित्सा पद्धति को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार करना आवश्यक है। हमें इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने की जरूरत है और यही स्वस्थ जीवन का सही आधार है। इसे स्वीकार करके ही हम खुश और स्वस्थ बन सकते हैं और स्वस्थ भारत की कल्पना को साकार कर सकते हैं। इसलिए हमें अपनी जीवनशैली को प्राकृतिक तरीके से विकसित करने की जरूरत है।