नेत्रम आरोग्यं।

जीते हुए अपने जीवन लक्ष्य को पाएं, यह सर्व मनुष्यात्माओं का परम कर्तव्य है। स्वस्थ रहना शरीर का नैसर्गिक स्वभाव एवं हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। कहा भी गया है पहला सुखनिरोगी काया । वास्तव में स्वास्थ्य जीवन की सबसे पहली आवश्यकता है। इसके बिना विपुल सम्पदा एवं वैभव सभी निरर्थक हैं। एक अस्वस्थ व्यक्ति स्वयं दुखी एवं दूसरों पर बोझ होता है। वह आत्म निर्माण का न तो प्रयास कर पाता है न ही परिवार समाज व राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दे सकता है।

जब हम नैसर्गिक संसार को देखते हैं तो पाते हैं कि स्वस्थ रहने के नियम बहुत ही सरल हैं। प्रकृति का अनुसरण कर हर कोई सहज ही स्वस्थ जीवन जी सकता है। प्रकृति के पंचतत्वों से निर्मित शरीर जितना प्रकृति के नजदीक रहेगा, वह उतना ही स्वस्थ रहेगा। व्यक्ति का रहना, खाना जितना सात्विक व सादगी भरा होगा वह उतना ही प्रकृति के करीब व स्वस्थ होगा।

संपूर्ण स्वास्थ्य अर्थात् रोग रहित शरीर व प्रसन्नता से भरा मन। अच्छी भूख लगना, गहरी नींद आना, मीलों पैदल चलने व वजन उठाने की शक्ति होना, उदार व सकारात्मक विचार व चिंतन की गहराई, उदारता, उमंग उत्साह, क्षमाशीलता, निष्काम सेवा भावना आदि संपूर्ण स्वास्थ्य की निशानी हैं। “दिनचर्या को व्यवस्थित बना लेना आरोग्य रक्षा की गारंटी है। प्रातः उठने से लेकर रात्रि सोने तक की क्रमबद्ध विधि – व्यवस्था बनायें। समय का विभाजन व निर्धारित कार्य पद्धति का फिर कड़ाई से पालन किया जाय। इससे शरीर की आंतरिक प्रणाली भी व्यवस्थित व क्रियाशील हो जाती हैं। जिन नियमों को तोड़ ने से बीमारियां होती हैं उनसे सावधान रहें। स्वस्थ रहने के जो नियम हम जानते हैं, और कर सकते हैं उनका तो अवश्य ही पालन करें। जब हम बीमार पड़ते हैं तो ठीक होने के लिए अपना सब-कुछ दांवपर लगा देते हैं, लेकिन बड़ा आश्चर्य यह है कि, ठीक रहने के लिए हम कुछ नहीं करते।

लेकिन आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में हालात बदल गये हैं। पढाई, ट्यूशन, गृहकार्य के अलावा T.V.. Computer, Internet, social media मैली संस्कृति आदि के जंजाल में मनुष्य जीवन उलझ सा गया है। इन बदली हुई परिस्थितियों में मनुष्य को जीने की नयी कला सीखनी होगी। ऐसी कला जिसमें वह वर्तमान परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने जीवन लक्ष्य को पा सके। जीने की कला आपको चुनने होगी। लेकिन यह अच्छी आदतें आपको जीवन भर साथ देगी।ये बातें नहीं बल्कि आपके अनन्य मित्र हैं। अन्य मित्र तो मुसीबत में साथ छोड़ भी सकते हैं, तथा गलत मार्ग पर भी ले जा सकते हैं, लेकिन ये आपकी अच्छी आदतें आपका साथ कभी नहीं छोड़ेंगे तथा आपको सदा उन्नति के मार्ग पर ही ले जायेंगे। आशा है आप इन अच्छी आदतो का स्वीकार कर उन्हे अपना बनाकर स्वयं को सम्पन्न व धन्य अनुभव करेंगे तथा जीवन को सफल करेंगे।

स्वस्थ जीवन की सबसे पहली आवश्यकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन का सच्चा आनंद ले सकता है; पढ़ाई की गहराई में जा सकता है; अपने लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु त्याग, तपस्या व मेहनत कर सकता है। एक रोगी व्यक्ति स्वयं ही दुखी तथा दूसरों पर बोझ होता है स्वस्थ रहने के नियमों का पालन करें। जल-उपवास करें अथवा रसाहार लें। दवाओं से बचें। दवाओं से प्राप्त किया गया स्वास्थ्य सच्चा स्वास्थ्य नहीं है। संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए प्राकृतिक नियमों का पालन करें। प्रकृति से बड़ा डॉक्टर, उपवास से बड़ा इलाज एवं उषा: पान से बडी दवा इस संसार में कोई नहीं।

स्वस्थ रहने के नियम बहुत सरल हैं। जल्दी सोयें, जल्दी उठें। रात को सोने से पहले एक ग्लास व सुबह उठकर दो ग्लास पानी पीयें। नित्य आसन-प्राणायाम व ध्यान करें। प्रतिदिन पसीना आये ऐसा श्रम अथवा खेलकूद अवश्य करें। भूख से कम भोजन लें, चौथाई पानी व चौथाई हवा के लिये पेट खाली रखें। भोजन अच्छी तरह चबाकर शांतिपूर्वक करें। पानी भोजन के एक घंटे बाद पीयें। सादा सात्विक भोजन लें। बहुत गर्म व बहुत ठंडे पदार्थों, पेप्सी, कोलों आदि से बचें। कहा भी गया है – जैसा खायें अन्न वैसा बने मन, अतः केवल पवित्र व ईमानदारी की कमाई का भोजन ही स्वीकार करें। व्यसनों से मुक्त रहें।

स्वस्थ नेत्र : आज मानसिक तनाव व दबाव,अनियमित जीवन, अप्राकृतिक खानपान के कारण छोटे बच्चे भी नेत्र-रोगों के शिकार हैं। आँखें हमे प्रभु की दी हुई अनमोल देन हैं। इनकी रक्षा करें। नेत्र रोगों के उपरोक्त कारणों को दूर करें। हरी सब्जियाँ, फलों आदि का अधिक प्रयोग करें। सूर्य-स्नान, नेत्र-स्नान, जल-नेति, पॉमिंग, आँखों तथा गर्दन के व्यायाम आदि सीखें व नियमित अभ्यास करें। तनाव से बचें। बहुत कम या बहुत अधिक प्रकाश में पढ़ाई न करें। ज्योति बिंदु या काले बिंदु पर त्राटक का अभ्यास करें। अपनी अनमोल आँखों का ख्याल रखेंगे तो ये आपकी जीवन भर सेवा करेंगी एवं साथ निभायेंगी।

इस संसार में प्राणीमात्र के लिए आँखें भगवान की एक अनुपम देन हैं। आँखें स्वस्थ रहें एवं आजीवन साथ निभायें, यह प्रत्येक जीवधारी की अभिलाषा रहती है। बिना आँखों के संसार मात्र अंधकार है। कहा भी है – आँख है तो जहान है। स्वस्थ आँखों के बिना जीवन अधूरा है। ऐसी उपयोगी आँखो के स्वास्थ्य के लिए हम बहुत कम ध्यान देते हैं। यदि कुछ सरल सी बातों को अपने दैनिक जीवन में उतार लिया जाय तो ईश्वर की ये अनुमोल देन जीवनभर हमारा साथ निभायेंगी।
पढ़ते समय प्रकाश सामने व थोड़ा बांयी ओर से आये ऐसी व्यवस्था करें। पुस्तक को लगभग एक फिट दूर रखकर पढ़ें अथवा लिखें।

बहुत तेज प्रकाश और बहुत कम प्रकाश में पढ़ाई न करें। बहुत झुककर या लेटकर पढ़ाई न करें। बिजली या धूप की तेज रोशनी में पढ़ना ठीक नहीं। चूल्हे पर, धुँए में या चकाचौंध रोशनी में कभी कार्य न करें। इससे Vitamin “A” की कमी हो जाती है। कार में बैठकर यात्रा करते हुए पढ़ने से और भोजन के तत्काल बाद पढ़ने से नेत्रों को हानि पहुँचती है।
बिना दबाव व तनाव के स्वाभाविक रूप से देखने की आदत डालें। घूर घूर कर नहीं देखें। बीच-बीच में पलकें झपकातें रहें। T. V. कार्यक्रम, फिल्म, कम्प्यूटर कार्य में स्क्रीन की ओर लगातार न देखें। इनके एकदम
सामने न बैठ थोड़ा दूर व तिरछा बैठें। बीच-बीच में Palming व गर्दन का व्यायाम करें, व आँखों पर ठंडे पानी के छींटे डालकर धोयें।
अनुचित आहार व दोषपूर्णरक्त संचार भी नेत्र रोगों के प्रमुख कारण है। आँखों के रोगों से बचने व मुक्त होने के लिए आहार विहार के संयम द्वारा शरीर शुद्धि व कब्ज से मुक्ति एक प्रमुख आधार है। आहार में फल व हरी सब्जियों व सलाद की मात्रा अधिक रखें। अंकुरित मूंग व चने भी उत्तम हैं। गाजर, चुकन्दर व आंवलों का रस नेत्र ज्योति हेतु उत्तम है।

फल, हरी सब्जियां,सलाद आदि का अप्राकृतिक आहार जैसे डिब्बाबंद (Packed), परिरक्षित (Preserved), परिष्कृत (Refined) व तले हुए (Deep Fried) खाद्यों से दूर रहें।लगातार मानसिक दबाव व तनाव बने रहने से गर्दन के पीछे की रीढ़ की हड्डी कड़ी हो जाती है व आसपास की मांसपेशियां सिकुड़ जाती हैं, जो कि नेत्र दोषों का प्रमुख कारण हैं। चिंता, नकारात्मक विचार, भय, घृण, मानसिक तनाव, किसी दबाव आदि से मुक्त रहने का प्रयास करें।
पॉमिंग (Palming) : नेत्रों को सहज ही ठंडक व विश्राम देने की यह एक सर्वश्रेष्ठ विधि है। इसमें आँखों को बिना स्पर्श किये हथेलियों से ढका जाता है तथा उसमें आँख खोलकर अंधकार का दर्शन किया जाता

मस्तिष्क व आँखों को शिथिलीकरणतथा पॉमिंग द्वारा कार्यों के बीच में विश्राम देते रहना उत्तम है। नेत्र-स्नान कागासन की स्थिति में बैठकर अथवा वॉश बेसिन पर सहब झुककर मुँह में पानी भर ले। तत्पश्चात् आँखों पर ठंडे पानी के १०-१५ चार छींटे मारे। फिर मुँह से पानी छोड़ दें। पुनः मुँह में पानी भरकर क्रिया दोहरायें। ऐसी ३ क्रियायें करें। इस क्रिया से नेत्र ज्योति बढ़ती है। मस्तिष्क की गर्मी दूर होने से सिरदर्द, आँखों की थकान व जलन दूर होती है। रात्रि विश्राम के पहले इस क्रिया को करने से नींद अच्छी आती है। सावधानियाँ – जिन्हें मोतियाबिन्द हो, हाल ही में आँखों का ऑपरेशन हुआ हो या आँखें सदैव लाल रहती हों, वे कृपया यह नेत्र-स्नान क्रिया न करें। 1 लिटर पानी में 50gm त्रिफला, मिट्टी के बर्तन में रात को भिगोयें व प्रातःमसल कर छानकर नेत्र स्नान करें। अथवा हरी बोतल में रखें पानी से आँखें धोयें।

सूर्य स्नान सूर्योदय व सूर्यास्त की किरण का (Visible rays का) 5 मिनट तक बंद नेत्रों से धूप-स्नान लेना भी दृष्टिदोषों को दूर करने में सर्वोत्तम है। इसके बाद पॉमिंग व ठंडे पानी के छीटों द्वारा नेत्र स्नान करें। जल-नेति: नेत्रों की ज्योति व स्वास्थ्य के लिये यह सर्वोत्तम है। इसे सीखें व करें। सप्ताह में एक बार करना पर्याप्त है।आँखों के तथा गर्दन के विभिन्न व्यायाम सीखें व नियमित करें।

आसन : नेत्र रोगों को दूर करने में सर्वांगासन, योगमुद्रासन, हस्तपाद चक्रासन, शीर्षासन, भूमिपाद शिरासन आदि बहुत उपयोगी आसन हैं।
नियमित धूप स्नान, वायु स्नान, उषा: पान, व्यायाम, उपवास आदि से नेत्र जीवन भर आपका साथ निभायेंगे।

प्राणायाम : नाडी शोधन व भस्त्रिका प्राणायाम उपयोगी हैं। इन्हें सीखें व करें। त्राटक : किसी ज्योति बिंदु या काले बिंदु पर नेत्रों को स्थिर करें। पांच मिनट से प्रारम्भ कर 30 मिनट तक अभ्यास बढायें। इससे नेत्र ज्योति कई गुना बढ़ जाती है। सकारात्मक विचारों द्वारा मन-मस्तिष्क को स्वस्थ व तनाव मुक्त रखें।

प्रातः हरी घास पर नंगे पैर आधा घंटा टहलें तथा हरियाली दर्शन करें। रोज प्रातः व रात्रि में पावों के तलवों की तिल या सरसों के तेल से मालिश करें। मैले हाथों या गंदे कपड़े से आँखों को कभी पोछें या मलें नहीं। दाँतों के स्वास्थ्य व सफाई पर भी ध्यान दें। दाँत मजबूत होंगे तो नेत्र ज्योति भी तेज होगी। यथासम्भव ठण्डे जल से स्नान करें। नेत्रों हेतु लाभकारी है। सौंफ का बारीक चूर्णकर उसमें बराबर भाग मिश्री या चीनी पाउडर मिलाकर रख लें। रात्रि सोने से पहले एक चम्मच लें। यह नेत्र ज्योति के लिए उत्तम है।

यह सब उपाय करते हुए सकारात्मक चिंतन करना मुख्य अंग है। यह अनुभव सिद्ध बात है कि व्यक्ति जैसा सोचता है व करता है, वह वैसा ही बन जाता है। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शक्तियां अनंत है। वह इनका साधारणत: ६ से १०% ही उपयोग कर पाता है, शेष शक्तियां सुप्त पड़ी रहती है। इन शक्तियों के जागरण का प्रमुख आधार है सकारात्मक चिन्तन सकारात्मक चिंतन के अभ्यास की साधना सर्व साधनाओं है। सर्व साधनाओं का लक्ष्य है जीवन में सकारात्मक चितन का विकास। इसके बिना कोई भी साधना अधूरी ही कही जायेगी। निरंतर रचनात्मक कार्यों में लगे रहने का फल सदा शहद जैसा मीठा ही होता है। सर्व महापुरूष एवं जीवन के सर्व अनुभव हमें सकारात्मक व रचनात्मक चिन्तन की ओर ईशारा करते हैं। एक सकारात्मक चिन्तन वाला व्यक्ति यमराज का भी मुस्कराते हुए नए जन्म के रूप में स्वागत करता है, अंधकार की शिकायत करने के बजाय वह सितारों का आनंद लेता है। जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी वह करूणामय ईश्वर की करूणा एवं कल्याण के दर्शन करता है। वह नम्र व विनयशील अवश्य रहता है लेकिन कायर या निर्बल नहीं होता। वह आत्मबल से सम्पन्न एवं आत्मविश्वास से भरपूर होता है। वह मानता है कि संसार में कोई भी व्यक्ति, वस्तु, वैभव, परिस्थिति किसी को दु:ख व कष्ट नहीं दे सकते। अच्छी-बुरी सर्व परिस्थितियों को वह अपने ही पूर्व में बोये कर्म रूपी बीजों के फल मान सहर्ष स्वीकार करता है। कर्मफल धूप छाँव की तरह जीवन में आकर विदा हो जाते हैं, सकारात्मक चिंतनयुक्त व्यक्ति स्वयं साक्षी रहते हुए, जीवन रूपी नाटक के इन दृष्यों को देखते सदा हर्षित व रहता है।

सकारात्मक चिंतन का अभ्यास करते वह अखिल ब्रह्माण्ड के प्राकृतिक व शाश्वत सिद्धांतों, कर्मफल के अटल विधान तथा ईश्वरीय न्याय पर पूर्ण श्रद्धा व निष्ठा रखता है। वह सदा अपने विचारों को पवित्र, वाणी को शहद जैसी मीठी व रत्नों से अनमोल तथा कर्मों को श्रेष्ठ, दिव्य गुणों से महकता रखता है। धन्य हैं वे जो जीवन में सकारात्मक चिंतन का अभ्यास करते हैं। धन्य है वे माँ-बाप जो अपने बच्चों को सकारात्मक चिंतन के संस्कार विरासत में देकर जाते हैं। आइए! जीवन में सकारात्मक चिंतन के विकास हेतु हम आज से व अभी से ही प्रयास प्रारम्भ करें एवं इनके द्वारा जीवन में सच्ची सुख-शांति, आनंद, प्रेम की प्राप्ति हेतु श्रेष्ठ कर्मों के बीजों को बोयें।

सूर्य नमस्कार

सूर्य रश्मि चिकित्सा

सूर्य का महत्त्व समझाने के लिए हमारे धर्म ग्रंथों में अनादि काल से वर्णन है। परंतु एक बात पक्की है कि यह हमें प्राचीन समय से अपनी ओर आकर्षित करता आया है। हम पिछले युगों में जाएँ या आज के युग की बात करें, सूर्य हमेशा जीवनदायिनी ऊर्जा देता आया है। सूर्य के बारे में जानने के लिए आज का वैज्ञानिक दिन-रात एक कर रहे हैं, जबकि हमारे ऋषि-मुनि इसकी दिव्यता और उसका उपयोग करना भी जानते थे। सूर्य मात्र हमारे शरीर को ही नहीं हमारे सूक्ष्म शरीर को भी अपनी चैतन्य शक्ति से जीवंतता प्रदान करता है। वैज्ञानिक इसे आग का गोला कहें अथवा कोई ग्रह परंतु प्राचीन काल में ही इसके अनेक रहस्यों को हमारे मनीषियों ने समझ लिया था और उसका उपयोग करने
की कला को जन-कल्याण तक पहुँचाया था परंतु अब सूर्य का ज्ञान लुप्तप्राय है।

यहाँ पर हम थोड़ी सी चर्चा सूर्य के रहस्य को समझाने के लिए करना चाहते हैं, ताकि हम जब सूर्य नमस्कार करें तो हमारे मन में श्रद्धा, लगन और आस्था प्रकट हो और हम उससे लाभान्वित हो सकें।
पाठकगण शायद जानते हों कि बनारस में एक बहुत बड़े संत हुए हैं।
जिनका नाम था स्वामी विशुद्धानंद परमहंस और उनके शिष्य थे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचार्य गोपीनाथ कविराज। चूँकि कथानक काफ़ी विस्तृत है, अतः हम सिर्फ इतना बताना चाहेंगे कि उन्होंने हिमालय के किसी गुप्त आश्रम (ज्ञानगंज आश्रम) में जाकर 12 वर्ष की कठिन साधना की। इसके बाद सन् 1920 के आस-पास वापस बनारस आकर सूर्य विज्ञान का चमत्कार इस पूरे विश्व को बताकर आश्चर्यचकित कर दिया था। लोगों ने दाँतों तले अंगुलियाँ दबा लीं थीं। सैकड़ों शिष्यों के सामने वे सूर्य विज्ञान द्वारा एक वस्तु को दूसरी वस्तु में रूपांतरित कर दिया करते थे, जैसे कपास को वे फूल, पत्थर, ग्रेनाइट,हीरा, लकड़ी आदि कुछ भी बनाकर दिखा देते थे। यहाँ तक कि उन्होंने एक बार मृत चिड़िया को जीवित कर दिया था। यह आश्रम आज भी हिमालय में स्थित है। यह वृत्तांत लेखक पॉल वंटन की पुस्तक मे है। यह दृष्टांत बताने के पीछे यह उद्देश्य हैं की सूर्य के प्रति आपकी जिज्ञासा और आस्था बढ़े। ताकि हम उस सुर्य से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर सकें।

सूर्य नमस्कार की एक आवृत्ति में 12 स्थितियाँ हैं। प्रत्येक आसन का -अपना एक मंत्र है। प्रत्येक क्रिया का अपना एक लाभ है। हम तो इतना कहेंगे कि नया जीवन चाहिए, तो सूर्य नमस्कार कीजिए।
प्रतिदिन नियम से किया जाने वाला सूर्य नमस्कार अन्य व्यायामों की अपेक्षा ज्यादा लाभकारी है। सूर्य देव का वर्णन हम जितना करें, कम है। अतः हम सूर्य देव को नमस्कार करने की पद्धति का वर्णन करेंगे।
सूर्य नमस्कार करने का मुख्य कारण संभवतया उसके द्वारा जीवनदायिनी ऊर्जा मिलना और उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना रहा है। सूर्य में स्थापित अकृत्रिम प्रतिमा को या यूँ कहें कि सूर्यदेव को अर्ध्य समर्पित करने का प्रचलन आदिकाल से रहा है, जब इस भारत-भूमि के प्रथम चक्रवर्ती राजा भरत सूर्य में स्थित जिनालयों को नमस्कार किया करते थे। किन्हीं कारणों से इसका प्रचार-प्रसार अधिक नहीं हो पाया परंतु दक्षिण भारत के आचार्यों ने इसे आत्मसात् किया और इस विद्या को जीवंत रखा। जब वे शेष भारत के तीर्थों पर भ्रमण हेतु आते तो वहाँ भी नित्यकर्म में सूर्य नमस्कार करते थे। तीर्थ स्थानों की जनता उन्हें देखकर सूर्य नमस्कार की विधि का अनुसरण करती थी। इस प्रकार पुनः संपूर्ण भारत वर्ष में सूर्य नमस्कार का प्रचार-प्रसार हुआ।

शिवाजी महाराज को उनके गुरु समर्थ रामदास ने सूर्य नमस्कार की विधि सिखाई जिसका उन्होंने अभ्यास किया और परिणामस्वरूप उनका शरीर एवं चरित्र इतिहास में अद्वितीय है। शिवाजी महाराज ने अपने सैनिकों को सूर्य नमस्कार की विधि सिखाई और इस प्रकार सूर्य नमस्कार की विधि का प्रचार-प्रसार बढ़ा। ‘सूर्य नमस्कार’ के द्वादश आदर्श बीज मंत्र एवं क्रिया मंत्र होने के कारण बारह अंकों के सूर्य नमस्कार की वैज्ञानिकता बढ़ जाती है।

महत्त्व हमारे ऋषियों ने मंत्र और व्यायामसहित एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जिसमें सूर्योपासना का भी समन्वय हो जाता है। इसे सूर्यनमस्कार कहते हैं। इसमें कुल १० आसनों का समावेश है। हमारी शारीरिक शक्ति की उत्पत्ति, स्थिति तथा वृद्धि सूर्य पर आधारित है। जो लोग सूर्यस्नान करते हैं, सूर्योपासना करते हैं वे सदैव स्वस्थ रहते हैं। सूर्यनमस्कार से शरीर की रक्तसंचरण प्रणाली, श्वास-प्रश्वास की कार्यप्रणाली और पाचन प्रणाली आदि पर अधिक प्रभाव पड़ता है। यह अनेक प्रकार के रोगों के कारणों को दूर करने में मदद करता है। सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास से शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति के साथ विचारशक्ति और स्मरणशक्ति तीव्र होती है। पश्चिमी वैज्ञानिक गार्डनर रॉनी ने कहा: “सूर्य श्रेष्ठ औषध है। उससे सर्दी, खाँसी, न्यूमोनिया और कोढ़ जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।” डॉक्टर सोले ने कहा : “सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है उतनी संसार की अन्य किसी चीज़ में नहीं।”

आदित्य ह्रदय

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।

केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ।।



सवितृमण्डल के भीतर रहनेवाले, पद्मासन में बैठे हुए, केयूर, मकर कुण्डल, किरीटधारी तथा हार पहने हुए, शंख-चक्रधारी, स्वर्ण के सदृश देदीप्यमान शरीवाले भगवान नारायण का सदा ध्यान करना चाहिए।’ (आदित्य हृदय : १३८)

गायत्री मंत्र के भाष्य का विस्तार चार वेद हैं। वेद के हर एक मंत्र एक एक छंद ,ऋषि और देवता है। उनका स्मरण कर विनियोग करना आवश्यक है। इसी तरह गायत्री मंत्र के भी छंद गायत्री है, ऋषि विश्वामित्र, और देवता सविता है। सविता का अर्थ होता है “सुर्य”। गायत्री ही सुर्य की अधिष्ठात्री देवता हैं। सूर्य उपासना को ” सूर्य नमस्कार” के नाम से जाना जाता हैं। मानवी शरीर प्रकृति का अद्भुत वरदान है। इसी शरीर में मातृसत्ता का जागरण होता हैं। इस मातृभाव को हमे सहेज कर रखना होगा। इस शरीर को निरोगी रखना का हमारा परम कर्तव्य हैं। शरीर के भीतर मौजूद अनंत ऊर्जा को योग्य रूप देना होगा। सूर्य उपासना का अंतिम चरण सूर्य ध्यान होता हैं। जो गायत्री के उस मातृशक्ति को शरीर के उन अंगों पर स्थापित करना होता है। मातृशक्ति उपासना का श्रेष्ठ उदाहरण और क्या हो सकता हैं? सूर्य तेज अग्नि का प्रतीक है। ध्यान इस सुंदर प्रक्रिया में प्रकाश के तेजोवलय से समन्वय स्थापित करने पर ही गायत्री की पूर्णाहुति संपन्न होती है। यज्ञाग्नि में आहुति देने से गायत्री पुरश्चरण का अभिन्न अंग माना जाता है। सूर्य उपासना केवल कल्पना नहीं अपितु सविता और सावित्री को शरीर में स्थापित करने का अनोखा विज्ञान है। अग्नि तत्व का प्रतीक है “सूर्य देवता”, और चेतन का स्थूल रूप है “सविता”। इस सूर्य नमस्कार का मुख्य उद्देश है, इस जड़ शरीर के द्वारा चेतनात्मक प्रशिक्षण संस्कारो को जाग्रत करना है। ब्रम्ह तेज को सविता कहा जाता है। यह सविता शक्ति ब्रम्हाण्डीय चेतना का रूप हैं। यह प्रखर तेज सविता सर्वत्र व्याप्त है। उस परम शक्ति आत्मचेतना से घनिष्ठता साध्य करने के लिए प्रतीक रूप में सूर्यस्वरुप अग्निपिंड की उपासना अनिवार्य हैं। सूर्य उपासना यह ब्रम्ह तेज अवतरण की प्रक्रिया का वह बीज है, जिसे आत्मचेतना को दिव्य भूमि पर अंकुरित करना होता है। पृथ्वी को आत्मा और सुर्य को ब्रम्ह तेज की उपमा दी गईं है। पृथ्वी और सुर्य का समन्वय “सुर्य नमस्कार” साधना से ही संभव है। जिसे कुण्डलिनी विज्ञान में मूलाधार से चेतना सुषुम्ना मार्ग से होती हुई कपाल तक की जागरण प्रक्रिया है “सुर्य नमस्कार”। पृथ्वी पर जो जीवन का आधार है, वह केवल सूर्य की ऊर्जा से प्राप्त हुआ है। सूर्य इस जगत की आत्मा है।

जिस प्रकार से पृथ्वी पर सूर्य केंद्र से जीवनी शक्ति का वर्षाव होता है, वैसे ही आत्मारूपी इस शरीर पर ब्रम्ह तेज प्राण सत्ता का वर्षाव होता हैं, सुर्य नमस्कार से। इसी उपासना से अंतः करण शुद्धता होती हैं। इस में कोई संशय नहीं है। वह सुर्य शक्ति अर्थात् सविता, यहीं प्रत्यक्ष में “ब्रम्हतेज” हैं। शास्त्रोंकारो ने गायत्री सद्बुद्धि , रितंभरा प्रज्ञा की देवता है तो प्राण और सविता इसी प्रयोजन की पुर्तता करते है। शास्त्र वचन में इसे त्रिकोण भूमिति जैसा सम्बध जताया है।

“यो वै सः ऐषा सा गायत्री”।

शतपथ (1/3/5/15)

जो प्राण हैं वही “गायत्री” अंतः चेतना है।

“प्राण एव सविता विद्युदेव सविता”

शतपथ (7/7/9)

प्राण भी सविता है, विद्युत भी सविता है।

यहा कुछ समझने वाली बात यह हैं , की सविता अर्थात तेज भौतिक अग्नि वा प्रकाश यह तो हैं, इसका मुख्य उद्देश है, अंतः चेतना ब्रम्हतत्व स्वरूप हैं। सविता के उस परम तेजस्वी तेज ब्रम्ह तत्त्व के शिवाय और दूसरा कोई तेज नही हो सकता है। यही चेतना रूपी प्रकाश सविता सूर्य विश्व जीवन के ज्ञान का केंद्र माना जाता हैं, साथ ही साथ भौतिक विज्ञान का भी केंद्र यही हैं। इसकी धारना करना मुनष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन है। चार वेद में जो मंत्र,ऋचा आदि हैं वह अंतः चेतना सविता शक्ति का विवेचन ही हैं। सूर्य उपासना, सुर्य नमस्कार यह तप साधना हैं। तपग्नी के साथ श्रद्धा का अनोखा स्थान इस उपासना को संपन्न बनाते हैं। यही सविता देवता सब के उपास्य, लक्ष्य और इष्ट हैं। जो प्रत्येक श्वास से मित्र बनकर कुंभक में हिरण्यगर्भ का दर्शन मेरुदंड में चेतना का संचार होकर आदिदेव भास्कर को नमन कर रेचक श्वास के साथ अपनी प्रतीति प्रदान कराता है। इसके लिए पुरुषार्थ का अनोखा जोड़ अनिवार्य है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने सविता देवता की उपासना पद्धति का वर्णन किया है। सूर्यध्यान में अवर्णित भाव को पल्लवित किया है, “मैं ओमकार स्वरूप भगवान को नमस्कार करता हूं। हे भगवान! आप समस्त विश्व की आत्मा और काल स्वरूप हो। समस्त प्राणी चर अचर में आपका ही निवास हैं। यह सुंदर भाव भगवान को अर्पित किए है।

सूर्य उपासना

यही सूर्य देवता असमान्य रहस्यमय शक्ति का उपयोग यंत्र के माध्यम से उपभोग लिया जा रहा है। अपारंपरिक ऊर्जा का स्रोत के रूप में इस ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा हैं। यह केवल ऊर्जा का ही नहीं अपितु अनेक शक्तियों का भण्डार है। जिसमे भौतिक विज्ञान के light theropy और ultra sound theropy ( मंत्र विज्ञान ) का ज्ञान समाया है। अगणित जीवनीशक्ति को निरोगी जीवन जीने के लिए महत्व पूर्ण है। इस का संपर्क संबंध स्थापित करके सानिध्य प्राप्त कराने में सक्षम हैं। यह शक्ति भौतिक प्रयोजन अंतः विकास गायत्री शक्ति कहलाती हैं। सुर्य नमस्कार का यह चक्र उस धन्यवाद के भाव को प्रज्वलित करता है जो,

नमस्ते देवी गायत्री , सावित्री त्रिपदेक्षरे

        (वशिष्ठ संहितार्थ वांत्रिक)

यह तीनों पदों की गायत्री , सावित्री देवी तुम्हे नमन।

यह सुर्य उपासना की अलग अलग श्वास पूरक , रेचक से लेकर भिन्न भिन्न शारिरिक स्थितिया वैज्ञानिक आधार हैं। नमस्कारासन से भुंजगासन से हस्तोतादासन अन्य अनेक योगासन की दिव्य श्रृंखला षटकुक्षी है। षटकुक्षी का अर्थ होता हैं , षटचक्रों का जागरण। सुर्य उपासना सुर्य नमस्कार से शरीर के भीतर के शक्ति केंद्र का जागरण होता हैं। मां कुण्डलिनी षटचक्रों का भेदन करती ब्रम्हारंध्र में गमन करती है। इस लिए यह षटकुक्षी का द्वार कहा जाता है। मंत्र के साथ जब यह साधना 12 अंगों में पूर्ण की जाती है तो, प्राण शक्ति का उत्थापन इस विद्या के द्वारा किया जाता है। इन्ही मंत्रो में प्राणशक्ति अभिभूत है। परिणामी साधक जब सिद्धि मार्ग पर अग्रसेर होता है, तो परब्रम्ह महाप्राण वह अपने वह अपने शरीर में अंतः करण में धारण करने की विधि है सुर्य नमस्कार। जब यह महाप्राण शरीर क्षेत्र में अवतरित होता हैं तो, साधक को आरोग्य, आयुष्य तेज ,ओज, बल, पराक्रम पुरूषार्थ प्राप्त होता हैं। मन क्षेत्र में उत्साह , स्फूर्ति, प्रफुल्लता ,साहस , एकाग्रता, स्थिरता , धैर्य, संयम इ. दिव्य गुणों का साक्षीदार बनाता है। परमात्मा का प्रधिनिधि सम्मान साधक को प्राप्त होता है। यही आत्मकल्याण ध्येयप्राप्ति का राजमार्ग है। सुर्य उपासना साक्षात महाप्राण को साधना ही है, यही सर्वत्र चर अचर हैं।