Sanskrit:- The language of God

A celestial sounds

If we look at the science of ancient India, then there is a grand vision of the vast culture of India. The education which teaches us and makes us aware, they are as follows,

Survey Bhavantu Sukhin Survey Santu Niramaya

This higher education is coming only and only from the Vedic period. If we look at the human body, it is an invention of an amazing structure.
Whatever research has been done outside, the same research is done in the human body. If you look at this body, then this creation has originated from sounds. The human body has been created out of Beej Mantras. According to the word Brahma, all the subtle and gross things in the world have all originated from sound. It is believed in the Yoga Sutras that there are 50 basic sounds in this world, the rest of the sounds have originated from these 50 sounds. These basic sounds are also called mantras.

Sanskrit and energy

After studying these mantras in their meditative state, the sages have created a language based on phonetic principles. Which is famous by the name Sanskrit. Sanskrit is such a language, in which human’s throat, teeth, tongue, The original form of all the sounds coming out of the lips and palate can be written in words and can also be heard. It is not possible to do this in any other language of the world. There are a total of 51 characters in the Sanskrit language, which are written in the Brahmi script. This ability is of this language, which is due to the alphabet made on a scientific basis. When one purely recites Sanskrit, there is a full of energy effect on the body of that person. Not only this, but it also has a subtle effect on those who listen to the pure pronunciation of this language. is reputed. The Vedas have the highest place. The person who listens to the original texts of Veda Purana, Ramayana, Gita, then its effect has been seen on his body. Educated in Banaras. Madonna says that, after learning this language’s pure pronunciation, she felt like this, after teaching Sanskrit, she developed the power of hearing.

Sorry, today Sanskrit language is not recognized as much as English. Sanskrit was the national language of the whole of India during ancient times, later it disappeared. According to a survey, the number of people who speak and understand Sanskrit in India is only 10 to 12 thousand people. Many kinds of research have been done in Germany to make the Sanskrit language alive. This is the need in India also. Indians living in America have started teaching the Sanskrit language thereby opening an institution of Sanskrit in New Jersey city.

Some interesting facts about the Sanskrit language.

Knowing these 20 facts about Sanskrit, you will be proud to be an Indian. Today we are telling you some such facts about Sanskrit, which will make any Indian proud.

  1. Sanskrit is considered the mother of all languages.
  2. Sanskrit is the official language of Uttarakhand.
  3. Sanskrit was the national language of India before the Arab intervention.
  4. According to NASA, Sanskrit is the clearest language spoken on earth.
  5. Sanskrit has more words than any other language in the world. At present, there are 102 billion 78 crores 50 lakh words in the Sanskrit dictionary.
  6. Sanskrit is a wonderful treasure trove for any subject. For example, there are more than 100 words in Sanskrit for the elephant itself.
  7. NASA has 60,000 written on palm leaves in Sanskrit. There are manuscripts on which NASA is researching.
  8. In July 1987, Forbes Magazine considered Sanskrit as the best language for computer software.
  9. In Sanskrit, the sentence is completed in the least number of words as compared to any other language.
  10. Sanskrit is the only language in the world that uses all the muscles of the tongue to speak.
  11. According to American Hindu University, a person who talks in Sanskrit will be free from diseases like BP, diabetes, cholesterol etc. By talking in Sanskrit, the nervous system of the human body is always active so that the person’s body has a positive charge. Activates with (Positive Charges).
  12. Sanskrit is also helpful in speech therapy, it increases concentration.
  13. People of Muttur village in the Karnataka state of India speak only in Sanskrit.
  14. Sudharma was the first Sanskrit newspaper, which was started in 1970. Its online version is still available today.
  15. There is a demand for a large number of Sanskrit speakers in Germany. Sanskrit is taught in 16th universities in Germany

Sanskrit is a language of the future.

According to NASA scientists, when they used to send messages to space travellers, their sentences were reversed. Because of this, the meaning of the message itself changed. He used many languages but every time the same problem came. Finally, he sent the message in Sanskrit because Sanskrit sentences do not change their meaning even when they are reversed. like,

Aham Vidyalaya Gachami.
Schools are important.
Gachhamiyah School.

There is no difference in the meaning of the above three. You will be surprised to know that the method of solving maths questions by computer i.e. Algorithms is made in Sanskrit and not in English. The 6th and 7th Generation Super Computers being built by NASA scientists will be based on the Sanskrit language which will be ready by 2034. Learning Sanskrit sharpens the mind and increases the power of memorization. Therefore, in many schools in London and Ireland, Sanskrit has been made a Compulsory Subject. At present, Sanskrit is taught in technical education courses in at least one university in more than 17 countries of the world.

You will be proud to study Sanskrit.

Shiv Sutra : Power to choose !!

शुक्लं यजुर्वेद के रुद्राष्टाध्यायी सुत्र में उल्लेख है,
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु

इस सुत्र को हमे समझना होगा, शाब्दिक अर्थ को तो आप जानते ही होंगे। पर इस सुत्र को महाशिवरात्री के शुभ अवसर पर जिवन में पिरोना होगा। यह सुत्र हमे बताता है, और सिखाता है,अगर आप किसी हाथी पर बैठना चाहते हो तो उस हाथी के संपर्क में आपको आना होगा उसे सिखाना होगा। अगर आपके जिवन मे वह गुरु शक्ती नहीं है। तो आप उसे शिक्षा के पाठ पढ़ा सकते हैं, परंतु समय आने पर वह हाथी आपको पटक देना! अगर गुरु है, संकल्प है तो आप अवश्य विजयी होंगे। यह हाथी का संदर्भ मन से है। यही शिव सूत्र हमे ज्ञान प्रदान करता है।

यह सुत्र सिखाता है, हमारा मन शुभ संकल्प से युक्त हो। संकल्प शक्ती बहुत प्रचण्ड है। इसी सृष्टी का निर्माण भी संकल्प शक्ती के द्वारा ही हुआ है। कोई भी शुभ कार्य करने से पहले संकल्प का आव्हान होता है। फिर वह संकल्प शक्ती उस कार्य में अपने प्राण शक्ति का हुंकार करती है। अगर मन मे संशय है तो, संकल्प शक्ती कमजोर होती है। और कार्य अपूर्ण होता है। संकल्प शक्ती के व्दारा मनुष्य मे बड़े स्तर पर उत्साह, धैर्य, का आगमन होता है। संकल्प शक्ती दृढ़ संकल्प में परिवर्तित होती है। दृढ़ संकल्प की अदभुत शक्ती निश्चिय की सवारी पर सवार होती हुई अपने परम लक्ष्य तक पहुंचती है, इसलिए मन स्थिर, और एकाग्र रखना महत्वपूर्ण हैं। यही मन चुनाव करता है, की आप चाहते क्या हो? भगवान शिव शिवरात्रि की आराधना हमे जीवन को योग्य दिशा सिखाती है।

एकाग्रता की दिव्य ऊर्जा से से संकल्प शक्ती दृढ़ होती जाती है। मन अगर अस्थिर है, तो आप लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते हैं। यहाँ योग दर्शन के वह सूत्र का आधार लेना आवश्यक होता है,

अभ्यासवैराग्याभ्याम् तन्निरोध” अभ्यास और वैराग्य से चंचलता को कम कर सकते हैं, अर्थात अच्छी चिजो के अभ्यास की हमे तैयारी करनी होगी। इस मन को योग्य अभ्यास में लगाना होगा। आज कि परिस्थिती कुछ अलग है। हमने अपने मन को नकारात्मक चीजों मे लगाया है। मन को अभ्यास हुआ है, डिप्रेशन, छोटी असफलता पर शोक करना, रोगी बनना। इसी कारणवश जिवन को देखने का दुष्टीकोन नैराश्य लेकर आता है। जिवन रोगी बनता व्यतिथ होता है। हर कर्म असफलता को प्राप्त होता है। इस लिए हमे अपने मन पर काम करना होगा। उसे योग्य अभ्यास में लगाना होगा। संकल्प शक्ती को हमें उच्च रखना होगा। यही संकल्प शक्ती आपको “तीव्रसंवेगामासन्न” से आप लक्ष्य को जल्दी वेग पूर्ण गति के साथ हासिल कर सकते हो। असामान्य परिस्थितीयो मे भी मन घबराने नही लगेगा। विलक्षण प्रयत्नो के जोड़ से हम अपनी यात्रा पुर्ण करने में सफल होंगे। प्रयासो से क्रांती आने में विलंब नहीं है। महामना मालवीय जी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए कृत संकल्पित थे। इसी संकल्प का परिणाम स्वरूप आपके सामने हैं, यही विश्वविद्यालय संपूर्ण जगत्‌ मे अपनी पहचान लेकर खड़ा है।

संकल्प शक्ति के आधार पर आप बड़ी से बड़ी चट्टानों को पार कर सकते हो। अर्थात् जीवन की समस्या आपको रोक नहीं सकेगी। अगर संकल्प शक्ति कमजोर है तो, यह स्वयं ही सर्वनाश है। मनुष्य का आध्यात्मिक जिवन और विकास इसी संकल्प शक्ती पर आधारित है। यही आत्मनिर्भर होने का राजमार्ग है। आध्यात्मिक उपलब्धी भी उस मनुष्य से दूर नहीं।

अथर्व वेद मे यही आशय पर आधारित सूत्र है,
यो वः शुष्पो हृदयेष्वंतराकृतिर्या वो मनसि प्रविष्टा । तान्त्सीवयामिहविषाघृतेन मयि सजाता रमतिर्वो अस्तु ॥

हृदय का बल और मन की संकल्पशक्ती अगर एक दिशा में आगे बढ़े तो आपको आपके परम् लक्ष्म पाने में सफलता ही प्राप्त होंगी। इसी संकल्पशक्ती के आधार पर व्यक्ती, जाती, और संस्कृती अजेय बनती जाती है। जीवात्मा से परमात्मा की यात्रा का सुगम अवसर की प्राप्ती होता है। “यथा पिण्डे तथा ब्रम्हाण्डे” । पिण्ड मे ब्रम्हाण्ड समाया है। पिण्ड का अर्थ होता शरिर, स्थुल शरिर और सुक्ष्म शरिर। ब्रम्हाण्ड का मतलब होता है “अनंत”। यह अनंत की सत्ता बाहर नहीं हमारे भीतर है। यह वो साक्षी काल होता, जो रात्रि काल भी शिव के अलंकार से श्रृंगार किया करती हैं । काल भी शिव उपासक बनकर शिव ही शिव को जपता चला जाता है, शान्ति और शक्ति का अदभूत मिलन का वह पर्व है, ‘महाशिवरात्री ”। चेतना विकास का यह अदभुत संगम है, जिसमे शांति, तेज और शक्ति संचार होता हैं।

यही जीवात्मा वह द्वार बनता जो रास्ता आपको परम् शिव तक आपको पहुंचाता है। यहां तक पहुंचने के लिए आपको जरूरत होती है, दिशा का चुनाव करने की। चुनाव करना अर्थात् “मन”। यही मन सबसे महत्वपूर्ण है, और शक्तीशाली भी। इसी मन के व्दारा मनुष्य अपनी इच्छा, संकल्प को साकार करता हैं। अर्थात पूर्ण करता है। मन शक्ती आपको (आत्मा) को इच्छाओं ‍मे जकड़ कर रखती है। हमारा जीवन इसी भ्रम जाल मे जकड़ा रहता है। अविद्या का उद्गम यहाँ से शुरू होता है। वृत्तीयाँ भी शुरू होती है। इसी लिए हमारा स्वरुप वृत्ति के सामान एक रुप होता है। इसलिए महर्षि पतंजलि सूत्र का आधार देकर सूत्र बताते है”

वृत्तिसारुप्यमितरत्र’ सा होता है। हम माया के जाल में फँसते चले जाते हैं। इसलिए महत्वपूर्ण है, मन पर नियंत्रण अथवा चंचलता को क्षीण करना। यहाँ आपको समझना है, श्वास का सबन्ध मन से होता है, और मन का सीधा संबन्ध संकल्प से होता है। संकल्प शक्ती आत्मा की शक्ती कही जाती है, संकल्प से युक्त मनुष्य सत्य का आचरण कर आत्मा तक साधना के माध्यम परम् गति को प्राप्त होता है। पुर्णत्व का दिव्य अनुभव साधक को प्राप्त होता है। श्रद्धा साधक की मानस अलंकार होती हैं

संशयात्मा विनश्यति”
जिसका मन संशय रूपी असुर से ग्रसित है, वह मनुष्य दृढ़ संकल्प को छू नहीं सकता। इसी में अपना विनाश को पात्र होता चला जाता है।

सामान्य मनुष्य काम को पूर्ण करने के लिए अपने 100% नही लगाता। अर्थात् मन लगाकर वह कार्य नही करता है। काम को पूर्ण करने में वह अपनी चंचलता का प्रदर्शन करता है। यही कारण है, उसके जिवन मे निराशा, निरुत्साह, असफलता आती है। यही नकारात्मकता की जड़ है। यही निराशा विचारों को नकारात्मक पोषण देती है। इसी आधार पर जीवन की दिशा धारा तय होती है। इसके विपरित आप अगर हर एक कार्य को अपने 100% लगाकर करते हो तो आपको सफलता मिलेगी। इसके साथ आपमें स्विकार करने की शक्ती का विकास होता है। आपका हर एक कार्य जागृती के साथ पूर्ण होता है। कार्य की गती, उत्साह को आप अनुभव कर सकने में समर्थ होंगे।

सर अडयार ने एक सिद्ध योगी से संबन्धीत अपनी किताब में लिखा है, उन दिव्य आत्मा का नाम स्वामी गोविन्ददेव था। जब इन्होंने जल से भरा हुआ घडे को आदेश दिया, उस आदेश का पालन करने के लिए वह मिट्टी का घडा जमिन से देड़ फुट तक उपर उठाता। एक समय गालव महर्षि जी के आश्रम मे अकाल पड़ा और उनके शिष्य प्यास से व्याकुल हो गए थे। इस दशा को देखने और समझने बाद महर्षि ने वहाँ के पर्वत को जल को देने का आदेश दिया। तभी वह पर्वत मे से उसी क्षण से एक जल धारा उत्पन्न हुई है।

यह पावन तपोस्थली राजस्थान के जयपुर शहर के पास गलताजी नाम से प्रख्यात है। चित्रकुट पर्वतीय श्रृंखला में महर्षि अत्री जी और उनकी भार्या अनुसया माता जी के आश्रम मे विपरित समय था। कही पर भी पीने के लिए पानी नहीं था। उस समय मे तपोनिष्ठ अत्री महर्षी आश्रम मे उपस्थित नहीं थे। पर उनकी पत्नी माँ अनुसया जी ने अपनी संकल्पशक्ती और तप के बल पर माँ गंगा का ‘आव्हान किया, तभी माँ गंगा का अवतरण हुआ। यह केवल आध्यात्मिक चमत्कार नही है। भौतिक शरिर के स्तर पर संकल्प शक्ती के बल पर अनेको चमत्कार सिद्ध हुए है। झारखंड के गहलौर का रहने वाला ‘दशरथ मांझी ने पहाड़ को खोदकर अपना रास्ता बनाया था। इस काम को पूर्ण करने के लिए उसे 22 साल लगे थे। यह कार्य केवल संकल्पशक्ती का कमाल है।

शिव तत्व : शिवो भूत्वा शिवं यजेत्”

शिव नाम परमात्मा का है (शिवु कल्याणे) इस धातु से ‘शिव’ शब्द सिद्ध होता है। ‘बहुल-मेतन्निदर्शनम्’= [धातुपाठे चुरादिगणे] इससे ‘शिवु’ धातु माना जाता है, “यः मङ्गल-मयो जीवानां मङ्गलकारी च सः शिवः”= जो [स्वयं] कल्याणस्वरूप [है] और [सबके] कल्याण का करने वाला है, इसलिये उस परमात्मा का नाम ‘शिव’ है । महाशिवरात्रि पर्व भगवान् शिव की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध है। शिव का अर्थ होता है-शुभ, भला। शंकर का अर्थ होता है- कल्याण करने वाला । निश्चित रूप से उन्हें प्रसन्न करने के लिए मनुष्य को उनके अनुरूप ही बनना पड़ता है। सूत्र है- “शिवो भूत्वा शिवं यजेत्” अर्थात्- शिव बनकर शिव की पूजा करें, तभी उनकी कृपा प्राप्त हो सकती है। यह भाव गहराई से साधकों को हृदयंगम कराया जा सके तथा शिव की विशेषताओं का सही रूप उनके ध्यान में लाया जा सके, तो वास्तव में साधना के आश्चर्यजनक परिणाम मिलने लगें।

भगवान शिव के प्रति जनसाधारण में बहुत आकर्षण है; किन्तु उनके सम्बन्ध में भ्रांतियाँ भी खूब हैं, इसलिए शिव की साधना के नाम पर ही भ्रांतियां होते रहते हैं। शिवरात्रि पर्व पर सामूहिक आयोजन के माध्यम से फैली हुई भ्रांतियों का निवारण करते हुए शिव की गरिमा के अनुरूप उनके स्वरूप पर जन आस्थाएँ स्थापित की जा सकती हैं। ऐसा करना व्यक्तिगत पुण्य अर्जन और लोककल्याण दोनों दृष्टियों से बहुत महत्त्व रखता है। शिव का अर्थ है- शुभ, शंकर का अर्थ है- कल्याण करने वाला।

शुभ और कल्याणकारी चिन्तन, चरित्र एवं आकांक्षाएँ बनाना ही शिव आराधना की तैयारी अथवा शिव सान्निध्य का लाभ है। शिवलिंग का अर्थ होता है शुभ प्रतीक चिह्न-बीज । शिव की स्थापना लिंग रूप में की जाती है, फिर वही क्रमशः विकसित होता हुआ सारे जीवन को आवृत कर लेता है। शिवरात्रि पर साधक व्रत-उपवास करके यही प्रयास करते हैं। शिव अपने लिए कठोर दूसरों के लिए उदार हैं। यह अध्यात्म साधकों के लिए आदर्श सूत्र है। स्वयं न्यूनतम साधनों से काम चलाते हुए, दूसरों को बहुमूल्य उपहार देना, स्वयं न्यूनतम में भी मस्त रहना, शिवत्व का प्रामाणिक सूत्र है।

नशीली वस्तुएँ आदि शिव को चढ़ाने की परिपाटी है। मादक पदार्थ सेवन अकल्याणकारी है; किन्तु उनमें औषधीय गुण भी हैं। शिव को चढ़ाने का अर्थ हुआ- उनके शिव-शुभ उपयोग को ही स्वीकार करना, अशुभ व्यसन रूप का त्याग करना। ऐसी अगणित प्रेरणाएँ शिव विग्रह के साथ जुड़ी हुई हैं। त्रिनेत्र विवेक से कामदहन, मस्तक पर चन्द्रमा मानसिक संतुलन, गंगा-ज्ञान प्रवाह, का उपयोग विवेकपूर्वक प्रेरणा प्रवाह पैदा करने में किया जा सकता है।

महाभारत में भगवती में देवी उमा व भगवान् शिव के संवाद भीष्म जी ने शर शैय्या पर पड़े हुए युधिष्ठिर को सुनाए थे, उनमें से एक प्रसंग हम उद्धृत करते हैं,

उमोवाच,

भगवन् भगनेत्रघ्न मानुषाणां विचेष्टितम्।

सर्वमात्मकृतं चेति श्रुतं मे भगवन्मतम् ।।

लोके ग्रहकृतं सर्वं मत्वा कर्म शुभाशुभम् ।

तदेव ग्रहनक्षत्रं प्रायशः पर्युपासते।।

एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि

अर्थात् भगवती उमा जी भगवान् महादेव जी से पूछती हैं, भगवन्! भगनेत्रनाशन! आपका मत है कि मनुष्यों की जो भली-बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनी का फल है। आपके इस मत को मैंने अच्छी तरह सुना; परंतु लोक में यह देखा जाता है, कि लोग समस्त शुभाशुभ कर्मफल को ग्रह जनित मान कर प्रायः उन उन ग्रह नक्षत्रों की आराधना करते रहते हैं। क्या उनकी यह मान्यता ठीक है? देव! यही मेरा संशय है। आप मेरे इस संदेह का निवारण कीजिए। इसपर भगवान् महादेव शिव जी उत्तर देते हैं,

श्रीमहेश्वर उवाच,

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वविनिश्चयम् ।।

नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव शुभाशुभनिवेदकाः।

मानवानां महाभागे न तु कर्मकराः स्वयम् ।।

प्रजानां तु हितार्थाय शुभाशुभविधिं प्रति ।

अनागतमतिक्रान्तं ज्योतिश्चक्रेण बोध्यते ।।

किंतु तत्र शुभं कर्म सुग्रहैस्तु निवेद्यते ।

दुष्कृतस्याशुभैरेव समवायो भवेदिति ।।

केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोति शुभाशुभम् ।

सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादे ग्रहा इति ।।

देवि! तुमने उचित संदेह उपस्थित किया है। इस विषय में जो सिद्धांत मत है, उसे सुनो। ग्रह और नक्षत्र मनुष्यों के शुभ और अशुभ की सूचनामात्र देने वाले हैं। [किंतु वास्तव में] ग्रह स्वयं कोई काम नहीं करते हैं। प्रजा के हित के लिए ज्यौतिष चक्र के भूत और भविष्य के शुभाशुभ फल बोध कराया जाता है। किंतु वहां शुभ कर्मकर्मफल की सूचना शुभ ग्रहों द्वारा प्राप्त होती है और दुष्कर्म के फल फल की सूचना अशुभ ग्रहों द्वारा ग्रहों ने कुछ किया है” – यह कथन लोगों का प्रमादि और दोष पूर्ण है। मात्र है। केवल ग्रह नक्षत्र शुभाशुभ कर्मफल को उपस्थित नहीं करते हैं अपितु सारा अपना ही किया हुआ कर्म ही शुभाशुभ फल का उत्पादक होता है।

[महाभारत शान्तिपर्व, अध्याय 145]

ॐ अमंगलानां शमनं, शमनं दुष्कृतस्य च ।

दुःस्वप्ननाशनं धन्यं, प्रपद्येऽहं शिवं शुभम्।।

अशुभ तत्त्वों का भी शुभ योग सम्भव है। कुछ ओषधियों में मादकता और विषैलापन भी होता है, उसे व्यसन न बनने दें। औषधि प्रयोग तक उनकी छूट है। व्यसन बन गये हों, तो उन्हें छोड़ें, शिवजी को चढ़ाएँ। संकल्प करें कि इनका अशिव उपयोग नहीं करेंगे। भीतर के दोषों को आज समय है उनका त्याग करने का। आज संकल्पित हो जाए, अशुभ का त्याग करने के लिए। इस महाशिवरात्री के दिव्य समय पर हमे दिक्षीत होना है। आगे बढ़ना है। शिक्षीत होकर साधना का रास्ता चुनकर जिवन को दिशा देने का यह समय है। इस समय पर ख़ुद को जकड़ो मत! आप जैसे हो? जहां हो? सब भगवान शिव को अर्पित करो! खुद को खोलने का यह समय है। जिस प्रकार एक बुंद सागर मे जिस प्रकार मिल जाती है। उसी प्रकार उस बुंद मे भी सागर मौजूद है। पर एक बुद भी उस विशाल सागर का बीज तो है। आप में भी उस अनन्त सत्ता का बीज है। आप भी उस शक्ती से परिपूर्ण हो। आप संपन्न हो। आप पुत्र हो उस अनंत सत्ता के!

यह शिवरात्री के पावन अवसर पर आदियोगी शिव हमे समझाते है, मै सर्वत्र हुँ। मेरे से सभी उत्पन्न है, और मैं प्रलय कर्ता हूं। इस शिवरात्री की पावन वेला जुड़ जाओ अपने महादेव के साथ। हर भीतर जाती हुई श्वास शिव है, तो बाहर नीकलती हुई श्वास शिव है यह समर्पन का महुर्त अपने महादेव का ही है। आपकी श्वास शिव हैं। आपका विचार शिव भी। आपका शरिर भी शिव। आपका भीतर का कण-कण शिव! स्वयं को पूर्ण शक्ती से शिव में अर्पित करना और भावना रखना शिव मेरे साथ है। वह चन्द्रशेखर आदि गुरू शिव के ज्ञान को स्वयं के पिण्ड ब्रम्हांड में प्रतिष्ठीत होता हुआ देखो इसलिए आप दिव्य हो । इस महाशिवरात्री के पावन अवसर पर एक दिव्य संकल्प व्रत धारी बनो। यही युगसुष्टा का आवहान है।

A latent light

।। तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः।।

हमारा जीवन जीने के लिए अन्न और जल जितना महत्व पूर्ण है, उतना ही महत्व पूर्ण है, वायु। क्या हम सिर्फ वायु के सहारे जिंदा रह सकते है क्या ? बिल्कुल ही नहीं। हम शरीर में नासिका के द्वारा वायु खींचते है, नही! बल्कि नासिका रंध्र से वायू के साथ प्राण तत्व भी भीतर जाता है। इसी प्राण तत्व के आधार पर ही शरीर अपनी संपूर्ण गतिविधियां पूर्ण करता है। हमारा जीवन अन्न और जल पर ही आश्रित नही हैं। शरीर के भीतर गई हर एक श्वास के साथ यह प्राण शक्ति हमारा साथ देती है। प्राण शक्ति चैतन्य रूप में उभरती है। यही शक्ति कुण्डलिनी स्वरुप धारण कर कपाल भेदन करती हुई परम गति को प्राप्त होती है। इसी लिए महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के चतुर्थ पाद में प्राण के विस्तार को ही प्राणायाम कहा है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणशक्ति में वृद्धि होती है। प्राणशक्ति का स्वरुप महर्षि पतंजलि जी ने सूत्र देकर प्रकाश डाला है। अथर्व वेद के प्राण सूक्त में प्राण की महिमा बताई है।

जो हमारे वायु मंडल में ऋण आवेषित कण होते है वह कण भीतर जाती हुई वायु के माध्यम से रक्त में प्रवेश करता है, यह श्वसन प्रक्रिया का एक अंग है। यही माध्यम हैं विजातीय द्रव्य को बाहर फेंकने का। परंतु प्राणायाम यह नहीं है, डीप ब्रीदिंग (गहरा श्वास-प्रश्वाँस लेने की प्रक्रिया) प्राणायाम है। प्राणायाम जानने से पूर्व ‘प्राण’ शब्द को जानना होगा। संस्कृत में ‘प्राण’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से हुई मानी जाती है। अन् धातु-जीवनी शक्ति चेतना वाचक है। इस प्रकार ‘प्राण’ शब्द का अर्थ चेतना शक्ति होता है। प्राण और जीवन प्रायः एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। प्राणायाम शब्द के दो खंड हैं एक ‘प्राण’ दूसरा ‘आयाम’ है। प्राण यहां जीवन तत्त्व हैं, और आयाम का अर्थ है विस्तार। प्राण शब्द के साथ प्राण वायु जोड़ा जाता है। तब उसका अर्थ नाक द्वारा साँस लेकर फेफड़ों में फैलाना तथा उसके ऑक्सीजन अंश को रक्त के माध्यम से समस्त शरीर में पहुँचाना भी होता है। यह प्रक्रिया शरीर को जीवित रखती है। अन्न और जल के बिना कुछ समय तक गुजारा हो सकता है, परंतु साँस के बिना तो दम घुटने से कुछ समय में ही जीवन का अंत हो जाता है। प्राण तत्त्व की महिमा जीवन धारण के लिए विराट की संकल्पना है।

प्रणायाम पूरे अष्टांग योग का ही प्राण है। प्राण वह ऊर्जा है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। क्युकी यही ऊर्जा सब प्राणी, वनस्पति यो में सुक्ष्म और सशक्त रूप में पाई जाती हैं। जीवधारियों की जड़ और चेतन का‌ समन्वित रुप एक ज्ञान है, और दूसरा क्रिया है। दोनों को ही गतिशील रखने के लिए संव्याप्त प्राण ऊर्जा से पोषण मिलता है। इसी आधार पर जीवधारियों का अस्तित्व है। प्राण शक्ति की गरिमा सर्वोपरि होने और उसी के आधार पर निर्वाह करने के कारण जीवधारियों को, प्राणी कहते हैं। प्रकृति अनुदान के रूप में हर प्राणी को मात्र उतनी ही प्राण ऊर्जा देती है, जिससे वह अपने जीवित और गतिमान रह सके। इसके अतिरिक्त यदि किसी को कुछ महत्त्वपूर्ण प्राप्त करना होता है, तो उसके लिए उसे विशेष पुरुषार्थ करना पड़ता है। उसे संकल्प बल से ब्रह्मांड चेतना में से प्राण ऊर्जा की अभीष्ट मात्रा प्रयत्न पूर्वक खींचनी पड़ती है और साँस के सहारे जिस तरह ‘ऑक्सीजन’ समस्त शरीर में पहुँचाई जाती है, उसी प्रकार वह प्राण ऊर्जा की अतिरिक्त मात्रा भी पहुँचानी पड़ती है। इस प्रकार योगशास्त्रानुमोदित विशेष क्रिया-प्रक्रियाओं द्वारा उस अतिरिक्त प्राण को अभीष्ट अवयवों एवं संस्थानों तक पहुँचाना पड़ता है, प्राण में निहित ऊर्जा, ओज, तेज, वीर्य और जीवनदायनी शक्ति। वही आयाम है, विस्तार, फैलाव, अवरोध या नियंत्रण। अंतः प्राणायाम का अर्थ हुआ है, प्राण अर्थात् श्वसन का विस्तार, और फिर उसका नियंत्रण।इस प्रकार ऊर्ध्वगति प्राप्त होकर आध्यात्मिक प्रयोजन पूर्ण होता है।

सृष्टि में जो चैतन्यता है, उसका बीज ही प्राण है। यही प्राण तत्व सृष्टि में गतिमान हो रहा है। यही संसार की उत्पत्ति का कारण है। समस्त सृष्टि कल्प के आदि और अंत में आकाश रूप में परिणति हो जाती एवं सभी शक्तियाँ प्राण में ही विलीन हो जाती हैं। नई सृष्टि उत्त्पति में प्राणत्व ही अभिव्यक्त होकर विभिन्न संरचनाओं के रूप में अपना परिचय देता है। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण एवं अणुओं की चुंबकीय शक्ति में प्राण शक्ति ही विद्यमान है। चेतना जीवों की हलचलों में वही प्रेरणा प्रदाता है, तो उत्पादन, अभिवर्धन का मूल प्राण स्पंदन ही है। यही जीवों को नवीन सृष्टि के लिए परस्पर आबद्ध करता। काम की प्रचंड शक्ति प्राण का ही एक भाग है। इसका निम्नस्तरीय स्तर है-काम-वासना अर्थात् भीतर बहुत मात्रा में क्रोध, और जुड़ाव है। प्राण शक्ति की उपासना सर्वश्रेष्ठ है। प्राण वह ब्रम्हाण्डीय द्वार है जो आपको भीतर का दर्शन कराता हैं।

विचारों की प्रखरता एवं वाणी की तेजस्विता प्राणतत्त्व आधर पर ही प्रकट होते है। विचार इसी से सशक्त बनते तथा दूसरों पर प्रभाव छोड़ते हैं। विचारक, मनीषी, संत महापुरुषों के विचार एवं उपदेश निकट के ही नहीं अपितु दूरदर्शी होते हैं। उन्हें श्रेष्ठता की ओर बढ़ चलने की प्रेरणा देते हैं। यह प्राण शक्ति का ही प्रभाव है, जो अपने विचारों के अनुसार अन्यों को चलने, अनुगमन करने को बाध्य करती है। प्राणायाम साधना का लक्ष्य इस तत्त्व को जानना तथा उस पर नियंत्रण प्राप्त करना है। नियंत्रित प्राण इतनी बड़ी संपदा है जिसके समक्ष संसार की सभी भौतिक संपदाएँ छोड़ी जा सकती हैं। उस महाशक्ति से प्रकृति को भी वशीभूत किया जा सकता है।

वेदों में प्राण शक्ति महिमा बताई है, जिसमें जिज्ञासु ऋषि से पूछता है,

“कस्मिंतु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञतो भवति” ?

ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसका ज्ञान होने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है। ऋषि उत्तर देते हुए कहते हैं कि “यह प्राण तत्त्व ही है जिसे जान लेने के बाद कुछ जानना अवशेष नहीं रहता।”

इसी कारण श्रुति कहती है कि “प्राण तत्त्व को समझने उस पर नियंत्रण प्राप्त करने से प्रकृति के समस्त रहस्यों को अनुभव किया जा सकता है। प्राण पर विजय प्राप्त कर लेने का अर्थ है-प्रकृति पर विजय प्राप्त करना, प्रकृति की अन्य शक्तियाँ प्राण संपन्न व्यक्ति की अनुगामिनी होती हैं।

अनंत प्राण समुद्र की यह सबसे निकट की तरंग है। इस पर यदि नियंत्रण किया जा सके तो उस प्राण के महासमुद्र से संपर्क जोड़ा जा सकता है।

प्राण समस्त प्राणियों में जीवनी शक्ति के रूप में प्राण शक्ति विद्यमान है। वैचारिक प्रखरता उसकी उच्चतम अभिव्यक्ति हैं। इसके अतिरिक्त भी प्राण की वृत्तियाँ हैं जिन्हें हम जन्म-जात प्रवृत्ति अथवा ज्ञान रहित चित वृत्ति भी कहते हैं। इन्ही वृत्ति के निरोध को महर्षि पतंजलि जी ने योग कहा है। योग है चित्त की वृत्तियों का निरोध। जब हम प्राण तत्व में विद्यामन अनंत तत्व को भीतर स्थापित करेगे तो उस अनंत की शक्तियां आपके भीतर आएगी। यही वह स्थिति है जिसे वेद कहते है,

। यथा पिंडे तथा ब्रम्हांडे।

इसी शरीर के भीतर ब्रम्हांड मौजूद है। आपको जागरूकता चाहिए।अचेतन मन द्वारा संचालित प्रवृत्तियों में भी प्राण तत्त्व की ही अव्यक्त भूमिका होती है। शरीर की समस्त क्रिया प्रणाली इसी के द्वारा संचालित हैं। विश्व में अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर एक अखंड ऊर्जा का प्रवाह दिखाई पड़ती है। वही भौतिक संसार के विभिन्न रूपों में व्यक्त होता हैं। प्रत्येक वस्तु इस अनंत प्राण की एक भँवर है। लाखों प्रकार के जीव प्राण की विभिन्न स्तर की अभिव्यक्तियाँ हैं। सूक्ष्म जगत् में भी प्रविष्ट करने पर वह अखंडता दिखाई पड़ती है। ईथर को संपूर्ण जड़ जगत् को सूक्ष्मावस्था माना जाता है। वह प्राण की स्पंदनशील सूक्ष्म स्थिति है। यह सबमें व्याप्त है। यह ब्रह्मांड व्यापी सूक्ष्म प्राण शक्ति ही है, अध्यात्म साधनाओं के माध्यम से ग्रहण, आत्मसात् करने पर प्राण-प्रयोग बन जाती हैं। इसे ही खींचकर अपने विकसित सूक्ष्म शरीर धारण कर योगीजन दिव्य क्षमता संपन्न बनते हैं। अध्यात्म विज्ञान की यह विद्या आत्मिक कायाकल्प में व मानसिक क्षमताओं के अभिवर्धन में बड़ी सफलता पूर्वक प्रयुक्त की जा सकती है, इसे अपने जीवन में परीक्षित कर ऋषियों ने ग्रंथों में भी स्थानापन्न किया है। प्राणतत्त्व समस्त भौतिक और आत्मिक संपदाओं का उद्गम केंद्र है। सर्वत्र संव्याप्त है।

स्वामी विवेकानंद ने प्राण की विवेचना ‘साइकिक फोर्स’ के रूप में की है। इसका अर्थ मानसिक शक्ति हुआ है। यह मस्तिष्कीय हलचल हुई, पर प्राण तो विश्वव्यापी है। यदि समष्टि को मन की शक्ति कहें या सर्वव्यापी चेतना शक्ति का नाम दें, तो ही यह अर्थ ठीक बैठ सकता है। व्यक्तिगत मस्तिष्कों की मानसिक शक्ति की क्षमता प्राण के रूप में नहीं हो सकती। मन की सर्वव्यापी क्षमता में अदभुत सामर्थ्य होता है। मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं के रूप में प्राण शक्ति के प्रकट होने का प्रखर होने का परिचय प्राप्त किया जा सकता है, पर वह मूलतः अधिक सूक्ष्म है। प्राण के साथ वायु विशेषण भी लगा है और उसे प्राण वायु’ कहा गया है। उनका तात्पर्य ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि वायु विकारों से नहीं वरन् उस प्रवाह से है जिसकी गतिशील विद्युत तरंगों के रूप में भौतिक विज्ञानी चर्चा करते हैं। अणु, उष्णता, प्रकाश आदि की शक्ति धाराओं के मूल में संव्याप्त सत्ता कहा जा सकता है।

आधिदैविकेन समष्टिव्यष्टिरूपेण हरेण्यगर्भेण प्राणात्मनैवैतद् विभुत्वमाम्नायते नाध्यात्मिकेन । -ब्रह्मसूत्र शांकर भाष्य

समष्टि रूप हिरण्यगर्भ विभु है। व्यष्टि रूप आधि – दैविक अणु।

इस अणु शक्ति के आधार पर ही पदार्थ विज्ञान खड़ा है। विद्युत, प्रकाश, विकिरण आदि की अनेकानेक शक्तियों उसी स्रोत से क्रियाशिल रहती हैं। अणु के भीतर जो सक्रियता है वह सूर्य की है, यदि सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक न पहुँचे तो यहाँ सर्वथा अंधकार ही होगा। अणुओं की जो सक्रियता पदार्थों का आविर्भाव एवं परिवर्तन करती है उसका कोई अस्तित्व दिखाई न पड़ेगा। भौतिक विज्ञान ने इसे सूर्य द्वारा पृथ्वी को प्रदत्त-अणु शक्ति के रूप में पहचाना है और उससे विभिन्न प्रकार के आविष्कार करके सुख साधनों का आविर्भाव किया है। पर यह नहीं धारण करना चाहिए कि विश्वव्यापी शक्ति भंडार मात्र अणु शक्ति की भौतिक सामर्थ्य तक ही सीमाबद्ध है। वस्तुतः यह विपुल संपदा इससे भी कई गुना अधिक है, जड़-चेतन सभी में समान रूप से संव्याप्त है। जड़ जगत में शक्ति तरंगों रूप में संव्याप्त सक्रियता के रूप में प्राण का परिचय दिया जा सकता है और चेतन जगत में उसे संवेदना कहा जा सकता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया इसी संवेदना के तीन रूप हैं। जीवंत प्राणी इसी के आधार पर जीवित रहते हैं। उसी के सहारे चाहते, सोचते और प्रयत्नशील होते हैं। इस जीवनी शक्ति जितनी मात्रा जिसे मिल जाती है वह उतना ही अधिक प्राणवान कहा जाता है।

प्राणायाम जितना सरल और आसान प्रतीत होता है, उतना है नहीं। जब कोई व्यक्ति प्राणायाम की चेष्टा करता है तो लगने लगता है कि यह कोई हंसी-खेल नहीं है, बल्कि एक जटिल परन्तु सार्थक कला है। प्राणायाम कोई काल्पनिक क्रिया नहीं है अपितु तत्काल प्रभावशाली है। प्राणायाम की कई क्रियाएँ सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती चली जाती हैं। आज के दौर का व्यक्ति कुछ ज्यादा ही तनावपूर्ण हो गया है। संतुलित एवं शांतिमय जीवन जीना जैसे बहुत कठिन हो गया है। स्नायुविक और रक्त संचालन कुछ प्रणालियों को प्रभावित करने वाली चिंताएँ और रोग अपेक्षाकृत बढ़ गए हैं। व्यक्ति मानसिक समस्याओं से पीड़ित हैं तो कुछ व्यावहारिक कारणों से खुद को शांत व स्थिर बनाए रखने के लिए वह तरह-तरह के मादक द्रव्यों का सेवन करता है किंतु उनसे शांति नहीं मिलती बल्कि वह जीवन को नर्क बना लेता है। संभवतया धूम्रपान और मादक द्रव्यों से वह कुछ समय के लिए दुःख भूल जाएँ परंतु यह समस्या का हल नहीं है। वे शारीरिक और मानसिक विकार तो पुनः लौटकर आ जाते हैं। हमने प्रयोगात्मक रूप से देखा है कि जीवन में प्राणायाम जैसा सशक्त माध्यम अपनाने से हम कई समस्याओं को हल कर सकते हैं। प्राणायाम तर्क, वाद-विवाद से परे है। इसे सीखने के लिए उल्लास, धैर्य, आत्म-समर्पण, गुरु-निर्देश और सावधानी पूर्वक की गई चेष्टा की ज़रूरत होती है और यही इसे सार्थकता प्रदान करती है।

आयुर्वेद में भी वायु का विशेष और महत्त्वपूर्ण स्थान प्रतिपादित करते हुए महर्षि चरक ने चरक संहिता सूत्रस्थान 12/7 में स्पष्ट किया है कि वायु-शरीर और शरीर अवयवों को धारण करने वाला प्राण, उदान, समान, अपान और व्यान इन पाँच प्रकारों वाला, ऊँची और नीची सभी प्रकार की शारीरिक चेष्टाओं का प्रवर्तक, मन का नियंत्रक और प्रणेता, सभी इन्द्रियों को अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में प्रवृत्त कराने वाला, शरीर की समस्त धातुओं का व्यूह वाला, शरीर का संधान करने वाला है। वाणी का प्रवर्तक, स्पर्श और शब्द की प्रकृति, श्रवण और स्पर्शन इन्द्रिय का मूल, हर्ष और उत्साह, जठराग्नि करने को प्रदीप्त करने वाला, विकृत दोषों का शोषण करने वाला स्वेद, मूत्र, पुरीष आदि मलों को बाहर निकालने वाला, स्थूल और सूक्ष्म स्त्रोतों का भेदन करने बाला है। इस प्रकार अकुपित वायु, आयु या जीवन के अनुवृत्ति निर्वाह में सहायक है। यह भी कहा है कि प्राण को मातरिश्वा कहते हैं। वायु ही प्राण है। भूत, भविष्य और वर्तमान सब-कुछ प्राण में ही अधिष्ठित है।

आत्मा को महात्मा, देवात्मा और परमात्मा बनने का अवसर इस प्राण शक्ति की अधिक मात्रा उपलब्ध करने पर ही संभव होता है। चेतन की विभु सत्ता जो समस्त ब्रह्मांड में संव्याप्त है चेतन प्राण कहलाती है। उसी का अमुक अंश प्रयत्न पूर्वक अपने में धारण करने वाला प्राणी-प्राणवान एवं महाप्राण बनता है। आज जरूरत है इस प्राण शक्ति के आव्हान की। यही शक्ति हर समय श्वास के साथ अपना परिचय देती है। इसी शक्ति के अभाव में मृत्यु ही है। हमे प्राण शक्ति को शरीर के साथ साधना है। तोड़ देनी है खुद की सीमाएं और साध्य करना है वह लक्ष्य जिसे हम पाना चाहते है? अंत में हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?

A win win attitude

मानवी व्यक्तित्व में अन्तनिहित समग्रता!

पदार्थवादी दृष्टिकोण वाले बौद्धिक मनुष्य को जैव रासायनिक संयोगों का एक आकस्मिक समुच्चय ही मानते रहे हैं। उस स्थिति में सम्पूर्ण व्यक्तित्व की किसी विशिष्ट एक सूत्र का प्रश्न ही नहीं उठता। रंग, रक्त, शरीरस्थ रसों आदि की दृष्टि से निश्चित वर्गों का निर्धारण हो जाने पर तो यह और भी निश्चित माना जाने लगा कि जिस प्रकार कुछ तत्वों की निश्चित मात्रा एवं निर्दिष्ट प्रक्रिया में सयोग मे अमुक यौगिक विशेष फल तैयार हो जाता है, उसी प्रकार कुछ निश्चित तत्वों के संयोग में सफल हो जाने पर वर्ग विशेष के मनुष्य भी तैयार हो जाएंगे।

लेकिन विज्ञान प्रेमियों की इस कल्पना को ध्वस्त किया है, खुद वैज्ञानिकों ने। जैसे-जैसे जीवन के रहस्यों की खोज का क्रम बढ़ता गया, वैसे-वैसे वे तथ्य सामने आते गये, जिनसे स्पष्ट होता गया कि शरीर के ढाँचे वर्ण, कद, आकृति, रक्त हड्डियों आदि के हिसाब से तो वर्गीकरण ठीक हैं। किन्तु जीवन के गहरे आधारो के क्षेत्र में इस वर्गीकरण से काम नहीं चलेगा। चेतना की विद्यमानता प्रत्येक व्यक्तित्व को एक समग्र रूप देती है। जो दूसरे से बिल्कुल भिन्न है और इस लिये जिसे वर्गों में नहीं बांधा जा सकता क्योंकि हर व्यक्ति अपने आप में एक पूर्ण इकाई है। उस परमसत्ता का ही एक अंश है। अपना वर्ग उपवर्ग वह स्वयं है। इस लिए मनुष्य को अपने भाग्य का विधाता मानते है। व्यक्ति के संस्कार उसकी जन्म-जन्मान्तर की संचित सम्पदाए और साधन है। यह मान्यता भारतीय तत्व दर्शन की रही है। संस्कारों का यह सम्पुञ्जन बहुआयामी और अति विस्तृत होता है। संस्कार रूपी ये विशेषताए व्यक्ति की स्वयं उपार्जित क्षमताएं होती हैं । इन्हीं से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उसकी अपनी विशिष्टता घनीभूत रहती है।

दृश्यमान मानव शरीर की स्थूल संरचना में बहुत अधिक अन्तर नहीं होता। तो भी कोई दो व्यक्ति शत प्रतिशत एक जैसे नहीं होते। फिर अन्तरंग क्षेत्र तो और भी विस्तृत है। प्रत्येक व्यक्तित्व का अलग-अलग अनुठापन होता है। जो संस्कार समूहों की ही विशेषता होती है।
यह विशेषता ही मनुष्य की प्रवृत्तियों रुचियों और सामर्थ्य के रूप में प्रकट होती रहती है। कोई प्रचण्ड शरीर बल का स्वामी है, तो किसी में उसकी अल्पता होती है। कोई विलक्षण मेधा और स्मरण शक्ति से सम्पन्न है। तो किसी की बुद्धि में स्थूल बातों के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता हैं, और स्मरण शक्ति भी मन्द होती है। किसी के हृदय में करुणा का अथाह समुद्र उमड़ता रहता है, तो किसी को पर-पीड़न में ही पुरुषार्थ प्रतीत होता है । ये सभी भिन्नताएं ईश्वरीय अनुदान में किसी प्रकार के पक्षपात या विषमता का परिणाम नहीं है, वरन् जन्म-जन्मान्तरों से अमुक व्यक्ति द्वारा बढ़ाई जा रही विशेषताओं या खोयी जा रही क्षमताओं का ही और फल हुआ करती हैं। व्यक्ति विकास के स्तर को हमे समझना होगा।

जिस प्रकार मिट्टी में पत्थर प्रतीत होने वाली वस्तुओं के तल में इलेक्ट्रान-प्रोटान और उनकी आधारभूत विद्यतु-तरंगे सक्रिय रहती है। उसी प्रकार स्थूल दृष्टि से जो काय कलेवर के अवयव हाड़-मांस के बने दीखते हैं उनमें चेतन कोशिकाएं और उनके भी मूल में जीन्स क्रोमोसोम की निर्माणकारी चेतना प्रक्रियाएं क्रियाशील रहती हैं। प्रत्येक मनुष्य के अपने व्यक्तित्व की विशिष्ट छाप उन मूलभूत तत्वों तक में विद्यामान होती है। इस विशेषता का पता चला आणविक जैविकी के विकास से, जिसकी भव्य परिणति के रूप में पिछले दिनों दुनिया की प्रथम शिशु का प्रदुर्भाव हो सका है और जिसने परे संसार को रोमांचित कर दिया है।

आणिविक जैविकी की खोजों से यह तथ्य सामने आया कि जीवन की मूलभूत इकाई है, कोशिका ये इकाइयाँ अति सूक्ष्म होती हैं। ये प्राणिमात्र की देह इकाइयां हैं। एक कोशीय जीव अमीबा से लेकर विकसित मनुष्य तक किसी स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट युवक के शरीर में लगभग साठ हजार अरब कोशिकाएं होती हैं। इनमें से दस हजार अरब तो ऐसी इकाइयां ही हैं, जो स्वयं प्रक्रिया को परिचालित करती हैं। जितनी जगह में ‘मैं कोशिका है” छपा है, उतनी जगह में औसत आकार की पचास हजार कोशिकाए रखी जा सकती है। एक कोशिका का अपना सिस्टम है, जिनमे पाया गया है, की एक कोशिका में 8 GB तक का स्टोरेज रहता है। मानव शरीर ईश्वर द्वार बनाया गया कंप्यूटर है।

इनमें से प्रत्येक कोशिका एक शानदार कारखाना है। जो उत्पादन, कचरे के निष्कासन, सक्रियता, सुव्यवस्था एवं प्रशासन की सुनियोजित प्रणाली से क्रियाशील है। इस कारखाने के तीन मुख्य खण्ड होते हैं- पहला बाहरी खोल, जो एक पतली झिल्ली जैसा होता है, दूसरा साइटोप्लाज्म जैसे लसलसे पदार्थ से लबालव भाग और तीसरा केन्द्रक। यह केन्द्र ही प्रत्येक गतिविधि का नियन्त्रक होता है। केन्द्रक में ही डीएनए रहता है। जो मनुष्य के गुणसूत्रों तथा अन्य सूचनाओं का भंडार होता है। सच पूछा जाय तो कोशिका एक बड़ी झील है, इसे जीव-द्रव्य या प्रोटोप्लाज्म की झील कह सकते हैं। जीव चेतना को क्षीर सागर भी कहा जा सकता है। इसी क्षीर सागर के केन्द्र में है केन्द्रक या न्यूक्लिस रूपी विष्णु जिनकी नाभिवत् केन्द्रिका न्यूक्लिओलस में रहते हैं डीएनए रूपी ब्रह्मा । इन ब्रह्मा के चार मुँह हैं- डीएनए रूपी सीढी की पौड़ियों के चार यौगिक एडिनिन, ग्वैनिन, साइटोसिन और थाइमिन । एडिनिन और थाइमिन का सदा जोड़ा रहता है तथा साइटोसिन और ग्वैनिन का। इन चारों का क्रम ही समस्त जीवों की समानता या भिन्नता का मूल है।

चेतना विज्ञान

डीएनए का जो कुण्डली का फीता है। उसके उपयुक्तता के लिए सर्व व्याप्त चेतना से तादात्म्य स्थापित करने के और कोई उपाय भी नहीं। एक ही आत्मा सब में समाया हुआ है। एक ही सूर्य लहरों में प्रतिविम्बत हो रहा है। यह प्रतिविम्ब भिन्न-भिन्न में उसी रूप से फीका दिखाई पड़ता है। रुप आकार प्रकार की यह भिन्नता कोशिकाओं तक में देखी जा सकती है। चमड़ी का बाहरी हिस्सा चपटी कोशिकाओं से बना है। तो पाचन प्रणाली की कोशिकाएँ सिलेन्डर के आकार की होती। माँसपेशियों की कोशिकाएं आकुंचन प्रसारण में सहायक होती तो गुर्दे की मूत्र निर्माण – निष्कासन में सहायक होती हैं। किन्तु अन्य भी कोशिका हो उसमें वे विशिष्टताएं विद्यमान होती हैं जो व्यक्तित्व का सार हैं। उनका पुनरुत्पादन सम्भव है। इसी आधर पर वैज्ञानिक दावा करते हैं, कि यदि महात्मा गाँधी की त्वचा की कोशिकाएं लेकर उनके ऊतक कोषिकाये बना लिये गये होते तो तक कुछ दिनों बाद तकनीक विकसित होने पर उन्हीं ऊतक कोशिकाएं से हजारों गाँधी बनाये जा सकते थे। यदि आज रोनाल्ड रीग अथवा फ्रेंचर की त्वचा की कोशिकाएँ इसी प्रकार रख ली जाए, कल उन्हीं से अनेकों रीग अथवा अनेको नेता बनाये जा सकते हैं।

चेताना विज्ञान और अणु जैविकी के अन्वेषण में कदम-कदम पर पैदा होने वाली नई-नई कठिनाइयाँ एवं प्रतिक्रियाए वैज्ञानिक की इस सामर्थ्य सम्भावना को साकार कर सकेंगी अथवा नहीं यह खोज का विषय है। परंतु एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के आगे की छाप दूसरे व्यक्ति से और एक के स्वरों का ध्वनि-चित्रांकन दूसरो के स्वरों के ध्वनि चित्रांकन से भिन्न होते हैं। साथ ही एक मनुष्य के शरीर में विद्यमान खरबों कोशिकाओ में से प्रत्येक में उसकी आधार भूत विशेषताएं सुरक्षित होती है। इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य की सम्पूर्ण सत्ता में समग्रता है। वह चित्र विचित्र प्रवृत्ति प्रवाहों का आकस्मिक मेल नहीं है। उसकी भावनाएं भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्वों के यों ही एकत्रीकरण से नहीं पैदा होती, अपितु उसके रोम-रोम में अंग अंग में उन कोशिका ओं का सारभूत अंश विद्यमान होता है।

इसी तथ्य से एक अन्य निष्कर्ष भी सामने आता है। मृत्यु के बाद मनुष्य के मस्तिष्क के प्रोटोप्लाज्म के बिखर जाने और उसके सौ वे भाग का अश-विशेष के अन्य मनुष्य में प्रविष्ट हो जाने की बात कई वैज्ञानिक को के द्वारा उन प्रमाणों के सन्दर्भ में की जाती रही है जहाँ व्यक्ति अपने कथित पूर्व जन्म का कोई प्रमाणिक विवरण दे देता किन्तु कोशिका सम्बन्धी ये खोजें उस तर्क को कमजोर बनाती जब शरीर के किसी भी हिस्से की कोशिका में व्यक्ति की सभी मूलभूत विशेषताएं संरक्षित रहती हैं। तो मस्तिष्क की कोशिका का टोप्लाज्म बिखर कर घूमघूम कर दूसरे में प्रविष्ट होने के स्थान पर उन कोशिका के ही नये रूप में पहुँचने की सम्भावना है। अभी इसके अनेक रहस्य अज्ञात के गर्भ में ही हैं। इतना ही स्पष्ट हुआ कि हर नयी कोशिका अपनी जननी कोशिका से समस्त सूचनाए संकेत लेकर अपना नया कारखाना खोलती है। नुवंशिकी कूट भाषा अभी तक पूर्णतः जानी नहीं जा सकी है। रहस्य खुलने पर वह जानकारी जीव-कोशिकाओं में निहित चेतना अविच्छिन्नता पर भी प्रकाश डाल सकेगी। आणविक जैविकी की इन खोजों ने ये दो बात अब तक स्पष्ट हैं-सभी जीव-कोशिकाओं की मूलभूत रचना-प्रक्रिया एक है। इस व्यक्तित्व की वे इकाइयाँ होती हैं। उसकी सभी आधरभूत विशेषता इनमें सूत्र रूप में सन्निहित होती हैं। दोनों ही तथ्य भारतीय दर्शन के प्रतिपादन के अनुरूप हैं । वेदान्त दर्शन की मान्यता है कि एक ही चेतन-तत्व भिन्न-भिन्न दृश्यों के रूप में सर्वत्र दीखता है। साथ ही इन दृश्यों का बनना-बिगड़ना भी आकस्मिक नहीं है। यह एक सुनिश्चित सृष्टि प्रक्रिया का अंग है। अपितु उसी व्यवस्था के नियमों के अनुसार होता है।

चेतना का स्तर और डीएनए

हमारी चेतना का स्तर न तो आकस्मिक है और न अन्तिम या अपरिवर्तनीय। न तो इसका चाहे जैसे संयोग होता है न ही चाहे जैसा विघटन। इस सृष्टि में सभी कुछ सुव्यवस्थित और नियम बद्ध है और चेतना से परिपूर्ण है। वस्तुतः शरीर एक परिपूर्ण ब्रह्माण्ड है। प्राकृतिक परमाणु (जो साइटोप्लाज्मा निर्माण करते ) उसके लोक की रचना करते हैं और एटम मिलकर एक चेतना के रूप में उसे गतिशील रखते हैं। सूर्य, परमाणु प्रक्रिया का विराट् रूप है। इसलिये वही दृश्य जगत की आत्मा है, चेतना है, नियामक है, सृष्टा है। उसी प्रकार सारी सृष्टि का एक अद्वितीय स्रष्टा और नियामक भी है पर वह इतना विराट है कि उसे एक दृष्टि में नहीं देखा जा सकता । उसे देखने समझने और पाने के लिये हमें परमाणु की चेतना से प्रवेश करना पड़ेगा, योग साधना का सहारा लेना पड़ेगा, अपनी चेतना को इतना सूक्ष्म बनाना पड़ेगा कि आवश्यकता पड़े तो वह काल ब्रह्माण्ड तथा गति रहित परमाणु की नाभि सत्ता में ध्यानस्थ केन्द्रित हो सके। उसी अवस्था पर पहुँचने से आत्मा को परमात्मा स्पष्ट अनुभूति होगी।

चार यौगिक उसकी चार अक्षर वर्णमाला है। इन्हीं अक्षरों के क्रम और डीएनए की संख्या के उलट फेर से भिन्न-भिन्न चेतना संदेश तैयार हो जाते हैं और उन चेतना सन्देशों से ही बनता यह सारा चेतना संसार। गुणसूत्र के डीएनए के एक क्रम से व्यक्ति का काला रंग बनता है तो अन्य भिन्न-भिन्न क्रम से गोरा,या पीला। देह के प्रत्येक अवयव और उनकी विशिष्टताओं का निर्माण इन्हीं डीएनए के हेर-फेर से हुआ करता है। कोशिकाओं के भीतर का डीएनए ही प्रोटीनों के संश्लेषण का निर्देशक है। इन प्रोटीनों से बनते हैं एंजाइम । प्रत्येक जैव-रासायनिक क्रिया का प्रारम्भ, विकास या अन्त इन्हीं एंजाइमों का खेल है। दुनिया में प्राणियों की बोलियाँ भिन्न-भिन्न हैं। एक प्राणी दूसरे वर्ग के प्राणी की बोली कम समझ पाता है। मनुष्य ने तो भिन्न मत भाषाएँ विकसित की हैं और जिस भाषा-बोली का उसे ज्ञान नहीं उसका आशय अभिप्राय वह नहीं समझ पाता। कई बार तो मनोदशा और ज्ञान स्तर की भिन्नता से एक ही भाषा के बोलने वाले दो व्यक्ति एक दूसरे का अभिप्रायः ठीक-ठीक नहीं समझ पाते। अपितु सभी जीवों की रासायनिक भाषा एक है और प्रत्येक जीव कोशीका उससे भली भांति अवगत है। उस भाषा का जो अर्थ जीवाणु कोशिका के लिए है वही अर्थ मानव कोशिका के लिए, इन सबसे यही स्पष्ट होता है कि सभी प्राणियों में क्रियाशील मूलभूत चेतना एक ही है और उनकी संरचना के आधारभूत सूत्र एक में हैं।

भारतीय तत्वदर्शी प्रखर साधनाओं द्वारा इसी एकमेव अद्वैत चेतन सत्ता और उसके लिए, क्रियाकलापों की जानकारी में समर्थ होते रहे हैं। तभी वे सूक्ष्म जगत में उभरने वाली हलचलों की जानकारी प्राप्त करने में समर्थ होते। इसलिए अंत में हमे हमारे जीवन का लक्ष्य तय करना होगा? हमे उस यात्रा के लिए तैयार होना हैं, जो भीतर के चिदाकाश का द्वार तक लेके जाती है। हमे तैयार होना है, उस सवाल के लिए “मैं चाहता क्या हूं??

आयु + वेद = आयुर्वेद

मां प्रकृति का धन्यवाद करना सीखाता, “आयुर्वेद”

मां प्रकृति ने मनुष्य के लिए हर वस्तु उत्पन्न की है। जीवन को जीने के लिए प्राण वायु, शक्ती के लिए अन्न। मां प्रकृति हमारी हर एक जरूरत को पूर्ण करती है। वो कभी आपदा के रुप में कहर बनकर टूट पड़ती है तो भी हमारी मदद करती हैं। परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। मां प्रकृति की सबसे सुंदर और जटिल संरचना है मानव शरीर। मानवी शरीर को स्वास्थ रखना हमारे हाथों में है। इस स्वस्थता को प्रदान करती है मां प्रकृति। मां प्रकृति के नजदीक रहकर हम खुद को और समस्त मानव जाति को निरोगी रख सकते है, इस बात में कोई संशय नहीं हैं। मां प्रकृति ने हमें ज्ञान प्रदान कराती है। मानव शरीर से जुड़ा हुआ ज्ञान है आयुर्वेद। औषधि उपचार के लिए जड़ी-बूटियाँ भी प्रदान की हैं। इस आधार पर चिकित्सा को सर्व सुलभ, प्रतिक्रियाहीन तथा सस्ता बनाया जा सकता है। जड़ी बूटी चिकित्सा बदनाम इसलिए हुई कि उसकी पहचान भुला दी गयी- विज्ञान जुठला दिया गया। सही जड़ी-बूटी उपयुक्त क्षेत्र से, उपयुक्त मौसम में एकत्र की जाय; उसे सही ढंग से रखा और प्रयुक्त किया जाय तो आज भी उनका चमत्कारी प्रभाव देखा जा सकता है।

हम कुछ ही गिनी चुनी जड़ी-बूटियों से ८० प्रतिशत लगभग रोगों का उपचार सहज ही किया जा सकता है। ऐसी सरल, सुगम, सस्ती परन्तु प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति जन-जन तक पहुँचाने के लिए हमारे ऋषि मुनियों, गुरु ,अनेक आध्यात्मिक संस्थान , शोध कर्ता ने आयुर्वेद पर प्रस्तुती सादर कि है। आयुर्वेद में वर्णित अनेक जड़ी-बूटियों को भारतीय संस्कृती में प्राथमिकता दी गयी है, जो भारत में अधिकांश क्षेत्रों में पायी जाती हैं, अथवा उगायी जा सकती है। भारत की गुरु सत्ता, आचार्य अनेक संतो की यह इच्छा है कि, यह विधा विकसित हो और रोग निवारण के साथ-साथ जन-जन को प्राण शक्ति संवर्धन का लाभ भी प्राप्त हो । ऋषियों द्वारा विकसित इस विद्या का लाभ पुनः जन-जन को मिले। आने वाले समय में न तो संसाधनों की कमी रहने वाली है, न की तकनीकी दृष्टि से विकसित सुविधा साधनों की हमें आशा रखनी चाहिए कि महाविनाश की सारी तैयारियों के बावजूद विवेक का वर्चस्व बना रहेगा एवं अज्ञान, अभाव को दूर कर एक सद्भावनापूर्ण समाज विकसित होगा। एक आशंका फिर भी मन में रहती है कि वर्तमान जीवन पद्धति चिन्तन की विकृति एवं आधुनिक विकास के चलते, क्या मां प्रकृति की संताने सभी प्राणियों में मनुष्य इस स्थिति में होगा कि साधनों का सदुपयोग कर सके ? स्वयं अपने आपको सर्वांगपूर्ण स्वस्थ एवं संतुलित बनाए रख सके ? मानव आज के विकास की राह में अंधा हुआ प्रतित होता हैं। गहराई से देखने पर काफी खोखला नजर आता है। उसकी जीवनी शक्ति मुरझाई सी गयी लगती है। थोड़ा सा मौसम का असंतुलन उसे व्याधिग्रस्त कर देता है। भ्रान्तियां, आवेश, उत्तेजना, अवसाद जैसे मनोविकारग्रस्त व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है। बाहर से स्वस्थ, सुडौल दीखते हुए भी व्यक्ति की जड़ें कमजोर दिखाई देती हैं। आहार उपलब्ध होते हुए भी वह आहार विष बनकर सामने आता है । इसे आधुनिक जीवन की नीति कहें या प्रगति की दिशा में भटकना, कुछ भी नाम दे लें; पर लगता यही है कि ये वे मजबूत कंधे नहीं हैं, जिन पर समाज, राष्ट्र, विश्व की सदी का बोझ लादकर आगे बढ़ा जा सकें।

आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने निदान के साधन इतने जुटा दिए है कि रोग की जाँच-पड़ताल अब अधिक समय नहीं लेती। पर “मनुष्य रोगी है,” यह वही मानने को तैयार न हो, वह बाहर से स्वस्थ दिखे भी न पड़े, तो समझना चाहिए की कहीं कोई गड़बड़ी है। आहार की अनियमितता, अस्त-व्यस्त रूप में आधुनिक औषधि का सेवन, चिन्तन क्षेत्र में भ्रान्तियों के भ्रम जाल ये सभी आज सारे मानव समुदाय को अस्वस्थ बनाये हुए हैं। लक्षण बाहर से दिखायी नहीं पड़ते ।अन्तविकार अन्दर से व्यक्ति को खोखला बनाते रहते एवं बाहर की लीपा-पोती से प्रकाश में नहीं आ पाते हैं। ऐसे में लगता है नया मानव तैयार करने के लिए ऐसी वैकल्पिक चिकत्सा पद्धति तलाशनी ही होगी, जो व्यक्ति को समग्र रूप से आरोग्य प्रदान करें, उसकी क्षीण होती जा रही जीवनी शक्ति को सहारा दे। चाहे प्रसंग अत्याधुनिक विकसित राष्ट्रों का हो अथवा अविकसित विकासशील तीसरी दुनिया के राष्ट्रों के नागरिकों का, सभी पर यह बात समान रूप से लागू होती है।

योग्य उपचार पद्धति का चयन!

सही उपचार पद्धति कौन सी हो ! इस पद्धति को कैसे समझे? इस लिए हमे हमारी मूल प्रकृति से जुड़ना होगा। उपचार से उपकार तक की यात्रा को विकसित करना होगा। रोगों के मूल तक जड़ों तक पहुंचना होगा तभी हम रोगों के जंजाल से मुक्त हो पाएंगे। इसलिए चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के नामों पर जब भी विचार होता है, तो वह एक सीमित दायरे में घूमकर रह जाता है। ऐलोपैथी की सबसे बड़ी देन यही है, कि उसने रोगों के कारणों के बारे में आधुनिक ढंग से चिन्तन करना सिखाया। चिकित्सा पद्धति कितनी निरापद है, इस विवाद में पड़े बिना यह चर्चा करना मुख्य होगा, कि वर्तमान परिस्थितियों में एक विशाल समुदाय में उपचार का मंत्र किस तरह फुंका जाय की उपचार के नाम पर चारों ओर नजर दौड़ाते है, तो प्रकृति के आंगन में फलने-फूलने वाली औषधि के माध्यम से चिकित्सा ही हर दृष्टि से हानिरहित, सस्ती, सुगम एवं अधिक लाभकारी प्रतीत होती है। यहां आयुर्वेद एवं वनौषधि विज्ञान के अन्तर को समझना जरूरी है। आयुर्वेद के धन्वन्तरि काल से लेकर अब तक के विकास में अनेकों परिवर्तन होते हुए चले आए हैं। आज के आयुर्वेद के रूप को देखते हुए मन में ग्लानि सी होती हैं। जो संस्कृति अपनी दिव्य शक्ति से सम्पन्न जड़ी-बूटियों के कारण कायाकल्प कर सकने तक में सक्षम मानी जाती रही है, उसे आयुर्वेद पढ़ कर डिग्री प्राप्त करने वाले ही प्रयुक्त न कर, एलोपैथी की शरण लेते देखे जाते हैं। यह मात्र बौद्धिक, परावलम्बन एवं पश्चिम की अन्धाधुंध नकल ही नहीं है, शरीर को स्थायी हानि पहुंचाने की कीमत पर तुरन्त लाभ मिलने की, रोगी व चिकित्सक की दोनों की मिली भगत की नीति भी है ।

जीवनी शक्ति संवर्धक वनौषधियाँ यदि कहीं नजर आती हैं, क्या वो सही ढंग से एकत्र न हुई, घास-पात के साथ मिली ये औषधियां क्या असर करेंगी ? जबकि सभी जानते हैं कि तोड़े जाने के बाद ३ से ६ माह के बाद इनके सभी गुण-धर्म लगभग समाप्त प्राय हो जाते हैं। जबकि भारत के अनेक आध्यात्मिक संस्थान द्वारा इस आयुर्वेद के गौरव, वनौषधि विज्ञान की महत्ता समझायी जाती हैं। और उन्हें यथा शक्ति स्वाभाविक रूप में प्रयोग करने योग्य बना कर, सेवन विधि का प्रतिपादन किया जाय एवं यदि सम्भव हो, तो ऐसी पौधशालायें स्थान स्थान पर लगायी जाए ताकि उनके ताजे रूप में सेवन का प्रचलन बढ़े। यह नई क्रांति के रुप में उभरकर नया बिजनेस मॉडल हो सकता है।


आयुर्वेद मूलतः अथर्ववेद का उपांग है और पाँचवे वेद के रूप में प्रख्यात है। अग्निवेश इस विधा के प्रणेता माने जाते हैं, जिन्होंने आयुवेद का अध्ययन पुनर्वसु आत्रेय से किया था; किन्तु अथर्ववेद जिसके एक अंग के रूप में आयुर्वेद ने जन्म लिया, उसमें अथर्वा ऋषि के माध्यम से यह बताया गया है, कि समस्त जीव समुदाय के लिए विधाता ने प्रकृति जगत वनौषधियों का प्रावधान रखा है। गुण, कर्म भेद अलग अलग हो सकते हैं, किन्तु एक भी पौधा इस धरती पर ऐसा नहीं है, जिसमें औषधीय गुण न हो। विशिष्ट चिकित्सा हेतु सुरक्षित कुछ विष प्रधान जड़ी-बूटियों की चर्चा न करके शेष पर दृष्टि डाली जाय, तो सभी स्थानीय उपचार (लोकल एप्लीशन) से लेकर समग्र शरीर के उपचार में उपयोगी देखी जा सकती हैं। आयुर्वेद के सुविख्यात आठ तन्त्रों की चर्चा भी यहाँ प्रासंगिक नहीं है। क्योंकि हमारा मूल विषय है वनौषधियों के विभिन्न अनुपान भेद द्वारा एकौषधि अथवा सम्मिश्रण के रूप में प्रयोग से शरीर व मन की सर्वांगपूर्ण चिकित्सा !! शरीर तंत्र व उसकी कार्य विधि की थोड़ी भी जानकारी रखने वाला व्यक्ति, उस विषय पर प्रस्तुत किये जा रहे प्रतिपादन द्वारा स्वयं अपनी एवं अन्य की चिकित्सा करता रह सकता है। इसी कारण अधिक विस्तार में जाने की अपेक्षा यह उचित समझा गया कि सार संक्षेप में इस चिकित्सा का मूलभूत तत्त्वदर्शन एवं उसकी कार्यपद्धति प्रस्तुत कर दी जाय ।

आयुर्वेद प्रकरण के प्रारम्भ में एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण एवं रोचक प्रसंग चरक संहिता में आता है। हिमालय क्षेत्र में सभी ऋषियों सम्मति से महर्षि भारद्वाज, देवराज इन्द्र के पास धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चतुविध पुरुषार्थों के साधन के आधार- आरोग्य की हरने वाले रोगों से मुक्ति पाने का उपाय पूछने जाते हैं, और देवराज इन्द्र ने यह ज्ञात देव वैद्य अश्विनी कुमारों से एवं अश्विनी कुमारों ने इसे दक्ष प्रजापति से प्राप्त किया। दक्ष प्रजापति को इस विद्या की शिक्षा स्वयं ब्रह्मा ने दिया था। भरद्वाज मुनि को आयुर्विज्ञान के तीन मूल सूत्र समझाते हुए देवराज इन्द्र कहते हैं कि आयुर्वेद मूलतः तीन स्तम्भों पर टिका है,

आयुर्वेद के तीन स्तंभ,

१) प्राणियों के स्वस्थ एवं रुग्ण होने के क्या कारण हैं।

(२) स्वस्थ एवं रुग्ण जीवधारियों के लक्षण क्या हैं ?

(३) स्वस्थ रहने को औषधि (पथ्य एवं जीवनी शक्ति सम्बर्धक बलप्रदायी औषधि) तथा रोगी प्राणी की औषधि क्या है ?

सारे आयुर्वेद की व्याख्या इन तीन स्तम्भों पर चलती है। वनौषधि विज्ञान की व्याख्या भी इसी आधार पर की जा सकती है। औषधि ही क्यों ? रस, भस्म-खनिज आदि क्यों नहीं ? इस संबंध में यही कहना है, कि अपना उद्देश्य आयुर्वेद के मूलभूत स्वरूप का पुनर्जीवन करना है। यह सारी धरती देवताओं द्वारा ले जाये जा रहे अमृत कलश से बंद रूप में गिरे अमृत से उद्भूत वनस्पतियों से विभूषित है। हर वनस्पति अपने पाँचों अंगों में औषधीय विशेषताएँ लिए हुए है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय, तो उनमें जल, स्टार्च, रेजिन्स पेटाइड्स रेसे आदि के रूप में सक्रिय घटक एवं संभावित साइड इफेक्ट (दुष्परिणाम) को रोकने वाले संघटक भी विद्यमान हैं। इन औषधियों को ताजे रूप कल्क कर-पीसकर, चटनी के रूप में, घनसत्व के रूप में या छाया में सुखाकर अच्छी तरह पीसकर सुक्ष्मीकृत चूर्ण रुप में दूध, जल, मधु, मिश्री, मलाई, घी या अन्य किसी अनुपान के साथ दिया जाता है। सभी रूपों में ये अपना प्रभाव शीघ्र ही दिखाती हैं। सर्वथा हानिरहित इनका शरीर पर प्रभाव सही निशाने पर बैठने वाला एवं चिरस्थायि होता है, यह शोधकर्ता ओ के निष्कर्ष बताते हैं। अन्य अनेकों संस्थानों द्वारा किए गये प्रयोग परीक्षण भी इसकी साक्षी देते हैं। उनके विस्तार में न जाते हुए यहाँ शरीर व मन पर वांछित प्रभाव डालने वाली ४२ औषधियों एवं उनकी प्रयोग विधि की चर्चा की जा रही है। इस संक्षिप्त निर्देशिका से परिजनों को उपचार प्रक्रिया का तत्त्व दर्शन समझकर, उसे व्यवहार में उतारना आसान हो जायेगा ।

विभिन्न संस्थानों के लिए भिन्न-भिन्न औषधियां: वनौषधि चिकित्सा का मूल आधार है- सक्रिय संघटकों को नष्ट किए बिना उन्हें संस्थान विशेष के लिए उचित मात्रा में अनुपान भेद द्वारा जीवनी शक्ति संवर्धन हेतु मुख मार्ग से देना । जहाँ आवश्यक हो, वहां उन्हें स्थानीय उपचार हेतु भी प्रयुक्त करना। इस दृष्टि से शरीर के विभिन्न संस्थानों के अनुसार चयन की गयी ४२ औषधियों का वर्णन इस प्रकार है,

42 औषधि के भंडार

1. सुख, मसूड़े एवं दाँतों के लिए बकुल (मौलश्री) ।
2.कायफल वालों के लिए भृगराज ।
3. त्वचा सम्बन्धी विकार के लिए बाकुची ।
4. मस्तिष्क एवं मनः संस्थान के लिए ब्राह्मी जय माँसी, दन ।
5. नाड़ी संस्थान – ज्योतिष्मति ( मालकगनी ) ।
6. संधि मांसपेशियों संबन्धी रोगों के लिए निर्गुण्डी, रास्ना, सुष्ठी (सोठ)।
7. हृदय एवं रक्तवाही संस्थान- पुनर्नवा, शंखपुष्पी, अर्जुन फेफड़े तथा ऊपरी व निचला श्वास संस्थान-अडूसा, भारंगी कटकारि शिरीष।
8. ऊपरी पाचन संस्थान एवं यकृत (लीवर) आंवला, मुलेठी, शतपुष्पा शरपुखा, कालमेध।
9. पाचन संस्थान नागकेसर एवं जननसंस्थान-गोर, वरुण, अशोक सोध।
10. रक्त होइफ, संक्रमण नाशक-दितीय सारियाँ, खदिर चिरायता

प्रसंगवश यहाँ एक दो बातों का खुलासा कर देना ठीक रहेगा। आयुर्वेद में होता यह है, की डॉक्टर एक ही औषधि को सभी रोगों को रामबाण दवा बता देते हैं। इस तरह वह कहीं भी नहीं रहती। स्वाभाविक है कि उसमें वे सक्रिय घटक है जिस कारण वह कई रोगों के कई लक्षणों पर अपना अचूक प्रभाव दिखाती है। किन्तु इससे यह नहीं प्रमाणित हो जाता कि वह उन सभी रोगों में काम में लायी जा सकती है। उसमें कौन से ऐसे सक्रिय औषधि तत्व है, यह फाइटोकेमीकल एनालिटीकल विधियों द्वारा पता लगाकर किसी रोग विशेष के साथ उसे प्रयुक्त किया जा सके, तो बहुत सीमा तक भ्रांतियां मिट सकती है। यह प्रयास औषधि निर्धारण में यहाँ किया गया है।

आवश्यकता पड़ने पर एक ही औषधि का सम्मिश्रण के प्रयोग सम्बन्धी एक और स्पष्टीकरण देना जरूरी है। किन्ही किन्ही
परिस्थितियों में व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक परिस्थितियों के अनुसार एक ही औषधि लम्बे समय तक प्रयोग करना ठीक होता है, कभी-कभी जरूरी होता है कि कुछ सम्मिश्रण प्रयोग किए जायें। इससे औषधि एक-दूसरे की कार्य क्षमता को और भी कई गुना बढ़ाती है एवं प्रभाव अधिक तीव्र व जल्दी होता है। औषधि यो के संघटक जब तक एक दूसरे से विच्छेदित नहीं होते, उनमें आपस में रासायनिक क्रिया नहीं होती। वे अपना प्रभाव समूचे रूप में मानव शरीर पर डालते हैं। अतः “ड्रग इटरएक्शन” जैसी संभावना यहाँ नहीं रह जाती। औषधियाँ जिन सक्रिय एल्केलाइड्स, पेण्टाएड्स व स्टार्च फाइवस आदि से मिलकर बनी होती हैं, वे परस्पर इस प्रकार एक दूसरे से मिले हुए रहते हैं, की एक ही औषधि का सेवन करने पर किसी तरह के हानिकारक प्रभाव की आशंका नहीं करनी चाहिए। एक ही जड़ी-बूटी में प्रोटागोनिस्ट ,एण्टागोनिस्ट तत्त्व विद्यामान रहते हैं। एण्टा गोनिस्ट निष्क्रिय औषधि तत्त्व साइड इफेक्ट्स को प्रभावी होने से पहले रोक देते हैं। इस प्रकार औषधि अपने आप में एक सम्पूर्ण आहार है। उचित मात्रा में उचित अनुपान के साथ लिए जाने पर उसके किसी भी प्रकार के दुष्परिणामों की अनावश्यक आशंका नहीं करनी चाहिए।

“वेहीकल” यानी वे पदार्थ, जो औषधि के साथ दिए जाने पर सक्रिय (एक्टिव इन्ग्रेडीएन्ट्स ) को शरीर में अपने लक्ष्य तक पहुंचाए। अनुपान उसी या अन्य किसी औषधि का क्वाथ भी हो सकता है, अथवा जल, दूध, घी, दही, मधु, मिश्री, मलाई, मक्खन या अन्य किसी तरल पदार्थ के रूप में भी हो सकता है । अनुपात इसलिए अनिवार्य है कि वह औषधि अपने सही रूप में सही स्थान पर पहुंचे। वस्तुतः अनुपान औषधि की क्रियाशीलता को बढ़ा देते हैं। सामान्यता ठण्डा या गुनगुना जल अनुपान रूप में प्रयोग करते है। गौ का दुदूध भी एक आदर्श अनुपान तथा स्वयं में एक सम्पूर्ण आहार है। लैक्टिक इन्जाइम्स व उसमें विद्यमान वसा के छोटे-छोटे कणों का बोल औषधि को “पेनिटेट्रिंग” प्रवेश योग्य बना देता है। दूध में लगभग २१ प्रकार के इनलाइम्स पाये जाते हैं। ये जड़ी-बूटियों के एल्केलाइड्स ,ग्लाइकोसाड्स व पेप्टाइड्स को सूक्ष्मीकृत करने की क्षमता रखते हैं। दूध गर्म करके थोड़ा ठण्डा करके लिया जाय, तो उचित है।

हनी वस्तुतः फूलों का स्वरस है। बाद में मधुमक्खियों द्वारा सक्रिय हारमोन्स के माध्यम से और भी अधिक गाढ़ा इन्जाइम बना दिया जाता है। जहाँ फूलों के स्वरस में पानी का अनुपात लगभग सत्तर प्रतिशत होता है, वहाँ मधुमक्खियों के शरीर से गुजर कर आने के बाद वह मात्र दस प्रतिशत रह जाता है। ऐसे द्रव्य पदार्थ के साथ ली गई औषधि पेट से तुरन्त रक्तवाही नलियों में होकर अपने-अपने क्षेत्र में पहुंच जाती है। हनी को जब भी लें, उसे ठण्डी स्थिति में ही लें। जल के साथ मिला कर लें। समान मात्र में जल के साथ गर्म अवस्था में मिलाने पर तथा घी के साथ समान मात्रा में दिए जाने का शरीर पर विष के समान प्रभाव पड़ता है, अतः इस सम्बन्ध में सावधानी बरती जानी चाहिए ।

मक्खन, घी, दही, मलाई आदि दूध के परिवर्तित रूप है। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें भी प्रयुक्त किया जा सकता है। मिश्री की चाशनी भी हनी के समान एक श्रेष्ठ “वेहीकल” है जो औषधि की घुलनशीलता को बिना उसके गुण धर्म बदले बढ़ा देती है। किन्हीं किन्हीं परिस्थितियों में इसे भी अनुपान रूप में प्रयोग किया जाता है। अनुपान के कार्यों के सम्बन्ध में चरक सूत्र स्थान (३२० अ० २७ ) में कहा गया है कि “अनुपान तृप्त करता है, देह एवं इन्द्रियों की कमी को पूर्ण करता है, बल व जीवन देता है, खाये हुए आहार को सर्वत्र शरीर में फैलाने का कार्य करता है व उसे शरीर के साथ एकभाव कर देता है। अनुपान सेवन की गयी औषधि को अलग कर आमाशाय व उससे आगे पक्वआशय की ओर से जाता है। यह अन्न को गीला कर आसानी से अवशोषित हो शरीर में संव्याप्त हो जाने वाला कर देता है। इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि जो पेय आहार की सीमा में नहीं आता है, जिसमें स्वयं के औषधि गुण न हों और धातुओं का विरोधी न हो, वही सर्व श्रेष्ठ अनुपान है। आयुर्वेद केवल एक पद्धति नहीं है, अपितु यह जीवन जीने का नया तरीका है। जहां आपको ज्ञान प्रदान किया जाता है वही आयुर्वेद को अपनाना ही आज की जरुरत है।

पूर्ण स्वास्थ होना है!

मै चाहता क्या हूं?

जन्म और मृत्यु के बीच की अवस्था का नाम जीवन है। जीवन को समझने से पूर्व जन्म और मृत्यु के कारणों को समझना आवश्यक होता है। जिसके कारण हमारा जीव विभिन्न जीव स्तर पर भ्रमण करता है। जन्म और मृत्यु क्यों? कब ? कैसे और कहाँ होती है? उसका संचालन और नियन्त्रण कौन और कैसे करता है? सभी की जीवन शैली, प्रज्ञा, सोच, विवेक, भावना, संस्कार, प्राथमिकताएँ, उद्देश्य, आवश्यकताएँ आयुष्य और मृत्यु का कारण और एक-सा क्यों नहीं होता? मृत्यु के पश्चात् अच्छे से अच्छे चिकित्सक का प्रयास और जीवन दायिनी समझी जाने वाली दवाईयाँ क्यों प्रभावहीन हो जाती हैं? मृत्यु के पश्चात् शरीर के कलेवर को क्यों जलाया, दफनाया अथवा अन्य किसी विधि द्वारा समाप्त किया जाता है ?

प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि “मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मुझे मानव जन्म क्यों और कैसे मिला ? मानव जीवन में भी सभी को एक-जैसी परिस्थितियाँ और वातावरण क्यों नहीं मिलते? सभी की आयु एक जैसी क्यों नहीं होती? किसी की बुद्धि, मन, इन्द्रियों और शरीर का पूर्ण विकास होता है तो कुछ जन्म से ही अविकसित, असन्तुलित, विकलांग अथवा अस्वस्थ क्यों होते हैं? जन्म के साथ परिवार, समाज, धर्म और संस्कृति, परिस्थितियाँ, कार्यक्षेत्र तथा जीवन को प्रभावित करने वाले विभिन्न प्रसंगों का संयोग अथवा वियोग क्यों मिलता है? जीवन चलाना तो प्रायः सभी जीव जानते हैं। परन्तु जीवन को सार्थक कैसे बनाना, यह केवल मानव जीवन में ही संभव होता है। सृष्टि में मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसको पाँचों इन्द्रियों के साथ मन, मस्तिष्क, चेतना और विवेक की सर्वोच्य अवस्था प्राप्त होती है, जिसमें जीवन का सर्वाधिक विकास सम्भव होता है। मानव इसी कारण सम्यक् चिन्तन कर अपनी क्षमताओं को पहचान, उसके अनुरूप जीवन का लक्ष्य बना जीवन जी सकता है।

इन सब प्रश्नों के जवाब आपको बाहर नहीं मिल सकते है। केवल भीतर की खोज ही एकमात्र विकल्प शेष रहता है। जीतने खोज और रिसर्च बाहर होते है उतने ही हमारे शरीर के भीतर बदलाव बनते है। इसलिए,
मानव जीवन अमूल्य है। वस्तु जितनी मूल्यवान होती है, उसका उपयोग उसके अनुरूप करने वाला ही सच्चा ज्ञानी होता है। चाय की जो प्याली पाँच रुपए में मिलती है, उसके लिए हज़ार रुपए देने वाला ना समझ होता है। वे सभी व्यक्ति बुद्धिमानों की श्रेणी में नहीं आते जो जानते हैं कि अमुक प्रवृत्ति उनके स्वास्थ्य अथवा जीवन के लिए हानिकारक है, फिर भी उनसे नहीं बचते और जो यह जानते है कि अमुक प्रवृत्तियों से शांति मिलती है, तनाव दूर होता है, निर्भयता आती है, स्वास्थ्य अच्छा रहता है, फिर भी उनकी उपेक्षा करते हैं। हमें चिन्तन करना होगा कि मानव जीवन के रूप में प्राप्त हम अपनी ऐसी अमूल्य क्षमताओं का अनावश्यक कार्यों में दुरुपयोग और अपव्यय तो नहीं कर रहे हैं? मानव योनि को व्यर्थ में ही बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं, ताकि भविष्य में अपनी मूर्खता पर पछताना पड़े? जब तक अपनी क्षमताओं का सही उपयोग नहीं होगा, दुःख और रोग के कारणों को नहीं समझा जाएगा तब तक हमारा जीवन अमर्यादित, अनियन्त्रित लक्ष्य-हीन, स्वच्छन्द, असंयमित होने से स्थायी स्वास्थ्य प्राप्त नहीं हो सकता।

स्वास्थ्य के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन करने से पूर्व तथा स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले विभिन्न तथ्यों की चर्चा करने से पूर्व स्वास्थ्य क्या होता हैं और रोग किन-किन कारणों से हो सकते हैं? उनको जानना और समझना आवश्यक है ताकि स्वास्थ्य के अनुरूप जीवन शैली अपनायी जा सके और रोग के कारणों से यथा सम्भव बचा जा सके। मृत्यु के लिए सौ सर्पों के काटने की आवश्यकता नहीं होती। एक सर्प का काटा व्यक्ति भी कभी-कभी मर सकता है। ठीक उसी प्रकार कभी-कभी बहुत छोटी लगने वाली हमारी गलती अथवा उपेक्षावृत्ति भी भविष्य में रोग का बहुत बड़ा कारण बन जीवन की प्रसन्नता आनन्द सदैव के लिए समाप्त कर देती है।



स्वस्थ का मतलब होता है रोग-मुक्त जीवन स्वस्थता तन, मन और आत्मोत्साह के समन्वय का नाम है।

  • जब शरीर, मन, इन्द्रियाँ और आत्मा ताल से ताल मिला कर सन्तुलन से कार्य करते हैं, तब ही अच्छा स्वास्थ्य कहलाता है।
  • शरीर की समस्त प्रणालियाँ एवं सभी अवयव स्वतन्त्रतापूर्वक अपना-अपना कार्य करें।
  • किसी के भी कार्य में किसी भी प्रकार का अवरोध, आलस्य अथवा निष्क्रियता न हो तथा उनको चलाने हेतु किसी बाह्य दवा अथवा उपकरणों की आवश्यकता न पड़े।
  • मन और पाँचों इन्द्रियाँ सशक्त हो।
  • स्मरण शक्ति अच्छी हो।
  • क्षमताओं का ज्ञान हो ।
  • विवेक जागृत हो।
  • लक्ष्य सही और विकासोन्मुख हो तथा जीवन में स्थायी आनन्द, शांति, प्रसन्नता बढ़ाने वाला हो।
  • तनाव, चिन्ता, निराशा, भय, अनैतिकता, हिंसा, झूठ, चोरी, व्याभिचार, तृष्णा आदि दुःख के कारणों को बढ़ाने वाला प्राथमिकताएँ सही हो एवं उसके अनुरूप संयमित, नियमित नियन्त्रित जीवनचर्या हो।
  • आवश्यकता की क्रियान्विति और अनावश्यक की उपेक्षा का स्वविवेक हो।
  • मन का चिन्तन और आचरण सम्यक् एवं संयमित हो। मन में बेचैनी न हो। इन्द्रियों की विषय विकारों में आसक्ति न हो।
  • समस्त प्रवृत्तियाँ सहज और स्वाभाविक हो, अस्वाभाविक न हो अर्थात् जिसका पाचन और श्वसन बराबर हो, नियमित हो, सन्तुलित हो।
  • अनुपयोगी अनावश्यक विजातीय तत्त्वों का शरीर से विसर्जन सही हो। भूख प्राकृतिक लगती हो ।
  • निद्रा स्वाभाविक आती हो। पसीना गन्ध-हीन हो। त्वचा मुलायम हो, बदन गठीला हो।
  • सीधी कमर, खिला हुआ चेहरा और आँखों में तेज हो। नाड़ी, मज्जा, अस्थि, प्रजनन, लसिका, रक्त परिभ्रमण आदि तंत्र शक्तिशाली हो तथा अपना कार्य पूर्ण क्षमता से करने में सक्षम हो जो निस्पृही तथा निरंहकारी हो।
  • जो आत्मविश्वासी, दृढ़ मनोवली, सहनशील, धैर्यवान, निर्भय, साहसी और जीवन के प्रति उत्साही हो।
  • जिसके सभी कार्य समय पर होते हो तथा जीवन नियमबद्ध हो । वास्तव में पूर्ण स्वस्थता के मापदण्ड तो यही हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं के स्वास्थ्य की स्थिति पर अवश्य चिन्तन करना चाहिए। जो-जो बातें उसके स्वयं के नियन्त्रण में होती हैं, उसके अनुरूप अपनी जीवनशैली बनाने का प्रयास करना चाहिए। परन्तु आज स्वास्थ्य का परामर्श देते समय अथवा रोग की अवस्था में निदान करते समय प्रायः कोई भी चिकित्सक अथवा स्वास्थ्य विशेषज्ञ व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले विविध कारणों का समग्रता से विश्लेषण नहीं करते। सत्य की पूर्णतः अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती। वह तो व्यक्ति के स्वयं की अनुभूति का विषय होता है। जो भी देखा जाता है, सुना जाता है, कथन किया जाता है, यन्त्रों अथवा परीक्षणों से पता लगाया जाता है वह सत्याश ही होता है। चिकित्सकों द्वारा किया गया ऐसा निदान और परामर्श सदैव कैसे शत-प्रतिशत सत्य और पूर्ण हो सकता है, अपने आपको स्वस्थ रखने की कामना रखने वालों से सम्यक् चिन्तन की अपेक्षा रखता है। अतः स्वस्थ रहने हेतु व्यक्ति के स्वयं की सजगता, विवेक, बुद्धि स्वावलम्बन जीवन पद्धति तथा स्वयं की स्वयं द्वारा नियमित समीक्षा, पूर्ण स्वस्थता की प्राप्ति के लिए अनिवार्य होती है। पराधीन अथवा दूसरों पर आश्रित रहने वाला व्यक्ति स्थायी स्वास्थ्य को प्राप्त नहीं कर सकता है।


आज चिकित्सा करवाते समय उपचार की प्रासंगिकता के बारे में प्रायः रोगी तनिक भी चिन्तन-मनन नहीं करते। चिकित्सक से निदान की सत्यता के संबंध में अपनी शंकाओं और उपचार से पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में स्पष्टीकरण नहीं लेते। रोग का मूल कारण जाने बिना उपचार प्रारम्भ करवा देते हैं। आज यह दवा, कल दूसरी, परसों तीसरी दवा। आज यह चिकित्सक, कल दूसरा चिकित्सक, परसों अन्य चिकित्सक कभी यह अस्पताल, कभी दूसरा अस्पताल तो कभी अन्य अस्पताल आज एक चिकित्सा पद्धति, चन्द रोज बाद दूसरी पद्धति और अगर रोग मुक्त न हो तो न जाने कितनी कितनी चिकित्सा पद्धतियाँ बदलते संकोच नहीं करते। स्वयं की असजगता, अविवेक और सही चिन्तन न होने से हमारी सोच लुभावने विज्ञापनों, डॉक्टरों के पास पड़ने वाली भीड़ से प्रभावित होती है। हम असहाय, हताश वन चिकित्सकों की प्रयोगशाला बनते तनिक भी संकोच नहीं करते। आज अधिकांश असाध्य एवं संक्रामक रोगों का एक मुख्य कारण, प्रारम्भिक अवस्था में गलत उपचार से पड़ने वाले दुष्प्रभाव होते हैं, जिसकी तरफ शायद ही किसी का ध्यान जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चलाये जा रहे रोग नियन्त्रक कार्यक्रम से पड़ने वाले दुष्प्रभाव की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।

वैश्विक महामारी के बाद दवा इंजेक्शन और वैक्सीन की जबरदस्ती आने वाले दुष्प्रभाव को आमंत्रण दे रही है। जबरदस्ती टिका कारण का विरोध होना ही चाहिए। उनसे पड़ने वाले दुष्प्रभावों की क्षति पूर्ति के कारण लोग अकारण बीमार पड़ रहे है। उपचार हेतु सही दृष्टिकोण आवश्यक है। अन्यथा हमे जीवन जीने के लिए फार्मेसी कंपनी यो पर आधारित रहना होगा। यह किसी षडयंत्र से कम तो नहीं है। खुद का स्वस्थ खुद के हाथों में है।

क्या हमारा श्वास अन्य व्यक्ति ले सकता है? क्या हमारा भोजन अन्य कोई पचा सकता है? क्या दूसरों के खाने से और पानी पीने से हमारी भूख अथवा प्यास शान्त हो सकती है? दूसरों की आँखों से हम नहीं देख सकते, दूसरों के कानों से हम नहीं सुन सकते, दूसरों के पैरों से हम नहीं चल सकते अपने स्वयं की गतिविधियों के संचालन, नियन्त्रण आदि से जितने हम स्वयं परिचित होते हैं, उतना प्राय: दूसरा व्यक्ति परिचित हो नहीं सकता। हम क्यों तनावग्रस्त, चिन्तित, निराश भयभीत हैं? उनका सही विश्लेषण अन्य व्यक्ति अथवा यंत्र नहीं कर सकता। हम स्वयं अपने खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार और गलत जीवनचर्या के अप्राकृतिक तरीकों से रोगों को आमन्त्रित करते हैं, परन्तु दवा और डॉक्टर से पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्ति की कामना रखते हैं। कितना भ्रम है? डॉक्टर एवं दवा मात्र सहयोगी की भूमिका निभा सकते हैं, परन्तु जब तक हमारा शरीर उस सहयोग को स्वीकार नहीं करेगा, तब तक अच्छे से अच्छी दवा तथा बड़े से बड़ा चिकित्सक हमें पूर्ण स्वस्थ नहीं बना सकता। मात्र आंशिक राहत पहुँचा सकता है। स्वास्थ्य को बनाए रखने में स्वयं की सजगता, सम्यक् चिन्तन और सम्यक् पुरुषार्थ की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। मानसिक असन्तुलन अथवा रोग का आभास होने की स्थिति में रोगी को पिछले 48 घंटों की अपनी गतिविधियों की समीक्षा करनी चाहिए। हमें स्वयं ही अपनी गलती का पता चल जायेगा, जिसके कारण रोग का प्रारम्भ हुआ है। रोग की प्रारम्भिक अवस्था में हमें जो संकेत मिलते हैं, उनकी समीक्षा करें तथा भोजन, पानी, हवा के ग्रहण करने में होने वाली भूलों को सुधारने हेतु आवश्यक संशोधन करें, कारण मालूम पड़ते ही समाधान ढूंढना अथवा उपचार सरल हो जाएगा। स्वस्थ रहने की कामना रखने वालों को प्रतिदिन अपने स्वास्थ्य की समीक्षा करनी चाहिए।

मानव शरीर की तुलना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्वचलित यंत्रों से की जा सकती है। स्वचालित यंत्रों के साथ जितनी कम छेड़-छाड़ की जाए उतना अच्छा होता है। मनुष्य के अलावा अधिकांश चेतनाशील प्राणी में सहज जीवन जीने के कारण अपेक्षाकृत कम रोगग्रस्त होते हैं। उन्हें अपने शरीर का विशेष ज्ञान भी नहीं होता। रोजाना दांतुन न करने के बावजूद उनके दाँत मनुष्य की भांति जल्दी खराब नहीं होते। उन्हें देखने के लिए चश्में की आवश्यकता नहीं होती। नवजात बालक भी सहज जीवन जीता है। उसकी अधिकांश शारीरिक बाह्य क्रियाएँ स्वाभाविक और प्राकृतिक होती है। उससे भी हम स्वस्थ रहने की काफी बाते सीख सकते हैं। उसमें किसी के प्रति न राग होता है और न द्वेष, इसी कारण बच्चा सभी को प्यारा लगता है। वह जब श्वास लेता है तो उसका पेट पूरा फूलता है अर्थात् वह गहरा और पूरा श्वास होता है। यदि हम बच्चे की भाँति सदैव गहरा और पूर्ण श्वास लेना प्रारम्भ कर दें तो अनेकों स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का स्वतः समाधान हो जायेगा। बच्चा जब सोता है तो सिर्फ सोता ही है। निश्चिन्त होकर सोता है, परन्तु कुछ लोग निद्रा में भी कुछ न कुछ चिन्तन करते रहते हैं। बच्चा कहीं नहीं जा सकता। चल-फिर नहीं सकता। फिर उसका पाचन कैसे होता है? उसका विकास इतना जल्दी क्यों और कैसे होता है? आखिर वह क्या व्यायाम करता है? हम प्राय: देखते है बच्चा पैरों को चलाता है, उसका पाचन और मल-मूत्र विसर्जन तंत्र ठीक से कार्य करता है। यदि हम भी नियमित रूप से ऐसा व्यायाम करना आरम्भ कर दें तो हम पाचन सम्बन्धी काफी रोगों से बच जाएँगे। पैरों में ऊर्जा का प्रवाह बराबर होने से घुटनों और पैरों सम्बन्धी अन्य रोगों की सम्भावना नहीं रहेगी।

बच्चा झूठ नहीं बोलता यदि हम भी सत्य का आचरण करें तो जीवन में निर्भयता आ सकती है। अनैतिकता, मायावृति, छल कपट, अहं स्वतः समाप्त हो जाता है, जो मानसिक रोगों का मुख्य कारण है। इन सभी बातों की शिक्षा बच्चे को कहाँ से मिलती है? यदि हम भी प्रकृति के साथ सहज जीवन जीना प्रारम्भ कर दें और शरीर के साथ, अनावश्यक छेड़छाड़ न करें तो हमारा स्वास्थ्य हमारे अनुकूल होगा तथा किसी कारणवश रोग होने की अवस्था में भी हम पुनः जल्दी स्वस्थ हो सकेंगे। हम स्वयं अपनी प्राथमिकताओं का चयन करें-“स्वस्थ बने या रोगी”
स्वस्थता हेतु जीवन में हल्कापन अनिवार्य हैं। सरलता, लघुता, हल्कापन स्वास्थ्य का प्रथम लक्षण है। अस्वस्थता से पूर्व हमें शरीर में भारीपन का अनुभव होने लगता है। बेचैनी लगने लगती है। जैसे ही शरीर हल्का अनुभव करने लगता है, हम स्वस्थता का अनुभव करने लगते हैं। जब हमारे संस्कारों और वृत्तियों में निष्कपटता आने लगती हैं, हम अपने आपको निर्भय, तनाव मुक्त और हल्का अनुभव करने लगते हैं। भारीपन क्यों, कब और कैसे आता है? उसके समझे बिना तथा उन कारणों से बचे बिना हल्केपन की प्राप्ति कठिन होती है।

हम जो कार्य करते हैं उसका उतना भार नहीं होता, जितना भार होता है उस कार्य की स्मृति अथवा कल्पना का वर्तमान का क्षण बहुत विचित्र होता है। अतः यदि भूत की स्मृति और भविष्य की कल्पना न की जाये तो मानसिक असंतुलन के दोषों से सहज ही बचा जा सकता है। कहा भी है-“भूत सपना है, भविष्य कल्पना है, और वर्तमान अपना है।” दुःख की स्मृति और कल्पना का अनावश्यक चिंतन भी मानसिक भारीपन का प्रमुख कारण होता है। अतः यदि वर्तमान में सहज जीना सीख लें तो हमारी अनेक समस्याओं का समाधान सहज संभव हो जाता है।


एक ही मिट्टी, पानी, हवा, धूप और परिश्रम के बावजूद पास-पास विकसित होने वाले गन्ने में इतना मिठास और नीम में इतना कड़वापन क्यों ? कारण स्पष्ट है, हम अपनी क्षमताओं से पूर्णतया परिचित नहीं है। जिसने उसको समझा, सदुपयोग किया उसने हमारे सामने सम्यक् चिन्तन करने की प्रेरणा अवश्य प्रस्तुत की। आधुनिक स्वास्थ्य वैज्ञानिक शरीर के सूक्ष्मतम भाग का यंत्रों और रासायनिक परीक्षणों द्वारा निरीक्षण और परीक्षण कर शरीर की गतिविधियों को समझने और समझाने का प्रयास कर रहे हैं, परन्तु आत्मा अरूपी है, निराकारी है, जिसको देखना सम्भव नहीं। आत्मा में अनन्त शक्तियाँ हैं, जो उसकी शुद्धावस्था में प्रकट होती हैं। जब आत्मा पूर्ण शुद्ध हो जाती है तो उसमें सृष्टि की समस्त प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष घटनाएँ दर्पण की भाँति प्रतिबिम्बित होने लगती हैं। आत्मा परमात्मा बन जाती है। ऐसी अवस्था को वीतराग अवस्था अथवा केवल ज्ञान की स्थिति कहते हैं। जहाँ सारा अज्ञान दूर हो जाता है, केवल ज्ञान ही शेष रहता है। सम्पूर्ण आत्मानुभूति की अवस्था में आज की भौतिक जानकारी तो होती ही है, परन्तु उससे भी आगे ब्रह्माण्ड के भूत, भविष्य एवं वर्तमान की सूक्ष्मतम एवं सम्पूर्ण जानकारी भी होती है। वे ही वास्तव में सच्चे एवं बड़े वैज्ञानिक होते हैं, और उनका कथन ही वैज्ञानिक होता है, वे सत्य के प्रेरणा स्रोत होते हैं। उनका उपदेश न केवल भौतिक उपलब्धियों तक ही सीमित होता है, अपितु जीवन के परम लक्ष्य तक का मार्ग दर्शन करता है। उसमें नर से नारायण, आत्मा को परमात्मा बनाने की क्षमता होती है। मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य, शांति और समाधि के लिए ऐसे महापुरुषों के निर्देशानुसार विवेक पूर्ण जीवनचर्या आवश्यक होती है। उसके विपरीत आचरण कर शरीर को स्वस्थ रखने की कल्पना शारीरिक रोगों से भले ही क्षणिक आंशिक राहत दिला दें, अन्त हानिकारक होती है, भविष्य के लिए कष्टदायक हो सकती है।

प्रश्न खड़ा होता है कि बिना शरीर विज्ञान की विशेष अथवा पूर्ण जानकारी के क्या स्वस्थ नहीं रहा जा सकता? क्या मात्र साधारण, सरल परन्तु आवश्यक जानकारी, मूल सैद्धान्तिक नियमों का पालन कर हम स्वस्थ जीवन नहीं जी सकते? क्या अनुभवी चिकित्सक एवं दूसरों के रोगों का उपचार करने वाले स्वास्थ्य विशेषज्ञ शरीर की विशेष जानकारी के बावजूद बीमार नहीं होते? जिस प्रकार बिजली का बटन चालू करते ही बल्ब से हमें प्रकाश मिलने लगता है। बटन चालू करने की प्रक्रिया बहुत ही सरल और सहज होती है, जिसे जनसाधारण आसानी से सीख सकता है। बटन चालू करने से पूर्व बिजली घर से बिजली के उपयोग करने की स्वीकृति नहीं लेनी पड़ती है। बिजली का के तारों को यह जानने की आवश्यकता नहीं होती कि बिजली का आविष्कार किसने किया? उसको यह जानने की भी आवश्यकता नहीं होती कि बिजली का प्रवाह कैसे होता है ? बटन चालू करने की विधि के साथ बिजली के उपकरण का प्लग से सम्बन्ध जोड़ना, बिजली के तारों को न छूना, फ्यूज बदलने जैसी सामान्य जानकारी रखने वाला बिजली का अधिकाधिक उपयोग कर सकता है। ठीक उसी प्रकार शारीरिक अवयवों की सम्पूर्ण जानकारी के आवश्यक मूलभूत चन्द सिद्धान्तों और नियमों जैसे- जीवन के लिए आवश्यक भोजन, पानी, हवा, धूप का प्रयोग कब, कहाँ और कैसे करना, प्रकृति के अनुकूल दिनचर्या और रात्रिचर्या, व्यायाम, आराम, स्वाध्याय, ध्यान, मौन की साधना कब और कैसे करना तथा सन्तुलन कैसे बनाये रखना और सन्तुलन बिगाड़ने वाली बातों से कैसे बचना आदि का पालन कर कोई भी स्वस्थ जीवन जी सकेता है? सारांश यह है कि जनसाधारण को मात्र इतनी जानकारी हो जाए कि शरीर और मन का असन्तुलन क्यों और कैसे बिगड़ता है? शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति क्यों और कैसे कम होती है ? उससे कैसे बचा जा सकता है? शरीर की प्रतिकारात्मक शक्ति को कैसे बढ़ाया जा सकता है? शरीर, मन और आत्मा के विकारों को कैसे दूर किया जा सकता है? मात्र इतनी जानकारी रखने वाला और उसके अनुरूप आचरण करने वाला आसानी से स्वस्थ जीवन जी सकता है।

हमारा स्वास्थ हमारे हाथों में ही है। इसलिए कोई भी रोग बड़ा नहीं है। आपका संकल्प बड़ा हैं। आपकी संकल्प शक्ति आपको नया उत्साह प्रदान करेगी। योग्य दिनचर्या के साथ आपको जीना है। विचारो में पवित्रता, आहार में सात्विकता महत्व पूर्ण है। सब से मूल बात निरोगी जीवन, रोग मुक्त जीवन, दवा मुक्त जीवन जीना हमारा मूलभूत अधिकार है।

आध्यात्म योग

ज्ञान, कर्म, और उपासना का संयोग है “आध्यात्म”

ज्ञान कर्म और उपासना, व्यक्ति इन तीनों से कभी भी खाली नहीं रहता। इन तीनों को शुद्ध बनाएं। तभी आपका इस जीवन का भविष्य तथा अगले जन्मों का भविष्य सुखदायक होगा। कर्मों का फल बहुत जटिल विषय है। बड़े-बड़े विद्वान इस विषय को ठीक से समझ नहीं पाते। ऋषियों ने वेदों का गहराई से अध्ययन किया, चिंतन मनन किया, और कर्मफल के विषय में कुछ बातें सबके सामने प्रस्तुत की।”उनके अनुसार यह सार है, कि जो भी व्यक्ति, जो भी कर्म करता है, उसको उसका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। फल भोगने में कोई भी छुटकारा नहीं है। जैसे बिजली की तार छूने से करंट लगता है। इसमें एक बार भी माफी नहीं होती। ऐसे ही कर्म फल में, ईश्वर के कानून में, कहीं भी कोई भी माफी नहीं होती।थोड़े कर्म का थोड़ा फल। अधिक कर्म का अधिक फल। अच्छे कर्म का अच्छा फल। बुरे कर्म का बुरा फल, मिलता अवश्य है। अपने सही समय पर मिलता है। किस कर्म का फल कब कहां क्या और कैसे देना, इसका निर्धारण ईश्वर करता है। क्योंकि वही इस विषय को ठीक प्रकार से जानता है, और कर्मफल देने में समर्थ भी है।

जैसा कि ऊपर कहा है, उसके अनुसार ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था को समझें। अपने ज्ञान कर्म उपासना को ठीक करें। यदि आपका ज्ञान ठीक है, तो आपका कर्म भी ठीक होगा। और उपासना भी ठीक होगी। यदि ज्ञान में गड़बड़ है, तो कर्म और उपासना में भी गड़बड़ रहेगी। आपका ज्ञान कर्म उपासना ठीक है या नहीं, इसकी कसौटी ईश्वर का संविधान वेद है। इसलिए वेदों को पढ़ना आवश्यक है।वहीं से पता चलेगा, कि आप का ज्ञान कर्म उपासना ठीक चल रहा है, या नहीं। क्योंकि इसी पर आपका भविष्य टिका है।

अध्यात्म एक ऐसा विज्ञान है, जिसमें सुनिश्चित साधनात्मक विधान को अपनाते हुए दो प्रयोजन सिद्ध किए जाते हैं। एक है-अंतराल की प्रसुप्त विभूतियों का जागरण और दूसरा है-अनंत ब्रह्मांड में व्याप्त ब्राह्मी चेतना का अनुग्रह अवतरण। इसको संभव करने के लिए साधक को दो कदम बढ़ाने होते हैं, जिनके नाम हैं-तप और योग । तप में जहाँ चित्त का परिशोधन होता है तो वहीं योग में चेतना का परिष्कार। परिशोधन अर्थात संचित कर्म का, कुसंस्कारों का दुष्कर्मों के प्रारब्ध संचय का निराकरण। वहीं परिष्कार का अर्थ है- श्रेष्ठता का जागरण, अभिवर्द्धन इस तरह तपश्चर्या एवं योग साधना के दो चरणों को अपनाते हुए अध्यात्म का प्रयोजन पूरा किया जाता है। तप को शरीर तक सीमित समझना नादानी होगी। इसका दायरा शरीर से आगे बढ़कर प्राण एवं मन तक विस्तृत है अर्थात पूरा अस्तित्व इसके कार्यक्षेत्र में आता है। तप की यह प्रक्रिया संयम, परिशोधन एवं जागरण के तीन चरणों में पूरी होती है। संयम में दैनिक जीवन की ऊर्जा के क्षरण को रोकते हुए उसे संचित किया जाता है, और इसका नियोजन महत्त्वपूर्ण एवं श्रेष्ठ कार्यों में किया जाता है। इनको 4 स्वरूपों में देखेंगे इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम।

इंद्रिय संयम में पाँच ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को परिष्कृत एवं सुनियोजित किया जाता है, जिससे तन-मन की सामर्थ्य भंडार के अपव्यय को रोककर प्रचंड ऊर्जा का संचय किया जा सके। और इसका नियोजन आत्मबल संवर्द्धन के उच्चस्तरीय प्रयोजन के निमित्त किया जा सके। इंद्रिय संयम की परिणति अर्थ संयम के रूप में होती है। धन एक तरह की शक्ति है, जो श्रम, समय एवं मनोयोग की सूक्ष्म विभूतियों का स्थूल रूप है। इसके संयम के साथ इन सूक्ष्म विभूतियों का उच्चस्तरीय उपयोग संभव होता है। धन को जीवनोपयोगी समाजोपयोगी शक्ति माना जाना चाहिए। और एक-एक पैसे का मात्र योग्य कार्यों में उपयोग होना चाहिए। समय संयम-ईश्वर द्वारा मनुष्य को सौंपी गई समयरूपी विभूति के सदुपयोग का विधान है, जिसके आधार पर विभिन्न प्रकार की भौतिक एवं आत्मिक विभूतियाँ सफलताएँ- संपदाएँ अर्जित कर सकना संभव होता है। इसके सही नियोजन के अभाव में समूची जीवन-ऊर्जा इधर-उधर बिखरकर नष्ट हो जाती है।
विचार संयम-मन की अपरिमित ऊर्जा के संयम एवं नियोजन का विज्ञान है, जिसके अभाव में इसकी अद्भुत क्षमता बिखरकर यों ही नष्ट होती रहती है। अनैतिक विचार न केवल मन को बहुत खोखला बनाते हैं, बल्कि ऐसी मनोग्रंथियों को जन्म देते हैं, जिनसे आत्मविकास का मार्ग सदा-सदा के लिए अवरुद्ध हो जाए। विचारशक्ति को भी उच्चस्तरीय संपदा माना जाए और चिंतन की एक-एक लहर को रचनात्मक दिशाधारा में प्रवाहित करने का जी-तोड़ परिश्रम किया जाए।

संयम के बाद तप के अंतर्गत परिशोधन का दूसरा महत्त्वपूर्ण चरण आता है। जीवन ऊर्जा की आवश्यक मात्रा को संचित किए बिना इसे कर पाना संभव नहीं होता। संग्रहित प्राण-ऊर्जा के द्वारा अचेतन मन की ग्रंथियों को खोलना तथा जन्म-जन्मांतर के कर्मबीजों को दग्ध करना इस प्रक्रिया में सम्मिलित हैं। मानवीय व्यक्तित्व को विघटित कर रही शारीरिक और मानसिक परेशानियों का कारण अचेतन मन की ये ग्रंथियाँ ही होती हैं, जिनमें अवरुद्ध ऊर्जा विकास के स्थान पर विनाश के दृश्य उपस्थित कर रही होती है। हर तरह के शारीरिक एवं मानसिक रोग इनके कारण व्यक्ति के जीवन को आक्रांत किए रहते हैं। चित्त की इन ग्रंथियों के परिशोधन के लिए अनेक तरह की तपश्चर्याओं का विधान है। अनेकों तपो का विधान विधित है, जिनको अपनाने पर अंतःकरण में जड़ जमाए कुसंस्कारों का परिमार्जन होता है तथा इसमें छिपी हुई सुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं व दिव्य सतोगुण का विकास होता है।

तप कुछ इस प्रकार से हैं—

  1. अस्वाद तप,
  2. तितीक्षा तप,
  3. कर्षण तप,
  4. उपवास,
  5. गव्य कल्प तप,
  6. प्रदातव्य तप,
  7. निष्कासन तप,
  8. साधना तप,
  9. ब्रह्मचर्य तप,
  10. चांद्रायण तप,
  11. मौन तप
  12. अर्जन तप

इनको अपनाने पर तन-मन के मल-विकारों की सफाई होती है; जिससे नस-नाड़ियों में रक्त का नया संचार होने लगता है एवं शारीरिक तंत्र नई स्फूर्ति से काम करने लगता है। साथ ही सूक्ष्मनाड़ियों में नव-प्राण का संचार होने लगता है और चित्त में जड़ जमाए विकारों का परिमार्जन होता है। तप के अंतर्गत परिशोधन के बाद फिर जागरण की प्रक्रिया आती है। अचेतन ग्रंथियों में अवरुद्ध जीवन- ऊर्जा के मुक्त होने पर अंतर्निहित क्षमताओं के जागरण का क्रम शुरू होता है। इसके प्रथम चरण में प्रतिभा, साहस, आत्मबल जैसी विभूतियाँ प्रस्फुटित होने लगती हैं। साथ ही मानवीय अस्तित्व के उन शक्ति संस्थानों के जाग्रत होने का क्रम प्रारंभ हो जाता है, जिनके द्वारा मनुष्य अनंत ब्राह्मीचेतना के प्रवाह को स्वयं में धारण करने में सक्षम होने लगता है। मानवीय चेतना में निहित ऋद्धि-सिद्धि के रूप में वर्णित अतींद्रिय शक्तियाँ एवं अलौकिक क्षमताएँ प्रकट होने लगती हैं। यहाँ तप के साथ योग का समन्वय जीवन-साधना को संपूर्ण का अनुभव देता है। तप एक तरह के अर्जन की प्रक्रिया है तो योग समर्पण और विसर्जन का विधान है। तप में व्यक्ति की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण एवं ऋद्धि- सिद्धियों के अर्जन के साथ अहंकार फूल सकता है, अध्यात्म पथ में विचलन आ सकता है, लेकिन योग इस दुर्घटना से बचाता है; क्योंकि इसमें अहंकार का समर्पण एवं विसर्जन होता है। यह अहं तक सीमित आत्मसत्ता के संकीर्ण दायरे को विराट अस्तित्व से जोड़ने व आत्मविस्तार की प्रक्रिया है।


भक्तियोग में जहाँ साधक अपने इष्ट-आराध्य एवं भगवान से जुड़कर इस स्थिति को पाता है, वहीं ज्ञानी आत्मा और ब्रह्म की एकता को स्थापित करते हुए अद्वैत की अवस्था को प्राप्त होता है। वहीं कर्मयोगी विराट ब्रह्म को सृष्टि में निहारते हुए निष्काम कर्म के साथ जीवन की व्यापकता को साधता है। ध्यानयोगी अष्टांगयोग की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए समाधि की अवस्था को प्राप्त होता है तथा जीवन के सकल समाधान को पाता है। इस तरह तप जहाँ जीवन-साधना का प्राथमिक आधार रहता है तो वहीं योग इसको निष्कर्ष तक ले जाने वाला अंतिम सोपान है। दोनों मिलकर जीवन-साधना को पूर्णता देते हैं और व्यक्ति को आत्मसिद्धि एवं मुक्ति के चरम उत्कर्ष तक ले जाते हैं। इस तरह तप और योग से युक्त पथ आध्यात्मिक जीवन का सुनिश्चित विज्ञान है, जो सकल सृष्टि के लिए वरदानस्वरूप होता है।

Miracles of words!

समर्थ गुरु रामदास का यह कथन सत्य है कि संसार भर में हमारे मित्र मौजूद हैं; किन्तु उन्हें प्राप्त करने की कुंजी जिह्वा के “कपाट” में बन्द है। मनुष्य की शिक्षा, सभ्यता, संस्कृति, बुद्धिमत्ता, चतुरता, विचारशीलता एवं दूरदर्शिता उसकी वाणी के माध्यम से ही दूसरों पर प्रकट होती रहती है। समाज में प्रतिष्ठा और प्रामाणिकता प्राप्त करने के लिए वाणी का परिष्कृत होना आवश्यक है। निन्दा करते रहने या कठिनाई के विरुद्ध खेद व्यक्त करने से सिर्फ नकारात्मकता ही बढ़ेगी। हमें रचनात्मक उपाय खोजने-पूछने पड़ेंगे, जो मुख्य सहयोग पर ही निर्भर हों। सहयोग उसी को मिलता है, जो मुँह खोलकर अपनी पात्रता सिद्ध कर सकता है।



बाइबिल में लिखा है-

“जरा परखो तो कि न्याययुक्त शब्दों में कितनी शक्ति भरी पड़ी है।”

एमर्सन कहते थे-

“भाषण एक शक्ति है। उसका प्रयोग अवांछनीयता से विलग करने और श्रेष्ठता की ओर बढ़ने का प्रोत्साहन देने के लिए ही किया जाना चाहिए।”

प्लेटो ने लिखा है-

“मानवी मस्तिष्कों पर शासन कर सकने की क्षमता भाषण शक्ति में सन्निहित है।”

किपलिंग की उक्ति है-”

शब्द मानव समाज द्वारा प्रयोग में लाया जाने वाला सर्वोत्तम रसायन है।”

विचारों की शक्ति संसार की सर्वोपरि शक्ति है। उसी के सहारे नर-पशु से भी गई-बीती स्थिति में पड़ा व्यक्ति प्रगति की दिशा में अग्रसर होता है और विविध प्रकार उपलब्धियो का अधिकारी बनता है। महामानवों की गरिमा, भौतिक क्षेत्र में हुआ समृद्ध ज्ञान और विज्ञान द्वारा उत्पन्न सुख-साधन प्रगति के अनेकानेक सोपान, शान्ति और सुव्यवस्था के आचार-विचार वृक्ष पर लगे हुए फल हैं। मानवी प्रगति का मूलभूत आधार भी कह सकते हैं। तत्त्वदर्शी विचारों की गरिमा का विवेचन हुए आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि अदृश्य शक्ति ने इस संसार को किस प्रकार सुन्दर गुलदस्ते की तरह सुन्दर है कर दिया है। “एना हैप्सटन” ने लिखा है-“ईश्वर की इस दुनिया में तार से चन्द्रमा, बादल, पर्वत, पुष्प और चित्र-विचित्र प्राणियों का सौर पग-पग पर बिखरा पड़ा है, पर शब्दों के समान और कोई अमुल्य वस्तु इस लोक में है नहीं।”

ई० डब्ल्यू विल्कोक्स कहते हैं-“मेरी धारणा है कि विचार निर्जिव नहीं, उनमें शक्ति हैं। उनमें बल भी है और पंख भी। संसार भर में भलाई और बुराई को एक स्थान से दूसरे स्थान पर हो देखे जा सकते हैं।

पोप विक्टार कहा करते थे-“काम इतने शक्तिशाली नहीं होते, जितने विचार। किसी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि का इतिहास उस समय में फैले हुए विचारों के आधार पर ही लिखा जाना चाहिए।”

अलबर्ट स्वाइट्जर ने विचार-शक्ति को युद्ध से भी अधिक फलप्रद और शक्तिशाली सिद्ध करते हुए कहा है-‘आज परिष्कृत विचारों का नितान्त अभाव दीखता है। हमने ऐसे प्रश्नों पर युद्ध डाले जिनका हल युक्तिवाद के सहारे वार्तालाप से निकाला ज सकता था। विचारों की दृष्टी से जो नहीं जीत सका, यह जीत जाने पर भी पराजित ही रहेगा।

मनीषियों को अपनी जान सम्पदा अपने तक ही सीमित नहीं रखनी चाहिए, उसका लाभ दूसरों तक पहुँचाना चाहिये। इसी में उनके स्वाध्याय एवं मनन-चिन्तन की सार्थकता है। समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन तत्वदर्शी लोग इसी प्रकार कर सकते हैं कि, वे जनमानस का स्तर निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न करते रहें, उसे नीचे न गिरने दें, विद्वान, संन्यासी और तत्वज्ञानी सदा से लोक उद्बोधन में निरन्तर रहकर जनता को मार्ग दिखा रहे हैं। ऐसी ही उनके लिए वेद और गुरू सत्ता की आज्ञा भी है।



तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत। इन्द्रस्य वज्रात् तीक्ष्णीयांसो येषामस्मि पुरोहितः ॥

अथर्व ३/११/४

‘पुरोहित ऐसे प्रवचन करे, जिससे लोग क्रियाशील, तेजस्वी, विवेकवान् और उपकारी बनें। वे अधोगामी न होने पायें।”


शचीभिर्नः शचीवसू दिवा नक्तं दशस्यतम् । मावां रातिरूप दसत्कदा चनास्पद्रातिः कदा चन॥

ऋग्वेद १/१३९/५

‘अध्यापक तथा उपदेशक लोगों को उत्तम धर्मनीति और सदाचार की शिक्षा दिया करें, ताकि किसी की उदारता नष्ट न हो।”

इतिहास साक्षी है कि वक्तृत्व शक्ति के सहारे कितने ही मनस्वी लोगों ने जन साधारण में हलचलें उत्पन्न की और उनके माध्यम से क्रान्तिकारी परिणाम प्रस्तुत हुए। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानंद, दयानन्द, गुरु रामदास, गुरु गोविन्द सिंह, विनोबा भावे आदि आचार्यों द्वारा धर्मक्षेत्र में। और सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाजपतराय, मालवीय, तिलक, सुभाष आदि नेताओं ने राजनीति के क्षेत्र हलचलें उत्पन्न की और उनकी प्रतिक्रिया कैसे परिर्वतन सामने लाई, यह किसी से छिपी नहीं है। संसार के हर कोने में लोग हुए हैं, जिन्होंने अपने क्षेत्रों की सामयिक समस्याओं का हल करने के लिये वाक शक्ति पाई। ऐसे लोगों में डिमास्थनीज, टूलियस, सिसरो, नेपोलियन, मार्टिन लूथर, अब्राहम लिंकन, वाशिंगटन, लेलिन, स्टालिन, हिटलर, मुसोलिनी, चर्चिल आदि के नाम गिनाये जा सकते हैं।

कई बार कुशल वक्ताओं द्वारा उत्पन्न की गई प्रभावोत्पादकता देखते ही बनती है। सुनने वालों का दिल उछलने लगता है। रोमांचित होते, जोश में आते दीखते हैं। भुजाएँ फड़कने लगती है। और आँखों में उनकी भाव विभोरता का आवेश झाँकता है। सुनने वालों को हँसना, रुलाना, उछालना,गरम या ठंडा कर कुशल वक्ता की अपनी विशेषता होती है। जिसे यह रहस्य विदित होता है और उसका अभ्यास अनुभव है, उसे जनता के मन मस्तिष्कों पर शासन करते देखा जा सकता है। परिमार्जित वक्तृता में एक प्रकार की विद्युतधारा सनसनाती हुई रहती है। उच्चारण की गति, शब्दों का गठन, भावों का समन्वय घटनाक्रम का प्रस्तुतीकरण तर्क और प्रमाणों का तारतम्य, भावनाओं का समावेश रहने से वक्त का प्रतिपादन इतना हृदयस्पर्शी हो जाता है कि सुनने वालों के अपनी मनःस्थिति को उसी की अनुगामिनी बनाने के लिए विवश होना पड़ता है। नेपोलियन की वाणी में जादू था, वह जिससे बात करता को अपना बना लेता था। उसके निर्देशों को टालने की कभी किसी की हिम्मत नहीं हुई। वह जब बोलता तो साथियों में जोश भर देता था।

और वे मन्त्र मुग्ध होकर आदेशों का पालन करने के लिए, प्राणपण से जुट जाते थे। हिटलर जब बोलता था तो जर्मन नागरिकों के खून खौला देता था। लेनिन ने दबी- पिसी रूसी जनता को इतना उत्तेजित कर दिया कि उसने शक्तिशाली शासकों से टक्कर ली और उनका तख्ता पलट दिया। सुभाषचन्द्र बोस ने प्रवासी भारतीयों को लेकर आजाद हिन्द फौज ही खड़ी कर दी। मार्टिन लूथर ने पोपशाही पोंगा पंथी की गहरी जड़ों को खोखला करके रख दिया और यूरोप भर में धार्मिक क्रान्ति का नया स्वरूप खड़ा कर दिया। सावरकर जी ने भारतीय जनता को स्वतंत्रता संग्राम खड़ा कर देने में जो सफलता पाई, उसमें उनकी वक्तृत्व शक्ति का अद्भुत योगदान था। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का व्यक्तित्व आकर्षक न था। वे दुबले, लम्बे और कुरूप थे। घर बार की दृष्टि से भी वे निर्धनों में ही गिने जाते थे; पर उनकी भाषण प्रतिभा अनोखी थी। प्रधानता इसी गुण के कारण वे इतने लोकप्रिय हो सके और उस देश के राष्ट्रपति चुने जा सके। जब तक उनके पास भाषण की पर्याप्त सामग्री एकत्रित न हो जाती, तब तक वे कभी बोलना स्वीकार न करते।

भगवान् बुद्ध ने दुष्प्रवृत्तियों की बाढ़ को रोकने के लिए पैनी वाक्शक्ति का उपयोग किया। उनके प्रवचन बड़े मर्मस्पर्शी होते थे। यही कारण था कि उनके जीवन काल में ही लाखों व्यक्ति भिक्षु और भिक्षुणी बनकर, धर्मचक्र प्रवर्तन में अपनी समस्त सामर्थ्य झोंककर धर्म प्रचारक बन गये। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को जन्म देने, आगे बढ़ाने और सफल बनाने में जिन नेताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाही, वे सभी कुशल वक्ता थे। दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, रानाडे, गोखले, लोकमान्य तिलक, विपिन चन्द्रपाल, चितरंजन दास, सुभाषचन्द्र बोस, लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय, राजगोपालाचार्य, आदि के भाषणो में प्राण फुंकते थे। उनकी भाषा बड़ी ओजस्वी और मर्मस्पर्शी होती थी। वक्तृत्व कला की दृष्टि से उनके भाषण बड़े प्रभावशाली प्रवाहपूर्ण और प्रथम श्रेणी के माने जाते थे। उन लोगों की सफ़लता के कारण तलाश करने पर कुछ तथ्य स्पष्ट रूप से सामने जो लक्ष्य था, उसमें अनीति का विरोध करने के लिए प्रचंड पुरूषार्थ, अतुल्य साहस, मातृभूमि के लिए आत्मसमर्पण-लक्ष्य की ओर द्रुतगति है। चलने की तड़पन, स्वार्थ सिद्धि से कोसों दूर त्याग-बलिदान की प्रचण्ड निष्ठा जैसे भावनात्मक कारण मुख्य थे।

जिनके पीछे पानी का दबाव अधिक होता है, वे नदिया और झरने बड़ी तेजी से बहते हैं, उनकी लहरें, हिलोरें तथा ध्वनियों मनोहारिणी होती हैं। जिनके पीछे दबाव न हो, उनका पानी बहाता है; पर मन्दगति की निर्जीवता ही दिखाई देती है। यही बात भाषण के सम्बन्ध में है। वक्ता की भावनाएँ जितनी प्रचण्ड होंगी, विषय में उसकी निष्ठा, लगन, तत्परता, तन्मयता का जितना गहरा बीज होगा, उतना ही ओज वाणी में भरा होगा। समाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ, समर्थ रामदास, ऋषि दयानन्द, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राममोहन राय आदि के बड़े प्रभावशाली रहे हैं। सूर, तुलसी, कबीर, दादू, रैदास आदि के भजन सुनकर लोग भाव-विभोर हो उठते थे। उसमें कंठ स्वर अथवा कविता का शब्द गठन उतना उच्चस्तरीय नहीं जितना कि उनका तादात्म्य व्यक्तित्व। ऐसे लोगों की वाणी लड़खड़ाती भी हो और शब्दों का चयन उतना अच्छा न बन पड़े, तो भी लोग उस कमी पर ध्यान नहीं देते। गांधी जी के भाषण, भाषण कला की दृष्टि से उतने अच्छे नहीं होते, फिर भी उनका व्यक्तित्व वाणी के साथ घुला होने के कारण उन्हें लोग न केवल श्रद्धापूर्वक सुनते थे, वरन् बहुत अधिक प्रेरणा भी ग्रहण करते थे।



वक्ता, लेखक, कवि, गायक, अभिनेता आदि कलाकार माने जाते हैं। उनकी अभिव्यक्तियाँ बहुत कुछ इस बात पर निर्भर रहती हैं कि उन्हें स्वयं कैसी अनुभूतियाँ होती हैं। यदि उनका निज का अन्तःकरण नीरस और शुष्क हो, तो उनका भाषण, लेखन, कविता गायन, अभिनय आदि स्पष्टतः नीरस दिखाई पड़ेंगे। विद्वान् सदा से यही कहते रहे हैं कि जब भीतर से भावनाएँ फूट रही हों, तभी उनके प्रकटीकरण का साहस करना चाहिए। संसार के महामानव ओजस्वी वक्ता भी रहे हैं, इसे दो तरह कहा जा सकता है। वाक्शक्ति के कारण वे ऊँचे स्तर तक पहुँच सके अथवा उनका भावना प्रवाह ऊँचा होने के कारण वाणी में ओजस्विता उत्पन्न हुई। कहा किसी भी तरह जाए, वस्तुतः दोनों परस्पर अविच्छिन्न और अन्यान्योश्रित हैं। दोनों तथ्य पूर्णतया परस्पर घनिष्ठतापूर्वक मिले हुए हैं।

वाणी की ओजस्विता और भावनाओं की प्रखरता दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू कहना चाहिए। सही तरीका यह है कि जिसके भीतर ज्ञान और भाव का निर्झर फूटता हो, उसे अपनी अभिव्यक्ति करनी चाहिए। दूसरा तरीका आरम्भिक अभ्यास की दृष्टि से यह भी हो सकता है कि जब बोलना हो, तब प्रतिपाद्य विषय में अपनी सघन श्रद्धा और तत्परता उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए। स्वाभाविक न होने पर उसे लोग नाटकीय भी बताते हैं और उस आधार पर भी वाणी में प्रभाव उत्पन्न करते हैं। सोचने की बात है कि जब कृत्रिमता के बल पर लोग अपना काम चला लेते हैं और बहुत हद तक अभीष्ट सफलता प्राप्त कर लेते हैं, तो वास्तविकता होने पर कितना अधिक और अस्थाई प्रभाव उत्पन्न किया जा सकेगा। अभ्यास, अनुभव, इच्छा, सतर्कता से कोई भी कला सीखी जा सकती है। धैर्यपूर्वक देर तक प्रयत्न करने और हर बार पिछली भूल का परिष्कार करते हुए नये सुधारों का समन्वय करने से प्रत्येक कलाकार प्रगति करता है। वक्तृत्व कला भी यही सब चाहती है। यह भी उन्हीं शाश्वत तथ्यों के आधार पर निखरती है, जिनके
सहारे अन्य कलाकार उच्चस्तरीय सफलता तक पहुँचते रहे हैं।

वसंत कुसुमाकर।

भारतीय संस्कृति अपने आप में एक अनोखा विज्ञान है। जिसकी तुलना नहीं की जा सकती है। मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित बनाएं रखने के लिए हमे जागरूक रहना होगा। यह संस्कृति हमे कर्मकाण्ड का आधार प्रदान करती है। कर्मकांड भी विज्ञान है खुद को मंत्र के साथ पिरोने का। वसंत ऋतु का आगमन ही विद्यारंभ संस्कार को लाता है। ज्ञान और बुद्धि को संतुलित करने के लिए एक तत्व का अभ्यास करना होता है। वह तत्व की उपासना होती है ” सरस्वती” जिसे मां कहकर पुकारा जाता है। सरस्वती शब्द तीन शब्दों से निर्मित हैं, प्रथम स्वर जिसका अर्थ सार, ‘स्व’ स्वयं तथा ‘ती’ जिसका अर्थ सम्पन्न हैं; जिसका अभिप्राय हैं जो स्वयं ही सम्पूर्ण सम्पन्न हो। ब्रह्माण्ड के निर्माण में सहायता हेतु, ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती को अपने ही शरीर से उत्पन्न किया था। इन्हीं के ज्ञान से प्रेरित हो ब्रह्मा जी ने समस्त जीवित तथा अजीवित तत्वों का निर्माण किया। ब्रह्मा जी की देवी सरस्वती के अतिरिक्त दो पत्नियां और भी हैं प्रथम सावित्री तथा द्वितीय गायत्री; तथा सभी रचना-ज्ञान से सम्बद्ध कार्यों से सम्बंधित हैं। देवी सरस्वती का एक नाम ब्राह्मणी भी हैं। वेद माता, ब्राह्मणी के नाम से त्रि-भुवन में विख्यात, विद्यार्थी वर्ग कि अधिष्ठात्री देवी सरस्वती जी हैं। इनका आव्हान करना मेधा शक्ति को बढ़ाता है। आज हम कुछ शक्ति केंद्र के बात करेगे अर्थात् ही मां सरस्वती जी मंत्रों से उन्हे समझने का प्रयास करेंगे।

सरस्वती जी का मंत्र ,
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती ।
यज्ञं वष्टु धियावसुः ||
चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् ।.
यज्ञं दुधे सरस्वती ।|
महो अर्ण: सरस्वती प्र चेतयति केतुना ।
धियो विश्वा वि राजति ।।

वेद के अर्थ से समझने के लिए हमारे पास प्राचीन ऋषियों के प्रमाण हैं। निघण्टु में वाणी के ५७ नाम हैं, उनमें से एक सरस्वती भी है। अर्थात् सरस्वती का अर्थ वेदवाणी है। ब्राह्मण ग्रंथ वेद व्याख्या के प्राचीनतम ग्रंथ है। वहाँ सरस्वती के अनेक अर्थ बताए गए हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
1- वाक् सरस्वती।। वाणी सरस्वती है। (शतपथ 7/5/1/31)
2- वाग् वै सरस्वती पावीरवी।। ( 7/3/39) पावीरवी वाग् सरस्वती है।
3- जिह्वा सरस्वती।। (शतपथ 12/9/1/14) जिह्ना को सरस्वती कहते हैं।
4- सरस्वती हि गौः।। वृषा पूषा। (2/5/1/11) गौ सरस्वती है अर्थात् वाणी, रश्मि, पृथिवी, इन्द्रिय आदि। अमावस्या सरस्वती है। स्त्री, आदित्य आदि का नाम सरस्वती है।
5- अथ यत् अक्ष्योः कृष्णं तत् सारस्वतम्।। (12/9/1/12) आंखों का काला अंश सरस्वती का रूप है।
6- अथ यत् स्फूर्जयन् वाचमिव वदन् दहति। ऐतरेय 3/4, अग्नि जब जलता हुआ आवाज करता है, वह अग्नि सारस्वत रूप है।
7- सरस्वती पुष्टिः, पुष्टिपत्नी। (तै0 2/5/7/4) सरस्वती पुष्टि है और पुष्टि को बढ़ाने वाली है।
8-एषां वै अपां पृष्ठं यत् सरस्वती। (तै0 1/7/5/5) जल का पृष्ठ सरस्वती है।

9-ऋक्सामे वै सारस्वतौ उत्सौ। ऋक् और साम सरस्वती के स्रोत हैं।
10-सरस्वतीति तद् द्वितीयं वज्ररूपम्। (कौ0 12/2) सरस्वती वज्र का दूसरा रूप है।
ऋग्वेद के 6/61 का देवता सरस्वती है। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने यहाँ सरस्वती के अर्थ विदुषी, वेगवती नदी, विद्यायुक्त स्त्री, विज्ञानयुक्त वाणी, विज्ञानयुक्ता भार्या आदि किये हैं।
अन्य देशों में मां सरस्वती अन्य शब्द से पुकारा जाता है। जैसे,
जापान में सरस्वती को ‘बेंजाइतेन’ कहते हैं। जापान में उनका चित्रन हाथ में एक संगीत वाद्य लिए हुए किया जाता है। जापान में वे ज्ञान, संगीत तथा ‘प्रवाहित होने वाली’ वस्तुओं की देवी के रूप में पूजित हैं।
दक्षिण एशिया के अलावा थाइलैण्ड, इण्डोनेशिया, जापान एवं अन्य देशों में भी सरस्वती की पूजा होती है।
अन्य भाषाओ/देशों में देवी सरस्वती के नाम-
बर्
चीन – बियानचाइत्यान
जापान – बेंजाइतेन
थाईलैण्ड –
सरस्वती देवी, हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं, जो विद्या की अधिष्ठात्री देवी मानी गई हैं। इनका नामांतर ‘शतरूपा’ भी है। इसके अन्य पर्याय हैं, वाणी, वाग्देवी, भारती, शारदा, वागेश्वरी इत्यादि। ये शुक्लवर्ण, श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणावादनतत्परा तथा श्वेतपद्मासना कही गई हैं। इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है। माघ शुक्ल पंचमी को इनकी पूजा की परिपाटी चली आ रही है। देवी भागवत के अनुसार ये ब्रह्मा की स्त्री हैं। सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है। उसमें विचारणा, भावना एवं संवेदना का त्रिविध समन्वय है। वीणा संगीत की, पुस्तक विचारणा की और मयूर वाहन कला की अभिव्यक्ति है। लोक चर्चा में सरस्वती को शिक्षा की देवी माना गया है। शिक्षा संस्थाओं में वसंत पंचमी को सरस्वती का जन्म दिन समारोह पूर्वक मनाया जाता है। पशु को मनुष्य बनाने का – अंधे को नेत्र मिलने का श्रेय शिक्षा को दिया जाता है। मनन से मनुष्य बनता है। मनन बुद्धि का विषय है। भौतिक प्रगति का श्रेय बुद्धि-वर्चस् को दिया जाना और उसे सरस्वती का अनुग्रह माना जाना उचित भी है। इस उपलब्धि के बिना मनुष्य को नर-वानरों की तरह वनमानुष जैसा जीवन बिताना पड़ता है। शिक्षा की गरिमा-बौद्धिक विकास की आवश्यकता जन-जन को समझाने के लिए सरस्वती पूजा की परम्परा है। इसे प्रकारान्तर से गायत्री महाशक्ति के अंतगर्त बुद्धि पक्ष की आराधना कहना चाहिए। कहते हैं कि, महाकवि कालिदास, वरदराजाचार्य, वोपदेव आदि मंद बुद्धि के लोग सरस्वती उपासना के सहारे उच्च कोटि के विद्वान् बने थे। इसका सामान्य तात्पर्य तो इतना ही है कि ये लोग अधिक मनोयोग एवं उत्साह के साथ अध्ययन में रुचिपूवर्क संलग्न हो गए, और अनुत्साह की मनःस्थिति में प्रसुप्त पड़े रहने वाली मस्तिष्कीय क्षमता को सुविकसित कर सकने में सफल हुए होंगे। इसका एक रहस्य यह भी हो सकता है कि कारणवश दुर्बलता की स्थिति में रह रहे बुद्धि-संस्थान को सजग-सक्षम बनाने के लिए वे उपाय-उपचार किए गए जिन्हें ‘सरस्वती आराधना’ कहा जाता है। उपासना की प्रक्रिया भाव-विज्ञान का महत्त्वपूर्ण अंग है। श्रद्धा और तन्मयता के समन्वय से की जाने वाली साधना-प्रक्रिया एक विशिष्ट शक्ति है। मनःशास्त्र के रहस्यों को जानने वाले स्वीकार करते हैं कि व्यायाम, अध्ययन, कला, अभ्यास की तरह साधना भी एक समर्थ प्रक्रिया है, जो चेतना क्षेत्र की अनेकानेक रहस्यमयी क्षमताओं को उभारने तथा बढ़ाने में पूणर्तया समर्थ है।

सरस्वती उपासना के संबंध में भी यही बात है। उसे शास्त्रीय विधि से किया जाय तो वह अन्य मानसिक उपचारों की तुलना में बौद्धिक क्षमता विकसित करने में कम नहीं, अधिक ही सफल होती है।
मन्दबुद्धि लोगों के लिए गायत्री महाशक्ति का सरस्वती तत्त्व अधिक हितकर सिद्घ होता है। बौद्धिक क्षमता विकसित करने, चित्त की चंचलता एवं अस्वस्थता दूर करने के लिए सरस्वती साधना की विशेष उपयोगिता है। मस्तिष्क-तंत्र से संबंधित अनिद्रा, सिर दर्द्, तनाव, जुकाम जैसे रोगों में गायत्री के इस अंश-सरस्वती साधना का लाभ मिलता है। कल्पना शक्ति की कमी, समय पर उचित निर्णय नही कर सकना, विस्मृति, प्रमाद, दीघर्सूत्रता, अरुचि जैसे कारणों से भी मनुष्य मानसिक दृष्टि से अपंग, असमर्थ जैसा बना रहता है और मूर्ख कहलाता है। उस अभाव को दूर करने के लिए सरस्वती साधना एक उपयोगी आध्यात्मिक उपचार है। शिक्षा के प्रति जन-जन के मन-मन में अधिक उत्साह भरने-लौकिक अध्ययन और आत्मिक स्वाध्याय की उपयोगिता अधिक गम्भीरता पूर्वक समझने के लिए भी सरस्वती पूजन की परम्परा है। बुद्धिमत्ता को बहुमूल्य सम्पदा समझा जाए और उसके लिए धन कमाने, बल बढ़ाने, साधन जुटाने, से भी अधिक ध्यान दिया जाए। इस लोकोपयोगी प्रेरणा को गायत्री महाशक्ति के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण धारा सरस्वती की मानी गयी है, और उससे लाभान्वित होने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। सरस्वती के स्वरूप एवं आसन आदि का संक्षिप्त तात्त्विक विवेचन इस तरह है-
सरस्वती के एक मुख, चार हाथ हैं। मुस्कान से उल्लास, दो हाथों में वीणा-भाव संचार एवं कलात्मकता की प्रतीक है। पुस्तक से ज्ञान और माला से ईशनिष्ठा-सात्त्विकता का बोध होता है। वाहन मयूर-सौन्दर्य एवं मधुर स्वर का प्रतीक है। इनका वाहन हंस माना जाता है और इनके हाथों में वीणा, वेद और माला होती है। भारत में कोई भी शैक्षणिक कार्य के पहले इनकी पूजा की जाती हैं।

सरस्वती वंदना:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥2॥
जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं। और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है। तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥1॥
शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से छुटकारा करने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ॥2॥

यह वरदान देने के बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने पहले देवी की पूजा की। सृष्टि निर्माण के लिए मूल प्रकृति के पांच रूपों में से सरस्वती एक है, जो वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी है। वसंत पंचमी का अवसर इस देवी को पूजने के लिए पूरे वर्ष में सबसे उपयुक्त है क्योंकि इस काल में धरती जो रूप धारण करती है, वह सुंदरतम होता है। सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्माजी ने जब धरती को मूक और नीरस देखा तो अपने कमंडल से जल लेकर छिटका दिया। इससे सारी धरा हरियाली से आच्छादित हो गई पर साथ ही देवी सरस्वती का प्राकट्य हुआ जिसे ब्रह्माजी ने आदेश दिया कि वीणा व पुस्तक से इस सृष्टि को आलोकित करें। तभी से देवी सरस्वती के वीणा से झंकृत संगीत में प्रकृति विहंगम नृत्य करने लगती है। देवी के ज्ञान का प्रकाश पूरी धरा को प्रकाशमान करता है। जिस तरह सारे देवों और ईश्वरों में जो स्थान श्रीकृष्ण का है वही स्थान ऋतुओं में वसंत का है। यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने स्वीकार किया है।
भगवान कृष्ण ने गीता में ‘ऋतुनां कुसुमाकरः‘ कहकर वसंत को अपनी सृष्टि माना है-

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकर: ॥
अर्थातृ- गायन-शास्त्र में वृहत् सामवेद हूँ छन्द-गायत्री छन्द-कलाप में। द्वादश-मास में मार्गशीर्ष मास हूँ ऋतुओं में हूँ कुसुमाकर (वसंत) मैं।सरस्वती शब्द तीन शब्दों से निर्मित हैं, प्रथम स्वर जिसका अर्थ सार, ‘स्व’ स्वयं तथा ‘ती’ जिसका अर्थ सम्पन्न हैं; जिसका अभिप्राय हैं जो स्वयं ही सम्पूर्ण सम्पन्न हो। ब्रह्माण्ड के निर्माण में सहायता हेतु, ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती को अपने ही शरीर से उत्पन्न किया था। इन्हीं के ज्ञान से प्रेरित हो ब्रह्मा जी ने समस्त जीवित तथा अजीवित तत्वों का निर्माण किया। ज्ञान प्रकाश की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती है। वसंत के इस पर्व पर उनका आगमन हमे ज्ञान से वाणी, से गतिमान कर सन्मार्ग पर प्रेरित करेगा।
सरस्वती जी का यह दिव्य आव्हान शरीर के उस स्थान पर किया जाए उनका नैकट्य हमे प्रदान हो! भगवती शारदा विद्या, बुद्धि, ज्ञान एवं वाणी की अधिष्ठात्री तथा सर्वदा शास्त्र-ज्ञान देने वाली देवी हैं। हमारे हिन्दू धर्मग्रन्थों में इन्हीं माँ वागीश्वरी की जयंती वसन्त पञ्चमी के दिन बतलाई गई है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को मनाया जाने वाला यह सारस्वतोत्सव या सरस्वती-पूजन अनुपम महत्त्व रखता है। सरस्वती माँ का मूलस्थान शशाङ्कसदन अर्थात् अमृतमय प्रकाशपुञ्ज है। जहां से वे अपने उपासकों के लिये निरंतर पचास अक्षरों के रूप में ज्ञानामृत की धारा प्रवाहित करती हैं। शुद्ध ज्ञानमय व आनन्दमय विग्रह वाली माँ वागीश्वरी का तेज दिव्य व अपरिमेय है और वे ही शब्दब्रह्म के रूप में उनकी स्तुति होती हैं। सृष्टिकाल में ईश्वर की इच्छा से आद्याशक्ति ने स्वयं को पाँच भागों में विभक्त किया था। वे राधा, पद्मा, सावित्री, दुर्गा एवं सरस्वती के रूप में भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से उत्पन्न हुईं थीं। उस समय श्रीकृष्ण के कण्ठ से उत्पन्न होने वाली देवी का नाम सरस्वती हुआ। ये नीलसरस्वतीरूपिणी देवी ही तारा महाविद्या हैं।

‘श्रीमद्देवीभागवत’ व ‘श्रीदुर्गासप्तशती’ में आद्याशक्ति द्वारा महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती के नाम से तीन भागों में विभक्त होने की कथा जगद्विख्यात है। सत्त्वगुणसम्पन्ना भगवती सरस्वती के अनेक नाम हैं, जिनमें वाक्, वाणी, गीः, धृति, भाषा, शारदा, वाचा, धीश्वरी, वागीश्वरी, ब्राह्मी, गौ, सोमलता, वाग्देवी और वाग्देवता आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। अमित तेजस्विनी व अनन्त गुणशालिनी देवी सरस्वती की पूजा एवं आराधना के लिये निर्धारित शारदा माँ का आविर्भाव-दिवस, माघ शुक्ल पञ्चमी श्रीपञ्चमी के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस दिन माँ की विशेष अर्चा-पूजा व व्रतोत्सव द्वारा इनके सांनिध्य प्राप्ति की साधना की जाती है। शास्त्रों में सरस्वती देवी की इस वार्षिक पूजा के साथ ही बालकों के अक्षरारम्भ-विद्यारम्भ की तिथियों पर भी सरस्वती-पूजन का विधान बताया गया है। बुध ग्रह की माता होने से हर बुधवार को की गयी माँ शारदा की आराधना बुध ग्रह की अनुकूलता व माँ सरस्वती की प्रसन्नता दोनों प्राप्त कराती है। सच्चे श्रद्धालु आराधक की निष्कपट भक्ति से अति प्रसन्न होने पर देवी सरस्वतीजी ऐसी कृपा बरसाती हैं कि उसकी वाणी सिद्ध हो जाती है जो कुछ कहा जाय, वही सत्य हो जाता है।

देवीभागवत में सरस्वती माता का यह ध्यान है-
सरस्वतीं शुक्लवर्णां सुस्मितां सुमनोहराम् ॥
कोटिचन्द्रप्रभामुष्ट पुष्ट श्रीयुक्तविग्रहाम् ।
वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकधारिणीम् ॥
रत्नसारेन्द्र निर्माणनवभूषणभूषिताम् ।
सुपूजितां सुरगणैर्ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः ॥
वन्दे भक्त्या वन्दितां च मुनीन्द्रमनुमानवै: ।

इसके अतिरिक्त सरस्वती जी की स्तुति के लिये ये दो श्लोक जगद्विख्यात हैं-
या कुन्देदुतुषार-हारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्ड-मण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्कर-प्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा।।
अर्थात् जो कुन्द के फूल, चन्द्रमा, बर्फ और हारके समान श्वेत हैं; जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं; जिनके हाथ उत्तम वीणा से सुशोभित हैं; जो श्वेत कमलासन पर बैठती हैं; ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकार की जड़ता हर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरा पालन करें।

शुक्लां ब्रह्मविचारसार-परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां,
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥।। ६ ।।
अर्थात् जिनका रूप श्वेत है, जो बह्मविचार की परम तत्व हैं, जो समस्त संसार में फैल रही हैं, जो हाथों में वीणा और पुस्तक धारण किये रहती हैं, अभय देती हैं, मूर्खतारूपी अन्धकार को दूर करती हैं, हाथ में स्फटिक मणि की माला लिये रहती हैं, कमल के आसन पर विराजमान होती हैं और बुद्धि देने वाली हैं, उन आद्या परमेश्वरी भगवती सरस्वती की मैं वन्दना करता हूँ।



आइए इन्ही सरस्वती जी का आव्हान कर संकल्पित होवे, संकल्पित होना मतलब हम तैयार है।
ॐ श्रीगणपतिर्जयतिः विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे बौद्धावतारे आर्यावर्तैकदेशे …(शहर का नाम)….नगरे/ग्रामे, शिशिर ऋतौ, ..(संवत्सर का नाम)… नाम्नि संवत्सरे, माघ मासे, शुक्ल पक्षे, पंचमी तिथौ, ..(वार का नाम)…वासरे, ..(गोत्र का नाम)…गोत्रीय ..(आपका नाम)… अहम् ..(प्रातः/मध्याह्न/सायाह्न)… काले श्री सरस्वती देवी प्रीत्यर्थे यथालब्धपूजनसामग्रीभिः भगवत्याः सरस्वत्याः पूजनमहं करिष्ये।’

वेदोक्त अष्टाक्षरी मंत्र ‘श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा’ अथवा जिस मंत्र से दीक्षित हो उसी से प्रत्येक वस्तु का सरस्वती देवी को समर्पण करें। मानस पूजा का भाव लेकर मां पारंम्बा सरस्वती की आराधना करे।
मंत्र “ऐं” यह माँ शारदा का अति सरल व सिद्धिप्रद एकाक्षर बीजमन्त्र है। देवीभागवत व ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णन है कि श्रीविष्णुजी ने वाल्मीकि को सरस्वतीजी का मंत्र बतलाया था। जिसके जप से उनमें कवित्व शक्ति उत्पन्न हुई थी। वह मंत्र है-
‘श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा । आगम-ग्रन्थों में सरस्वती जी के अन्य मन्त्र भी निर्दिष्ट हैं। जिनमें ‘ऐं वाग्वादिनी फट फट स्वाहा’
यह बीज दशाक्षर मन्त्र है जो सर्वार्थसिद्धिप्रद व सर्वविद्याप्रदायक कहा गया है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में इनका यह मन्त्र निर्दिष्ट है-
‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा ।’
उपरोक्त मंत्रों का उठते-बैठते, चलते-फिरते कहीं भी मन ही मन में जप करना भी लाभकारी होता है।
वाक्सिद्धिदायिनी भगवती सरस्वती की महिमा और प्रभाव असीमित है। ऋग्वेद १०।१२५ सूक्त के आठवें मंत्र के अनुसार वाग्देवी सौम्य गुणों की दात्री व वसु-रुद्रादित्यादि सभी देवों की रक्षिका हैं। ये ही राष्ट्रीय भावना प्रदान करती हैं और लोकहित के लिये संघर्ष करती हैं। ब्रह्माजी की शक्ति ये ही हैं। सृष्टि-निर्माण वाग्देवी का कार्य है। ज्ञानदायिनी माँ सरस्वती ने नदी के रूप में अवतार भी लिया था।
“ऐंकाररूपिणी” माँ शारदा की ही कृपा से महर्षि वाल्मीकि, व्यास, वसिष्ठ, आदि ऋषि उच्चता को प्राप्त कर कृतार्थ हुए। महाज्ञानस्वरूपिणी माँ वागीश्वरी की महिमा के विषय में जितना कहें कम ही है। ये शारदा देवी हमारी जिह्वा में-बुद्धि में सदा ही वास करती हैं। इनके ही आशीर्वाद से हम सभी बोल-समझ पाते हैं। ऐसी वागीश्वरी माँ सर्वेश्वरी पातु सरस्वती माम् । विद्या- बुद्धि, विवेक और ज्ञान तत्व की अधिष्ठात्री के रूप में जो परम चेतना सचराचर जगत में व्याप्त हैं उन माँ पराम्बा सरस्वती का आशिर्वाद हमे प्राप्त हों।