• ।। तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः।।

    हमारा जीवन जीने के लिए अन्न और जल जितना महत्व पूर्ण है, उतना ही महत्व पूर्ण है, वायु। क्या हम सिर्फ वायु के सहारे जिंदा रह सकते है क्या ? बिल्कुल ही नहीं। हम शरीर में नासिका के द्वारा वायु खींचते है, नही! बल्कि नासिका रंध्र से वायू के साथ प्राण तत्व भी भीतर जाता है। इसी प्राण तत्व के आधार पर ही शरीर अपनी संपूर्ण गतिविधियां पूर्ण करता है। हमारा जीवन अन्न और जल पर ही आश्रित नही हैं। शरीर के भीतर गई हर एक श्वास के साथ यह प्राण शक्ति हमारा साथ देती है। प्राण शक्ति चैतन्य रूप में उभरती है। यही शक्ति कुण्डलिनी स्वरुप धारण कर कपाल भेदन करती हुई परम गति को प्राप्त होती है। इसी लिए महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के चतुर्थ पाद में प्राण के विस्तार को ही प्राणायाम कहा है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणशक्ति में वृद्धि होती है। प्राणशक्ति का स्वरुप महर्षि पतंजलि जी ने सूत्र देकर प्रकाश डाला है। अथर्व वेद के प्राण सूक्त में प्राण की महिमा बताई है।

    जो हमारे वायु मंडल में ऋण आवेषित कण होते है वह कण भीतर जाती हुई वायु के माध्यम से रक्त में प्रवेश करता है, यह श्वसन प्रक्रिया का एक अंग है। यही माध्यम हैं विजातीय द्रव्य को बाहर फेंकने का। परंतु प्राणायाम यह नहीं है, डीप ब्रीदिंग (गहरा श्वास-प्रश्वाँस लेने की प्रक्रिया) प्राणायाम है। प्राणायाम जानने से पूर्व ‘प्राण’ शब्द को जानना होगा। संस्कृत में ‘प्राण’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से हुई मानी जाती है। अन् धातु-जीवनी शक्ति चेतना वाचक है। इस प्रकार ‘प्राण’ शब्द का अर्थ चेतना शक्ति होता है। प्राण और जीवन प्रायः एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। प्राणायाम शब्द के दो खंड हैं एक ‘प्राण’ दूसरा ‘आयाम’ है। प्राण यहां जीवन तत्त्व हैं, और आयाम का अर्थ है विस्तार। प्राण शब्द के साथ प्राण वायु जोड़ा जाता है। तब उसका अर्थ नाक द्वारा साँस लेकर फेफड़ों में फैलाना तथा उसके ऑक्सीजन अंश को रक्त के माध्यम से समस्त शरीर में पहुँचाना भी होता है। यह प्रक्रिया शरीर को जीवित रखती है। अन्न और जल के बिना कुछ समय तक गुजारा हो सकता है, परंतु साँस के बिना तो दम घुटने से कुछ समय में ही जीवन का अंत हो जाता है। प्राण तत्त्व की महिमा जीवन धारण के लिए विराट की संकल्पना है।

    प्रणायाम पूरे अष्टांग योग का ही प्राण है। प्राण वह ऊर्जा है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। क्युकी यही ऊर्जा सब प्राणी, वनस्पति यो में सुक्ष्म और सशक्त रूप में पाई जाती हैं। जीवधारियों की जड़ और चेतन का‌ समन्वित रुप एक ज्ञान है, और दूसरा क्रिया है। दोनों को ही गतिशील रखने के लिए संव्याप्त प्राण ऊर्जा से पोषण मिलता है। इसी आधार पर जीवधारियों का अस्तित्व है। प्राण शक्ति की गरिमा सर्वोपरि होने और उसी के आधार पर निर्वाह करने के कारण जीवधारियों को, प्राणी कहते हैं। प्रकृति अनुदान के रूप में हर प्राणी को मात्र उतनी ही प्राण ऊर्जा देती है, जिससे वह अपने जीवित और गतिमान रह सके। इसके अतिरिक्त यदि किसी को कुछ महत्त्वपूर्ण प्राप्त करना होता है, तो उसके लिए उसे विशेष पुरुषार्थ करना पड़ता है। उसे संकल्प बल से ब्रह्मांड चेतना में से प्राण ऊर्जा की अभीष्ट मात्रा प्रयत्न पूर्वक खींचनी पड़ती है और साँस के सहारे जिस तरह ‘ऑक्सीजन’ समस्त शरीर में पहुँचाई जाती है, उसी प्रकार वह प्राण ऊर्जा की अतिरिक्त मात्रा भी पहुँचानी पड़ती है। इस प्रकार योगशास्त्रानुमोदित विशेष क्रिया-प्रक्रियाओं द्वारा उस अतिरिक्त प्राण को अभीष्ट अवयवों एवं संस्थानों तक पहुँचाना पड़ता है, प्राण में निहित ऊर्जा, ओज, तेज, वीर्य और जीवनदायनी शक्ति। वही आयाम है, विस्तार, फैलाव, अवरोध या नियंत्रण। अंतः प्राणायाम का अर्थ हुआ है, प्राण अर्थात् श्वसन का विस्तार, और फिर उसका नियंत्रण।इस प्रकार ऊर्ध्वगति प्राप्त होकर आध्यात्मिक प्रयोजन पूर्ण होता है।

    सृष्टि में जो चैतन्यता है, उसका बीज ही प्राण है। यही प्राण तत्व सृष्टि में गतिमान हो रहा है। यही संसार की उत्पत्ति का कारण है। समस्त सृष्टि कल्प के आदि और अंत में आकाश रूप में परिणति हो जाती एवं सभी शक्तियाँ प्राण में ही विलीन हो जाती हैं। नई सृष्टि उत्त्पति में प्राणत्व ही अभिव्यक्त होकर विभिन्न संरचनाओं के रूप में अपना परिचय देता है। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण एवं अणुओं की चुंबकीय शक्ति में प्राण शक्ति ही विद्यमान है। चेतना जीवों की हलचलों में वही प्रेरणा प्रदाता है, तो उत्पादन, अभिवर्धन का मूल प्राण स्पंदन ही है। यही जीवों को नवीन सृष्टि के लिए परस्पर आबद्ध करता। काम की प्रचंड शक्ति प्राण का ही एक भाग है। इसका निम्नस्तरीय स्तर है-काम-वासना अर्थात् भीतर बहुत मात्रा में क्रोध, और जुड़ाव है। प्राण शक्ति की उपासना सर्वश्रेष्ठ है। प्राण वह ब्रम्हाण्डीय द्वार है जो आपको भीतर का दर्शन कराता हैं।

    विचारों की प्रखरता एवं वाणी की तेजस्विता प्राणतत्त्व आधर पर ही प्रकट होते है। विचार इसी से सशक्त बनते तथा दूसरों पर प्रभाव छोड़ते हैं। विचारक, मनीषी, संत महापुरुषों के विचार एवं उपदेश निकट के ही नहीं अपितु दूरदर्शी होते हैं। उन्हें श्रेष्ठता की ओर बढ़ चलने की प्रेरणा देते हैं। यह प्राण शक्ति का ही प्रभाव है, जो अपने विचारों के अनुसार अन्यों को चलने, अनुगमन करने को बाध्य करती है। प्राणायाम साधना का लक्ष्य इस तत्त्व को जानना तथा उस पर नियंत्रण प्राप्त करना है। नियंत्रित प्राण इतनी बड़ी संपदा है जिसके समक्ष संसार की सभी भौतिक संपदाएँ छोड़ी जा सकती हैं। उस महाशक्ति से प्रकृति को भी वशीभूत किया जा सकता है।

    वेदों में प्राण शक्ति महिमा बताई है, जिसमें जिज्ञासु ऋषि से पूछता है,

    “कस्मिंतु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञतो भवति” ?

    ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसका ज्ञान होने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है। ऋषि उत्तर देते हुए कहते हैं कि “यह प्राण तत्त्व ही है जिसे जान लेने के बाद कुछ जानना अवशेष नहीं रहता।”

    इसी कारण श्रुति कहती है कि “प्राण तत्त्व को समझने उस पर नियंत्रण प्राप्त करने से प्रकृति के समस्त रहस्यों को अनुभव किया जा सकता है। प्राण पर विजय प्राप्त कर लेने का अर्थ है-प्रकृति पर विजय प्राप्त करना, प्रकृति की अन्य शक्तियाँ प्राण संपन्न व्यक्ति की अनुगामिनी होती हैं।

    अनंत प्राण समुद्र की यह सबसे निकट की तरंग है। इस पर यदि नियंत्रण किया जा सके तो उस प्राण के महासमुद्र से संपर्क जोड़ा जा सकता है।

    प्राण समस्त प्राणियों में जीवनी शक्ति के रूप में प्राण शक्ति विद्यमान है। वैचारिक प्रखरता उसकी उच्चतम अभिव्यक्ति हैं। इसके अतिरिक्त भी प्राण की वृत्तियाँ हैं जिन्हें हम जन्म-जात प्रवृत्ति अथवा ज्ञान रहित चित वृत्ति भी कहते हैं। इन्ही वृत्ति के निरोध को महर्षि पतंजलि जी ने योग कहा है। योग है चित्त की वृत्तियों का निरोध। जब हम प्राण तत्व में विद्यामन अनंत तत्व को भीतर स्थापित करेगे तो उस अनंत की शक्तियां आपके भीतर आएगी। यही वह स्थिति है जिसे वेद कहते है,

    । यथा पिंडे तथा ब्रम्हांडे।

    इसी शरीर के भीतर ब्रम्हांड मौजूद है। आपको जागरूकता चाहिए।अचेतन मन द्वारा संचालित प्रवृत्तियों में भी प्राण तत्त्व की ही अव्यक्त भूमिका होती है। शरीर की समस्त क्रिया प्रणाली इसी के द्वारा संचालित हैं। विश्व में अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर एक अखंड ऊर्जा का प्रवाह दिखाई पड़ती है। वही भौतिक संसार के विभिन्न रूपों में व्यक्त होता हैं। प्रत्येक वस्तु इस अनंत प्राण की एक भँवर है। लाखों प्रकार के जीव प्राण की विभिन्न स्तर की अभिव्यक्तियाँ हैं। सूक्ष्म जगत् में भी प्रविष्ट करने पर वह अखंडता दिखाई पड़ती है। ईथर को संपूर्ण जड़ जगत् को सूक्ष्मावस्था माना जाता है। वह प्राण की स्पंदनशील सूक्ष्म स्थिति है। यह सबमें व्याप्त है। यह ब्रह्मांड व्यापी सूक्ष्म प्राण शक्ति ही है, अध्यात्म साधनाओं के माध्यम से ग्रहण, आत्मसात् करने पर प्राण-प्रयोग बन जाती हैं। इसे ही खींचकर अपने विकसित सूक्ष्म शरीर धारण कर योगीजन दिव्य क्षमता संपन्न बनते हैं। अध्यात्म विज्ञान की यह विद्या आत्मिक कायाकल्प में व मानसिक क्षमताओं के अभिवर्धन में बड़ी सफलता पूर्वक प्रयुक्त की जा सकती है, इसे अपने जीवन में परीक्षित कर ऋषियों ने ग्रंथों में भी स्थानापन्न किया है। प्राणतत्त्व समस्त भौतिक और आत्मिक संपदाओं का उद्गम केंद्र है। सर्वत्र संव्याप्त है।

    स्वामी विवेकानंद ने प्राण की विवेचना ‘साइकिक फोर्स’ के रूप में की है। इसका अर्थ मानसिक शक्ति हुआ है। यह मस्तिष्कीय हलचल हुई, पर प्राण तो विश्वव्यापी है। यदि समष्टि को मन की शक्ति कहें या सर्वव्यापी चेतना शक्ति का नाम दें, तो ही यह अर्थ ठीक बैठ सकता है। व्यक्तिगत मस्तिष्कों की मानसिक शक्ति की क्षमता प्राण के रूप में नहीं हो सकती। मन की सर्वव्यापी क्षमता में अदभुत सामर्थ्य होता है। मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं के रूप में प्राण शक्ति के प्रकट होने का प्रखर होने का परिचय प्राप्त किया जा सकता है, पर वह मूलतः अधिक सूक्ष्म है। प्राण के साथ वायु विशेषण भी लगा है और उसे प्राण वायु’ कहा गया है। उनका तात्पर्य ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि वायु विकारों से नहीं वरन् उस प्रवाह से है जिसकी गतिशील विद्युत तरंगों के रूप में भौतिक विज्ञानी चर्चा करते हैं। अणु, उष्णता, प्रकाश आदि की शक्ति धाराओं के मूल में संव्याप्त सत्ता कहा जा सकता है।

    आधिदैविकेन समष्टिव्यष्टिरूपेण हरेण्यगर्भेण प्राणात्मनैवैतद् विभुत्वमाम्नायते नाध्यात्मिकेन । -ब्रह्मसूत्र शांकर भाष्य

    समष्टि रूप हिरण्यगर्भ विभु है। व्यष्टि रूप आधि – दैविक अणु।

    इस अणु शक्ति के आधार पर ही पदार्थ विज्ञान खड़ा है। विद्युत, प्रकाश, विकिरण आदि की अनेकानेक शक्तियों उसी स्रोत से क्रियाशिल रहती हैं। अणु के भीतर जो सक्रियता है वह सूर्य की है, यदि सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक न पहुँचे तो यहाँ सर्वथा अंधकार ही होगा। अणुओं की जो सक्रियता पदार्थों का आविर्भाव एवं परिवर्तन करती है उसका कोई अस्तित्व दिखाई न पड़ेगा। भौतिक विज्ञान ने इसे सूर्य द्वारा पृथ्वी को प्रदत्त-अणु शक्ति के रूप में पहचाना है और उससे विभिन्न प्रकार के आविष्कार करके सुख साधनों का आविर्भाव किया है। पर यह नहीं धारण करना चाहिए कि विश्वव्यापी शक्ति भंडार मात्र अणु शक्ति की भौतिक सामर्थ्य तक ही सीमाबद्ध है। वस्तुतः यह विपुल संपदा इससे भी कई गुना अधिक है, जड़-चेतन सभी में समान रूप से संव्याप्त है। जड़ जगत में शक्ति तरंगों रूप में संव्याप्त सक्रियता के रूप में प्राण का परिचय दिया जा सकता है और चेतन जगत में उसे संवेदना कहा जा सकता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया इसी संवेदना के तीन रूप हैं। जीवंत प्राणी इसी के आधार पर जीवित रहते हैं। उसी के सहारे चाहते, सोचते और प्रयत्नशील होते हैं। इस जीवनी शक्ति जितनी मात्रा जिसे मिल जाती है वह उतना ही अधिक प्राणवान कहा जाता है।

    प्राणायाम जितना सरल और आसान प्रतीत होता है, उतना है नहीं। जब कोई व्यक्ति प्राणायाम की चेष्टा करता है तो लगने लगता है कि यह कोई हंसी-खेल नहीं है, बल्कि एक जटिल परन्तु सार्थक कला है। प्राणायाम कोई काल्पनिक क्रिया नहीं है अपितु तत्काल प्रभावशाली है। प्राणायाम की कई क्रियाएँ सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती चली जाती हैं। आज के दौर का व्यक्ति कुछ ज्यादा ही तनावपूर्ण हो गया है। संतुलित एवं शांतिमय जीवन जीना जैसे बहुत कठिन हो गया है। स्नायुविक और रक्त संचालन कुछ प्रणालियों को प्रभावित करने वाली चिंताएँ और रोग अपेक्षाकृत बढ़ गए हैं। व्यक्ति मानसिक समस्याओं से पीड़ित हैं तो कुछ व्यावहारिक कारणों से खुद को शांत व स्थिर बनाए रखने के लिए वह तरह-तरह के मादक द्रव्यों का सेवन करता है किंतु उनसे शांति नहीं मिलती बल्कि वह जीवन को नर्क बना लेता है। संभवतया धूम्रपान और मादक द्रव्यों से वह कुछ समय के लिए दुःख भूल जाएँ परंतु यह समस्या का हल नहीं है। वे शारीरिक और मानसिक विकार तो पुनः लौटकर आ जाते हैं। हमने प्रयोगात्मक रूप से देखा है कि जीवन में प्राणायाम जैसा सशक्त माध्यम अपनाने से हम कई समस्याओं को हल कर सकते हैं। प्राणायाम तर्क, वाद-विवाद से परे है। इसे सीखने के लिए उल्लास, धैर्य, आत्म-समर्पण, गुरु-निर्देश और सावधानी पूर्वक की गई चेष्टा की ज़रूरत होती है और यही इसे सार्थकता प्रदान करती है।

    आयुर्वेद में भी वायु का विशेष और महत्त्वपूर्ण स्थान प्रतिपादित करते हुए महर्षि चरक ने चरक संहिता सूत्रस्थान 12/7 में स्पष्ट किया है कि वायु-शरीर और शरीर अवयवों को धारण करने वाला प्राण, उदान, समान, अपान और व्यान इन पाँच प्रकारों वाला, ऊँची और नीची सभी प्रकार की शारीरिक चेष्टाओं का प्रवर्तक, मन का नियंत्रक और प्रणेता, सभी इन्द्रियों को अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में प्रवृत्त कराने वाला, शरीर की समस्त धातुओं का व्यूह वाला, शरीर का संधान करने वाला है। वाणी का प्रवर्तक, स्पर्श और शब्द की प्रकृति, श्रवण और स्पर्शन इन्द्रिय का मूल, हर्ष और उत्साह, जठराग्नि करने को प्रदीप्त करने वाला, विकृत दोषों का शोषण करने वाला स्वेद, मूत्र, पुरीष आदि मलों को बाहर निकालने वाला, स्थूल और सूक्ष्म स्त्रोतों का भेदन करने बाला है। इस प्रकार अकुपित वायु, आयु या जीवन के अनुवृत्ति निर्वाह में सहायक है। यह भी कहा है कि प्राण को मातरिश्वा कहते हैं। वायु ही प्राण है। भूत, भविष्य और वर्तमान सब-कुछ प्राण में ही अधिष्ठित है।

    आत्मा को महात्मा, देवात्मा और परमात्मा बनने का अवसर इस प्राण शक्ति की अधिक मात्रा उपलब्ध करने पर ही संभव होता है। चेतन की विभु सत्ता जो समस्त ब्रह्मांड में संव्याप्त है चेतन प्राण कहलाती है। उसी का अमुक अंश प्रयत्न पूर्वक अपने में धारण करने वाला प्राणी-प्राणवान एवं महाप्राण बनता है। आज जरूरत है इस प्राण शक्ति के आव्हान की। यही शक्ति हर समय श्वास के साथ अपना परिचय देती है। इसी शक्ति के अभाव में मृत्यु ही है। हमे प्राण शक्ति को शरीर के साथ साधना है। तोड़ देनी है खुद की सीमाएं और साध्य करना है वह लक्ष्य जिसे हम पाना चाहते है? अंत में हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?

  • मानवी व्यक्तित्व में अन्तनिहित समग्रता!

    पदार्थवादी दृष्टिकोण वाले बौद्धिक मनुष्य को जैव रासायनिक संयोगों का एक आकस्मिक समुच्चय ही मानते रहे हैं। उस स्थिति में सम्पूर्ण व्यक्तित्व की किसी विशिष्ट एक सूत्र का प्रश्न ही नहीं उठता। रंग, रक्त, शरीरस्थ रसों आदि की दृष्टि से निश्चित वर्गों का निर्धारण हो जाने पर तो यह और भी निश्चित माना जाने लगा कि जिस प्रकार कुछ तत्वों की निश्चित मात्रा एवं निर्दिष्ट प्रक्रिया में सयोग मे अमुक यौगिक विशेष फल तैयार हो जाता है, उसी प्रकार कुछ निश्चित तत्वों के संयोग में सफल हो जाने पर वर्ग विशेष के मनुष्य भी तैयार हो जाएंगे।

    लेकिन विज्ञान प्रेमियों की इस कल्पना को ध्वस्त किया है, खुद वैज्ञानिकों ने। जैसे-जैसे जीवन के रहस्यों की खोज का क्रम बढ़ता गया, वैसे-वैसे वे तथ्य सामने आते गये, जिनसे स्पष्ट होता गया कि शरीर के ढाँचे वर्ण, कद, आकृति, रक्त हड्डियों आदि के हिसाब से तो वर्गीकरण ठीक हैं। किन्तु जीवन के गहरे आधारो के क्षेत्र में इस वर्गीकरण से काम नहीं चलेगा। चेतना की विद्यमानता प्रत्येक व्यक्तित्व को एक समग्र रूप देती है। जो दूसरे से बिल्कुल भिन्न है और इस लिये जिसे वर्गों में नहीं बांधा जा सकता क्योंकि हर व्यक्ति अपने आप में एक पूर्ण इकाई है। उस परमसत्ता का ही एक अंश है। अपना वर्ग उपवर्ग वह स्वयं है। इस लिए मनुष्य को अपने भाग्य का विधाता मानते है। व्यक्ति के संस्कार उसकी जन्म-जन्मान्तर की संचित सम्पदाए और साधन है। यह मान्यता भारतीय तत्व दर्शन की रही है। संस्कारों का यह सम्पुञ्जन बहुआयामी और अति विस्तृत होता है। संस्कार रूपी ये विशेषताए व्यक्ति की स्वयं उपार्जित क्षमताएं होती हैं । इन्हीं से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उसकी अपनी विशिष्टता घनीभूत रहती है।

    दृश्यमान मानव शरीर की स्थूल संरचना में बहुत अधिक अन्तर नहीं होता। तो भी कोई दो व्यक्ति शत प्रतिशत एक जैसे नहीं होते। फिर अन्तरंग क्षेत्र तो और भी विस्तृत है। प्रत्येक व्यक्तित्व का अलग-अलग अनुठापन होता है। जो संस्कार समूहों की ही विशेषता होती है।
    यह विशेषता ही मनुष्य की प्रवृत्तियों रुचियों और सामर्थ्य के रूप में प्रकट होती रहती है। कोई प्रचण्ड शरीर बल का स्वामी है, तो किसी में उसकी अल्पता होती है। कोई विलक्षण मेधा और स्मरण शक्ति से सम्पन्न है। तो किसी की बुद्धि में स्थूल बातों के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता हैं, और स्मरण शक्ति भी मन्द होती है। किसी के हृदय में करुणा का अथाह समुद्र उमड़ता रहता है, तो किसी को पर-पीड़न में ही पुरुषार्थ प्रतीत होता है । ये सभी भिन्नताएं ईश्वरीय अनुदान में किसी प्रकार के पक्षपात या विषमता का परिणाम नहीं है, वरन् जन्म-जन्मान्तरों से अमुक व्यक्ति द्वारा बढ़ाई जा रही विशेषताओं या खोयी जा रही क्षमताओं का ही और फल हुआ करती हैं। व्यक्ति विकास के स्तर को हमे समझना होगा।

    जिस प्रकार मिट्टी में पत्थर प्रतीत होने वाली वस्तुओं के तल में इलेक्ट्रान-प्रोटान और उनकी आधारभूत विद्यतु-तरंगे सक्रिय रहती है। उसी प्रकार स्थूल दृष्टि से जो काय कलेवर के अवयव हाड़-मांस के बने दीखते हैं उनमें चेतन कोशिकाएं और उनके भी मूल में जीन्स क्रोमोसोम की निर्माणकारी चेतना प्रक्रियाएं क्रियाशील रहती हैं। प्रत्येक मनुष्य के अपने व्यक्तित्व की विशिष्ट छाप उन मूलभूत तत्वों तक में विद्यामान होती है। इस विशेषता का पता चला आणविक जैविकी के विकास से, जिसकी भव्य परिणति के रूप में पिछले दिनों दुनिया की प्रथम शिशु का प्रदुर्भाव हो सका है और जिसने परे संसार को रोमांचित कर दिया है।

    आणिविक जैविकी की खोजों से यह तथ्य सामने आया कि जीवन की मूलभूत इकाई है, कोशिका ये इकाइयाँ अति सूक्ष्म होती हैं। ये प्राणिमात्र की देह इकाइयां हैं। एक कोशीय जीव अमीबा से लेकर विकसित मनुष्य तक किसी स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट युवक के शरीर में लगभग साठ हजार अरब कोशिकाएं होती हैं। इनमें से दस हजार अरब तो ऐसी इकाइयां ही हैं, जो स्वयं प्रक्रिया को परिचालित करती हैं। जितनी जगह में ‘मैं कोशिका है” छपा है, उतनी जगह में औसत आकार की पचास हजार कोशिकाए रखी जा सकती है। एक कोशिका का अपना सिस्टम है, जिनमे पाया गया है, की एक कोशिका में 8 GB तक का स्टोरेज रहता है। मानव शरीर ईश्वर द्वार बनाया गया कंप्यूटर है।

    इनमें से प्रत्येक कोशिका एक शानदार कारखाना है। जो उत्पादन, कचरे के निष्कासन, सक्रियता, सुव्यवस्था एवं प्रशासन की सुनियोजित प्रणाली से क्रियाशील है। इस कारखाने के तीन मुख्य खण्ड होते हैं- पहला बाहरी खोल, जो एक पतली झिल्ली जैसा होता है, दूसरा साइटोप्लाज्म जैसे लसलसे पदार्थ से लबालव भाग और तीसरा केन्द्रक। यह केन्द्र ही प्रत्येक गतिविधि का नियन्त्रक होता है। केन्द्रक में ही डीएनए रहता है। जो मनुष्य के गुणसूत्रों तथा अन्य सूचनाओं का भंडार होता है। सच पूछा जाय तो कोशिका एक बड़ी झील है, इसे जीव-द्रव्य या प्रोटोप्लाज्म की झील कह सकते हैं। जीव चेतना को क्षीर सागर भी कहा जा सकता है। इसी क्षीर सागर के केन्द्र में है केन्द्रक या न्यूक्लिस रूपी विष्णु जिनकी नाभिवत् केन्द्रिका न्यूक्लिओलस में रहते हैं डीएनए रूपी ब्रह्मा । इन ब्रह्मा के चार मुँह हैं- डीएनए रूपी सीढी की पौड़ियों के चार यौगिक एडिनिन, ग्वैनिन, साइटोसिन और थाइमिन । एडिनिन और थाइमिन का सदा जोड़ा रहता है तथा साइटोसिन और ग्वैनिन का। इन चारों का क्रम ही समस्त जीवों की समानता या भिन्नता का मूल है।

    चेतना विज्ञान

    डीएनए का जो कुण्डली का फीता है। उसके उपयुक्तता के लिए सर्व व्याप्त चेतना से तादात्म्य स्थापित करने के और कोई उपाय भी नहीं। एक ही आत्मा सब में समाया हुआ है। एक ही सूर्य लहरों में प्रतिविम्बत हो रहा है। यह प्रतिविम्ब भिन्न-भिन्न में उसी रूप से फीका दिखाई पड़ता है। रुप आकार प्रकार की यह भिन्नता कोशिकाओं तक में देखी जा सकती है। चमड़ी का बाहरी हिस्सा चपटी कोशिकाओं से बना है। तो पाचन प्रणाली की कोशिकाएँ सिलेन्डर के आकार की होती। माँसपेशियों की कोशिकाएं आकुंचन प्रसारण में सहायक होती तो गुर्दे की मूत्र निर्माण – निष्कासन में सहायक होती हैं। किन्तु अन्य भी कोशिका हो उसमें वे विशिष्टताएं विद्यमान होती हैं जो व्यक्तित्व का सार हैं। उनका पुनरुत्पादन सम्भव है। इसी आधर पर वैज्ञानिक दावा करते हैं, कि यदि महात्मा गाँधी की त्वचा की कोशिकाएं लेकर उनके ऊतक कोषिकाये बना लिये गये होते तो तक कुछ दिनों बाद तकनीक विकसित होने पर उन्हीं ऊतक कोशिकाएं से हजारों गाँधी बनाये जा सकते थे। यदि आज रोनाल्ड रीग अथवा फ्रेंचर की त्वचा की कोशिकाएँ इसी प्रकार रख ली जाए, कल उन्हीं से अनेकों रीग अथवा अनेको नेता बनाये जा सकते हैं।

    चेताना विज्ञान और अणु जैविकी के अन्वेषण में कदम-कदम पर पैदा होने वाली नई-नई कठिनाइयाँ एवं प्रतिक्रियाए वैज्ञानिक की इस सामर्थ्य सम्भावना को साकार कर सकेंगी अथवा नहीं यह खोज का विषय है। परंतु एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के आगे की छाप दूसरे व्यक्ति से और एक के स्वरों का ध्वनि-चित्रांकन दूसरो के स्वरों के ध्वनि चित्रांकन से भिन्न होते हैं। साथ ही एक मनुष्य के शरीर में विद्यमान खरबों कोशिकाओ में से प्रत्येक में उसकी आधार भूत विशेषताएं सुरक्षित होती है। इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य की सम्पूर्ण सत्ता में समग्रता है। वह चित्र विचित्र प्रवृत्ति प्रवाहों का आकस्मिक मेल नहीं है। उसकी भावनाएं भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्वों के यों ही एकत्रीकरण से नहीं पैदा होती, अपितु उसके रोम-रोम में अंग अंग में उन कोशिका ओं का सारभूत अंश विद्यमान होता है।

    इसी तथ्य से एक अन्य निष्कर्ष भी सामने आता है। मृत्यु के बाद मनुष्य के मस्तिष्क के प्रोटोप्लाज्म के बिखर जाने और उसके सौ वे भाग का अश-विशेष के अन्य मनुष्य में प्रविष्ट हो जाने की बात कई वैज्ञानिक को के द्वारा उन प्रमाणों के सन्दर्भ में की जाती रही है जहाँ व्यक्ति अपने कथित पूर्व जन्म का कोई प्रमाणिक विवरण दे देता किन्तु कोशिका सम्बन्धी ये खोजें उस तर्क को कमजोर बनाती जब शरीर के किसी भी हिस्से की कोशिका में व्यक्ति की सभी मूलभूत विशेषताएं संरक्षित रहती हैं। तो मस्तिष्क की कोशिका का टोप्लाज्म बिखर कर घूमघूम कर दूसरे में प्रविष्ट होने के स्थान पर उन कोशिका के ही नये रूप में पहुँचने की सम्भावना है। अभी इसके अनेक रहस्य अज्ञात के गर्भ में ही हैं। इतना ही स्पष्ट हुआ कि हर नयी कोशिका अपनी जननी कोशिका से समस्त सूचनाए संकेत लेकर अपना नया कारखाना खोलती है। नुवंशिकी कूट भाषा अभी तक पूर्णतः जानी नहीं जा सकी है। रहस्य खुलने पर वह जानकारी जीव-कोशिकाओं में निहित चेतना अविच्छिन्नता पर भी प्रकाश डाल सकेगी। आणविक जैविकी की इन खोजों ने ये दो बात अब तक स्पष्ट हैं-सभी जीव-कोशिकाओं की मूलभूत रचना-प्रक्रिया एक है। इस व्यक्तित्व की वे इकाइयाँ होती हैं। उसकी सभी आधरभूत विशेषता इनमें सूत्र रूप में सन्निहित होती हैं। दोनों ही तथ्य भारतीय दर्शन के प्रतिपादन के अनुरूप हैं । वेदान्त दर्शन की मान्यता है कि एक ही चेतन-तत्व भिन्न-भिन्न दृश्यों के रूप में सर्वत्र दीखता है। साथ ही इन दृश्यों का बनना-बिगड़ना भी आकस्मिक नहीं है। यह एक सुनिश्चित सृष्टि प्रक्रिया का अंग है। अपितु उसी व्यवस्था के नियमों के अनुसार होता है।

    चेतना का स्तर और डीएनए

    हमारी चेतना का स्तर न तो आकस्मिक है और न अन्तिम या अपरिवर्तनीय। न तो इसका चाहे जैसे संयोग होता है न ही चाहे जैसा विघटन। इस सृष्टि में सभी कुछ सुव्यवस्थित और नियम बद्ध है और चेतना से परिपूर्ण है। वस्तुतः शरीर एक परिपूर्ण ब्रह्माण्ड है। प्राकृतिक परमाणु (जो साइटोप्लाज्मा निर्माण करते ) उसके लोक की रचना करते हैं और एटम मिलकर एक चेतना के रूप में उसे गतिशील रखते हैं। सूर्य, परमाणु प्रक्रिया का विराट् रूप है। इसलिये वही दृश्य जगत की आत्मा है, चेतना है, नियामक है, सृष्टा है। उसी प्रकार सारी सृष्टि का एक अद्वितीय स्रष्टा और नियामक भी है पर वह इतना विराट है कि उसे एक दृष्टि में नहीं देखा जा सकता । उसे देखने समझने और पाने के लिये हमें परमाणु की चेतना से प्रवेश करना पड़ेगा, योग साधना का सहारा लेना पड़ेगा, अपनी चेतना को इतना सूक्ष्म बनाना पड़ेगा कि आवश्यकता पड़े तो वह काल ब्रह्माण्ड तथा गति रहित परमाणु की नाभि सत्ता में ध्यानस्थ केन्द्रित हो सके। उसी अवस्था पर पहुँचने से आत्मा को परमात्मा स्पष्ट अनुभूति होगी।

    चार यौगिक उसकी चार अक्षर वर्णमाला है। इन्हीं अक्षरों के क्रम और डीएनए की संख्या के उलट फेर से भिन्न-भिन्न चेतना संदेश तैयार हो जाते हैं और उन चेतना सन्देशों से ही बनता यह सारा चेतना संसार। गुणसूत्र के डीएनए के एक क्रम से व्यक्ति का काला रंग बनता है तो अन्य भिन्न-भिन्न क्रम से गोरा,या पीला। देह के प्रत्येक अवयव और उनकी विशिष्टताओं का निर्माण इन्हीं डीएनए के हेर-फेर से हुआ करता है। कोशिकाओं के भीतर का डीएनए ही प्रोटीनों के संश्लेषण का निर्देशक है। इन प्रोटीनों से बनते हैं एंजाइम । प्रत्येक जैव-रासायनिक क्रिया का प्रारम्भ, विकास या अन्त इन्हीं एंजाइमों का खेल है। दुनिया में प्राणियों की बोलियाँ भिन्न-भिन्न हैं। एक प्राणी दूसरे वर्ग के प्राणी की बोली कम समझ पाता है। मनुष्य ने तो भिन्न मत भाषाएँ विकसित की हैं और जिस भाषा-बोली का उसे ज्ञान नहीं उसका आशय अभिप्राय वह नहीं समझ पाता। कई बार तो मनोदशा और ज्ञान स्तर की भिन्नता से एक ही भाषा के बोलने वाले दो व्यक्ति एक दूसरे का अभिप्रायः ठीक-ठीक नहीं समझ पाते। अपितु सभी जीवों की रासायनिक भाषा एक है और प्रत्येक जीव कोशीका उससे भली भांति अवगत है। उस भाषा का जो अर्थ जीवाणु कोशिका के लिए है वही अर्थ मानव कोशिका के लिए, इन सबसे यही स्पष्ट होता है कि सभी प्राणियों में क्रियाशील मूलभूत चेतना एक ही है और उनकी संरचना के आधारभूत सूत्र एक में हैं।

    भारतीय तत्वदर्शी प्रखर साधनाओं द्वारा इसी एकमेव अद्वैत चेतन सत्ता और उसके लिए, क्रियाकलापों की जानकारी में समर्थ होते रहे हैं। तभी वे सूक्ष्म जगत में उभरने वाली हलचलों की जानकारी प्राप्त करने में समर्थ होते। इसलिए अंत में हमे हमारे जीवन का लक्ष्य तय करना होगा? हमे उस यात्रा के लिए तैयार होना हैं, जो भीतर के चिदाकाश का द्वार तक लेके जाती है। हमे तैयार होना है, उस सवाल के लिए “मैं चाहता क्या हूं??

  • मां प्रकृति का धन्यवाद करना सीखाता, “आयुर्वेद”

    मां प्रकृति ने मनुष्य के लिए हर वस्तु उत्पन्न की है। जीवन को जीने के लिए प्राण वायु, शक्ती के लिए अन्न। मां प्रकृति हमारी हर एक जरूरत को पूर्ण करती है। वो कभी आपदा के रुप में कहर बनकर टूट पड़ती है तो भी हमारी मदद करती हैं। परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। मां प्रकृति की सबसे सुंदर और जटिल संरचना है मानव शरीर। मानवी शरीर को स्वास्थ रखना हमारे हाथों में है। इस स्वस्थता को प्रदान करती है मां प्रकृति। मां प्रकृति के नजदीक रहकर हम खुद को और समस्त मानव जाति को निरोगी रख सकते है, इस बात में कोई संशय नहीं हैं। मां प्रकृति ने हमें ज्ञान प्रदान कराती है। मानव शरीर से जुड़ा हुआ ज्ञान है आयुर्वेद। औषधि उपचार के लिए जड़ी-बूटियाँ भी प्रदान की हैं। इस आधार पर चिकित्सा को सर्व सुलभ, प्रतिक्रियाहीन तथा सस्ता बनाया जा सकता है। जड़ी बूटी चिकित्सा बदनाम इसलिए हुई कि उसकी पहचान भुला दी गयी- विज्ञान जुठला दिया गया। सही जड़ी-बूटी उपयुक्त क्षेत्र से, उपयुक्त मौसम में एकत्र की जाय; उसे सही ढंग से रखा और प्रयुक्त किया जाय तो आज भी उनका चमत्कारी प्रभाव देखा जा सकता है।

    हम कुछ ही गिनी चुनी जड़ी-बूटियों से ८० प्रतिशत लगभग रोगों का उपचार सहज ही किया जा सकता है। ऐसी सरल, सुगम, सस्ती परन्तु प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति जन-जन तक पहुँचाने के लिए हमारे ऋषि मुनियों, गुरु ,अनेक आध्यात्मिक संस्थान , शोध कर्ता ने आयुर्वेद पर प्रस्तुती सादर कि है। आयुर्वेद में वर्णित अनेक जड़ी-बूटियों को भारतीय संस्कृती में प्राथमिकता दी गयी है, जो भारत में अधिकांश क्षेत्रों में पायी जाती हैं, अथवा उगायी जा सकती है। भारत की गुरु सत्ता, आचार्य अनेक संतो की यह इच्छा है कि, यह विधा विकसित हो और रोग निवारण के साथ-साथ जन-जन को प्राण शक्ति संवर्धन का लाभ भी प्राप्त हो । ऋषियों द्वारा विकसित इस विद्या का लाभ पुनः जन-जन को मिले। आने वाले समय में न तो संसाधनों की कमी रहने वाली है, न की तकनीकी दृष्टि से विकसित सुविधा साधनों की हमें आशा रखनी चाहिए कि महाविनाश की सारी तैयारियों के बावजूद विवेक का वर्चस्व बना रहेगा एवं अज्ञान, अभाव को दूर कर एक सद्भावनापूर्ण समाज विकसित होगा। एक आशंका फिर भी मन में रहती है कि वर्तमान जीवन पद्धति चिन्तन की विकृति एवं आधुनिक विकास के चलते, क्या मां प्रकृति की संताने सभी प्राणियों में मनुष्य इस स्थिति में होगा कि साधनों का सदुपयोग कर सके ? स्वयं अपने आपको सर्वांगपूर्ण स्वस्थ एवं संतुलित बनाए रख सके ? मानव आज के विकास की राह में अंधा हुआ प्रतित होता हैं। गहराई से देखने पर काफी खोखला नजर आता है। उसकी जीवनी शक्ति मुरझाई सी गयी लगती है। थोड़ा सा मौसम का असंतुलन उसे व्याधिग्रस्त कर देता है। भ्रान्तियां, आवेश, उत्तेजना, अवसाद जैसे मनोविकारग्रस्त व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है। बाहर से स्वस्थ, सुडौल दीखते हुए भी व्यक्ति की जड़ें कमजोर दिखाई देती हैं। आहार उपलब्ध होते हुए भी वह आहार विष बनकर सामने आता है । इसे आधुनिक जीवन की नीति कहें या प्रगति की दिशा में भटकना, कुछ भी नाम दे लें; पर लगता यही है कि ये वे मजबूत कंधे नहीं हैं, जिन पर समाज, राष्ट्र, विश्व की सदी का बोझ लादकर आगे बढ़ा जा सकें।

    आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने निदान के साधन इतने जुटा दिए है कि रोग की जाँच-पड़ताल अब अधिक समय नहीं लेती। पर “मनुष्य रोगी है,” यह वही मानने को तैयार न हो, वह बाहर से स्वस्थ दिखे भी न पड़े, तो समझना चाहिए की कहीं कोई गड़बड़ी है। आहार की अनियमितता, अस्त-व्यस्त रूप में आधुनिक औषधि का सेवन, चिन्तन क्षेत्र में भ्रान्तियों के भ्रम जाल ये सभी आज सारे मानव समुदाय को अस्वस्थ बनाये हुए हैं। लक्षण बाहर से दिखायी नहीं पड़ते ।अन्तविकार अन्दर से व्यक्ति को खोखला बनाते रहते एवं बाहर की लीपा-पोती से प्रकाश में नहीं आ पाते हैं। ऐसे में लगता है नया मानव तैयार करने के लिए ऐसी वैकल्पिक चिकत्सा पद्धति तलाशनी ही होगी, जो व्यक्ति को समग्र रूप से आरोग्य प्रदान करें, उसकी क्षीण होती जा रही जीवनी शक्ति को सहारा दे। चाहे प्रसंग अत्याधुनिक विकसित राष्ट्रों का हो अथवा अविकसित विकासशील तीसरी दुनिया के राष्ट्रों के नागरिकों का, सभी पर यह बात समान रूप से लागू होती है।

    योग्य उपचार पद्धति का चयन!

    सही उपचार पद्धति कौन सी हो ! इस पद्धति को कैसे समझे? इस लिए हमे हमारी मूल प्रकृति से जुड़ना होगा। उपचार से उपकार तक की यात्रा को विकसित करना होगा। रोगों के मूल तक जड़ों तक पहुंचना होगा तभी हम रोगों के जंजाल से मुक्त हो पाएंगे। इसलिए चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के नामों पर जब भी विचार होता है, तो वह एक सीमित दायरे में घूमकर रह जाता है। ऐलोपैथी की सबसे बड़ी देन यही है, कि उसने रोगों के कारणों के बारे में आधुनिक ढंग से चिन्तन करना सिखाया। चिकित्सा पद्धति कितनी निरापद है, इस विवाद में पड़े बिना यह चर्चा करना मुख्य होगा, कि वर्तमान परिस्थितियों में एक विशाल समुदाय में उपचार का मंत्र किस तरह फुंका जाय की उपचार के नाम पर चारों ओर नजर दौड़ाते है, तो प्रकृति के आंगन में फलने-फूलने वाली औषधि के माध्यम से चिकित्सा ही हर दृष्टि से हानिरहित, सस्ती, सुगम एवं अधिक लाभकारी प्रतीत होती है। यहां आयुर्वेद एवं वनौषधि विज्ञान के अन्तर को समझना जरूरी है। आयुर्वेद के धन्वन्तरि काल से लेकर अब तक के विकास में अनेकों परिवर्तन होते हुए चले आए हैं। आज के आयुर्वेद के रूप को देखते हुए मन में ग्लानि सी होती हैं। जो संस्कृति अपनी दिव्य शक्ति से सम्पन्न जड़ी-बूटियों के कारण कायाकल्प कर सकने तक में सक्षम मानी जाती रही है, उसे आयुर्वेद पढ़ कर डिग्री प्राप्त करने वाले ही प्रयुक्त न कर, एलोपैथी की शरण लेते देखे जाते हैं। यह मात्र बौद्धिक, परावलम्बन एवं पश्चिम की अन्धाधुंध नकल ही नहीं है, शरीर को स्थायी हानि पहुंचाने की कीमत पर तुरन्त लाभ मिलने की, रोगी व चिकित्सक की दोनों की मिली भगत की नीति भी है ।

    जीवनी शक्ति संवर्धक वनौषधियाँ यदि कहीं नजर आती हैं, क्या वो सही ढंग से एकत्र न हुई, घास-पात के साथ मिली ये औषधियां क्या असर करेंगी ? जबकि सभी जानते हैं कि तोड़े जाने के बाद ३ से ६ माह के बाद इनके सभी गुण-धर्म लगभग समाप्त प्राय हो जाते हैं। जबकि भारत के अनेक आध्यात्मिक संस्थान द्वारा इस आयुर्वेद के गौरव, वनौषधि विज्ञान की महत्ता समझायी जाती हैं। और उन्हें यथा शक्ति स्वाभाविक रूप में प्रयोग करने योग्य बना कर, सेवन विधि का प्रतिपादन किया जाय एवं यदि सम्भव हो, तो ऐसी पौधशालायें स्थान स्थान पर लगायी जाए ताकि उनके ताजे रूप में सेवन का प्रचलन बढ़े। यह नई क्रांति के रुप में उभरकर नया बिजनेस मॉडल हो सकता है।


    आयुर्वेद मूलतः अथर्ववेद का उपांग है और पाँचवे वेद के रूप में प्रख्यात है। अग्निवेश इस विधा के प्रणेता माने जाते हैं, जिन्होंने आयुवेद का अध्ययन पुनर्वसु आत्रेय से किया था; किन्तु अथर्ववेद जिसके एक अंग के रूप में आयुर्वेद ने जन्म लिया, उसमें अथर्वा ऋषि के माध्यम से यह बताया गया है, कि समस्त जीव समुदाय के लिए विधाता ने प्रकृति जगत वनौषधियों का प्रावधान रखा है। गुण, कर्म भेद अलग अलग हो सकते हैं, किन्तु एक भी पौधा इस धरती पर ऐसा नहीं है, जिसमें औषधीय गुण न हो। विशिष्ट चिकित्सा हेतु सुरक्षित कुछ विष प्रधान जड़ी-बूटियों की चर्चा न करके शेष पर दृष्टि डाली जाय, तो सभी स्थानीय उपचार (लोकल एप्लीशन) से लेकर समग्र शरीर के उपचार में उपयोगी देखी जा सकती हैं। आयुर्वेद के सुविख्यात आठ तन्त्रों की चर्चा भी यहाँ प्रासंगिक नहीं है। क्योंकि हमारा मूल विषय है वनौषधियों के विभिन्न अनुपान भेद द्वारा एकौषधि अथवा सम्मिश्रण के रूप में प्रयोग से शरीर व मन की सर्वांगपूर्ण चिकित्सा !! शरीर तंत्र व उसकी कार्य विधि की थोड़ी भी जानकारी रखने वाला व्यक्ति, उस विषय पर प्रस्तुत किये जा रहे प्रतिपादन द्वारा स्वयं अपनी एवं अन्य की चिकित्सा करता रह सकता है। इसी कारण अधिक विस्तार में जाने की अपेक्षा यह उचित समझा गया कि सार संक्षेप में इस चिकित्सा का मूलभूत तत्त्वदर्शन एवं उसकी कार्यपद्धति प्रस्तुत कर दी जाय ।

    आयुर्वेद प्रकरण के प्रारम्भ में एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण एवं रोचक प्रसंग चरक संहिता में आता है। हिमालय क्षेत्र में सभी ऋषियों सम्मति से महर्षि भारद्वाज, देवराज इन्द्र के पास धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चतुविध पुरुषार्थों के साधन के आधार- आरोग्य की हरने वाले रोगों से मुक्ति पाने का उपाय पूछने जाते हैं, और देवराज इन्द्र ने यह ज्ञात देव वैद्य अश्विनी कुमारों से एवं अश्विनी कुमारों ने इसे दक्ष प्रजापति से प्राप्त किया। दक्ष प्रजापति को इस विद्या की शिक्षा स्वयं ब्रह्मा ने दिया था। भरद्वाज मुनि को आयुर्विज्ञान के तीन मूल सूत्र समझाते हुए देवराज इन्द्र कहते हैं कि आयुर्वेद मूलतः तीन स्तम्भों पर टिका है,

    आयुर्वेद के तीन स्तंभ,

    १) प्राणियों के स्वस्थ एवं रुग्ण होने के क्या कारण हैं।

    (२) स्वस्थ एवं रुग्ण जीवधारियों के लक्षण क्या हैं ?

    (३) स्वस्थ रहने को औषधि (पथ्य एवं जीवनी शक्ति सम्बर्धक बलप्रदायी औषधि) तथा रोगी प्राणी की औषधि क्या है ?

    सारे आयुर्वेद की व्याख्या इन तीन स्तम्भों पर चलती है। वनौषधि विज्ञान की व्याख्या भी इसी आधार पर की जा सकती है। औषधि ही क्यों ? रस, भस्म-खनिज आदि क्यों नहीं ? इस संबंध में यही कहना है, कि अपना उद्देश्य आयुर्वेद के मूलभूत स्वरूप का पुनर्जीवन करना है। यह सारी धरती देवताओं द्वारा ले जाये जा रहे अमृत कलश से बंद रूप में गिरे अमृत से उद्भूत वनस्पतियों से विभूषित है। हर वनस्पति अपने पाँचों अंगों में औषधीय विशेषताएँ लिए हुए है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय, तो उनमें जल, स्टार्च, रेजिन्स पेटाइड्स रेसे आदि के रूप में सक्रिय घटक एवं संभावित साइड इफेक्ट (दुष्परिणाम) को रोकने वाले संघटक भी विद्यमान हैं। इन औषधियों को ताजे रूप कल्क कर-पीसकर, चटनी के रूप में, घनसत्व के रूप में या छाया में सुखाकर अच्छी तरह पीसकर सुक्ष्मीकृत चूर्ण रुप में दूध, जल, मधु, मिश्री, मलाई, घी या अन्य किसी अनुपान के साथ दिया जाता है। सभी रूपों में ये अपना प्रभाव शीघ्र ही दिखाती हैं। सर्वथा हानिरहित इनका शरीर पर प्रभाव सही निशाने पर बैठने वाला एवं चिरस्थायि होता है, यह शोधकर्ता ओ के निष्कर्ष बताते हैं। अन्य अनेकों संस्थानों द्वारा किए गये प्रयोग परीक्षण भी इसकी साक्षी देते हैं। उनके विस्तार में न जाते हुए यहाँ शरीर व मन पर वांछित प्रभाव डालने वाली ४२ औषधियों एवं उनकी प्रयोग विधि की चर्चा की जा रही है। इस संक्षिप्त निर्देशिका से परिजनों को उपचार प्रक्रिया का तत्त्व दर्शन समझकर, उसे व्यवहार में उतारना आसान हो जायेगा ।

    विभिन्न संस्थानों के लिए भिन्न-भिन्न औषधियां: वनौषधि चिकित्सा का मूल आधार है- सक्रिय संघटकों को नष्ट किए बिना उन्हें संस्थान विशेष के लिए उचित मात्रा में अनुपान भेद द्वारा जीवनी शक्ति संवर्धन हेतु मुख मार्ग से देना । जहाँ आवश्यक हो, वहां उन्हें स्थानीय उपचार हेतु भी प्रयुक्त करना। इस दृष्टि से शरीर के विभिन्न संस्थानों के अनुसार चयन की गयी ४२ औषधियों का वर्णन इस प्रकार है,

    42 औषधि के भंडार

    1. सुख, मसूड़े एवं दाँतों के लिए बकुल (मौलश्री) ।
    2.कायफल वालों के लिए भृगराज ।
    3. त्वचा सम्बन्धी विकार के लिए बाकुची ।
    4. मस्तिष्क एवं मनः संस्थान के लिए ब्राह्मी जय माँसी, दन ।
    5. नाड़ी संस्थान – ज्योतिष्मति ( मालकगनी ) ।
    6. संधि मांसपेशियों संबन्धी रोगों के लिए निर्गुण्डी, रास्ना, सुष्ठी (सोठ)।
    7. हृदय एवं रक्तवाही संस्थान- पुनर्नवा, शंखपुष्पी, अर्जुन फेफड़े तथा ऊपरी व निचला श्वास संस्थान-अडूसा, भारंगी कटकारि शिरीष।
    8. ऊपरी पाचन संस्थान एवं यकृत (लीवर) आंवला, मुलेठी, शतपुष्पा शरपुखा, कालमेध।
    9. पाचन संस्थान नागकेसर एवं जननसंस्थान-गोर, वरुण, अशोक सोध।
    10. रक्त होइफ, संक्रमण नाशक-दितीय सारियाँ, खदिर चिरायता

    प्रसंगवश यहाँ एक दो बातों का खुलासा कर देना ठीक रहेगा। आयुर्वेद में होता यह है, की डॉक्टर एक ही औषधि को सभी रोगों को रामबाण दवा बता देते हैं। इस तरह वह कहीं भी नहीं रहती। स्वाभाविक है कि उसमें वे सक्रिय घटक है जिस कारण वह कई रोगों के कई लक्षणों पर अपना अचूक प्रभाव दिखाती है। किन्तु इससे यह नहीं प्रमाणित हो जाता कि वह उन सभी रोगों में काम में लायी जा सकती है। उसमें कौन से ऐसे सक्रिय औषधि तत्व है, यह फाइटोकेमीकल एनालिटीकल विधियों द्वारा पता लगाकर किसी रोग विशेष के साथ उसे प्रयुक्त किया जा सके, तो बहुत सीमा तक भ्रांतियां मिट सकती है। यह प्रयास औषधि निर्धारण में यहाँ किया गया है।

    आवश्यकता पड़ने पर एक ही औषधि का सम्मिश्रण के प्रयोग सम्बन्धी एक और स्पष्टीकरण देना जरूरी है। किन्ही किन्ही
    परिस्थितियों में व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक परिस्थितियों के अनुसार एक ही औषधि लम्बे समय तक प्रयोग करना ठीक होता है, कभी-कभी जरूरी होता है कि कुछ सम्मिश्रण प्रयोग किए जायें। इससे औषधि एक-दूसरे की कार्य क्षमता को और भी कई गुना बढ़ाती है एवं प्रभाव अधिक तीव्र व जल्दी होता है। औषधि यो के संघटक जब तक एक दूसरे से विच्छेदित नहीं होते, उनमें आपस में रासायनिक क्रिया नहीं होती। वे अपना प्रभाव समूचे रूप में मानव शरीर पर डालते हैं। अतः “ड्रग इटरएक्शन” जैसी संभावना यहाँ नहीं रह जाती। औषधियाँ जिन सक्रिय एल्केलाइड्स, पेण्टाएड्स व स्टार्च फाइवस आदि से मिलकर बनी होती हैं, वे परस्पर इस प्रकार एक दूसरे से मिले हुए रहते हैं, की एक ही औषधि का सेवन करने पर किसी तरह के हानिकारक प्रभाव की आशंका नहीं करनी चाहिए। एक ही जड़ी-बूटी में प्रोटागोनिस्ट ,एण्टागोनिस्ट तत्त्व विद्यामान रहते हैं। एण्टा गोनिस्ट निष्क्रिय औषधि तत्त्व साइड इफेक्ट्स को प्रभावी होने से पहले रोक देते हैं। इस प्रकार औषधि अपने आप में एक सम्पूर्ण आहार है। उचित मात्रा में उचित अनुपान के साथ लिए जाने पर उसके किसी भी प्रकार के दुष्परिणामों की अनावश्यक आशंका नहीं करनी चाहिए।

    “वेहीकल” यानी वे पदार्थ, जो औषधि के साथ दिए जाने पर सक्रिय (एक्टिव इन्ग्रेडीएन्ट्स ) को शरीर में अपने लक्ष्य तक पहुंचाए। अनुपान उसी या अन्य किसी औषधि का क्वाथ भी हो सकता है, अथवा जल, दूध, घी, दही, मधु, मिश्री, मलाई, मक्खन या अन्य किसी तरल पदार्थ के रूप में भी हो सकता है । अनुपात इसलिए अनिवार्य है कि वह औषधि अपने सही रूप में सही स्थान पर पहुंचे। वस्तुतः अनुपान औषधि की क्रियाशीलता को बढ़ा देते हैं। सामान्यता ठण्डा या गुनगुना जल अनुपान रूप में प्रयोग करते है। गौ का दुदूध भी एक आदर्श अनुपान तथा स्वयं में एक सम्पूर्ण आहार है। लैक्टिक इन्जाइम्स व उसमें विद्यमान वसा के छोटे-छोटे कणों का बोल औषधि को “पेनिटेट्रिंग” प्रवेश योग्य बना देता है। दूध में लगभग २१ प्रकार के इनलाइम्स पाये जाते हैं। ये जड़ी-बूटियों के एल्केलाइड्स ,ग्लाइकोसाड्स व पेप्टाइड्स को सूक्ष्मीकृत करने की क्षमता रखते हैं। दूध गर्म करके थोड़ा ठण्डा करके लिया जाय, तो उचित है।

    हनी वस्तुतः फूलों का स्वरस है। बाद में मधुमक्खियों द्वारा सक्रिय हारमोन्स के माध्यम से और भी अधिक गाढ़ा इन्जाइम बना दिया जाता है। जहाँ फूलों के स्वरस में पानी का अनुपात लगभग सत्तर प्रतिशत होता है, वहाँ मधुमक्खियों के शरीर से गुजर कर आने के बाद वह मात्र दस प्रतिशत रह जाता है। ऐसे द्रव्य पदार्थ के साथ ली गई औषधि पेट से तुरन्त रक्तवाही नलियों में होकर अपने-अपने क्षेत्र में पहुंच जाती है। हनी को जब भी लें, उसे ठण्डी स्थिति में ही लें। जल के साथ मिला कर लें। समान मात्र में जल के साथ गर्म अवस्था में मिलाने पर तथा घी के साथ समान मात्रा में दिए जाने का शरीर पर विष के समान प्रभाव पड़ता है, अतः इस सम्बन्ध में सावधानी बरती जानी चाहिए ।

    मक्खन, घी, दही, मलाई आदि दूध के परिवर्तित रूप है। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें भी प्रयुक्त किया जा सकता है। मिश्री की चाशनी भी हनी के समान एक श्रेष्ठ “वेहीकल” है जो औषधि की घुलनशीलता को बिना उसके गुण धर्म बदले बढ़ा देती है। किन्हीं किन्हीं परिस्थितियों में इसे भी अनुपान रूप में प्रयोग किया जाता है। अनुपान के कार्यों के सम्बन्ध में चरक सूत्र स्थान (३२० अ० २७ ) में कहा गया है कि “अनुपान तृप्त करता है, देह एवं इन्द्रियों की कमी को पूर्ण करता है, बल व जीवन देता है, खाये हुए आहार को सर्वत्र शरीर में फैलाने का कार्य करता है व उसे शरीर के साथ एकभाव कर देता है। अनुपान सेवन की गयी औषधि को अलग कर आमाशाय व उससे आगे पक्वआशय की ओर से जाता है। यह अन्न को गीला कर आसानी से अवशोषित हो शरीर में संव्याप्त हो जाने वाला कर देता है। इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि जो पेय आहार की सीमा में नहीं आता है, जिसमें स्वयं के औषधि गुण न हों और धातुओं का विरोधी न हो, वही सर्व श्रेष्ठ अनुपान है। आयुर्वेद केवल एक पद्धति नहीं है, अपितु यह जीवन जीने का नया तरीका है। जहां आपको ज्ञान प्रदान किया जाता है वही आयुर्वेद को अपनाना ही आज की जरुरत है।

  • मै चाहता क्या हूं?

    जन्म और मृत्यु के बीच की अवस्था का नाम जीवन है। जीवन को समझने से पूर्व जन्म और मृत्यु के कारणों को समझना आवश्यक होता है। जिसके कारण हमारा जीव विभिन्न जीव स्तर पर भ्रमण करता है। जन्म और मृत्यु क्यों? कब ? कैसे और कहाँ होती है? उसका संचालन और नियन्त्रण कौन और कैसे करता है? सभी की जीवन शैली, प्रज्ञा, सोच, विवेक, भावना, संस्कार, प्राथमिकताएँ, उद्देश्य, आवश्यकताएँ आयुष्य और मृत्यु का कारण और एक-सा क्यों नहीं होता? मृत्यु के पश्चात् अच्छे से अच्छे चिकित्सक का प्रयास और जीवन दायिनी समझी जाने वाली दवाईयाँ क्यों प्रभावहीन हो जाती हैं? मृत्यु के पश्चात् शरीर के कलेवर को क्यों जलाया, दफनाया अथवा अन्य किसी विधि द्वारा समाप्त किया जाता है ?

    प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि “मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मुझे मानव जन्म क्यों और कैसे मिला ? मानव जीवन में भी सभी को एक-जैसी परिस्थितियाँ और वातावरण क्यों नहीं मिलते? सभी की आयु एक जैसी क्यों नहीं होती? किसी की बुद्धि, मन, इन्द्रियों और शरीर का पूर्ण विकास होता है तो कुछ जन्म से ही अविकसित, असन्तुलित, विकलांग अथवा अस्वस्थ क्यों होते हैं? जन्म के साथ परिवार, समाज, धर्म और संस्कृति, परिस्थितियाँ, कार्यक्षेत्र तथा जीवन को प्रभावित करने वाले विभिन्न प्रसंगों का संयोग अथवा वियोग क्यों मिलता है? जीवन चलाना तो प्रायः सभी जीव जानते हैं। परन्तु जीवन को सार्थक कैसे बनाना, यह केवल मानव जीवन में ही संभव होता है। सृष्टि में मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसको पाँचों इन्द्रियों के साथ मन, मस्तिष्क, चेतना और विवेक की सर्वोच्य अवस्था प्राप्त होती है, जिसमें जीवन का सर्वाधिक विकास सम्भव होता है। मानव इसी कारण सम्यक् चिन्तन कर अपनी क्षमताओं को पहचान, उसके अनुरूप जीवन का लक्ष्य बना जीवन जी सकता है।

    इन सब प्रश्नों के जवाब आपको बाहर नहीं मिल सकते है। केवल भीतर की खोज ही एकमात्र विकल्प शेष रहता है। जीतने खोज और रिसर्च बाहर होते है उतने ही हमारे शरीर के भीतर बदलाव बनते है। इसलिए,
    मानव जीवन अमूल्य है। वस्तु जितनी मूल्यवान होती है, उसका उपयोग उसके अनुरूप करने वाला ही सच्चा ज्ञानी होता है। चाय की जो प्याली पाँच रुपए में मिलती है, उसके लिए हज़ार रुपए देने वाला ना समझ होता है। वे सभी व्यक्ति बुद्धिमानों की श्रेणी में नहीं आते जो जानते हैं कि अमुक प्रवृत्ति उनके स्वास्थ्य अथवा जीवन के लिए हानिकारक है, फिर भी उनसे नहीं बचते और जो यह जानते है कि अमुक प्रवृत्तियों से शांति मिलती है, तनाव दूर होता है, निर्भयता आती है, स्वास्थ्य अच्छा रहता है, फिर भी उनकी उपेक्षा करते हैं। हमें चिन्तन करना होगा कि मानव जीवन के रूप में प्राप्त हम अपनी ऐसी अमूल्य क्षमताओं का अनावश्यक कार्यों में दुरुपयोग और अपव्यय तो नहीं कर रहे हैं? मानव योनि को व्यर्थ में ही बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं, ताकि भविष्य में अपनी मूर्खता पर पछताना पड़े? जब तक अपनी क्षमताओं का सही उपयोग नहीं होगा, दुःख और रोग के कारणों को नहीं समझा जाएगा तब तक हमारा जीवन अमर्यादित, अनियन्त्रित लक्ष्य-हीन, स्वच्छन्द, असंयमित होने से स्थायी स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हो सकता।

    स्वास्थ्य के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन करने से पूर्व तथा स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले विभिन्न तथ्यों की चर्चा करने से पूर्व स्वास्थ्य क्या होता हैं और रोग किन-किन कारणों से हो सकते हैं? उनको जानना और समझना आवश्यक है ताकि स्वास्थ्य के अनुरूप जीवन शैली अपनायी जा सके और रोग के कारणों से यथा सम्भव बचा जा सके। मृत्यु के लिए सौ सर्पों के काटने की आवश्यकता नहीं होती। एक सर्प का काटा व्यक्ति भी कभी-कभी मर सकता है। ठीक उसी प्रकार कभी-कभी बहुत छोटी लगने वाली हमारी गलती अथवा उपेक्षावृत्ति भी भविष्य में रोग का बहुत बड़ा कारण बन जीवन की प्रसन्नता आनन्द सदैव के लिए समाप्त कर देती है।



    स्वस्थ का मतलब होता है रोग-मुक्त जीवन स्वस्थता तन, मन और आत्मोत्साह के समन्वय का नाम है।

    • जब शरीर, मन, इन्द्रियाँ और आत्मा ताल से ताल मिला कर सन्तुलन से कार्य करते हैं, तब ही अच्छा स्वास्थ्य कहलाता है।
    • शरीर की समस्त प्रणालियाँ एवं सभी अवयव स्वतन्त्रतापूर्वक अपना-अपना कार्य करें।
    • किसी के भी कार्य में किसी भी प्रकार का अवरोध, आलस्य अथवा निष्क्रियता न हो तथा उनको चलाने हेतु किसी बाह्य दवा अथवा उपकरणों की आवश्यकता न पड़े।
    • मन और पाँचों इन्द्रियाँ सशक्त हो।
    • स्मरण शक्ति अच्छी हो।
    • क्षमताओं का ज्ञान हो ।
    • विवेक जागृत हो।
    • लक्ष्य सही और विकासोन्मुख हो तथा जीवन में स्थायी आनन्द, शांति, प्रसन्नता बढ़ाने वाला हो।
    • तनाव, चिन्ता, निराशा, भय, अनैतिकता, हिंसा, झूठ, चोरी, व्याभिचार, तृष्णा आदि दुःख के कारणों को बढ़ाने वाला प्राथमिकताएँ सही हो एवं उसके अनुरूप संयमित, नियमित नियन्त्रित जीवनचर्या हो।
    • आवश्यकता की क्रियान्विति और अनावश्यक की उपेक्षा का स्वविवेक हो।
    • मन का चिन्तन और आचरण सम्यक् एवं संयमित हो। मन में बेचैनी न हो। इन्द्रियों की विषय विकारों में आसक्ति न हो।
    • समस्त प्रवृत्तियाँ सहज और स्वाभाविक हो, अस्वाभाविक न हो अर्थात् जिसका पाचन और श्वसन बराबर हो, नियमित हो, सन्तुलित हो।
    • अनुपयोगी अनावश्यक विजातीय तत्त्वों का शरीर से विसर्जन सही हो। भूख प्राकृतिक लगती हो ।
    • निद्रा स्वाभाविक आती हो। पसीना गन्ध-हीन हो। त्वचा मुलायम हो, बदन गठीला हो।
    • सीधी कमर, खिला हुआ चेहरा और आँखों में तेज हो। नाड़ी, मज्जा, अस्थि, प्रजनन, लसिका, रक्त परिभ्रमण आदि तंत्र शक्तिशाली हो तथा अपना कार्य पूर्ण क्षमता से करने में सक्षम हो जो निस्पृही तथा निरंहकारी हो।
    • जो आत्मविश्वासी, दृढ़ मनोवली, सहनशील, धैर्यवान, निर्भय, साहसी और जीवन के प्रति उत्साही हो।
    • जिसके सभी कार्य समय पर होते हो तथा जीवन नियमबद्ध हो । वास्तव में पूर्ण स्वस्थता के मापदण्ड तो यही हैं।

    प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के स्वास्थ्य की स्थिति पर अवश्य चिन्तन करना चाहिए। जो-जो बातें उसके स्वयं के नियन्त्रण में होती हैं, उसके अनुरूप अपनी जीवनशैली बनाने का प्रयास करना चाहिए। परन्तु आज स्वास्थ्य का परामर्श देते समय अथवा रोग की अवस्था में निदान करते समय प्रायः कोई भी चिकित्सक अथवा स्वास्थ्य विशेषज्ञ व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले विविध कारणों का समग्रता से विश्लेषण नहीं करते। सत्य की पूर्णतः अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती। वह तो व्यक्ति के स्वयं की अनुभूति का विषय होता है। जो भी देखा जाता है, सुना जाता है, कथन किया जाता है, यन्त्रों अथवा परीक्षणों से पता लगाया जाता है वह सत्याश ही होता है। चिकित्सकों द्वारा किया गया ऐसा निदान और परामर्श सदैव कैसे शत-प्रतिशत सत्य और पूर्ण हो सकता है, अपने आपको स्वस्थ रखने की कामना रखने वालों से सम्यक् चिन्तन की अपेक्षा रखता है। अतः स्वस्थ रहने हेतु व्यक्ति के स्वयं की सजगता, विवेक, बुद्धि स्वावलम्बन जीवन पद्धति तथा स्वयं की स्वयं द्वारा नियमित समीक्षा, पूर्ण स्वस्थता की प्राप्ति के लिए अनिवार्य होती है। पराधीन अथवा दूसरों पर आश्रित रहने वाला व्यक्ति स्थायी स्वास्थ्य को प्राप्त नहीं कर सकता है।


    आज चिकित्सा करवाते समय उपचार की प्रासंगिकता के बारे में प्रायः रोगी तनिक भी चिन्तन-मनन नहीं करते। चिकित्सक से निदान की सत्यता के संबंध में अपनी शंकाओं और उपचार से पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में स्पष्टीकरण नहीं लेते। रोग का मूल कारण जाने बिना उपचार प्रारम्भ करवा देते हैं। आज यह दवा, कल दूसरी, परसों तीसरी दवा। आज यह चिकित्सक, कल दूसरा चिकित्सक, परसों अन्य चिकित्सक कभी यह अस्पताल, कभी दूसरा अस्पताल तो कभी अन्य अस्पताल आज एक चिकित्सा पद्धति, चन्द रोज बाद दूसरी पद्धति और अगर रोग मुक्त न हो तो न जाने कितनी कितनी चिकित्सा पद्धतियाँ बदलते संकोच नहीं करते। स्वयं की असजगता, अविवेक और सही चिन्तन न होने से हमारी सोच लुभावने विज्ञापनों, डॉक्टरों के पास पड़ने वाली भीड़ से प्रभावित होती है। हम असहाय, हताश वन चिकित्सकों की प्रयोगशाला बनते तनिक भी संकोच नहीं करते। आज अधिकांश असाध्य एवं संक्रामक रोगों का एक मुख्य कारण, प्रारम्भिक अवस्था में गलत उपचार से पड़ने वाले दुष्प्रभाव होते हैं, जिसकी तरफ शायद ही किसी का ध्यान जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चलाये जा रहे रोग नियन्त्रक कार्यक्रम से पड़ने वाले दुष्प्रभाव की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।

    वैश्विक महामारी के बाद दवा इंजेक्शन और वैक्सीन की जबरदस्ती आने वाले दुष्प्रभाव को आमंत्रण दे रही है। जबरदस्ती टिका कारण का विरोध होना ही चाहिए। उनसे पड़ने वाले दुष्प्रभावों की क्षति पूर्ति के कारण लोग अकारण बीमार पड़ रहे है। उपचार हेतु सही दृष्टिकोण आवश्यक है। अन्यथा हमे जीवन जीने के लिए फार्मेसी कंपनी यो पर आधारित रहना होगा। यह किसी षडयंत्र से कम तो नहीं है। खुद का स्वस्थ खुद के हाथों में है।

    क्या हमारा श्वास अन्य व्यक्ति ले सकता है? क्या हमारा भोजन अन्य कोई पचा सकता है? क्या दूसरों के खाने से और पानी पीने से हमारी भूख अथवा प्यास शान्त हो सकती है? दूसरों की आँखों से हम नहीं देख सकते, दूसरों के कानों से हम नहीं सुन सकते, दूसरों के पैरों से हम नहीं चल सकते अपने स्वयं की गतिविधियों के संचालन, नियन्त्रण आदि से जितने हम स्वयं परिचित होते हैं, उतना प्राय: दूसरा व्यक्ति परिचित हो नहीं सकता। हम क्यों तनावग्रस्त, चिन्तित, निराश भयभीत हैं? उनका सही विश्लेषण अन्य व्यक्ति अथवा यंत्र नहीं कर सकता। हम स्वयं अपने खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार और गलत जीवनचर्या के अप्राकृतिक तरीकों से रोगों को आमन्त्रित करते हैं, परन्तु दवा और डॉक्टर से पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्ति की कामना रखते हैं। कितना भ्रम है? डॉक्टर एवं दवा मात्र सहयोगी की भूमिका निभा सकते हैं, परन्तु जब तक हमारा शरीर उस सहयोग को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक अच्छे से अच्छी दवा तथा बड़े से बड़ा चिकित्सक हमें पूर्ण स्वस्थ नहीं बना सकता। मात्र आंशिक राहत पहुँचा सकता है। स्वास्थ्य को बनाए रखने में स्वयं की सजगता, सम्यक् चिन्तन और सम्यक् पुरुषार्थ की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। मानसिक असन्तुलन अथवा रोग का आभास होने की स्थिति में रोगी को पिछले 48 घंटों की अपनी गतिविधियों की समीक्षा करनी चाहिए। हमें स्वयं ही अपनी गलती का पता चल जायेगा, जिसके कारण रोग का प्रारम्भ हुआ है। रोग की प्रारम्भिक अवस्था में हमें जो संकेत मिलते हैं, उनकी समीक्षा करें तथा भोजन, पानी, हवा के ग्रहण करने में होने वाली भूलों को सुधारने हेतु आवश्यक संशोधन करें, कारण मालूम पड़ते ही समाधान ढूंढना अथवा उपचार सरल हो जाएगा। स्वस्थ रहने की कामना रखने वालों को प्रतिदिन अपने स्वास्थ्य की समीक्षा करनी चाहिए।

    मानव शरीर की तुलना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्वचलित यंत्रों से की जा सकती है। स्वचालित यंत्रों के साथ जितनी कम छेड़-छाड़ की जाए उतना अच्छा होता है। मनुष्य के अलावा अधिकांश चेतनाशील प्राणी में सहज जीवन जीने के कारण अपेक्षाकृत कम रोगग्रस्त होते हैं। उन्हें अपने शरीर का विशेष ज्ञान भी नहीं होता। रोजाना दांतुन न करने के बावजूद उनके दाँत मनुष्य की भांति जल्दी खराब नहीं होते। उन्हें देखने के लिए चश्में की आवश्यकता नहीं होती। नवजात बालक भी सहज जीवन जीता है। उसकी अधिकांश शारीरिक बाह्य क्रियाएँ स्वाभाविक और प्राकृतिक होती है। उससे भी हम स्वस्थ रहने की काफी बाते सीख सकते हैं। उसमें किसी के प्रति न राग होता है और न द्वेष, इसी कारण बच्चा सभी को प्यारा लगता है। वह जब श्वास लेता है तो उसका पेट पूरा फूलता है अर्थात् वह गहरा और पूरा श्वास होता है। यदि हम बच्चे की भाँति सदैव गहरा और पूर्ण श्वास लेना प्रारम्भ कर दें तो अनेकों स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का स्वतः समाधान हो जायेगा। बच्चा जब सोता है तो सिर्फ सोता ही है। निश्चिन्त होकर सोता है, परन्तु कुछ लोग निद्रा में भी कुछ न कुछ चिन्तन करते रहते हैं। बच्चा कहीं नहीं जा सकता। चल-फिर नहीं सकता। फिर उसका पाचन कैसे होता है? उसका विकास इतना जल्दी क्यों और कैसे होता है? आखिर वह क्या व्यायाम करता है? हम प्राय: देखते है बच्चा पैरों को चलाता है, उसका पाचन और मल-मूत्र विसर्जन तंत्र ठीक से कार्य करता है। यदि हम भी नियमित रूप से ऐसा व्यायाम करना आरम्भ कर दें तो हम पाचन सम्बन्धी काफी रोगों से बच जाएँगे। पैरों में ऊर्जा का प्रवाह बराबर होने से घुटनों और पैरों सम्बन्धी अन्य रोगों की सम्भावना नहीं रहेगी।

    बच्चा झूठ नहीं बोलता यदि हम भी सत्य का आचरण करें तो जीवन में निर्भयता आ सकती है। अनैतिकता, मायावृति, छल कपट, अहं स्वतः समाप्त हो जाता है, जो मानसिक रोगों का मुख्य कारण है। इन सभी बातों की शिक्षा बच्चे को कहाँ से मिलती है? यदि हम भी प्रकृति के साथ सहज जीवन जीना प्रारम्भ कर दें और शरीर के साथ, अनावश्यक छेड़छाड़ न करें तो हमारा स्वास्थ्य हमारे अनुकूल होगा तथा किसी कारणवश रोग होने की अवस्था में भी हम पुनः जल्दी स्वस्थ हो सकेंगे। हम स्वयं अपनी प्राथमिकताओं का चयन करें-“स्वस्थ बने या रोगी”
    स्वस्थता हेतु जीवन में हल्कापन अनिवार्य हैं। सरलता, लघुता, हल्कापन स्वास्थ्य का प्रथम लक्षण है। अस्वस्थता से पूर्व हमें शरीर में भारीपन का अनुभव होने लगता है। बेचैनी लगने लगती है। जैसे ही शरीर हल्का अनुभव करने लगता है, हम स्वस्थता का अनुभव करने लगते हैं। जब हमारे संस्कारों और वृत्तियों में निष्कपटता आने लगती हैं, हम अपने आपको निर्भय, तनाव मुक्त और हल्का अनुभव करने लगते हैं। भारीपन क्यों, कब और कैसे आता है? उसके समझे बिना तथा उन कारणों से बचे बिना हल्केपन की प्राप्ति कठिन होती है।

    हम जो कार्य करते हैं उसका उतना भार नहीं होता, जितना भार होता है उस कार्य की स्मृति अथवा कल्पना का वर्तमान का क्षण बहुत विचित्र होता है। अतः यदि भूत की स्मृति और भविष्य की कल्पना न की जाये तो मानसिक असंतुलन के दोषों से सहज ही बचा जा सकता है। कहा भी है-“भूत सपना है, भविष्य कल्पना है, और वर्तमान अपना है।” दुःख की स्मृति और कल्पना का अनावश्यक चिंतन भी मानसिक भारीपन का प्रमुख कारण होता है। अतः यदि वर्तमान में सहज जीना सीख लें तो हमारी अनेक समस्याओं का समाधान सहज संभव हो जाता है।


    एक ही मिट्टी, पानी, हवा, धूप और परिश्रम के बावजूद पास-पास विकसित होने वाले गन्ने में इतना मिठास और नीम में इतना कड़वापन क्यों ? कारण स्पष्ट है, हम अपनी क्षमताओं से पूर्णतया परिचित नहीं है। जिसने उसको समझा, सदुपयोग किया उसने हमारे सामने सम्यक् चिन्तन करने की प्रेरणा अवश्य प्रस्तुत की। आधुनिक स्वास्थ्य वैज्ञानिक शरीर के सूक्ष्मतम भाग का यंत्रों और रासायनिक परीक्षणों द्वारा निरीक्षण और परीक्षण कर शरीर की गतिविधियों को समझने और समझाने का प्रयास कर रहे हैं, परन्तु आत्मा अरूपी है, निराकारी है, जिसको देखना सम्भव नहीं। आत्मा में अनन्त शक्तियाँ हैं, जो उसकी शुद्धावस्था में प्रकट होती हैं। जब आत्मा पूर्ण शुद्ध हो जाती है तो उसमें सृष्टि की समस्त प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष घटनाएँ दर्पण की भाँति प्रतिबिम्बित होने लगती हैं। आत्मा परमात्मा बन जाती है। ऐसी अवस्था को वीतराग अवस्था अथवा केवल ज्ञान की स्थिति कहते हैं। जहाँ सारा अज्ञान दूर हो जाता है, केवल ज्ञान ही शेष रहता है। सम्पूर्ण आत्मानुभूति की अवस्था में आज की भौतिक जानकारी तो होती ही है, परन्तु उससे भी आगे ब्रह्माण्ड के भूत, भविष्य एवं वर्तमान की सूक्ष्मतम एवं सम्पूर्ण जानकारी भी होती है। वे ही वास्तव में सच्चे एवं बड़े वैज्ञानिक होते हैं, और उनका कथन ही वैज्ञानिक होता है, वे सत्य के प्रेरणा स्रोत होते हैं। उनका उपदेश न केवल भौतिक उपलब्धियों तक ही सीमित होता है, अपितु जीवन के परम लक्ष्य तक का मार्ग दर्शन करता है। उसमें नर से नारायण, आत्मा को परमात्मा बनाने की क्षमता होती है। मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य, शांति और समाधि के लिए ऐसे महापुरुषों के निर्देशानुसार विवेक पूर्ण जीवनचर्या आवश्यक होती है। उसके विपरीत आचरण कर शरीर को स्वस्थ रखने की कल्पना शारीरिक रोगों से भले ही क्षणिक आंशिक राहत दिला दें, अन्त हानिकारक होती है, भविष्य के लिए कष्टदायक हो सकती है।

    प्रश्न खड़ा होता है कि बिना शरीर विज्ञान की विशेष अथवा पूर्ण जानकारी के क्या स्वस्थ नहीं रहा जा सकता? क्या मात्र साधारण, सरल परन्तु आवश्यक जानकारी, मूल सैद्धान्तिक नियमों का पालन कर हम स्वस्थ जीवन नहीं जी सकते? क्या अनुभवी चिकित्सक एवं दूसरों के रोगों का उपचार करने वाले स्वास्थ्य विशेषज्ञ शरीर की विशेष जानकारी के बावजूद बीमार नहीं होते? जिस प्रकार बिजली का बटन चालू करते ही बल्ब से हमें प्रकाश मिलने लगता है। बटन चालू करने की प्रक्रिया बहुत ही सरल और सहज होती है, जिसे जनसाधारण आसानी से सीख सकता है। बटन चालू करने से पूर्व बिजली घर से बिजली के उपयोग करने की स्वीकृति नहीं लेनी पड़ती है। बिजली का के तारों को यह जानने की आवश्यकता नहीं होती कि बिजली का आविष्कार किसने किया? उसको यह जानने की भी आवश्यकता नहीं होती कि बिजली का प्रवाह कैसे होता है ? बटन चालू करने की विधि के साथ बिजली के उपकरण का प्लग से सम्बन्ध जोड़ना, बिजली के तारों को न छूना, फ्यूज बदलने जैसी सामान्य जानकारी रखने वाला बिजली का अधिकाधिक उपयोग कर सकता है। ठीक उसी प्रकार शारीरिक अवयवों की सम्पूर्ण जानकारी के आवश्यक मूलभूत चन्द सिद्धान्तों और नियमों जैसे- जीवन के लिए आवश्यक भोजन, पानी, हवा, धूप का प्रयोग कब, कहाँ और कैसे करना, प्रकृति के अनुकूल दिनचर्या और रात्रिचर्या, व्यायाम, आराम, स्वाध्याय, ध्यान, मौन की साधना कब और कैसे करना तथा सन्तुलन कैसे बनाये रखना और सन्तुलन बिगाड़ने वाली बातों से कैसे बचना आदि का पालन कर कोई भी स्वस्थ जीवन जी सकेता है? सारांश यह है कि जनसाधारण को मात्र इतनी जानकारी हो जाए कि शरीर और मन का असन्तुलन क्यों और कैसे बिगड़ता है? शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति क्यों और कैसे कम होती है ? उससे कैसे बचा जा सकता है? शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति को कैसे बढ़ाया जा सकता है? शरीर, मन और आत्मा के विकारों को कैसे दूर किया जा सकता है? मात्र इतनी जानकारी रखने वाला और उसके अनुरूप आचरण करने वाला आसानी से स्वस्थ जीवन जी सकता है।

    हमारा स्वास्थ हमारे हाथों में ही है। इसलिए कोई भी रोग बड़ा नहीं है। आपका संकल्प बड़ा हैं। आपकी संकल्प शक्ति आपको नया उत्साह प्रदान करेगी। योग्य दिनचर्या के साथ आपको जीना है। विचारो में पवित्रता, आहार में सात्विकता महत्व पूर्ण है। सब से मूल बात निरोगी जीवन, रोग मुक्त जीवन, दवा मुक्त जीवन जीना हमारा मूलभूत अधिकार है।

  • आंवला मनुष्य जाति को मिला हुआ कल्पवृक्ष है। आवला का यह बहुगुणी वृक्ष परमेश्वर ने मानव को स्वस्थ रखने के लिए निर्माण किया है। और कुष्मांड (पेठा) अनेक औषधि गुणो से युक्त है। भारतीय संस्कृती में माँ प्रकृती को धन्यवाद करने की प्रथा है, जिसमे वह त्योहार रूपो में मनाया जाता है। जैसा की आप जानते है की, भारतीय संस्कृती मे वृक्षो का अनन्य साधारण महत्व रहा है। सदियों से वृक्षों की पुजा की जाती। क्योकी, निर्जिव वस्तुओं से अन्न (भोजन) कैसे तैयार किया जाता? यह रहस्य केवल वृक्षो को ही पता है| हम बाहर के विज्ञान को कितना ही जानते है, पर कुछ बातो पर अभी भी पड़दा है। वह रहस्य है। साधारण मिटट्टी, कुछ खाद, सुर्यप्रकाश इन सब चिजे मिलाकर वनस्पती अपना उत्पाद बनाते है। जैसे आम, चावल, गेहूं जैसे अप्रतिम पदार्थ तैयार करती है। इस गूढ़ रहस्य का विज्ञान वृक्ष, वनस्पती और माँ प्रकृती ही जाने। वनस्पती सृष्टी ही प्रथम अस्तित्व की धरोहर है। हमारे पूर्वज पीढ़ी का पुराना अस्तित्व है। पर उन सबकी जड़े एक ही वंशवृक्ष तक पहुंचती है। इस तथ्य को हमे समझना है। इसी कारण से वृक्षों की पूजा अर्चना कि जाती है। हमारी धरोहर को धन्यवाद करने का वह सुअवसर होता है। उच्च पूजा भावो को अर्पण किया जाता है।

    बरगद के वृक्ष का इस में प्रथम स्थान है। क्योकी बरगद, पिपल यह ऐसे पेड़ों की श्रृंखला है, जिनके पत्र की एक धारधार भुजा को यदि जमिन मे रखा जाए तो परिणाम स्वरुप बड़ा वृक्ष बनकर सामने आता है। इन वृक्षों के लिए किसी तरह की बीज की आवश्यकता नहीं होती है। इन वृक्षो मे खत्म नही होने वाले कटिन्युएशन तत्व रहता है। सस्टेन और कटिन्युएशन यह शब्द कोविड वैश्विक माहामारी के दरम्यान बहुत प्रचलन में थे। अपरिचित परिस्थितीयो मे संरक्षित रहना और अपना उत्पादन क्षमता की रक्षा करना इन्ही दो वृक्षों की पहचान है। यह वृक्ष जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, वैसी ही इन की जड़े बहुत सशक्त बनती जाती है। मानव भी इन्ही वृक्षों की भांति अपने जड़ों को फैलाता चला जा रहा है। स्त्री, पुरुष का यह भेद सब वंशवृक्ष काही तो परिणाम है। इस लिए बरगद और पीपल के वृक्षो की प्रदक्षिणा करने की प्रथा है। स्वयं ही खुद को गोल-गोल प्रदक्षिणा लगाने से भ्रुमध्य की ग्रंथी पर साकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इन ग्रंथी को चालना मिलने से और वृक्ष को प्रदक्षिणा लगाने से, “आरोग्यम धन संपदा” की ओर हम आकर्षित होने लगते है। स्त्री आरोग्य के लिए हार्मोन्स महत्वपूर्ण होते हैं। इसी लिए वृक्षों की वैज्ञानिक पूजा और धन्यवाद के भाव को अर्पण करने से स्त्री जाति को आरोग्यं में लाभ मिलता है।इस लिए वृक्ष पूजन मे स्त्री जाति को प्रथम स्थान प्राप्त है।

    इनके बाद पुजा का दिव्य स्थान प्राप्त होता है, और हम आव्हान करते आवला वृक्ष का! आवले का यह वृक्ष ‘बरगद वृक्ष की पंक्तीयो में तो बैठ सकता है। पर औषधी गुणो से यह परिपूर्ण है। आवला यह औषधियो मे रसायन की तरह सेवन किया जाता है। आवला के सेवन से मनुष्य में तारुण्य, उत्साह, ऊर्जा का संचार बढ़ता है। आरोग्य की प्राप्ती होती है। वृक्ष पर सुखा हुआ आवला के सेवन करने से पाचनशक्ती का विकास होता है। सुखा आंवला बहुगुणी होता है। पूर्ण तरीके से पका हुआ सुखा आंवला से चूर्ण और च्यवनप्राश बनता है। जिसकी तुलना किसी औषधी से नहीं कि जा सकती है ! आंवला वृक्ष के आसपास का परिसर हमारी चेतासंस्था को चालना देता है, और विकास करता है। इन वृक्षों में भगवान विष्णु का वास होता है। इसी लिए आंवला वृक्ष की छाँव में भोजन का अपना महत्व है। इसी लिए यह हमारी परंपरा का हिस्सा है।

    कोई भी वृक्ष और वनस्पति जिवित ही है। उसे कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। आयु में बड़े वृक्ष केवल जंगल की शोभा नहीं है, अपितु वह हमारे घरो के निकट रहने चाहिए। बड़ी-बड़ी सोसायटी बिल्डिंगमे वृक्षोको स्थान ही नहीं रहा है। इन सब के परिणाम global warming, और वैश्विक माहामारी के रुप में सामने आ रहे है। जैसे मां और पिताजी को यदी कोई दुःख होने पर पुत्र को कभी यश नहीं मिलता। उसी प्रकार अगिनत वृक्षों को नष्ट करने पर हमे कैसे पूर्ण स्वास्थ मिल सकता है? मानव जाति पर उसी वृक्षवल्ली का आर्शिवाद है। इन सबकी आपको याद दिलाने की कोशिश है, ताकि भविष्य के प्रदुषण से बचा जा सके। इसी लिए इन वृक्षों की पूजा करना कोई गलत नहीं है। इसके पिछे वैज्ञानिक कारण मौजूद है। आंवला का यह सीजन साल अपनी दस्तक देता है। यह कुछ ही माह तक उपलब्ध रहता है। इन्ही सीजन के माह मे आंवले से अनेक पदार्थ तयार किये जाते है। आंवला का उपयोग बारह माह होता है। इसी लिए इसे अधिक महत्व है। इसी लिए फार्मसी कंपनी का पसंदीदा फल आंवला है।

    आंवला का फल आत्म संतुलन का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करता है। आंवला वृक्षो की पूजा करने के पश्चातही औषधी बनाने की प्रक्रिया का आरंभ किया जाता है। आंवला से युक्त च्ववनप्राश आयुर्वेद में एक चमत्कार ही है, यह अतुल्य है। च्ववनप्राश का सेवन हर एक व्यक्ती कर सकता है। च्यवनप्राश की सेवन विधि शास्त्र के अनुसार बताई हुई योग्य है। आंवला को एक किसी वस्त्र में एकत्रित कर सभी वनस्पतीयो के अर्क में आंवला को पकाकर उसे गाढा किया जाता है। यह गाढ़ा किया हुए द्रावण को शुद्ध घी के साथ एकत्रित कर संस्कारित किया जाता है। उसी मे खांड, मिश्री, गुड़ मिलाकर बाद मे पकाया जाता है, बनकर तैयार होता च्यवनप्राश।

    कुष्मांड अर्थात (पेठा) । पेठा मतलब उत्तर प्रदेश के आग्रा शहर की याद दिलाता है। पेठा वृष्य गुणधर्म का है। यह पुरुशक्ती शुक्रशक्ती को फायदा पहुंचाता है। पेठा में शीतलता का गुणधर्म मौजूद होता है। इस फल की सब्जी भी बनाई जाती है। पेठा मेधा शक्ति विकास के लिए उत्तम टॉनिक है। च्यवनप्राश से आंवला को सहेज कर रखा जाता है। उसी प्रकार धात्री रसायन जैसा रसायन बनाकर पेठा का साल भर आनंद लिया जा सकता है। यह दोनों भी फल गुणधर्म में एक दूसरे के पूरक है। आंवला यह फल है और पेठा सब्जी है। पर आमतौर पर आंवला फल समझकर कभी कभी खाया जाता तो, पेठा को सब्जी भी काम प्रचलन है। दिव्य गुणो से परिपूर्ण पेठा अदभुत है। इस लिए, भारतीय संस्कृती मे कुष्मांड नवमी मनायी जाती है। कुष्मांडा यह मां नवदुर्गा का एक रूप भी है। इसलिए भारतीय संस्कृती अपने विशाल हदय का परिचय देती है।

    भारतीय संस्कृतीमे कार्तिक माह का अपना महत्व है। आधुनिक संशोधन के अनुसार भी इस माह मे उत्पादित आंवला में ॲस्कार्बिक ॲसिड का सर्वाधिक प्रमाण होता है। यह सिद्ध हुआ है। आंवला की यह विशेषता है ,की इसे अगर पकाया जाए तो भी इसके भीतर विटामिन “c” नष्ट नहीं होता।

    आयुर्वेद ग्रंथ राजनिघण्टु मे वर्णित आंवला का महत्व,

    आमलकं कषायाम्लं मधुरं शिशिरं लघु । दाहपित्तवमीमेह शोफघ्नं च रसायनम् ।।…राजनिघण्टु

    अमृताभं

    श्रम-वमन-विबन्धाध्मान-विष्टम्भ-दोषप्रशमनम् चामलक्याः फलं स्यात् ।।… राजनिघण्टु

    आंवला का स्वाद तुरट, कड़वा, मधुर होता है। वह गुणधर्म से शीतल और पाचन को मदद करता है। पीत्तदोष कम करता है। रसायन का अर्थ होता है, रस रक्तादी धातु ओ को संपन्न करना उन्हें शक्ती देना | थकावट, मलावष्टभ, पेट मे वायु का प्रकोप जैसे रोगों मे आंवला का उपयोग श्रेष्ठ होता है। इन्ही सब गुणों की वजह से आंवला को अमृत की उपमा दि गई है। त्वचा आरोग्य के लिए यह उत्तम है। यह कान्ति को सुधारता है। बालो को उत्तम पोषण प्रदान करता है। आँखो के लिए यह उत्तम औषधी है। आमला रसायन तारुण्य को स्थिरता प्रदान कराता है। यह अनेकों रसायनों में उपयोगी होता है। च्यवनप्राश, ब्राह्यरसायन, आमलकावलेह, धात्री रसायन इन सब रसायनो मे मुख्य घटक आंवला होता है।

    एक अकेला आंवला ही त्रिदोषो पर गुणकारी है। इसका वर्णन सुश्रुताचार्य ने किया है,

    हन्ति वातं तदम्लत्वात् पित्तं माधुर्यशैत्यतः । कर्फ रुक्षकषायत्वात् फलेभ्योऽभ्यधिकं च यत् ।।…सुश्रुत सूत्रस्थान

    आंवले का स्वाद कैशैला, कड़वा रहने से यह वात रोगों का शमन करता है। मधुर और शितल रहने के कारण यह पित्त का शमन करता है। आंवला का स्वाद तुरट रहने से यह कफ रोगो का शमन करने में सक्षम होता है। त्रिदोषो का संतुलन आंवला करता है। आंवला का मुख्य लाभ पीत्तशमन करना होता है। आंवला का उपयोग खाने के लिए और, बाहरी लेप लगाने के लिए होता है। आंवला रस आम्लपित्त पर प्रभावकारी है। आवला रस 2 स्पुन लेकर इसमे 1 gm जिरा, और कुछ मात्रा में मिश्री मिलाकर 15 दिन लेने से एसिडिटी पर उत्तम औषध है।

    पित्त बढ़ने से कभी चक्कर आने लगते है ,तो आवला रस 2- स्पुन और मिश्री मिलाने से उपयोग होता है। आंवला, सौठ, लिंबू का रस इन से अचार बनाया जाता है। यह पाचनसंस्था के लिए उपयोगी है। आंवला, सौंठ और जिरा पावडर मिलाकर उसे सुखाकर सुपरी बनाई जाती है। भोजन के बाद यह उत्तम है। नशा छुड़ाने में मदद करती हैं।

    पेठा को संस्कृत में कुष्मांड कहा जाता है। जिसके बीज में उष्णता ही नहीं होती है। पेठा यह शीतल गुणो का अधिकारी होता है। आयुर्वेद में इसका गुणगान किया हुआ है,

    कुष्माण्डं बृंहणं वृष्यं गुरु पित्तास्रवातनुत् । बालं पित्तापहं शीतं मध्यमं

    कफकारकम् ॥ वृद्धं नातिहिमं स्वादु सक्षारं दीपनं लघु । बस्तिशुद्धिकरं चेतोरोगहृत्सर्वदोषजित् ।।…भावप्रकाश

    शरिर मे धातुओं का पोषण करता है। विशेषता शुक्रधातु के पोषण में यह लाभकारी है।यह पित्त नाशक,रक्तदोष को दूर करता है। वात संतुलन करता है। ताजा फ्रेश तैयार हुआ पेठा बहुत शीतल अर्थात् ठंडा होता है। यह पित्तशमन करता है। कुछ दिनों में यह पकने के बाद प्राकृत कफ का पोषण करता है । साधारणता: यह थंड प्रकृती और स्वाद में मधुर, क्षारयुक्त रहता है। यह अग्नि को प्रदिप्त करता है। मुत्राशय की शुद्धी करता है। विशेषता यह मानसिक रोगो में लाभप्रद है।

    पेठा बस्तीशुद्धकर, शीत वीर्य का रहने के कारण मुत्राशय की शुध्दी करता है। एसिडिटी होने पर सुबह पेठे का 4-5 स्पुन रस, मिश्री के साथ लेने से लाभ होता है। शरिर मे उष्णता बढ़ने के कारण शरिर में नासिका से रक्त बहता है। इस पर पेठा लाभकारी है।



    उत्तर भारत में आगारा की मिठाई पेठा नाम से प्रसिद्ध है। गुलाब अर्क के साथ बनाई गई पेठा मिठाई स्वाद में अप्रतिम होती है। दक्षिण भारत में सांबर बनाते समय पेठा का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार इन्ही सब औषधि का उपयोग कर स्वास्थ जीवन की नीव रखी जा सकती है। प्रकृति संवर्धन का यह माध्यम हैं। प्रकृति का यह दिव्य उपहार है। हमे हमारी परंपरा पर गर्व करना होगा। सनातन ही श्रेष्ठ है।

  • ।अथ योगानुशासनम्।

    मनुष्य का जीवन साधना पथ हैं। साधना के साथ आपको खुद को साधना होता हैं। परम शक्ति का यह उपहार है मनुष्य जीवन। जिसका हर एक कार्य, कर्म, विचार उस ब्रम्हांडिय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता हैं। क्यूकि परम शक्ति बाहर नहीं अपने भीतर हैं। यह केवल बात करने का कार्य नही है। यह अनुभव करने का कार्य हैं। “अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः” इस सूत्र से यात्रा को शुरूवात करनी होती हैं। योग दर्शन महर्षि पतंजलि कृत यह दिव्य ग्रंथ योग के हर एक पैलु को स्पष्ट करता है। योग का अर्थ होता है जुड़ना। उस परम् सुंदर शक्तिशाली तत्व से। यह शास्त्र ज्ञान प्रदान करता है, हर एक एक स्थिति योग है। योग ही अनुशासन है। इस लिए महर्षि कहते हैं “अथ योगानुशासनम्”। इसी सूत्र से आरंभ होता यह शास्त्र का। योग वास्तव में एक ‘सार्वभौम् विश्व मानव धर्म’ है। योग की दृष्टि में धर्म एक विज्ञान है किंतु योग को किसी धर्म विशेष से न जोड़ते हुए उसका अध्ययन करें तो पाएँगे कि हम अपने किसी धार्मिक अंग का ही पठन-पाठन कर रहे हैं और अपनी आस्था एवं धार्मिक भावनाओं को मानव जाति के कल्याण व उत्थान के लिए दृढ़ कर रहे हैं। इस प्रकार हम योग के रहस्य को स्पष्ट रूप से समझने का प्रयास कर सकते हैं।

    जिन ऋषियों ने आत्मा का दर्शन कर लिया था यह उनके द्वारा प्रतिपादित विधियों का निर्देशन है। और आध्यात्मिक प्रणाली का क्रमिक दर्शन कराता है। एवं साधक को अपने लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ होता है। इस प्रकार व्यावहारिक रूप में योग दीक्षात्मक दर्शन एवं सार्वभौम् धर्म का प्रतीक है। आज जनमानस का मानना है कि महर्षि पतंजलि ने योग का निरूपण किया जबकि योग के प्रथम गुरु भगवान शिव ही हैं। कुछ लोगों का मानना है। कि हिरण्य-गर्भ रचित योगसूत्र जो अब लुप्त हो गए हैं, उन्हीं के आधार पर पतंजलि योग दर्शन की रचना हुई। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग का प्रतिपादन किया जो कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि के रूप में गृहीत है। भारतीय वाङ्ममय में योग पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है।

    गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं,

    तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।

    कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।

    (6/46)

    हे अर्जुन! तू योगी बन जा। क्योंकि तपस्वियों, ज्ञानियों और सकाम कर्म में निरत् जन इन सभी में योगी श्रेष्ठ है।

    श्रीमद्भागवत महापुराण में अपने सखा उद्धव को उपदेश देते कहते हैं -हुए श्री कृष्ण,


    जितेन्द्रियस्य युकृस्य जितश्रवासस्य योगिनः ।

    मयि धारयतश्चेत उपतिष्ठन्ति सिद्धयः ।।

    ( 11/15/1)

    प्रिय उद्धव! जब योगी इन्द्रिय, प्राण और मन को वश में करके अपना चित्त मुझमें लगाकर मेरी धारणा करने लगता है, तब उसके सामने बहुत सी सिद्धियाँ उपस्थित हो जाती हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि, योग के द्वारा सभी सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशिता, वशिता, कामावसायिता नाम की अष्टसिद्धियाँ) स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। परंतु योग की चरम उपलब्धि मात्र सिद्धि प्राप्ति के संकुचित प्रकोष्ठ को अधिगत् करना नहीं, वरन् आत्मज्ञान, आत्म दर्शन आत्म सुख और आत्मबल की प्राप्ति है।

    योग की विभिन्न पद्धतियों एवं उपासना की अनेकानेक विधियों का प्रमुख लक्ष्य चित्त को राग, द्वेष आदि मल से रहित उसमें सत्वगुण का उद्रेक करके वृत्तियों को निर्मलता प्रदान करना है। योग स्वरूप-बोध से स्वरूपोपलब्धि तक की यात्रा है। अंतःश्चेतना की जागृति का योग अन्यतम साधन है।

    चरित्र निर्माण में योग का जो महत्त्व है वह भी स्पष्ट है। मानव में निहित सात्विक तत्व जब योग साधना द्वारा जागृत हो उठते हैं तब वह मानवीय गुणों से मण्डित हो जाता है। क्षमा, दया, करुणा, ज्ञान-दर्शन और वैराग्य की अभिवृद्धि ही चरित्र निर्माण की भित्तियाँ हैं।

    मनुष्य के व्यक्तित्व की अखंडता ही सर्वोपरि है। खंडित मनुष्य का तात्पर्य है तन, मन एवं भाव के बीच समरसता एवं सामंजस्य का न होना। खंडित मनुष्य सुविधापूर्ण हो सकता है, लेकिन न वह शांत होगा, न आनंदित। खंडित मनुष्य उपयोगी हो सकता है, लेकिन उल्लासपूर्ण नहीं। अतीत में मनुष्य के खंडों को ही स्वीकार किया गया है। मनुष्य बहुआयामी है। हम उसके एक आयाम को स्वीकार कर सकते हैं और दूसरे आयामों को इनकार कर सकते हैं। सच तो यह है कि यह तर्क के अनुकूल पड़ता है, क्योंकि उसके खंड एकदूसरे के विपरीत मालूम होते हैं। जैसे मस्तिष्क है, वह तर्क से जीता है और हृदय भाव से। जिन्होंने मस्तिष्क को स्वीकार किया उन्हें अनिवार्यरूपेण, उनके ही तर्क की निष्पत्ति के अनुसार, भाव को अस्वीकार कर देना पड़ा, लेकिन मनुष्य अगर मस्तिष्क ही रह जाए। और उसमें भाव के फूल न खिलते हों, केवल वह गणित और तर्क और हिसाब ही लगाता हो, तो वैसा मनुष्य यंत्रवत् होगा।

    वैसे मनुष्य के जीवन में उल्लास नहीं हो सकता, काव्य नहीं हो सकता, संगीत नहीं हो सकता। वैसा मनुष्य संपदा एवं पद-प्रतिष्ठा तो अर्जित कर सकता है, वह बहुत कुशल भी हो सकता है, लेकिन उसकी जिंदगी सूखी होगी, उसकी जिंदगी में कभी आह्लाद का या विषाद का कोई आर्द्र भाव प्रकट नहीं हो सकता है और उसका हृदय एक मरुस्थल होगा, जिसमें हरियाली नहीं होगी और जिसमें पक्षी गीत नहीं गाएँगे। ऐसे व्यक्ति की दृष्टि बड़ी संकुचित, बड़ी संकीर्ण होती है। वह पदार्थ के अतिरिक्त और कुछ स्वीकार न कर सकता; क्योंकि पदार्थ ही उसकी पकड़ में आता है। वह अपने को जानने की बात ही भूल जाता है। आँख के लिए दर्पण चाहिए जो अपने को देखे। उसी दर्पण का नाम काव्य है। काव्य हमें अपनी झलक दिखाता है। काव्य हमें अपनी सुगंध देता है। काव्य हमारे भीतर के भाव का उद्रेक है, भाव की तरंग है।

    काव्य और विज्ञान

    काव्य हमारी अपने से पहली प्रतीति, पहला साक्षात्कार है। काव्य से रहित व्यक्ति सही अर्थों में जीवंत नहीं उसका विकास होने की संभावना थी, लेकिन वह चूक गया है और आज यह दुर्भाग्य बहुत गहन हो गया है; क्योंकि हम विज्ञान की तो शिक्षा देते हैं, हम प्रत्येक व्यक्ति को संदेह में कुशल बनाते हैं, सोच और विचार में निष्णात करते हैं। काव्य के बिना हमारे जीवन में, वह जो दृश्य और अदृश्य के बीच का सेतु है, निर्मित नहीं होगा। काव्य का अर्थ इतना सीमित नहीं है, जितना साधारणतः समझा जाता है। काव्य में वह सब है, जो तर्क से नहीं जन्मता, फिर चाहे संगीत हो, फिर चाहे नृत्य हो, चाहे मूर्तिकला हो, चाहे स्थापत्य हो। जो भी सिर्फ तर्क के अनुसार नहीं पैदा होता है, जिसमें तर्क से कुछ ज्यादा है। तर्क से परे एवं पार है, वही काव्य है और जब तक काव्य नहीं है, तब तक धर्म की कोई संभावना नहीं है। इसलिए काव्य विज्ञान के ऊपर की सीढ़ी है। विज्ञान संसार का पदार्थ है, और विज्ञान सभी की समझ में आ जाता है। काव्य तो फूल है, चाहो तो इससे इनकार कर सकते हैं। सौंदर्य है, अस्वीकार करने में कठिनाई नहीं है। काव्य के लिए हृदय को भावपूर्ण होने की कला आनी चाहिए। काव्य के लिए मस्तिष्क को कभी-कभी दूर हटाकर रख देने की क्षमता आनी चाहिए। जैसे कभी जब आकाश में बादल घिर जाएँ और मोर नाचने लगें तो हमारा मन भी उस नृत्य में सम्मिलित हो जाता है और जब कभी दूर से रात के अंधेरे में कोयल की आवाज आए, तो अपने हृदय को खोलकर अपने हृदय के भीतर उसे आमंत्रित करना आना चाहिए।

    काव्य विज्ञान से ऊपर, विज्ञान से श्रेष्ठतर है। विज्ञान की उपयोगिता है, उपादेयता है। इसलिए विज्ञान का कोई विरोधी नहीं है, परंतु उसकी उपयोगिता चरम मूल्य नहीं है। उसकी उपयोगिता हमारे लिए है। हमसे ऊपर नहीं है। हम उसके ऊपर हैं और विज्ञान की उपयोगिता इसीलिए है, ताकि हम काव्य के जगत् में प्रवेश कर सकें। यदि हम यह समझ सकें, तो विज्ञान वरदान बन सकता है। अब तक तो यह अभिशाप सिद्ध हुआ है अपितु नही यह आपके हाथो में ही हैं। विज्ञान हमें ज्यादा समय देता है, क्योंकि जिस काम में घंटों लगते थे, वह यह क्षणों में कर देता है। विज्ञान हमारे जीवन को लंबा कर देता है। विज्ञान हमारे पास इतनी क्षमता जुटा देता है कि हम चाहें तो नाचें, चाहें तो गाएँ, चाहें तो विश्राम करें, ध्यान करें। विज्ञान समृद्धि देता है, लेकिन समृद्धि की एक ही महत्ता हो सकती है कि अंतर्यात्रा शुरू हो सके। इसलिए विज्ञान का विरोध नहीं है, परंतु काव्य आत्मसात् हो। हमें के विज्ञान पर ठहरना नहीं है। विज्ञान से ऊपर काव्य का रंग है। विज्ञान अगर मंदिर बना सके तो अच्छा, लेकिन इस मंदिर का जो अंतर्-गर्भ होगा, जो गर्भगृह होगा, वह तो काव्य का ही हो सकता है। अगर यह मंदिर ही मंदिर हो के और इसमें कोई गर्भगृह न हो, जहाँ परम अतिथि को आमंत्रित किया जा सके, जहाँ परम देवता को विराजमान किया जा सके, तो यह मंदिर खाली है, यह मंदिर अर्थहीन है। इस मंदिर का कोई प्रयोजन नहीं है। इसे बनाना व्यर्थ है। काव्य में इसकी सार्थकता होगी।

    विचार बाह्य यात्रा का साधन है, भाव अंतर्यात्रा का साधन है। दोनों का अपना उपयोग है, लेकिन हमें दोनों के पार होना है, उसे कभी न भूलना चाहिए। एक क्षण को विस्मरण नहीं होना चाहिए। न तो हम मस्तिष्क हैं, न हम हृदय है। जब हम मस्तिष्क के पीछे खड़े हो जाते हैं, तो तर्क (निर्मित होता है। विज्ञान का जन्म होता है, गणित बनता है। और जब हम भाव के पीछे खड़े हो जाते हैं तो काव्य की तरंगें उठती हैं, संगीत जन्मता है। जब हम दोनों से मुक्त होकर स्वयं को जानते हों, तो धर्म का उद्भव होता है। तब हमारे भीतर सत्य को प्रतीति होती है। सत्य की प्रतीति ही हमें संत बनाती है। नियम, व्रत, उपवास से कोई संत नहीं होता है। सत्य को जो जान लेता है, अपने भीतर विराजमान, पहचान लेता है, अपने भीतर के देवता को अंतर्-देवता से जिसका परिचय हो जाता है, वही संत है। संतत्त्व तो है साक्षी का अनुभव नहीं मैं मन हूँ, नहीं मैं हृदय हूँ, नहीं मैं देह हूँ, नहीं मैं बाहर हूँ, नही मैं भीतर हूँ। मैं उस अद्वैत परम सत्ता का प्रतिक हूँ। जहाँ दोनों का अतिक्रमण हो गया है। जहाँ सिर्फ शुद्ध चैतन्य हो जाना है। जिस पर कोई बंधन नहीं हैं, न विचार के, न भाव के। जहाँ गणित भी खो गया और जहाँ काव्य भी खो गया। जहाँ सब परम शांत है। पतंजलि योग सूत्र “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” की साक्षात प्रतीति होती है। जो एक परम स्थिति है। समाधि अवस्था है। “विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः” जहां हमारे निरोध के संस्कार भी क्षीण हो जाते है। परम चिदाकश का अंश रूप में प्रकाश का साक्षात्कार होता है। अर्थात अंतिम स्थिति की प्राप्ति

    जहाँ परम मौन घटित हुआ है, उस परम मौन के कारण ही हमने संतों को मुनि कहा है। यह मनुष्य की त्रिमूर्ति है विज्ञान, काव्य, धर्म। ये मनुष्य के तीन चेहरे हैं। हमें किसी एक तत्त्व से नहीं बँधना चाहिए। हमें तीनों को जानना है और तीनों से मुक्त भी होना। हमे तीनो शक्तियों को समर्पित होना हैं। सकारात्मक भाव लेकर यह यात्रा को पूर्ण करना होता हैं। गुरु का परम तेज, शक्ति, और ज्ञान का मिलन होता हैं।

    इन तीनों को जानना और जानने वाला सदा ही अतिक्रमण कर जाता है, जानने वाला कभी भी दृश्य नहीं बनता, द्रष्टा ही रहता है। उसे दृश्य बनाने का कोई उपाय नहीं है। इसके पश्चात तुम्हारी मंजिल पूरी होती है। यही मनुष्य का अखंड रूप है। यह भविष्य का मनुष्य है, जिसके आगमन की प्रतीक्षा की जा रही है; क्योंकि अगर वह नहीं आया, तो पुराना मनुष्य सड़ गया है। पुराना मनुष्य खंडित है। एक-एक हिस्से को लोगों ने जकड़ा है। पश्चिम ने पकड़ा विज्ञान को, पूरब ने पकड़ा धर्म को, दोनों मूर्च्छित हालात में हैं, अर्द्धजीवित हैं। पश्चिम मर रहा है, क्योंकि शरीर तो है, धन है, पद है, पर आत्मा नहीं है और पूरब मर रहा है, क्योंकि आत्मा की बातचीत तो है, लेकिन देह खो गई है। दीनता है, दरिद्रता है, भुखमरी है। पेट भूखा है, आत्मा की बात भी करें, तो कब तक करें और कितनी ही समृद्धि हमारे पास हो, अगर आत्मा ही नहीं है तो हम ही नहीं हैं। यह हमारी समृद्धि केवल हमें अपनी दरिद्रता की याद दिलाएगी और कुछ भी नहीं।

    पश्चिम बाहर से समृद्ध है, पर भीतर से दरिद्र है। पूरब ने भीतर की समृद्धि में बाहर की दरिद्रता मोल ले ली है। यह खंड-खंड का चुनाव है। यह चुनाव अशुभ हुआ। नास्तिक और आस्तिक, दोनों को भीतर जोड़ देना चाहिए। पूरब और पश्चिम को छोड़कर सरक जाएँ। नई सुबह हो रही है। नया दिन आ रहा है। नए मनुष्य का दिन आ रहा है। यह नए मनुष्य की घोषणा है।

  • ज्ञान, कर्म, और उपासना का संयोग है “आध्यात्म”

    ज्ञान कर्म और उपासना, व्यक्ति इन तीनों से कभी भी खाली नहीं रहता। इन तीनों को शुद्ध बनाएं। तभी आपका इस जीवन का भविष्य तथा अगले जन्मों का भविष्य सुखदायक होगा। कर्मों का फल बहुत जटिल विषय है। बड़े-बड़े विद्वान इस विषय को ठीक से समझ नहीं पाते। ऋषियों ने वेदों का गहराई से अध्ययन किया, चिंतन मनन किया, और कर्मफल के विषय में कुछ बातें सबके सामने प्रस्तुत की।”उनके अनुसार यह सार है, कि जो भी व्यक्ति, जो भी कर्म करता है, उसको उसका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। फल भोगने में कोई भी छुटकारा नहीं है। जैसे बिजली की तार छूने से करंट लगता है। इसमें एक बार भी माफी नहीं होती। ऐसे ही कर्म फल में, ईश्वर के कानून में, कहीं भी कोई भी माफी नहीं होती।थोड़े कर्म का थोड़ा फल। अधिक कर्म का अधिक फल। अच्छे कर्म का अच्छा फल। बुरे कर्म का बुरा फल, मिलता अवश्य है। अपने सही समय पर मिलता है। किस कर्म का फल कब कहां क्या और कैसे देना, इसका निर्धारण ईश्वर करता है। क्योंकि वही इस विषय को ठीक प्रकार से जानता है, और कर्मफल देने में समर्थ भी है।

    जैसा कि ऊपर कहा है, उसके अनुसार ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था को समझें। अपने ज्ञान कर्म उपासना को ठीक करें। यदि आपका ज्ञान ठीक है, तो आपका कर्म भी ठीक होगा। और उपासना भी ठीक होगी। यदि ज्ञान में गड़बड़ है, तो कर्म और उपासना में भी गड़बड़ रहेगी। आपका ज्ञान कर्म उपासना ठीक है या नहीं, इसकी कसौटी ईश्वर का संविधान वेद है। इसलिए वेदों को पढ़ना आवश्यक है।वहीं से पता चलेगा, कि आप का ज्ञान कर्म उपासना ठीक चल रहा है, या नहीं। क्योंकि इसी पर आपका भविष्य टिका है।

    अध्यात्म एक ऐसा विज्ञान है, जिसमें सुनिश्चित साधनात्मक विधान को अपनाते हुए दो प्रयोजन सिद्ध किए जाते हैं। एक है-अंतराल की प्रसुप्त विभूतियों का जागरण और दूसरा है-अनंत ब्रह्मांड में व्याप्त ब्राह्मी चेतना का अनुग्रह अवतरण। इसको संभव करने के लिए साधक को दो कदम बढ़ाने होते हैं, जिनके नाम हैं-तप और योग । तप में जहाँ चित्त का परिशोधन होता है तो वहीं योग में चेतना का परिष्कार। परिशोधन अर्थात संचित कर्म का, कुसंस्कारों का दुष्कर्मों के प्रारब्ध संचय का निराकरण। वहीं परिष्कार का अर्थ है- श्रेष्ठता का जागरण, अभिवर्द्धन इस तरह तपश्चर्या एवं योग साधना के दो चरणों को अपनाते हुए अध्यात्म का प्रयोजन पूरा किया जाता है। तप को शरीर तक सीमित समझना नादानी होगी। इसका दायरा शरीर से आगे बढ़कर प्राण एवं मन तक विस्तृत है अर्थात पूरा अस्तित्व इसके कार्यक्षेत्र में आता है। तप की यह प्रक्रिया संयम, परिशोधन एवं जागरण के तीन चरणों में पूरी होती है। संयम में दैनिक जीवन की ऊर्जा के क्षरण को रोकते हुए उसे संचित किया जाता है, और इसका नियोजन महत्त्वपूर्ण एवं श्रेष्ठ कार्यों में किया जाता है। इनको 4 स्वरूपों में देखेंगे इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम।

    इंद्रिय संयम में पाँच ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को परिष्कृत एवं सुनियोजित किया जाता है, जिससे तन-मन की सामर्थ्य भंडार के अपव्यय को रोककर प्रचंड ऊर्जा का संचय किया जा सके। और इसका नियोजन आत्मबल संवर्द्धन के उच्चस्तरीय प्रयोजन के निमित्त किया जा सके। इंद्रिय संयम की परिणति अर्थ संयम के रूप में होती है। धन एक तरह की शक्ति है, जो श्रम, समय एवं मनोयोग की सूक्ष्म विभूतियों का स्थूल रूप है। इसके संयम के साथ इन सूक्ष्म विभूतियों का उच्चस्तरीय उपयोग संभव होता है। धन को जीवनोपयोगी समाजोपयोगी शक्ति माना जाना चाहिए। और एक-एक पैसे का मात्र योग्य कार्यों में उपयोग होना चाहिए। समय संयम-ईश्वर द्वारा मनुष्य को सौंपी गई समयरूपी विभूति के सदुपयोग का विधान है, जिसके आधार पर विभिन्न प्रकार की भौतिक एवं आत्मिक विभूतियाँ सफलताएँ- संपदाएँ अर्जित कर सकना संभव होता है। इसके सही नियोजन के अभाव में समूची जीवन-ऊर्जा इधर-उधर बिखरकर नष्ट हो जाती है।
    विचार संयम-मन की अपरिमित ऊर्जा के संयम एवं नियोजन का विज्ञान है, जिसके अभाव में इसकी अद्भुत क्षमता बिखरकर यों ही नष्ट होती रहती है। अनैतिक विचार न केवल मन को बहुत खोखला बनाते हैं, बल्कि ऐसी मनोग्रंथियों को जन्म देते हैं, जिनसे आत्मविकास का मार्ग सदा-सदा के लिए अवरुद्ध हो जाए। विचारशक्ति को भी उच्चस्तरीय संपदा माना जाए और चिंतन की एक-एक लहर को रचनात्मक दिशाधारा में प्रवाहित करने का जी-तोड़ परिश्रम किया जाए।

    संयम के बाद तप के अंतर्गत परिशोधन का दूसरा महत्त्वपूर्ण चरण आता है। जीवन ऊर्जा की आवश्यक मात्रा को संचित किए बिना इसे कर पाना संभव नहीं होता। संग्रहित प्राण-ऊर्जा के द्वारा अचेतन मन की ग्रंथियों को खोलना तथा जन्म-जन्मांतर के कर्मबीजों को दग्ध करना इस प्रक्रिया में सम्मिलित हैं। मानवीय व्यक्तित्व को विघटित कर रही शारीरिक और मानसिक परेशानियों का कारण अचेतन मन की ये ग्रंथियाँ ही होती हैं, जिनमें अवरुद्ध ऊर्जा विकास के स्थान पर विनाश के दृश्य उपस्थित कर रही होती है। हर तरह के शारीरिक एवं मानसिक रोग इनके कारण व्यक्ति के जीवन को आक्रांत किए रहते हैं। चित्त की इन ग्रंथियों के परिशोधन के लिए अनेक तरह की तपश्चर्याओं का विधान है। अनेकों तपो का विधान विधित है, जिनको अपनाने पर अंतःकरण में जड़ जमाए कुसंस्कारों का परिमार्जन होता है तथा इसमें छिपी हुई सुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं व दिव्य सतोगुण का विकास होता है।

    तप कुछ इस प्रकार से हैं—

    1. अस्वाद तप,
    2. तितीक्षा तप,
    3. कर्षण तप,
    4. उपवास,
    5. गव्य कल्प तप,
    6. प्रदातव्य तप,
    7. निष्कासन तप,
    8. साधना तप,
    9. ब्रह्मचर्य तप,
    10. चांद्रायण तप,
    11. मौन तप
    12. अर्जन तप

    इनको अपनाने पर तन-मन के मल-विकारों की सफाई होती है; जिससे नस-नाड़ियों में रक्त का नया संचार होने लगता है एवं शारीरिक तंत्र नई स्फूर्ति से काम करने लगता है। साथ ही सूक्ष्मनाड़ियों में नव-प्राण का संचार होने लगता है और चित्त में जड़ जमाए विकारों का परिमार्जन होता है। तप के अंतर्गत परिशोधन के बाद फिर जागरण की प्रक्रिया आती है। अचेतन ग्रंथियों में अवरुद्ध जीवन- ऊर्जा के मुक्त होने पर अंतर्निहित क्षमताओं के जागरण का क्रम शुरू होता है। इसके प्रथम चरण में प्रतिभा, साहस, आत्मबल जैसी विभूतियाँ प्रस्फुटित होने लगती हैं। साथ ही मानवीय अस्तित्व के उन शक्ति संस्थानों के जाग्रत होने का क्रम प्रारंभ हो जाता है, जिनके द्वारा मनुष्य अनंत ब्राह्मीचेतना के प्रवाह को स्वयं में धारण करने में सक्षम होने लगता है। मानवीय चेतना में निहित ऋद्धि-सिद्धि के रूप में वर्णित अतींद्रिय शक्तियाँ एवं अलौकिक क्षमताएँ प्रकट होने लगती हैं। यहाँ तप के साथ योग का समन्वय जीवन-साधना को संपूर्ण का अनुभव देता है। तप एक तरह के अर्जन की प्रक्रिया है तो योग समर्पण और विसर्जन का विधान है। तप में व्यक्ति की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण एवं ऋद्धि- सिद्धियों के अर्जन के साथ अहंकार फूल सकता है, अध्यात्म पथ में विचलन आ सकता है, लेकिन योग इस दुर्घटना से बचाता है; क्योंकि इसमें अहंकार का समर्पण एवं विसर्जन होता है। यह अहं तक सीमित आत्मसत्ता के संकीर्ण दायरे को विराट अस्तित्व से जोड़ने व आत्मविस्तार की प्रक्रिया है।


    भक्तियोग में जहाँ साधक अपने इष्ट-आराध्य एवं भगवान से जुड़कर इस स्थिति को पाता है, वहीं ज्ञानी आत्मा और ब्रह्म की एकता को स्थापित करते हुए अद्वैत की अवस्था को प्राप्त होता है। वहीं कर्मयोगी विराट ब्रह्म को सृष्टि में निहारते हुए निष्काम कर्म के साथ जीवन की व्यापकता को साधता है। ध्यानयोगी अष्टांगयोग की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए समाधि की अवस्था को प्राप्त होता है तथा जीवन के सकल समाधान को पाता है। इस तरह तप जहाँ जीवन-साधना का प्राथमिक आधार रहता है तो वहीं योग इसको निष्कर्ष तक ले जाने वाला अंतिम सोपान है। दोनों मिलकर जीवन-साधना को पूर्णता देते हैं और व्यक्ति को आत्मसिद्धि एवं मुक्ति के चरम उत्कर्ष तक ले जाते हैं। इस तरह तप और योग से युक्त पथ आध्यात्मिक जीवन का सुनिश्चित विज्ञान है, जो सकल सृष्टि के लिए वरदानस्वरूप होता है।

  • समर्थ गुरु रामदास का यह कथन सत्य है कि संसार भर में हमारे मित्र मौजूद हैं; किन्तु उन्हें प्राप्त करने की कुंजी जिह्वा के “कपाट” में बन्द है। मनुष्य की शिक्षा, सभ्यता, संस्कृति, बुद्धिमत्ता, चतुरता, विचारशीलता एवं दूरदर्शिता उसकी वाणी के माध्यम से ही दूसरों पर प्रकट होती रहती है। समाज में प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता प्राप्त करने के लिए वाणी का परिष्कृत होना आवश्यक है। निन्दा करते रहने या कठिनाई के विरुद्ध खेद व्यक्त करने से सिर्फ नकारात्मकता ही बढ़ेगी। हमें रचनात्मक उपाय खोजने-पूछने पड़ेंगे, जो मुख्य सहयोग पर ही निर्भर हों। सहयोग उसी को मिलता है, जो मुँह खोलकर अपनी पात्रता सिद्ध कर सकता है।



    बाइबिल में लिखा है-

    “जरा परखो तो कि न्याययुक्त शब्दों में कितनी शक्ति भरी पड़ी है।”

    एमर्सन कहते थे-

    “भाषण एक शक्ति है। उसका प्रयोग अवांछनीयता से विलग करने और श्रेष्ठता की ओर बढ़ने का प्रोत्साहन देने के लिए ही किया जाना चाहिए।”

    प्लेटो ने लिखा है-

    “मानवी मस्तिष्कों पर शासन कर सकने की क्षमता भाषण शक्ति में सन्निहित है।”

    किपलिंग की उक्ति है-”

    शब्द मानव समाज द्वारा प्रयोग में लाया जाने वाला सर्वोत्तम रसायन है।”

    विचारों की शक्ति संसार की सर्वोपरि शक्ति है। उसी के सहारे नर-पशु से भी गई-बीती स्थिति में पड़ा व्यक्ति प्रगति की दिशा में अग्रसर होता है और विविध प्रकार उपलब्धियो का अधिकारी बनता है। महामानवों की गरिमा, भौतिक क्षेत्र में हुआ समृद्ध ज्ञान और विज्ञान द्वारा उत्पन्न सुख-साधन प्रगति के अनेकानेक सोपान, शान्ति और सुव्यवस्था के आचार-विचार वृक्ष पर लगे हुए फल हैं। मानवी प्रगति का मूलभूत आधार भी कह सकते हैं। तत्त्वदर्शी विचारों की गरिमा का विवेचन हुए आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि अदृश्य शक्ति ने इस संसार को किस प्रकार सुन्दर गुलदस्ते की तरह सुन्दर है कर दिया है। “एना हैप्सटन” ने लिखा है-“ईश्वर की इस दुनिया में तार से चन्द्रमा, बादल, पर्वत, पुष्प और चित्र-विचित्र प्राणियों का सौर पग-पग पर बिखरा पड़ा है, पर शब्दों के समान और कोई अमुल्य वस्तु इस लोक में है नहीं।”

    ई० डब्ल्यू विल्कोक्स कहते हैं-“मेरी धारणा है कि विचार निर्जिव नहीं, उनमें शक्ति हैं। उनमें बल भी है और पंख भी। संसार भर में भलाई और बुराई को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हो देखे जा सकते हैं।

    पोप विक्टार कहा करते थे-“काम इतने शक्तिशाली नहीं होते, जितने विचार। किसी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि का इतिहास उस समय में फैले हुए विचारों के आधार पर ही लिखा जाना चाहिए।”

    अलबर्ट स्वाइट्जर ने विचार-शक्ति को युद्ध से भी अधिक फलप्रद और शक्तिशाली सिद्ध करते हुए कहा है-‘आज परिष्कृत विचारों का नितान्त अभाव दीखता है। हमने ऐसे प्रश्नों पर युद्ध डाले जिनका हल युक्तिवाद के सहारे वार्तालाप से निकाला ज सकता था। विचारों की दृष्टी से जो नहीं जीत सका, यह जीत जाने पर भी पराजित ही रहेगा।

    मनीषियों को अपनी जान सम्पदा अपने तक ही सीमित नहीं रखनी चाहिए, उसका लाभ दूसरों तक पहुँचाना चाहिये। इसी में उनके स्वाध्याय एवं मनन-चिन्तन की सार्थकता है। समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन तत्वदर्शी लोग इसी प्रकार कर सकते हैं कि, वे जनमानस का स्तर निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न करते रहें, उसे नीचे न गिरने दें, विद्वान, संन्यासी और तत्वज्ञानी सदा से लोक उद्बोधन में निरन्तर रहकर जनता को मार्ग दिखा रहे हैं। ऐसी ही उनके लिए वेद और गुरू सत्ता की आज्ञा भी है।



    तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत। इन्द्रस्य वज्रात् तीक्ष्णीयांसो येषामस्मि पुरोहितः ॥

    अथर्व ३/११/४

    ‘पुरोहित ऐसे प्रवचन करे, जिससे लोग क्रियाशील, तेजस्वी, विवेकवान् और उपकारी बनें। वे अधोगामी न होने पायें।”


    शचीभिर्नः शचीवसू दिवा नक्तं दशस्यतम् । मावां रातिरूप दसत्कदा चनास्पद्रातिः कदा चन॥

    ऋग्वेद १/१३९/५

    ‘अध्यापक तथा उपदेशक लोगों को उत्तम धर्मनीति और सदाचार की शिक्षा दिया करें, ताकि किसी की उदारता नष्ट न हो।”

    इतिहास साक्षी है कि वक्तृत्व शक्ति के सहारे कितने ही मनस्वी लोगों ने जन साधारण में हलचलें उत्पन्न की और उनके माध्यम से क्रान्तिकारी परिणाम प्रस्तुत हुए। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानंद, दयानन्द, गुरु रामदास, गुरु गोविन्द सिंह, विनोबा भावे आदि आचार्यों द्वारा धर्मक्षेत्र में। और सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाजपतराय, मालवीय, तिलक, सुभाष आदि नेताओं ने राजनीति के क्षेत्र हलचलें उत्पन्न की और उनकी प्रतिक्रिया कैसे परिर्वतन सामने लाई, यह किसी से छिपी नहीं है। संसार के हर कोने में लोग हुए हैं, जिन्होंने अपने क्षेत्रों की सामयिक समस्याओं का हल करने के लिये वाक शक्ति पाई। ऐसे लोगों में डिमास्थनीज, टूलियस, सिसरो, नेपोलियन, मार्टिन लूथर, अब्राहम लिंकन, वाशिंगटन, लेलिन, स्टालिन, हिटलर, मुसोलिनी, चर्चिल आदि के नाम गिनाये जा सकते हैं।

    कई बार कुशल वक्ताओं द्वारा उत्पन्न की गई प्रभावोत्पादकता देखते ही बनती है। सुनने वालों का दिल उछलने लगता है। रोमांचित होते, जोश में आते दीखते हैं। भुजाएँ फड़कने लगती है। और आँखों में उनकी भाव विभोरता का आवेश झाँकता है। सुनने वालों को हँसना, रुलाना, उछालना,गरम या ठंडा कर कुशल वक्ता की अपनी विशेषता होती है। जिसे यह रहस्य विदित होता है और उसका अभ्यास अनुभव है, उसे जनता के मन मस्तिष्कों पर शासन करते देखा जा सकता है। परिमार्जित वक्तृता में एक प्रकार की विद्युतधारा सनसनाती हुई रहती है। उच्चारण की गति, शब्दों का गठन, भावों का समन्वय घटनाक्रम का प्रस्तुतीकरण तर्क और प्रमाणों का तारतम्य, भावनाओं का समावेश रहने से वक्त का प्रतिपादन इतना हृदयस्पर्शी हो जाता है कि सुनने वालों के अपनी मनःस्थिति को उसी की अनुगामिनी बनाने के लिए विवश होना पड़ता है। नेपोलियन की वाणी में जादू था, वह जिससे बात करता को अपना बना लेता था। उसके निर्देशों को टालने की कभी किसी की हिम्मत नहीं हुई। वह जब बोलता तो साथियों में जोश भर देता था।

    और वे मन्त्र मुग्ध होकर आदेशों का पालन करने के लिए, प्राणपण से जुट जाते थे। हिटलर जब बोलता था तो जर्मन नागरिकों के खून खौला देता था। लेनिन ने दबी- पिसी रूसी जनता को इतना उत्तेजित कर दिया कि उसने शक्तिशाली शासकों से टक्कर ली और उनका तख्ता पलट दिया। सुभाषचन्द्र बोस ने प्रवासी भारतीयों को लेकर आजाद हिन्द फौज ही खड़ी कर दी। मार्टिन लूथर ने पोपशाही पोंगा पंथी की गहरी जड़ों को खोखला करके रख दिया और यूरोप भर में धार्मिक क्रान्ति का नया स्वरूप खड़ा कर दिया। सावरकर जी ने भारतीय जनता को स्वतंत्रता संग्राम खड़ा कर देने में जो सफलता पाई, उसमें उनकी वक्तृत्व शक्ति का अद्भुत योगदान था। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का व्यक्तित्व आकर्षक न था। वे दुबले, लम्बे और कुरूप थे। घर बार की दृष्टि से भी वे निर्धनों में ही गिने जाते थे; पर उनकी भाषण प्रतिभा अनोखी थी। प्रधानता इसी गुण के कारण वे इतने लोकप्रिय हो सके और उस देश के राष्ट्रपति चुने जा सके। जब तक उनके पास भाषण की पर्याप्त सामग्री एकत्रित न हो जाती, तब तक वे कभी बोलना स्वीकार न करते।

    भगवान् बुद्ध ने दुष्प्रवृत्तियों की बाढ़ को रोकने के लिए पैनी वाक्शक्ति का उपयोग किया। उनके प्रवचन बड़े मर्मस्पर्शी होते थे। यही कारण था कि उनके जीवन काल में ही लाखों व्यक्ति भिक्षु और भिक्षुणी बनकर, धर्मचक्र प्रवर्तन में अपनी समस्त सामर्थ्य झोंककर धर्म प्रचारक बन गये। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को जन्म देने, आगे बढ़ाने और सफल बनाने में जिन नेताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाही, वे सभी कुशल वक्ता थे। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, रानाडे, गोखले, लोकमान्य तिलक, विपिन चन्द्रपाल, चितरंजन दास, सुभाषचन्द्र बोस, लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय, राजगोपालाचार्य, आदि के भाषणो में प्राण फुंकते थे। उनकी भाषा बड़ी ओजस्वी और मर्मस्पर्शी होती थी। वक्तृत्व कला की दृष्टि से उनके भाषण बड़े प्रभावशाली प्रवाहपूर्ण और प्रथम श्रेणी के माने जाते थे। उन लोगों की सफ़लता के कारण तलाश करने पर कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से सामने जो लक्ष्य था, उसमें अनीति का विरोध करने के लिए प्रचंड पुरूषार्थ, अतुल्य साहस, मातृभूमि के लिए आत्मसमर्पण-लक्ष्य की ओर द्रुतगति है। चलने की तड़पन, स्वार्थ सिद्धि से कोसों दूर त्याग-बलिदान की प्रचण्ड निष्ठा जैसे भावनात्मक कारण मुख्य थे।

    जिनके पीछे पानी का दबाव अधिक होता है, वे नदिया और झरने बड़ी तेजी से बहते हैं, उनकी लहरें, हिलोरें तथा ध्वनियों मनोहारिणी होती हैं। जिनके पीछे दबाव न हो, उनका पानी बहाता है; पर मन्दगति की निर्जीवता ही दिखाई देती है। यही बात भाषण के सम्बन्ध में है। वक्ता की भावनाएँ जितनी प्रचण्ड होंगी, विषय में उसकी निष्ठा, लगन, तत्परता, तन्मयता का जितना गहरा बीज होगा, उतना ही ओज वाणी में भरा होगा। समाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ, समर्थ रामदास, ऋषि दयानन्द, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राममोहन राय आदि के बड़े प्रभावशाली रहे हैं। सूर, तुलसी, कबीर, दादू, रैदास आदि के भजन सुनकर लोग भाव-विभोर हो उठते थे। उसमें कंठ स्वर अथवा कविता का शब्द गठन उतना उच्चस्तरीय नहीं जितना कि उनका तादात्म्य व्यक्तित्व। ऐसे लोगों की वाणी लड़खड़ाती भी हो और शब्दों का चयन उतना अच्छा न बन पड़े, तो भी लोग उस कमी पर ध्यान नहीं देते। गांधी जी के भाषण, भाषण कला की दृष्टि से उतने अच्छे नहीं होते, फिर भी उनका व्यक्तित्व वाणी के साथ घुला होने के कारण उन्हें लोग न केवल श्रद्धापूर्वक सुनते थे, वरन् बहुत अधिक प्रेरणा भी ग्रहण करते थे।



    वक्ता, लेखक, कवि, गायक, अभिनेता आदि कलाकार माने जाते हैं। उनकी अभिव्यक्तियाँ बहुत कुछ इस बात पर निर्भर रहती हैं कि उन्हें स्वयं कैसी अनुभूतियाँ होती हैं। यदि उनका निज का अन्तःकरण नीरस और शुष्क हो, तो उनका भाषण, लेखन, कविता गायन, अभिनय आदि स्पष्टतः नीरस दिखाई पड़ेंगे। विद्वान् सदा से यही कहते रहे हैं कि जब भीतर से भावनाएँ फूट रही हों, तभी उनके प्रकटीकरण का साहस करना चाहिए। संसार के महामानव ओजस्वी वक्ता भी रहे हैं, इसे दो तरह कहा जा सकता है। वाक्शक्ति के कारण वे ऊँचे स्तर तक पहुँच सके अथवा उनका भावना प्रवाह ऊँचा होने के कारण वाणी में ओजस्विता उत्पन्न हुई। कहा किसी भी तरह जाए, वस्तुतः दोनों परस्पर अविच्छिन्न और अन्यान्योश्रित हैं। दोनों तथ्य पूर्णतया परस्पर घनिष्ठतापूर्वक मिले हुए हैं।

    वाणी की ओजस्विता और भावनाओं की प्रखरता दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू कहना चाहिए। सही तरीका यह है कि जिसके भीतर ज्ञान और भाव का निर्झर फूटता हो, उसे अपनी अभिव्यक्ति करनी चाहिए। दूसरा तरीका आरम्भिक अभ्यास की दृष्टि से यह भी हो सकता है कि जब बोलना हो, तब प्रतिपाद्य विषय में अपनी सघन श्रद्धा और तत्परता उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए। स्वाभाविक न होने पर उसे लोग नाटकीय भी बताते हैं और उस आधार पर भी वाणी में प्रभाव उत्पन्न करते हैं। सोचने की बात है कि जब कृत्रिमता के बल पर लोग अपना काम चला लेते हैं और बहुत हद तक अभीष्ट सफलता प्राप्त कर लेते हैं, तो वास्तविकता होने पर कितना अधिक और अस्थाई प्रभाव उत्पन्न किया जा सकेगा। अभ्यास, अनुभव, इच्छा, सतर्कता से कोई भी कला सीखी जा सकती है। धैर्यपूर्वक देर तक प्रयत्न करने और हर बार पिछली भूल का परिष्कार करते हुए नये सुधारों का समन्वय करने से प्रत्येक कलाकार प्रगति करता है। वक्तृत्व कला भी यही सब चाहती है। यह भी उन्हीं शाश्वत तथ्यों के आधार पर निखरती है, जिनके
    सहारे अन्य कलाकार उच्चस्तरीय सफलता तक पहुँचते रहे हैं।

  • भारतीय संस्कृति अपने आप में एक अनोखा विज्ञान है। जिसकी तुलना नहीं की जा सकती है। मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित बनाएं रखने के लिए हमे जागरूक रहना होगा। यह संस्कृति हमे कर्मकाण्ड का आधार प्रदान करती है। कर्मकांड भी विज्ञान है खुद को मंत्र के साथ पिरोने का। वसंत ऋतु का आगमन ही विद्यारंभ संस्कार को लाता है। ज्ञान और बुद्धि को संतुलित करने के लिए एक तत्व का अभ्यास करना होता है। वह तत्व की उपासना होती है ” सरस्वती” जिसे मां कहकर पुकारा जाता है। सरस्वती शब्द तीन शब्दों से निर्मित हैं, प्रथम स्वर जिसका अर्थ सार, ‘स्व’ स्वयं तथा ‘ती’ जिसका अर्थ सम्पन्न हैं; जिसका अभिप्राय हैं जो स्वयं ही सम्पूर्ण सम्पन्न हो। ब्रह्माण्ड के निर्माण में सहायता हेतु, ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती को अपने ही शरीर से उत्पन्न किया था। इन्हीं के ज्ञान से प्रेरित हो ब्रह्मा जी ने समस्त जीवित तथा अजीवित तत्वों का निर्माण किया। ब्रह्मा जी की देवी सरस्वती के अतिरिक्त दो पत्नियां और भी हैं प्रथम सावित्री तथा द्वितीय गायत्री; तथा सभी रचना-ज्ञान से सम्बद्ध कार्यों से सम्बंधित हैं। देवी सरस्वती का एक नाम ब्राह्मणी भी हैं। वेद माता, ब्राह्मणी के नाम से त्रि-भुवन में विख्यात, विद्यार्थी वर्ग कि अधिष्ठात्री देवी सरस्वती जी हैं। इनका आव्हान करना मेधा शक्ति को बढ़ाता है। आज हम कुछ शक्ति केंद्र के बात करेगे अर्थात् ही मां सरस्वती जी मंत्रों से उन्हे समझने का प्रयास करेंगे।

    सरस्वती जी का मंत्र ,
    पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती ।
    यज्ञं वष्टु धियावसुः ||
    चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् ।.
    यज्ञं दुधे सरस्वती ।|
    महो अर्ण: सरस्वती प्र चेतयति केतुना ।
    धियो विश्वा वि राजति ।।

    वेद के अर्थ से समझने के लिए हमारे पास प्राचीन ऋषियों के प्रमाण हैं। निघण्टु में वाणी के ५७ नाम हैं, उनमें से एक सरस्वती भी है। अर्थात् सरस्वती का अर्थ वेदवाणी है। ब्राह्मण ग्रंथ वेद व्याख्या के प्राचीनतम ग्रंथ है। वहाँ सरस्वती के अनेक अर्थ बताए गए हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
    1- वाक् सरस्वती।। वाणी सरस्वती है। (शतपथ 7/5/1/31)
    2- वाग् वै सरस्वती पावीरवी।। ( 7/3/39) पावीरवी वाग् सरस्वती है।
    3- जिह्वा सरस्वती।। (शतपथ 12/9/1/14) जिह्ना को सरस्वती कहते हैं।
    4- सरस्वती हि गौः।। वृषा पूषा। (2/5/1/11) गौ सरस्वती है अर्थात् वाणी, रश्मि, पृथिवी, इन्द्रिय आदि। अमावस्या सरस्वती है। स्त्री, आदित्य आदि का नाम सरस्वती है।
    5- अथ यत् अक्ष्योः कृष्णं तत् सारस्वतम्।। (12/9/1/12) आंखों का काला अंश सरस्वती का रूप है।
    6- अथ यत् स्फूर्जयन् वाचमिव वदन् दहति। ऐतरेय 3/4, अग्नि जब जलता हुआ आवाज करता है, वह अग्नि सारस्वत रूप है।
    7- सरस्वती पुष्टिः, पुष्टिपत्नी। (तै0 2/5/7/4) सरस्वती पुष्टि है और पुष्टि को बढ़ाने वाली है।
    8-एषां वै अपां पृष्ठं यत् सरस्वती। (तै0 1/7/5/5) जल का पृष्ठ सरस्वती है।

    9-ऋक्सामे वै सारस्वतौ उत्सौ। ऋक् और साम सरस्वती के स्रोत हैं।
    10-सरस्वतीति तद् द्वितीयं वज्ररूपम्। (कौ0 12/2) सरस्वती वज्र का दूसरा रूप है।
    ऋग्वेद के 6/61 का देवता सरस्वती है। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने यहाँ सरस्वती के अर्थ विदुषी, वेगवती नदी, विद्यायुक्त स्त्री, विज्ञानयुक्त वाणी, विज्ञानयुक्ता भार्या आदि किये हैं।
    अन्य देशों में मां सरस्वती अन्य शब्द से पुकारा जाता है। जैसे,
    जापान में सरस्वती को ‘बेंजाइतेन’ कहते हैं। जापान में उनका चित्रन हाथ में एक संगीत वाद्य लिए हुए किया जाता है। जापान में वे ज्ञान, संगीत तथा ‘प्रवाहित होने वाली’ वस्तुओं की देवी के रूप में पूजित हैं।
    दक्षिण एशिया के अलावा थाइलैण्ड, इण्डोनेशिया, जापान एवं अन्य देशों में भी सरस्वती की पूजा होती है।
    अन्य भाषाओ/देशों में देवी सरस्वती के नाम-
    बर्
    चीन – बियानचाइत्यान
    जापान – बेंजाइतेन
    थाईलैण्ड –
    सरस्वती देवी, हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं, जो विद्या की अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं। इनका नामांतर ‘शतरूपा’ भी है। इसके अन्य पर्याय हैं, वाणी, वाग्देवी, भारती, शारदा, वागेश्वरी इत्यादि। ये शुक्लवर्ण, श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणावादनतत्परा तथा श्वेतपद्मासना कही गई हैं। इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है। माघ शुक्ल पंचमी को इनकी पूजा की परिपाटी चली आ रही है। देवी भागवत के अनुसार ये ब्रह्मा की स्त्री हैं। सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है। उसमें विचारणा, भावना एवं संवेदना का त्रिविध समन्वय है। वीणा संगीत की, पुस्तक विचारणा की और मयूर वाहन कला की अभिव्यक्ति है। लोक चर्चा में सरस्वती को शिक्षा की देवी माना गया है। शिक्षा संस्थाओं में वसंत पंचमी को सरस्वती का जन्म दिन समारोह पूर्वक मनाया जाता है। पशु को मनुष्य बनाने का – अंधे को नेत्र मिलने का श्रेय शिक्षा को दिया जाता है। मनन से मनुष्य बनता है। मनन बुद्धि का विषय है। भौतिक प्रगति का श्रेय बुद्धि-वर्चस् को दिया जाना और उसे सरस्वती का अनुग्रह माना जाना उचित भी है। इस उपलब्धि के बिना मनुष्य को नर-वानरों की तरह वनमानुष जैसा जीवन बिताना पड़ता है। शिक्षा की गरिमा-बौद्धिक विकास की आवश्यकता जन-जन को समझाने के लिए सरस्वती पूजा की परम्परा है। इसे प्रकारान्तर से गायत्री महाशक्ति के अंतगर्त बुद्धि पक्ष की आराधना कहना चाहिए। कहते हैं कि, महाकवि कालिदास, वरदराजाचार्य, वोपदेव आदि मंद बुद्धि के लोग सरस्वती उपासना के सहारे उच्च कोटि के विद्वान् बने थे। इसका सामान्य तात्पर्य तो इतना ही है कि ये लोग अधिक मनोयोग एवं उत्साह के साथ अध्ययन में रुचिपूवर्क संलग्न हो गए, और अनुत्साह की मनःस्थिति में प्रसुप्त पड़े रहने वाली मस्तिष्कीय क्षमता को सुविकसित कर सकने में सफल हुए होंगे। इसका एक रहस्य यह भी हो सकता है कि कारणवश दुर्बलता की स्थिति में रह रहे बुद्धि-संस्थान को सजग-सक्षम बनाने के लिए वे उपाय-उपचार किए गए जिन्हें ‘सरस्वती आराधना’ कहा जाता है। उपासना की प्रक्रिया भाव-विज्ञान का महत्त्वपूर्ण अंग है। श्रद्धा और तन्मयता के समन्वय से की जाने वाली साधना-प्रक्रिया एक विशिष्ट शक्ति है। मनःशास्त्र के रहस्यों को जानने वाले स्वीकार करते हैं कि व्यायाम, अध्ययन, कला, अभ्यास की तरह साधना भी एक समर्थ प्रक्रिया है, जो चेतना क्षेत्र की अनेकानेक रहस्यमयी क्षमताओं को उभारने तथा बढ़ाने में पूणर्तया समर्थ है।

    सरस्वती उपासना के संबंध में भी यही बात है। उसे शास्त्रीय विधि से किया जाय तो वह अन्य मानसिक उपचारों की तुलना में बौद्धिक क्षमता विकसित करने में कम नहीं, अधिक ही सफल होती है।
    मन्दबुद्धि लोगों के लिए गायत्री महाशक्ति का सरस्वती तत्त्व अधिक हितकर सिद्घ होता है। बौद्धिक क्षमता विकसित करने, चित्त की चंचलता एवं अस्वस्थता दूर करने के लिए सरस्वती साधना की विशेष उपयोगिता है। मस्तिष्क-तंत्र से संबंधित अनिद्रा, सिर दर्द्, तनाव, जुकाम जैसे रोगों में गायत्री के इस अंश-सरस्वती साधना का लाभ मिलता है। कल्पना शक्ति की कमी, समय पर उचित निर्णय नही कर सकना, विस्मृति, प्रमाद, दीघर्सूत्रता, अरुचि जैसे कारणों से भी मनुष्य मानसिक दृष्टि से अपंग, असमर्थ जैसा बना रहता है और मूर्ख कहलाता है। उस अभाव को दूर करने के लिए सरस्वती साधना एक उपयोगी आध्यात्मिक उपचार है। शिक्षा के प्रति जन-जन के मन-मन में अधिक उत्साह भरने-लौकिक अध्ययन और आत्मिक स्वाध्याय की उपयोगिता अधिक गम्भीरता पूर्वक समझने के लिए भी सरस्वती पूजन की परम्परा है। बुद्धिमत्ता को बहुमूल्य सम्पदा समझा जाए और उसके लिए धन कमाने, बल बढ़ाने, साधन जुटाने, से भी अधिक ध्यान दिया जाए। इस लोकोपयोगी प्रेरणा को गायत्री महाशक्ति के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण धारा सरस्वती की मानी गयी है, और उससे लाभान्वित होने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। सरस्वती के स्वरूप एवं आसन आदि का संक्षिप्त तात्त्विक विवेचन इस तरह है-
    सरस्वती के एक मुख, चार हाथ हैं। मुस्कान से उल्लास, दो हाथों में वीणा-भाव संचार एवं कलात्मकता की प्रतीक है। पुस्तक से ज्ञान और माला से ईशनिष्ठा-सात्त्विकता का बोध होता है। वाहन मयूर-सौन्दर्य एवं मधुर स्वर का प्रतीक है। इनका वाहन हंस माना जाता है और इनके हाथों में वीणा, वेद और माला होती है। भारत में कोई भी शैक्षणिक कार्य के पहले इनकी पूजा की जाती हैं।

    सरस्वती वंदना:
    या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
    या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
    या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
    सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥
    शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
    वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
    हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
    वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥
    जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं। और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है। तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥1॥
    शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से छुटकारा करने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ॥2॥

    यह वरदान देने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने पहले देवी की पूजा की। सृष्टि निर्माण के लिए मूल प्रकृति के पांच रूपों में से सरस्वती एक है, जो वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी है। वसंत पंचमी का अवसर इस देवी को पूजने के लिए पूरे वर्ष में सबसे उपयुक्त है क्योंकि इस काल में धरती जो रूप धारण करती है, वह सुंदरतम होता है। सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्माजी ने जब धरती को मूक और नीरस देखा तो अपने कमंडल से जल लेकर छिटका दिया। इससे सारी धरा हरियाली से आच्छादित हो गई पर साथ ही देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ जिसे ब्रह्माजी ने आदेश दिया कि वीणा व पुस्तक से इस सृष्टि को आलोकित करें। तभी से देवी सरस्वती के वीणा से झंकृत संगीत में प्रकृति विहंगम नृत्य करने लगती है। देवी के ज्ञान का प्रकाश पूरी धरा को प्रकाशमान करता है। जिस तरह सारे देवों और ईश्वरों में जो स्थान श्रीकृष्ण का है वही स्थान ऋतुओं में वसंत का है। यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने स्वीकार किया है।
    भगवान कृष्ण ने गीता में ‘ऋतुनां कुसुमाकरः‘ कहकर वसंत को अपनी सृष्टि माना है-

    बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
    मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकर: ॥
    अर्थातृ- गायन-शास्त्र में वृहत् सामवेद हूँ छन्द-गायत्री छन्द-कलाप में। द्वादश-मास में मार्गशीर्ष मास हूँ ऋतुओं में हूँ कुसुमाकर (वसंत) मैं।सरस्वती शब्द तीन शब्दों से निर्मित हैं, प्रथम स्वर जिसका अर्थ सार, ‘स्व’ स्वयं तथा ‘ती’ जिसका अर्थ सम्पन्न हैं; जिसका अभिप्राय हैं जो स्वयं ही सम्पूर्ण सम्पन्न हो। ब्रह्माण्ड के निर्माण में सहायता हेतु, ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती को अपने ही शरीर से उत्पन्न किया था। इन्हीं के ज्ञान से प्रेरित हो ब्रह्मा जी ने समस्त जीवित तथा अजीवित तत्वों का निर्माण किया। ज्ञान प्रकाश की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती है। वसंत के इस पर्व पर उनका आगमन हमे ज्ञान से वाणी, से गतिमान कर सन्मार्ग पर प्रेरित करेगा।
    सरस्वती जी का यह दिव्य आव्हान शरीर के उस स्थान पर किया जाए उनका नैकट्य हमे प्रदान हो! भगवती शारदा विद्या, बुद्धि, ज्ञान एवं वाणी की अधिष्ठात्री तथा सर्वदा शास्त्र-ज्ञान देने वाली देवी हैं। हमारे हिन्दू धर्मग्रन्थों में इन्हीं माँ वागीश्वरी की जयंती वसन्त पञ्चमी के दिन बतलाई गई है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को मनाया जाने वाला यह सारस्वतोत्सव या सरस्वती-पूजन अनुपम महत्त्व रखता है। सरस्वती माँ का मूलस्थान शशाङ्कसदन अर्थात् अमृतमय प्रकाशपुञ्ज है। जहां से वे अपने उपासकों के लिये निरंतर पचास अक्षरों के रूप में ज्ञानामृत की धारा प्रवाहित करती हैं। शुद्ध ज्ञानमय व आनन्दमय विग्रह वाली माँ वागीश्वरी का तेज दिव्य व अपरिमेय है और वे ही शब्दब्रह्म के रूप में उनकी स्तुति होती हैं। सृष्टिकाल में ईश्वर की इच्छा से आद्याशक्ति ने स्वयं को पाँच भागों में विभक्त किया था। वे राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा एवं सरस्वती के रूप में भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से उत्पन्न हुईं थीं। उस समय श्रीकृष्ण के कण्ठ से उत्पन्न होने वाली देवी का नाम सरस्वती हुआ। ये नीलसरस्वतीरूपिणी देवी ही तारा महाविद्या हैं।

    ‘श्रीमद्देवीभागवत’ व ‘श्रीदुर्गासप्तशती’ में आद्याशक्ति द्वारा महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती के नाम से तीन भागों में विभक्त होने की कथा जगद्विख्यात है। सत्त्वगुणसम्पन्ना भगवती सरस्वती के अनेक नाम हैं, जिनमें वाक्, वाणी, गीः, धृति, भाषा, शारदा, वाचा, धीश्वरी, वागीश्वरी, ब्राह्मी, गौ, सोमलता, वाग्देवी और वाग्देवता आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। अमित तेजस्विनी व अनन्त गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा एवं आराधना के लिये निर्धारित शारदा माँ का आविर्भाव-दिवस, माघ शुक्ल पञ्चमी श्रीपञ्चमी के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस दिन माँ की विशेष अर्चा-पूजा व व्रतोत्सव द्वारा इनके सांनिध्य प्राप्ति की साधना की जाती है। शास्त्रों में सरस्वती देवी की इस वार्षिक पूजा के साथ ही बालकों के अक्षरारम्भ-विद्यारम्भ की तिथियों पर भी सरस्वती-पूजन का विधान बताया गया है। बुध ग्रह की माता होने से हर बुधवार को की गयी माँ शारदा की आराधना बुध ग्रह की अनुकूलता व माँ सरस्वती की प्रसन्नता दोनों प्राप्त कराती है। सच्चे श्रद्धालु आराधक की निष्कपट भक्ति से अति प्रसन्न होने पर देवी सरस्वतीजी ऐसी कृपा बरसाती हैं कि उसकी वाणी सिद्ध हो जाती है जो कुछ कहा जाय, वही सत्य हो जाता है।

    देवीभागवत में सरस्वती माता का यह ध्यान है-
    सरस्वतीं शुक्लवर्णां सुस्मितां सुमनोहराम् ॥
    कोटिचन्द्रप्रभामुष्ट पुष्ट श्रीयुक्तविग्रहाम् ।
    वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकधारिणीम् ॥
    रत्नसारेन्द्र निर्माणनवभूषणभूषिताम् ।
    सुपूजितां सुरगणैर्ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः ॥
    वन्दे भक्त्या वन्दितां च मुनीन्द्रमनुमानवै: ।

    इसके अतिरिक्त सरस्वती जी की स्तुति के लिये ये दो श्लोक जगद्विख्यात हैं-
    या कुन्देदुतुषार-हारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
    या वीणावरदण्ड-मण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
    या ब्रह्माच्युतशङ्कर-प्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता।
    सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा।।
    अर्थात् जो कुन्द के फूल, चन्द्रमा, बर्फ और हारके समान श्वेत हैं; जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं; जिनके हाथ उत्तम वीणा से सुशोभित हैं; जो श्वेत कमलासन पर बैठती हैं; ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकार की जड़ता हर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरा पालन करें।

    शुक्लां ब्रह्मविचारसार-परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
    वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
    हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां,
    वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥।। ६ ।।
    अर्थात् जिनका रूप श्वेत है, जो बह्मविचार की परम तत्व हैं, जो समस्त संसार में फैल रही हैं, जो हाथों में वीणा और पुस्तक धारण किये रहती हैं, अभय देती हैं, मूर्खतारूपी अन्धकार को दूर करती हैं, हाथ में स्फटिक मणि की माला लिये रहती हैं, कमल के आसन पर विराजमान होती हैं और बुद्धि देने वाली हैं, उन आद्या परमेश्वरी भगवती सरस्वती की मैं वन्दना करता हूँ।



    आइए इन्ही सरस्वती जी का आव्हान कर संकल्पित होवे, संकल्पित होना मतलब हम तैयार है।
    ॐ श्रीगणपतिर्जयतिः विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे बौद्धावतारे आर्यावर्तैकदेशे …(शहर का नाम)….नगरे/ग्रामे, शिशिर ऋतौ, ..(संवत्सर का नाम)… नाम्नि संवत्सरे, माघ मासे, शुक्ल पक्षे, पंचमी तिथौ, ..(वार का नाम)…वासरे, ..(गोत्र का नाम)…गोत्रीय ..(आपका नाम)… अहम् ..(प्रातः/मध्याह्न/सायाह्न)… काले श्री सरस्वती देवी प्रीत्यर्थे यथालब्धपूजनसामग्रीभिः भगवत्याः सरस्वत्याः पूजनमहं करिष्ये।’

    वेदोक्त अष्टाक्षरी मंत्र ‘श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा’ अथवा जिस मंत्र से दीक्षित हो उसी से प्रत्येक वस्तु का सरस्वती देवी को समर्पण करें। मानस पूजा का भाव लेकर मां पारंम्बा सरस्वती की आराधना करे।
    मंत्र “ऐं” यह माँ शारदा का अति सरल व सिद्धिप्रद एकाक्षर बीजमन्त्र है। देवीभागवत व ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन है कि श्रीविष्णुजी ने वाल्मीकि को सरस्वतीजी का मंत्र बतलाया था। जिसके जप से उनमें कवित्व शक्ति उत्पन्न हुई थी। वह मंत्र है-
    ‘श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा । आगम-ग्रन्थों में सरस्वती जी के अन्य मन्त्र भी निर्दिष्ट हैं। जिनमें ‘ऐं वाग्वादिनी फट फट स्वाहा’
    यह बीज दशाक्षर मन्त्र है जो सर्वार्थसिद्धिप्रद व सर्वविद्याप्रदायक कहा गया है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में इनका यह मन्त्र निर्दिष्ट है-
    ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा ।’
    उपरोक्त मंत्रों का उठते-बैठते, चलते-फिरते कहीं भी मन ही मन में जप करना भी लाभकारी होता है।
    वाक्सिद्धिदायिनी भगवती सरस्वती की महिमा और प्रभाव असीमित है। ऋग्वेद १०।१२५ सूक्त के आठवें मंत्र के अनुसार वाग्देवी सौम्य गुणों की दात्री व वसु-रुद्रादित्यादि सभी देवों की रक्षिका हैं। ये ही राष्ट्रीय भावना प्रदान करती हैं और लोकहित के लिये संघर्ष करती हैं। ब्रह्माजी की शक्ति ये ही हैं। सृष्टि-निर्माण वाग्देवी का कार्य है। ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती ने नदी के रूप में अवतार भी लिया था।
    “ऐंकाररूपिणी” माँ शारदा की ही कृपा से महर्षि वाल्मीकि, व्यास, वसिष्ठ, आदि ऋषि उच्चता को प्राप्त कर कृतार्थ हुए। महाज्ञानस्वरूपिणी माँ वागीश्वरी की महिमा के विषय में जितना कहें कम ही है। ये शारदा देवी हमारी जिह्वा में-बुद्धि में सदा ही वास करती हैं। इनके ही आशीर्वाद से हम सभी बोल-समझ पाते हैं। ऐसी वागीश्वरी माँ सर्वेश्वरी पातु सरस्वती माम् । विद्या- बुद्धि, विवेक और ज्ञान तत्व की अधिष्ठात्री के रूप में जो परम चेतना सचराचर जगत में व्याप्त हैं उन माँ पराम्बा सरस्वती का आशिर्वाद हमे प्राप्त हों।

  • जल ही जीवन हैं। हमारे शरीर का 70% भाग पानी है। शरीर से प्रतिदिन 2600 ग्राम पानी खर्च होता हैं। किडनी 1500 ग्राम, त्वचा 650 ग्राम, फेफड़े 320 ग्राम, मल मूत्र मार्ग 130 ग्राम, अंतः शरीर में पानी के संतुलन को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन कम से कम 2 से 3 लिटर पानी पीना आवश्यक है। आज बीमारियां प्राय सर्वव्यापी हो चुकी है। इनसे मुक्ति हेतु लोग दवाओं विष अपने शरीर में सेवन कराते जा रहे है। रक्त में मिलकर यह भ्रमण करते विष आगे चलकर क्रमश बड़ी बीमारियों का कारण बनते है। आइए! अनेकानेक बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए हमारे पूर्वज वैदिक वैज्ञानिक ऋषि मुनियों ने जल का सहारा लेकर स्वास्थ जीवन जी नीव रखी थी। जल से स्वास्थ को आकर्षित करना बहुत आसान है। स्वास्थ jl निरोगी जीवन का आधार है। वस्तुत: हम जो पीते है, वही कुछ हम हैं। अशुद्ध जल शरीर में रोगों का कारण बनता है। शुद्ध जल के नाम पर हम मृत जल का सेवन करते है। प्लास्टिक बोतल का पानी प्लास्टिक के तरह ही होता है। इस निर्जीव जल से कैसे स्वास्थ जीवन की अपेक्षा रख सकते है??

    हवा के पश्चात् शरीर में दूसरी सबसे बड़ी आवश्यकता पानी की होती है। पानी के बिना जीवन लम्बे समय तक नहीं चल सकता। शरीर में लगभग दो तिहाई भाग पानी का होता है। शरीर के अलग-अलग भागों में पानी की आवश्यकता अलग-अलग होती है। जब पानी के आवश्यक अनुपात में असंतुलन हो जाता है तो, शारीरिक क्रियाएँ प्रभावित होने लगती है, अत: हमें यह जानना और समझना आवश्यक है कि पानी का उपयोग हम कब और कैसे करें ? पानी कितना, कैसा और कब पिये? उसका तापमान कितना हो? स्वच्छ, शुद्ध, हल्का साफ किया हुआ शरीर के तापमान के अनुकूल पानी जन साधारण के लिए उपयोगी होता है। पानी को जितना धीरे-धीरे घूंट-घूंट पीये उतना अधिक लाभप्रद होता है। इसी कारण हमारे यहाँ लोक वाक्य प्रसिद्ध है- “खाना पीओ और पानी खाओ” अर्थात् धीरे-धीरे पानी पीओ।

    हमारे शरीर में जल का प्रमुख कार्य भोजन पचाने वाली विभिन्न प्रक्रियाओं में शामिल होना तथा शरीर को संरचना का निर्माण करना होता है। जल शरीर के भीतर विद्यमान गंदगी को पसीने एवं मलमूत्र के माध्यम से बाहर निकालने, शरीर के तापमान को नियंत्रित करने तथा शारीरिक शुद्धि के लिए बहुत उपयोगी तथा लाभकारी होता हैं। शरीर में जल की कमी से कब्ज, थकान, ग्रीष्म ऋतु में लू आदि की संभावना रहती है। जल के कारण ही हमें, नौ प्रकार के रसों-मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा और कैशैला आदि का अलग-अलग स्वाद अनुभव होता है। भोजन के तुरन्त बाद पानी पीना हानिकारक और विष युक्त होता है।

    भोजन के तुरन्त पहले पानी पीने से भूख शान्त हो जाती है। बिना भूख भोजन का पाचन बराबर नहीं होता। जब आपको अच्छी भूख लगे तभी आप भोजन को ग्रहण करो। खाना खाने के पश्चात् आमाशय में लीवर, पित्ताशय, पेन्क्रियाज आदि में अम्ल के मिलने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है। अतः प्रायः जनसाधारण को पानी पीने की इच्छा होती है। परन्तु पानी पीने से पाचक रस पतले हो जाते हैं, जिसके कारण आमाशय में भोजन का पूर्ण पाचन नहीं हो पाता। फलतः भोजन से जो ऊर्जा मिलनी चाहिए, प्रायः नहीं मिलती आहार के रूप में ग्रहण किये गये, जिन पौष्टिक तत्त्वों से रस, रक्त, मांस, मज्जा, वीर्य आदि अवयवों का निर्माण होना चाहिये, वो नहीं हो पाता। अपाच्य भोजन आमाशय और आंतों में ही पड़ा रहता है, जिससे मंदाग्नि, कब्ज, गैस, एसिडिटी, Ibs आदि विभिन्न पाचन संबंधी रोगों उत्पन्न होने की संभावना रहती है। दूसरी तरफ अपाच्य भोजन को निष्काषित करने के लिये शरीर को व्यर्थ में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। अतः भोजन के पश्चात् जितनी ज्यादा देर से पानी पीयेंगे उतना पाचन अच्छा होता है। प्राय: भोजन के दो घंटे पश्चात जितनी आवश्यकता हो खूब पानी पीना चाहिए। जिससे शरीर में पानी की कमी न हो। भोजन सुपाच्च तरीके से पाचन होना चाहिए।

    प्रारम्भ में जब तक अभ्यास न हो, ठोस भोजन के साथ तरल पदार्थों का भी उपयोग अवश्य करना चाहिये। भोजन की बीच में थोड़ा सा पानी पी सकते हैं, परन्तु वह पानी गुनगुना हो, न कि बहुत ठण्डा खाने के पश्चात् भी आवश्यक हो तो जितना ज्यादा गरम पीने योग्य पानी थोड़ा पी सकते हैं। भोजन पाचन के तुरन्त बाद पानी पीना नही चाहिए। भोजन पाचन से पूर्व एक साथ ज्यादा पानी पीने से आंव की वृद्धि होती है। अपच, गैस और कब्ज, एसिडिटी होता है। अतः स्वास्थ्य प्रेमी साधकों को सायंकालीन भोजन यथा संभव त्यागना ही उपयुक्त होता है परन्तु यदि ऐसा संभव न हो और भोजन के पश्चात् पानी पीना आवश्यक हो तो, हमारे शरीर के तापमान के अनुसार ही पानी गर्म होना चाहिए, और उतना गर्म पानी धीरे-धीरे घूंट-घूंट पीना चाहिए।

    शरीर के तापमान के अनुसार गर्म पानी पीने से आमाशय की गर्मी में संतुलन रखना संभव हो जाता है। साथ ही धीरे-धीरे पानी पीने से पानी के साथ मुंह में रहने वाला पाचक स्त्राव पानी के साथ मिलने से वह पानी पाचक बन जाता है। शरीर में औषधि का कार्य संपन्न करता है।
    प्रातः काल निद्रा का त्याग करने के पश्चात् बिना मुंह धुएं अथवा दांतुन या कुल्ला किये बिना ही रात भर ताम्र पात्र में रखा हुआ अपनी क्षमतानुसार एक से डेड लीटर पानी पीना चाहिये इस क्रिया को उषा: पान कहते हैं। रात भर में मुंह बंद रहने के साथ साथ जीभ पर विजातीय तत्व जमा हो जाते हैं। इसी कारण दिन भर कार्य करने के बावजूद मुंह में जितनी बदबू नहीं आती, उतनी निद्रा में बिना कुछ खाये ही आती है। ये विजातीय तत्व जब पानी के साथ खाली पेट में पुनः जाते हैं तब वह औषधि का कार्य करते हैं। अत: उषापान का पूर्ण लाभ बिना दातुन पानी पीने से ही मिलता है। इस क्रिया से शरीर के भीतर के लगभग 20% टॉक्सिन बाहर जाते है। कब्ज विकार दूर होते है। त्वचा विकारों में यह महत्व पूर्ण प्रक्रिया है। उषा पान के पश्चात् टहलने अथवा पेट का व्यायाम (संकुचन और फैलाना) करने से पेट में आंत एक दम साफ हो जाती है। जिससे पाचन संबंधी सभी प्रकार के रोगों में शीघ्र राहत मिलती हैं। पानी पीने का श्रेष्ठतम समय प्रातःकाल भूखे पेट होता है। रात्रि के मध्यनः काल में चयापचय क्रिया द्वारा जो विजातीय अनावश्यक तत्त्व शरीर में रात भर में जमा हो जाते हैं, उनका निष्कासन गुर्दे, आंतो, त्वचा अथवा फेफड़ों द्वारा होता है। अतः उत्सर्जन क्रिया के सब अंग, सक्रिय होकर समस्त विजातीय पदार्थों को बाहर निकालने में सक्रिय हो जाते हैं। जब तक रात भर में एकत्रित विष भली भांति निष्कासित नहीं होता और ऊपर से आहार लिया जाये तो विभिन्न प्रकार के रोग होने की संभावना रहती है। उषा पान से बवासीर, सुजन, संग्रहणी, ज्वर, उदर रोग, कब्ज, आत्ररोग, मोटापा, गुर्दे संबंधी रोग, यकृत रोग, नासिका आदि से रक्त स्राव, कमर दर्द, आंख, कान आदि विभिन्न अंगों के रोगों से मुक्ति मिलती है।



    नेत्र ज्योति में वृद्धि, बुद्धि निर्मल तथा सिर के बाल जल्दी सफेद नहीं होते आदि अनेक लाभ होते हैं। जापान के सिकनेश एसोसियेशन द्वारा प्रकाशित एक लेख में इस बात की पुष्टि की गई है। ऐसे प्रयोग का पूर्ण लाभ तब ही मिलता है जब उपरोक्त विधि से पानी पीने के साथ भोजन के लगभग दो घंटे बाद अथवा आमाशय में भोजन के पाचन के पश्चात् ही पानी पीते हैं। उषापान स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिए समान उपयोगी होता है। प्रारम्भ में यदि एक साथ इतना पानी न पी सकें तो प्रारम्भ में दो गिलास जल से शुरू करें। धीरे-धीरे एक से डेढ़ लीटर तक मात्रा बढ़ाना चाहिए।इतना ज्यादा पानी एक साथ पीने पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता सिर्फ प्रथम कुछ दिनों में अधिक पेशाब आ सकता है। यह प्रयोग सस्ता, सुन्दर, स्वावलम्बी और काफी प्रभावशाली होता है। गर्म पानी औषधि है।

    हम केवल पानी के मदद से शरीर की सफाई कर सकते है। जल में भाव का दर्शन होता है। जल मन के भीतर के भाव को दर्शाता है। जल को प्रेम भाव की नजर से देखने से यह जल के क्रिस्टल पॉजीटिव एनर्जी का काम करते है। भय और क्रोध से देखने से जल निगेटिव एनर्जी का काम करता है। यह जल के भीतर क्रिस्टल का प्रभाव है। क्यूकि जल जीवित है। जल में जीवन है। जल केवल प्यास बुझाने के लिए नहीं है , यह मां प्रकृति की तरफ से अदभूत देन मानव को प्रदान की हैं। एल्कलाइन वॉटर यह परिकल्पना जीवित है। नैनो टेक्नोलॉजी के द्वारा जल को योग्य सम्मान देकर तैयार होता है। भारतीय संस्कृति के नाभी और प्राण केंद्र है “यज्ञ”। यज्ञ की भस्म को छानकर पानी में भिगो कर रखने से पानी एल्कलाइन होता है, एनर्जी का अदभूत प्रदर्शन होता है।
    ठण्डे पेय तथा फ्रीज में रखा अथवा बर्फ वाला पानी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। स्वस्थ अवस्था में हमारे शरीर का तापक्रम 98.4 डिग्री फारहनाइट यानि 37 डिग्री सेन्टीग्रेड के लगभग होता है। जिस प्रकार इलेक्ट्रिकल अप्लायंसेज एयर कंडीशनर कूलर आदि चलाने से इलेक्ट्रिसिटी खर्च होती है। उसी प्रकार ठण्डे पेय पीने अथवा खाने से शरीर को अपना तापमान नियन्त्रित रखने के लिये अपनी ऊर्जा व्यर्थ में खर्च करनी पड़ती है। अतः पानी शरीर के तापमान के जैसा गर्म पीना चाहिए। आजकल सामूहिक प्रोग्राम में भोजन के पश्चात् आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक्स पीने का जो प्रचलन है, वह स्वास्थ्य के लिये बहुत हानिकारक होता है। इन तरीको को टाल देना ही उचित है। स्वास्थ हमारे ही हाथो में ही हैं।

    भय, क्रोध, मूर्छा, शोक व चोट लग जाने के समय अन्तः स्त्रावि ग्रंथियो द्वारा छोड़े गये हानिकारक प्रभाव को कम करने के लिये पानी पीना लाभप्रद होता है। लू तथा गर्मी लग जाने पर ठंडा पानी व सर्दी लग जाने पर गर्म पानी पीना चाहिये, उससे शरीर को राहत मिलती है। पानी पीकर गर्मी में बाहर निकलने पर लू लगने की संभावना नहीं रहती।
    उच्च अम्लता में भी अधिक पानी पीना चाहिए, क्योंकि यह पेट तथा पाचन नली के अन्दर की कोमल सतह को जलन से बचाता है। दिन में दो घंटे के अन्तर पर पानी अवश्य पीना चाहिए, क्योंकि इसमें अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियों का स्राव पर्याप्त मात्रा में निकलता रहता है। उपवास के समय पाचन अंगों को भोजन पचाने का कार्य नहीं करना पड़ता। अतः ये शरीर में विजातीय तत्वों को आसानी से निकालना प्रारम्भ कर देते हैं। अधिक पानी पीने से उन तत्वों के निष्कासन में मदद मिलती है।
    पेट में भारीपन, खट्टी डकारें आना, पेट में जलन तथा अपच आदि का कारण पाचन तंत्र में खराबी होता है। अतः ऐसे समय गर्म पानी पीने से पाचन सुधरता है और उपरोक्त रोगों में राहत मिलती है। डायरिया, उल्टी, दस्त के समय उबाल कर ठंडा किया हुआ पानी पीना चाहिये, क्योंकि यह पानी कीटाणु रहित हो जाता है तथा दस्त के कारण शरीर में होने वाली पानी की कमी को रोकता है। नाक से गर्म जल की बाष्प के लेने से जुकाम और गले संबंधी रोगों में आराम मिलता है।पीने वाली अधिकांश दवाईयां में पानी का उपयोग किया जाता है। अधिकांश ठोस दवाईयां भी चाहे वे एलोपैथिक टेबलेट हों अथवा आयुर्वेद या अन्य चिकित्सा पद्धति से संबंधित मुह में लेने वाली दवाईयों को पानी के माध्यम से सरलता पूर्वक निगला जा सकता है। त्रिफला के पानी से आंखें धोने पर रोशनी सुधरती है। रात भर मेथी दाने में भिगोया पानी पीने से पाचन संबंधी रोग ठीक होते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा में शारीरिक शुद्धि के लिये पानी का अलग-अलग ढंग से उपयोग किया जाता है।

    विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त स्नान ताजा पानी से ही करना चाहिये। ताजा पानी रक्त संचार को बढ़ाता है। जिससे शरीर में स्फूर्ति और शक्ति बढ़ती है। जबकि गर्म पानी से स्नान करने पर आलस्य एवं शिथिलता
    बढ़ती है। जल चिकित्सा के अनुभूत प्रयोग पानी के विभिन्न प्रकार की ऊर्जाओं को सरलता से अपने अन्दर समाहित कर लेता है। अतः आजकल विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में पानी में आवश्यक ऊर्जा संचित कर रोगी को देने से उपचार को प्रभावशाली बनाया जा सकता है। सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के अन्तर्गत शरीर में जिस रंग की आवश्यकता होती है, उस रंग की कांच की बोतल या बर्तन में पानी को निश्चित विधि तथा धूप में रखने से पानी में उस रंग के गुण आ जाते हैं। ऐसा पानी पीने से रोगों में राहत मिलती है तथा यदि स्वस्थ व्यक्ति पीये तो रोग होने की संभावना नहीं रहती। पानी को आवश्यकतानुसार चुम्बक पर रखने से उसमें चुम्बकीय ऊर्जा संचित होने लगती है। उस पानी का उपयोग चुम्बकीय चिकित्सक विभिन्न रोगों के उपचार में करते हैं।

    सूर्य किरण एवं चुम्बक की भांति पिरामिड के अन्दर अथवा पिरामिड के ऊपर पानी रखने से उसमें स्वास्थ्यवर्धक गुण उत्पन्न हो जाते हैं, जिसका सेवन करने से रोगों में राहत मिलती है और स्वस्थ व्यक्ति रोग मुक्त रहता है। पानी को विभिन्न रत्नों मंत्रों अथवा आवश्यकतानुसार स्वर तथा विभिन्न रंगों के बिजली के प्रकाश को तरंगों से भी अर्जित किया जा सकता है। जिसके सेवन से असाध्य एवं संक्रामक रोगों का उपचार किया जा सकता है। पानी को जैसे बर्तन अथवा धातु के सम्पर्क में रखा जाता है, उसमें उस धातु के गुण उत्पन्न होने लगते हैं। प्रत्येक धातु का स्वास्थ्य की दृष्टि से अपना अलग-अलग प्रभाव होता है। सोने से ऊर्जित जल पीने से श्वसन प्रणाली के रोग, जैसे दमा, श्वास फूलना, फेफड़े संबंधी रोगों, हृदय और मस्तिष्क संबंधी रोगों में लाभ होता है। चांदी से पाचन क्रिया के अवयव आमाशय, लीवर, पित्ताशय, आंतों के अनेक रोगों एवं मूत्र प्रणाली के रोगों में आराम मिलता है। अन्य ऊर्जा से परिपूर्ण जल के सेवन से जोड़ों के रोग, पोलियों, कुष्ठरोग, रक्त चाप, घुटनों का दर्द, मानसिक तनाव आदि में काफी लाभ होता है। जल की महिमा जितनी करे उतनी कम है। क्यूकि आखिर में जल ही जीवन है। जल को सुरक्षित रखना और योग्य उपयोग में लेना आज की जरुरत है। भविष्य में चिंता है , नया युद्ध वार जल के लिए ही होगा। जहां जल है वह जीवन है। बिना जल के जीवन नही जिया जाता है। जल और प्रकृति का सम्मान आवश्यक है।

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