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सूर्य और सविता

मानवी अस्तित्व का सीधा संबंध “सवितु” शब्द से हैं। यहां आपको आपके जन्म का प्रयोजन समझने में सहायता मिलेगी। हमारे भीतर की चेतना का विस्तार अनंत हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण है, प्रकाश की ओर लौटना हमारा मूल स्वभाव हैं। यही प्रकाश ज्ञान और ऊर्जा रूपों में स्थित है। चेतना का विस्तार ही समग्रता की ओर बढ़ाता हैं। ज्ञान और ऊर्जा का सरल संबंध सवितु से ही हैं। प्रकृति के अनुकूल रहना उसे स्वीकार करना सत्व ज्ञान हैं। इसी ज्ञान,ज्योति का प्रखर प्रकाश स्वरुप हैं “सूर्य”। सविता का सामान्य अर्थ ही सूर्य से अभिप्रेत हैं। सूर्य का दर्शन हमे प्रत्यक्ष रूप से होता है। यह प्रतिक और तेजपुंज हैं, प्रतिनिधि है, उस परम् परमात्मा का जो चर अचर सबमें व्याप्त है। आध्यात्म की भाषा में तेजस्वी, प्रकाश और सृष्टि की उत्त्पति और प्रलयकर्ता को सविता माना जाता हैं। सविता की शक्ति अनन्त है। वह अनेकों रूपों में स्थित है, उनके तेज स्वरुप को ही सविता कहा जाता है। इसी कड़ी में परमात्मा का ध्यान किया जाता है, उनका स्मरण किया जाता है, की उनकी दिव्य शक्तियां हमारे भीतर आकर्षित हो सके। उनका भाव रूपो में आव्हान किया जाता है। जिस प्रकार से हम वाइस कॉल करते है, उसी प्रकार से हम उस व्यक्ति से जुड़ जाते है। यही नियम आध्यात्म क्षेत्र में भी लागु होता है। अगर हमे ईश्वर की शक्तियों का लाभ लेना हैं है, तो उस तत्व, शक्ति का स्मरण कर उनकी ऊर्जा को आप आत्मसात कर सकने में सक्षम हो जाते हो। इसी लिए आध्यात्म विश्व में साधना और ध्यान को नित्य क्रम में स्वीकार किया हैं। यह केवल प्रथा नही, अपितु इनके पीछे वैज्ञानिक महत्व हैं। यह वो क्रम है, जो मन को योग्य दिशा प्रदान करता हैं। ताकि आप सफ़लता के मार्ग पर चल सके!

आपका अवचेतन मन सदैव जाग्रत रहता है। यह असीमित ऊर्जाओ का भंडार है। इसी मन को दिशा देने का प्रयोजन आध्यात्म विद्या में ही मौजुद है। इसी मन को किसी एक धुन, संगीत, आवाज, किसी एक केंद्र पर एकाग्र कर मन की शक्तियों को जाग्रत किया जाता है। मन को एकाग्र करने के लिए आध्यात्म जगत मंत्र शक्ति का आधर लेने की सलाह देता है। आध्यात्म विज्ञान में महामंत्र और वेद मंत्र गायत्री है। गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति शरीर के उन ऊर्जा केंद्रों को जाग्रत करती है, जिसके द्वारा आप ब्रम्हांड की असीम शक्ति से जुड़ सकते हैं। गायत्री मंत्र आपके लिए वह केंद्र हैं, जहां आप परम तेजस्वी सविता से जुड़ते हैं। सविता ही परमात्मा और परम तेजस्वी है। इसी मंत्र के द्वारा उस परम् तप तेजस्वीता का आव्हान किया जाता है। साधक प्रार्थना के भाव को प्रज्वलित करता हुआ सविता को समर्पित होता हैं। यहीं प्रार्थना वो दारिया है, जहां यही सविता शक्ति आत्मिक तेज, बौद्धिक तेज, आर्थिक तेज, शारिरिक तेज से परिपूर्ण करती हैं। यही पूर्णता जीवन को सुंदर और सम्पन्न बनाती है। इसी परमात्मा के तेज को धारण कर हम अपने जीवन को ऊर्जा के साथ साकारात्मक दृष्टिकोन के साथ अपने दिव्य लक्ष्य की ओर मार्गक्रमण करते है।

सविता वै प्रसवनामीशे ।- कृष्ण यजुर्वेद.

यह संस्कृत मंत्र हमे मार्गदर्शन करता हैं, हर एक वस्तु भाव है अर्थात् pure intentation. यही भाव का उत्त्पति कर्ता परमेश्वर सविता है। परमात्मा सविता इसलिए है, वह उत्त्पति और शक्ति का अनंत स्रोत है।

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।

योऽसावित्येव पुरुषः सोऽसावहम् ।

मैत्र्यु प. 6/35

सविता सत्य की शक्ति में निवास करती है। इसलिए सत्य शाश्वत और अटल है। इसी परमात्मा का प्रतिनिधि तेज रूप में सूर्य है। सूर्य का प्रकाश, और जीवनी शक्ति और सूर्य के भीतर का आकर्षण, ध्वनी में स्रुष्टि कर्ता सविता शक्ति स्वयं विद्यामान रहती है।

आदित्यमण्डले ध्यायेत्परमात्मनम् अयम् ।-शौनक

यह मंत्र हमे ध्यान की ओर आकर्षित करता है। यह मंत्र हमे प्रेरित करता है, उस परम तप तेज का ध्यान करने के लिए। यह हमे आदेश देता है, उस सूर्य मंडल के केंद्र पर अविनाशी परमात्मा का ध्यान सर्वश्रेष्ठ है।

सूर्याद्भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु ।

सूर्ये लयं प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च ॥

सूर्योप,

सूर्य के भीतर निरंतर गूंजायमान अखंड प्रणव ध्वनि जो “ओम” है। इसी प्रणव ध्वनी से सृष्टि उत्पन्न हुई है। सूर्य की किरणों में वह जीवनी शक्ति के द्वारा जगत का पालन पोषण होता है। मनुष्य की प्रत्येक श्वास में मौजुद प्राण तत्व भी यही है। हाल‌ ही कुछ दिनो में NASA के वैज्ञानिको ने यह खोज संपन्न की, और यह सिद्ध किया की, सूर्य के भीतर निरंतर ओम का उच्चारण होता हैं। यह बात भारतीय सनातन में वेदों में हजारों साल पहले ही मौजुद है।

चन्द्रमा सविता प्राण एव सविता विद्युदेव सविता ।

गोपथ ब्रा. पूर्व भाग 6/7/8

सूर्य के किरणे अर्थात् तेज में “वरेण्य” शक्ति मौजुद है। इसी वरेण्य शक्ति के द्वारा वनस्पति अपने अन्न को तैयार करती है। यही अन्न “अमृत” बनकर पाचन के यज्ञ को आहूत करता हैं। इसी अन्न के द्वारा मनुष्य का पोषण होता है। अन्न के द्वारा ही विचार बनते है। इस लिए अन्न दिव्य है।

नत्वा सूर्य परं धाम ऋग्यजुः सामरूपिणम् ।

प्रज्ञानाचाखिलेशाय सप्ताश्वाय त्रिमूर्तये ॥

नमो व्याहतिरूपाय त्वमोंकार सदैव हि ।

त्वामृते परमात्मानं नत् त्पश्यामि देवतम् ।।

सूर्य पु.अ. 1/13,33,34,37

सूर्य की शक्ति ही प्रत्यक्ष अनुभव की जा सकती है। भारतीय सनातन इस सूर्य को परमात्मा सविता का ही साक्षात प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार करता है। इस लिए यही तेजपूंज सूर्य ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का स्वरुप धारण करता अवतरित हुआ हैं। यह परम तेजस्वी, सात अश्वो के रथ पर आरूढ़ यह ब्रम्ह तेज ब्रम्हा, विष्णु और महेश का प्रत्यक्ष ज्ञान करवाता है। सूर्य का ध्यान करने से शरीर के भीतर के सभी ऊर्जा केंद्र जाग्रत होते हैं। इसलिए सविता शक्ति का धन्यवाद करने के लिए सूर्य नमस्कार की विधि प्रचलित है।

चन्द्रमा सविता प्राण एव सविता विद्युदेव सविता ।

गोपथ ब्रा. पूर्व भाग 6/7/8

सूर्य और चंद्र देवता तुल्य है। यह प्रकृति का संतुलन करते है। अनेक शक्तियों को परिवर्तित करने में सक्षम हैं। जो जीव सृष्टि जो पर प्राण सत्ता आरूढ़ हैं, वह सूर्य ही है। इन्ही जीवात्मा को ऊर्जा प्रदाता सूर्य है।

एष हि खल्वात्मा, सविता । मैत्र्युप. 6/8

सभी जीवों के भीतर सूक्ष्म सत्ता में आत्मा विराजमान है। यही आत्मा सूर्य है। यह सब में चैतन्य के रूप में निवास करता है।

सवितुरिति सृष्टिस्थितिलयलक्षणकस्य सर्व ।

प्रपंचस्य समस्तद्वैत विभ्रमस्याधिष्ठानं लक्ष्यते ॥

शंकरभाष्य उच्चट वि.

इसी सृष्टि का पालन और प्रलयकर्ता, की कारणभूत शक्ति और सम्पूर्ण द्वैत, विभ्रम का आधार सविता है। यह अनेकों में एक का संदेश देता है। यह सूत्र वो प्रमाण है, की परमात्मा सविता सर्वत्र हैं।

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ।

येत जातानि जीवन्ति ।

यत्प्रत्यभिसंविशन्ति तद्विज्ञात्वातदबहोति।

तैत्तिरीय भू.च. अ.

यह तैत्तिरीय उपनिषद का मंत्र हमे वह अधिकार प्रदान करता है, जहां आपको आइडेंटिटी करने की शक्ति का आधार मिलता है। इसी‌‌ सृष्टि का पालन कर्ता और प्रलय कर्ता ब्रम्हा है। अर्थात् सविता ही है।

संरक्षिता च भूतानां सविता च ततः सविता स्मृतः ।

यू.यो.यज्ञ 1/91

पृव्थि पर मौजूद सभी जीवों में प्राण ऊर्जा उपस्थित है। इसी प्राण ऊर्जा का प्रभाव हमे कार्य के प्रति जागरूकता और नींद लेने जैसे कार्यों को सम्पन्न करती है। यही प्राण शक्ति का दिव्य रूप सविता है, यही हमे संरक्षित करती है।

सूते सकल श्रेयांसि धातॄणां इति सविता।

संध्या भाष्य

मन की समस्त शक्तियो को एक जगह केंद्रित करने से अलौकिक बाल , तेज,ओज की प्राप्ति होती है। सविता का अर्थ होता है, आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है।

एषोऽन्तरादित्ये हिरण्यमयः पुरुषो दृश्यते।

हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ।

छ-न्दो. 1/6.

जब साधक निरंतर श्रद्धा पूर्वक साधना मार्ग पर पर अग्रसर होता हैं। तो आत्मा साक्षात्कार को प्राप्त होता है। वहा उसे दिव्य प्रकाश का अलौकिक दर्शन प्राप्त होता है।

देवाऽयं भगवान्भानुरन्तर्यामी सनातनः ॥

सूर्य पु.अ. 1/11

सूर्य को ईश्वर और कल्याणकारी देवता के रूप में स्वीकार किया है। यही नित्य शुद्ध शाश्वत सनातन है।

नमः सवित्रे जगदेकच क्षुषे

जगत्प्रसूतिस्थितिनाश हेतवे ।

त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरिचिनारायणशंकरात्मने ॥

-भविष्य पु.

सूर्य शक्ति सभी प्राणिमात्र का भरण पोषण करता है। इसलिए यह परम आत्मा हैं। तेजपुंज आदित्य को हमारा नमस्कार।

सूते सकल जन दुःख निवृत्ति हेतुं वृष्टिं जनयति सविता ।

जल रूप में बरसती बारिश की बूंदे, उस बूंद में जो तृप्ति शान्ति रूप में स्थित हैं, वो सविता है।

आदित्याज्जायते वृष्टिः वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ।

सूर्य जिस प्रकाश किरणों की सहायता से उष्णता को धारण करता हैं, उसी प्रकाश किरणों से मेघवर्षा होती है।

यन्मण्डलं ज्ञानघनं त्वगम्यं

त्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम्

समस्त तेजोमयदिव्यरूपम् ॥

पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्याम् ॥

यह प्रार्थना स्वरुप है, वो परम तेज जो ज्ञान से परिपूर्ण है। अगम्य अगोचर हैं। सम्पूर्ण जगत सृष्टि को प्रकाश का बोध कराता है। उस सूर्य मंडल के तेज को हम स्वीकार करते है। वो तेज हमे पवित्र बनावे।

वह्निर्नारायणः साक्षात् नारायणं नमोऽस्तुते ।

नारायण हृदय

अग्नि के भीतर की ज्वाला और तेज स्वयं विद्यमान है, उस नारायण को हम नमस्कार करते है। नारायण अग्निस्वरूप में प्रकाशमान है।

अग्न्यादिरूपी विष्णुर्हि वेदादौ ब्रह्म गीयते । तत्पदं परमं विष्णोर्देवस्य सवितुः स्मृतम् ॥

अग्निपुराण अ. 216/9

वेदों के प्रारंभ में भगवान विष्णु जी गायन अग्निस्वरुप, ब्रम्हस्वरुप में होता हैं। इसलिए विष्णु भगवान ही सविता शक्ति के परम पद में वर्णित है।

हृदयाकाशे तु यो जीवः साधकैरुपगीयते । स एवादित्यरूपेण वह्निर्नभसि राजते ॥

व्यास

साधक जिस जीव परमात्मा का अपने हृदय में ध्यान करते है, वही तेज प्रकाश धारण कर बाह्य जगत में सूर्य रूप में अपना परिचय करवाता है।

सवितुस्तु पदं वितनोति ध्रुवं

मनुजो बलवान् सवितेव भवेत् । विषया अनुभूतिपरिस्थितय

स्तु सदात्मन एव गणेदिति सः ॥

गायत्री गीता

सवितु: शक्ति हम सभी मनुष्यों को आव्हान करती है की, आप सभी मेरी संतान हो। इस लिए आप परम तेजस्वी हो! आप ज्योर्तिमय हो! आप अकेले नहीं हो!! सभी विषय, अनुभूति सभी प्रकार की परिस्थिति का हमारे आत्मा से सीधा संबंध होता है। यह हमे सोचना हैं। आप जैसे हो? आप जहा कहा हो? यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण तो यह हैं, की आप चाहते क्या हो?? यह आपको समझना है, की हमारे विचार जीवन की स्वतंत्रता को बाधित तो नही कर रहे है? सोचो??

वेदों में वर्णित सूर्य सृष्टि।

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।

नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥

श्रीभगवतगीता (2, 24)

जीवात्मा परमात्मा का अणुरूप है। अनुरूप आत्मा यह सीधा करता है। भौतिक शरीर में असंख्य बदलाव होने पर भी आत्मा नित्य अणुरूप में स्थित रहता है। इन सभी भौतिक दोषों से मुक्त होकर अणु रूप आत्मा परम तेज सविता के किरणों में आध्यात्मिक स्फूलिंग बनकर रहता है। इस श्लोक में भगवान अपने पूर्णत्व का बोध कराते है। अर्थात् परमात्मा सर्वव्यापी है, इस में कोई भी संशय नहीं है। प्रत्येक जीवात्मा में परमात्मा अंश रूप में विद्यमान हैं। उसी प्रकार भगवान की हर एक सृष्टि में जीवात्मा मौजुद है। वह अनेकों प्रकार से भिन्न भिन्न स्वरूप में होंगे। जैसे जल‌सृष्टि, वायुसृष्टि, भूगर्भ और यहां तक अग्नि सृष्टि में भी। अग्नि सृष्टि की विद्यामानता सुक्ष्म में होती है। इस लिए यह अनुसंधान का विषय है, की सूर्य पर भी कोई जीवात्मा का वास्तव्य है की नही? इस प्रश्न का समाधान श्रीमद्भगवत गीता जी का यह श्लोक देता है। सूर्य पर भी जीव‌ सृष्टि की उपस्थिति है। हमे अपने विचारों को पोषण देना होगा। विचारो से परे होकर वास्तविक जगत का दर्शन करना होगा। अपनी सोई हुई आंखो को जगाना पड़ेगा।हमारे विचार औषधि है। यह विचार वह शक्ति है जो उड़ान भरने के लिए हमे काबिल बनाती है। विचारो का योग्य शुद्ध पोषण करना हमारे हाथो में ही है। हम स्वयं अपने भाग्य के रचैता हैं।

ॐॐ असो वा आदित्यो देवमधु। तस्य धौरेव तिरश्चानव शोऽन्तरिक्षमपूयो मरीचयः पुत्राः ॥१॥

ऋग्वेद

अमेरिका द्वीप पर जब दुनिया की सबसे बड़ी टेलिस्कोप (डेनियल के इन) ने काम शुरू किया तो अपनी हि सूर्य की सतह पर गढ़ा दी। दुनिया के सामने पहली बार ये तस्वीरे सामने आई जिनमें सूर्य की सतह सोने की तरह चमकती और मधुमक्खी के छत्ते की तरह फैलता और सिकुड़ती दिखाई दे रही है। यह दृश्य पहले कभी नहीं देखा गया, क्योंकि आग उगलते पर इसे असंभव माना लिया गया। टेलिस्कोप ने पहली बार सूर्य को निहारने वाली रिपोर्ट कहती है कि, सूर्य की सतह का पैटर्न मधुमक्खी के छत्ते सेल की, तरह है जो पूरे सूर्य की सतह पर दिखाई देते हैं। जब ये सिकुड़ते और फैलते हैं, तब इनके केंद्र से प्रबल ऊष्मा निकलती है। ये सेल टेक्सास प्रांत के आकार की है। वैज्ञानिकों ने कहा कि सूर्य के विस्तार और सौर धमाके निश्चित ही पृथ्वी पर जीवन को प्रभावित करते हैं। शोधकर्ता प्रोफेसर जेफ कुन ने कहा, यह वास्तव में लीलियों के समय से जमीन से सूर्य का आध्ययन करने की मानव की क्षमता से ऊंची छलांग है, कि टाइम्स इस डेनियल के. इनोये टेलिस्कोप ने 10 मिनट का एक वीडियो भी बनाया है। इससे यह पता चलता है कि हर 14 सेकेंड में सूर्य की सतह पर एक टर्बुलेंस यानि भीषण उथल-पुथल होती है। यही रिसर्च का प्रणाम भारतीय समस्त के वेदों में पहले से ही मौजुद है। यही भारतीय सनातन की सुंदरता है। ऋग्वेद के मंत्र में सूर्य की सतह मधु मक्खी की छत्ते की तरह हैं, यह वर्णित है। ऊपर वर्णित ऋगवेदी मंत्र इसी रिसर्च का भव्य प्रमाण है। आपको सूर्य ऊर्जा से संबंधित अनेकों तथा को यह आमंत्रित किया है। यह हमे चुनौती देनी है, अपने विचारो को! विचारो से परे होना एक कला काही प्रदर्शन तो ही है

ऑटो सजेशन” की अनोखी पहल है, “तुलसी”

स्वस्थता प्रदायक हैं तुलसी

तुलसी एक दैविक वनस्पति है, इसलिए तुलसी का सनातन समाज में बहुत महत्व था। आज भी पूजा-पाठ में तुलसी के पत्तों की जरूरत पड़ती है। पंचामृत व चरणामृत, दोनों में तुलसी के पत्ते अनिवार्य हैं। एक समय था जब भारत के हर घर-आँगन में तुलसी का चौरा (तुलसी लगाने का स्थान) होता था, क्योंकि पवित्रता में तुलसी का स्थान गंगा से भी ऊँचा है।
जब से संसार में सभ्यता का उदय हुआ है, मनुष्य रोग और औषधि इन दोनों शब्दों को सुनते आए हैं। जब हम किसी शारीरिक कष्ट का अनुभव करते हैं तभी हमको ‘औषधि’ की याद आ जाती है, पर आजकल औषधि को हम जिस प्रकार ‘टेबलेट’, ‘मिक्चर’, ‘इंजेक्शन’, ‘कैप्सूल’ आदि नए-नए रूपों में देखते हैं, वैसी बात वैदिक समय में न थी। उस समय सामान्य वनस्पतियाँ और कुछ जड़ी-बूटियाँ ही स्वाभाविक रूप में औषधि का काम करती थीं और उन्हीं से बड़े-बड़े रोग शीघ्र निर्मूल हो जाते थे, तुलसी भी उसी प्रकार की औषधियों में से एक हैं। जब तुलसी के निरंतर प्रयोग हमारे वैदिक वैज्ञानिक
ऋषियों ने यह अनुभव किया कि, यह वनस्पति एक नहीं सैकड़ों छोटे-बड़े रोगों में लाभ पहुँचाती है और इसके द्वारा आसपास का वातावरण भी शुद्ध और स्वास्थ्यप्रद रहता है तो उन्होंने विभिन्न प्रकार से इसके प्रचार का प्रयत्न किया। उन्होंने प्रत्येक घर में तुलसी का कम से कम एक पौधा लगाना और अच्छी तरह से देखभाल करते रहना धर्म कर्त्तव्य बतलाया। खास धार्मिक स्थानों पर ‘तुलसी वृंदावन’ बनाने की भी उन्होंने सलाह दी, जिसका प्रभाव दूर तक के वातावरण पर पड़े।

धीरे-धीरे तुलसी के स्वास्थ्य प्रदायक गुणों और सात्विक प्रभाव के कारण उसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि लोग उसे भक्ति भाव की दृष्टि से देखने लगे, उसे पूज्य माना जाने लगा। इस प्रकार तुलसी की उपयोगिता और भी अधिक बढ़ गई, क्योंकि जिस वस्तु का प्रयोग श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है, उसका प्रभाव बहुत शीघ्र और अधिक दिखलाई पड़ता है। हमारे यहाँ के आयुर्वेद के ग्रंथों में कई स्थानों पर चिकित्सा कार्य के लिए जड़ी-बूटियाँ संग्रह करते समय उनकी स्तुति-प्रार्थना करने का विधान बतलाया गया है, और यह भी लिखा है कि उनको तिथियों या नक्षत्रों में तोड़कर या काटकर लाया जाए। इसका कारण यही है कि इस प्रकार की मानसिक भावना के साथ ग्रहण की हुई औषधियाँ लापरवाही से बनाई गई दवाओं की अपेक्षा कहीं अधिक लाभप्रद होती हैं।

कुछ लोगों ने यह अनुभव किया कि तुलसी केवल शारीरिक व्याधियों को ही दूर नहीं करती, अपितु मनुष्य के आंतरिक भावों और विचारों पर भी उसका कल्याणकारी प्रभाव पड़ता है। हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार किसी भी पदार्थ की परीक्षा केवल उसके प्रत्यक्ष गुणों से ही नहीं की जानी चाहिए, वरन उसके सूक्ष्म और कारण प्रभाव को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। तुलसी के प्रयोग से ज्वर, खाँसी, जुकाम, संक्रामक रोग आदि जैसी अनेक बीमारियों में तो लाभ पहुँचता ही है, उससे मन में पवित्रता, शुद्धता और भक्ति की भावनाएँ भी बढ़ती हैं। इसी तथ्य को लोगों की समझ में बैठाने के लिए शास्त्रों में कहा गया है,

त्रिकाल बिनता पुत्र प्रयाश तुलसी यदि ।
विशिष्यते कायशुद्धिश्चान्द्रायण शतं बिना ॥
तुलसी गन्धमादाय यत्र गच्छन्ति मारुतः ।
दिशो दशश्च पूतास्तुर्भूत ग्रामश्चतुर्विधः ॥

अर्थात, ‘यदि प्रातः, दोपहर और संध्या के समय तुलसी का सेवन किया जाए तो उससे मनुष्य की काया इतनी शुद्ध जाती है। जितनी अनेक बार चांद्रायण व्रत करने से भी नहीं होती। तुलसी की गंध वातावरण के साथ जितनी दूर तक जाती है, वहाँ की वायु और निवास करने वाले सब प्राणी पवित्र निर्विकार हो जाते हैं।’

सकारात्मकता और तुलसी

तुलसी की यह महिमा, गुण-गरिमा केवल कल्पना ही नहीं हैं। भारतीय जनता हजारों वर्षों से इसको प्रत्यक्ष अनुभव करती आई है, और इसलिए प्रत्येक देवालय, तीर्थस्थान और सद्गृहस्थों के घरों में तुलसी को स्थान दिया गया है। वर्तमान स्थिति में भी कितने ही आधुनिक विचारों के देशी और विदेशी व्यक्ति उसकी विशेषताओं को स्वीकार करते हैं, और वातावरण को शुद्ध करने के लिए तुलसी के पौधों के गमले अपने बँगलो पर रखने की व्यवस्था करते हैं, फिर तुलसी का पौधा जहाँ रहेगा सात्विक भावनाओं का विस्तार तो करेगा ही। इसलिए हम चाहे जिस भाव से तुलसी के संपर्क में रहें, हमको उससे होने वाले शारीरिक, मानसिक और आत्मिक लाभ न्यूनाधिक परिमाण में प्राप्त होंगे ही। तुलसी से होने वाले इन सब लाभों को समझकर पुराणकारों ने सामान्य जनता में उसका प्रचार बढ़ाने के लिए अनेक कथाओं की रचना कर डाली, साथ ही उसकी षोडशोपचार पूजा के लिए भी बड़ी लंबी-चौड़ी विधियाँ अपनाकर तैयार कर दीं। यद्यपि इन बातों से अशिक्षित जनता में अनेक प्रकार के अंधविश्वास भी फैलते हैं और तुलसी विवाह के नाम पर अनेक लोग हजारों रुपये खर्चा कर डालते हैं, पर इससे हर स्थान पर तुलसी का पौधा लगाने की प्रथा अच्छी तरह फैल गई। पुराणकारों ने तुलसी में समस्त देवताओं का निवास बतलाते हुए यहाँ तक कहा है,

तुलसस्यां सकल देवाः वसन्ति सततं यतः ।

अतस्तामचयेल्लोकः सर्वान्देवानसमर्चयन ॥

अर्थात, तुलसी में समस्त देवताओं का निवास सदैव रहता है। इसलिए जो लोग उसकी पूजा करते हैं, उनको अनायास ही सभी देवों की पूजा का लाभ प्राप्त हो जाता है।

तत्रे कस्तुलसी वृक्षस्तिष्ठति द्विज सत्तमा ।

यत्रेव त्रिदशा सर्वे ब्रह्मा विष्णु शिवादय ॥

जिस स्थान पर तुलसी का एक पौधा रहता है, वहाँ पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि समस्त देवता निवास करते हैं।

पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्या सरितस्तथा ।

वासुदेवादयो देवास्तिष्ठन्ति तुलसी दले ॥

तुलसी पत्रों में पुष्कर आदि तीर्थ, गंगा आदि सरिताएँ और वासुदेव आदि देवों का निवास होता है।

रोपनात् पालनात् सेकात् दर्शनात्स्पर्शनान्नृणाम् ।

तुलसी दह्यते पाप बाड्मनः काय संचितम् ॥

‘तुलसी के लगाने एवं रक्षा करने, जल देने, दर्शन करने, स्पर्श करने से मनुष्य के वाणी, मन और काया के समस्त दोष नष्ट होते हैं।’

औषधि तुलसी

सर्वोषधि रसेन व पुराह अमृत मन्थने ।
सर्वसत्वोपकाराय विष्णुना तुलसी कृताः ॥
प्राचीनकाल में ‘अमृत मंथन’ के अवसर पर समस्त औषधियों और रसों (भस्मों) से पहले विष्णु भगवान ने समस्त प्राणियों के उपकारार्थ तुलसी को उत्पन्न किया।

तुलसी की रोगनाशक शक्ति इस प्रकार प्राचीन ग्रंथकारों ने तुलसी की महिमा को सर्वसाधारण के हृदय में जमाने के लिए उसकी बड़ी प्रशंसा की है और उसके अनेक लाभ बतलाए गए हैं। इनमें से शरीर संबंधी गुण अर्थात तुलसी की रोगनाशक शक्ति तो प्रत्यक्ष ही है और विशेषतः कफ, खाँसी, ज्वर संबंधी औषधियों के साथ तुलसी को भी सम्मिलित करने का विधान है। भारतीय चिकित्सा विधान में सबसे प्राचीन और मान्य ग्रंथ चरक संहिता में तुलसी के गुणों का वर्णन करते हुए। कहा गया है,

हिक्काज विषश्वास पार्श्व शूल विनाशिनः ।
पित्तकृतत्कफवातघ्न सुरसः पूर्ति गन्धहा ॥
अर्थात ‘सुरसा (तुलसी) हिचकी, खाँसी, विष विकार, पसली के दर्द को मिटाने वाली है। इससे पित्त की वृद्धि और दूषित कफ तथा वायु का शमन होता है, यह दुर्गंध को भी दूर करती है।

‘ दूसरे प्रसिद्ध ग्रंथ ‘भाव प्रकाश’ में कहा गया है,

तुलसी कटुका तिक्ता हृदयोष्णा दाहिपित्तकृत।
दीपना कष्टकृच्छ स्त्रापाश्र्व रुककफवातजित ॥
तुलसी कटु, तिक्त हृदय के लिए हितकर, त्वचा के रोगों में लाभदायक, पाचन शक्ति को बढ़ाने वाली, मूत्रकृच्छ के कष्ट को मिटाने वाली है, यह कफ और वात संबंधी विकारों को ठीक करती है।

आयुर्वेद के ज्ञाताओं ने समस्त औषधियों और जड़ी-बूटियों के गुण जानने के लिए ‘निघंटु’ ग्रंथों की रचना की है, उसमें भी तुलसी के गुण विस्तापूर्वक लिखे गए हैं। ‘धन्वन्तरि निघंटु’ में कहा गया है,

तुलसी लघुरुष्णाच्य रुक्ष कफ विनाशिनी ।
क्रिमिदोषं निहन्त्यैषा रुचि कृवह्निदीपनी ॥
‘तुलसी हलकी उष्ण, रूक्ष, कफ दोषों और कृमि दोषों को मिटाने वाली और अग्निदीपक होती है।’

धर्म और तुलसी

दूसरे ‘राजबल्लभ निघंटु’ में कहा गया है,

तुलसी पित्तकृद्वाता क्रिमी दौर्गन्धनाशिनी ।
पश्विशुलापूरतिश्वास कास हिक्काविकारजित ।
‘तुलसी पित्तकारक तथा वात कृमि और दुर्गंध को मिटाने वाली है, पसली के दरद, खाँसी, श्वास, हिचकी में लाभकारी है।’

इसलिए औषधियों के रूप सेवन करने पर भी तुलसी की कोई विपरीत प्रतिक्रिया नहीं होती, न उसके कारण शरीर में किसी प्रकार के दूषित तत्त्व एकत्रित होते हैं। तुलसी स्वाभाविक रूप से शारीरिक यंत्रों की क्रिया को सुधारती है और रोग को दूर करने में सहायता पहुँचाती है। डॉक्टरों के तीव्र इंजेक्शन जिनमें कई प्रकार के विष भी हुआ करते हैं और वैद्यों की भस्मों की तरह उससे किसी तरह के कुपरिणाम या प्रतिक्रिया की आशंका नहीं होती। वह तो एक बहुत सौम्य वनस्पति है, जिसके दस-पाँच पत्ते लोग चाहे जब चबा लेते हैं, पर उनसे किसी को हानि होते नहीं देखी गई।

धर्म की दृष्टि से तुलसी में अधिक मात्रा में विष्णु तत्व होते हैं, जो पवित्रता के प्रतीक हैं। इसलिए जिन पदार्थों में तुलसी डालते हैं, वह पवित्र हो जाते हैं और क्योंकि इसके पत्तों में ईश्वरीय तरंगों को आकर्षित करने की क्षमता होती है और वे दैवी शक्ति प्रदान करते हैं। तुलसी की माला विष्णु परिवार से जुड़े देवी-देवताओं के मंत्र जाप के लिए प्रयोग में लाई जाती है। तुलसी की माला धारण करने से एक रक्षा कवच बन जाता है। तुलसी के पत्तों-शाखाओं से एक ऐसा रोगनाशक तेल वायुमंडल में उड़ता है कि इसके आसपास रहने, इसे छूने इसे पानी देने और इसका पौधा रोपने से ही कई रोग नष्ट हो जाते हैं। इसकी गंध दसों दिशाओं को पवित्र करके कवच की तरह प्राणियों को बचाती है। इसके बीजों से उड़ते रहनेवाला तेल तत्त्व त्वचा से छूकर रोम-रोम के विकार हर लेता है। आयुर्वेद के अनुसार तुलसी एक रामबाण पौधा है, जिसका प्रयोग कई प्रकार के शारीरिक कष्टों को दूर करने में होता है। तुलसी दो प्रकार की होती है- एक साधारण हरे पत्ते वाली तथा दूसरी श्यामा तुलसी, जिसके पत्ते छोटे व काले रंग के होते हैं। श्यामा तुलसी पूजा के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती है। इसका औषधि के रूप में एक और लाभ यह है कि, तुलसी के पत्तों में कुछ मात्रा में पारा (मरकरि) होता है। मरकरी एक सीमित मात्रा में शरीर के लिए बहुत हितकारी है, पर दाँतों के लिए हानिकारक इस कारण तुलसी के पत्तों को साबुत ही निगला जाता है, दाँतों से चबाया नहीं जाता।

तुलसी द्वारा मानसिक चिकित्सा

एक और विशिष्टता तुलसी की यह है कि जहाँ और फूल-पत्तियों की शक्ति मुरझाने पर समाप्त हो जाती है, वहीं तुलसी के पत्तों की शक्ति सूखने पर भी बनी रहती है और ये वातावरण को सात्त्विक बनाए रखते हैं। अगर घर आँगन में, सड़क किनारे या कहीं और तुलसी की बगीची लगा दें तो साँप-बिच्छू अपने आप वहाँ से भाग जाते हैं। इसी कारण, तुलसीवाले घर-आँगन को तीर्थ समान माना जाता है।
बिल्वपत्र (बेल के पत्ते) भी तुलसी की ही भाँति सदा शुद्ध रहते हैं। जहाँ तुलसी में विष्णु तत्त्व होता है, वहीं बिल्व पत्र में शिव तत्व होता है। इनमें भी सूखने के बाद देवता तत्त्व सदैव विद्यमान रहता है और उसे प्रक्षेपित करता रहता है। बिल्वपत्र के चिकने भाग को नीचे की तरफ रखकर शिव पिंडी पर चढ़ाते हैं। तुलसी का एक नाम वृंदा भी है अर्थात् विद्युत् शक्ति इसलिए तुलसी की लकड़ी से बनी माला, गजरा आदि पहनने की प्रथा सदियों से चली आ रही है, क्योंकि इनसे विद्युत् की तरंगें निकलकर रक्त संचार में कोई रुकावट नहीं आने देतीं। इसी प्रकार गले में पड़ी तुलसी की माला फेफड़ों और हृदय को रोगों से बचाती है। आप में से कुछ को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मलेशिया द्वीप में कब्रों पर तुलसी द्वारा पूजन-प्रथा चली आ रही है, जिसका वैज्ञानिक आधार यह है कि मृत शरीर वायुमंडल में दुष्प्रभाव और दुर्गंध नहीं फैलाता। शव को तुलसी पौधे के पास रखने का एक मात्र वैज्ञानिक रहस्य यही है कि शव देर तक सुरक्षित रहता है और मृत शरीर की गंध तुलसी की दुर्गंध से दबी रहती है।

इजराइल में भी तुलसी के बारे में ऐसी ही धारणाएँ हैं। सूर्य-चंद्र के ग्रहण के दौरान बड़े-बुजुर्ग अन्न-सब्जियों में तुलसी दल (पते) इसलिए रखते थे कि सौर मंडल से उस समय आनेवाली विनाशक विकिरण तरंगें खाद्यान्न को दूषित न करें। इस प्रकार ग्रहण के समय तुलसीदल एक रक्षक आवरण का कार्य करता है। तुलसी के पत्ते रात होने पर नहीं तोड़ने का विधान है। विज्ञान यह है कि इस पौधे में सूर्यास्त के बाद इसमें विद्यमान विद्युत्-तरंगें प्रकट हो जाती हैं, जो पत्तियाँ तोड़नेवाले के लिए हानिकारक हैं। इससे उसके शरीर में विकार आ सकता है। तुलसी सेवन के बाद दूध नहीं पीना चाहिए। ऐसा करने से चर्म रोग हो जाने का डर है।

वर्तमान समय में मानसिक चिकित्सा में आत्मसंकेत (ऑटो सजैशन) का बड़ा महत्त्व है। यदि कोई मनुष्य अपने स्वास्थ्य, विचार और मानसिक प्रवृत्तियों को श्रेष्ठ बनाने के लिए बार-बार किसी काम को मन में लाकर मुँख से कहे और वैसी ही कल्पना करे तो उसमें धीरे-धीरे उन विशेषताओं की वृद्धि होती रहती है जो उद्देश्य आधुनिक विचारों के व्यक्ति ‘ऑटो सजैशन’ से पूरा करते हैं, उसी को हमारे यहाँ के प्राचीन मनीषियों ने देवताओं की प्रार्थना-स्तुति कवच आदि के माध्यम से प्राप्त करने की विधि निकाली थी। इन दोनों मार्गों की भली प्रकार परीक्षा करने के उपरांत हम कह सकते हैं कि सामान्य स्तर के लोगों के लिए दूसरा मार्ग ही अधिक लाभदायक है, क्योंकि किसी स्थूल पदार्थ को आधार बनाकर प्रयुक्त किया जाता है, पर पहली विधि जो केवल मानसिक भावनाओं और किसी निराकार शक्ति पर आश्रित रहती है।

तुलसी यह विलक्षण वनस्पति हमे माँ प्रकृति की तरफ से मिला हुआ वरदान से कम नहीं है। जो प्राण की चिकित्सा को अनोखा बल प्रदान करती है। तुलसी के विज्ञान को समझकर इस विलक्षण वनस्पति का प्रयोग स्वस्थ समाज को निर्माण करने सक्षम है इस में कोई संशय नहीं है। हमे जरूरत है, तुलसी की कृषि को आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बनाने का प्रयत्न किया जाए। तुलसी के पत्ते की तरह तरह की औषधीयॉ और चाय बनाने के अतिरिक्त उसका काढ़ा बनाकर कोरोना जैसे संक्रमण से बचाने में मानव जाति की मदद करेगा।

Cosmic Medicine

Inhale true “prana”

The power within us is the name “consciousness” which works within the root. The work of Chetan is to control the root. There is full control over the root. Wherever it is a mixture of and animate, its name is life. Spirit is the part of God. Who do we breathe? No, we do not have life. Through breath, we pull the wind, which is full of gas. In Prana, H, O2, NE etc. Within the same life, there is a resolution to the first. Breath can drag the air, but can not pull life. We call “pranayama” in the order we pull. By pranayama, you can reach the state of meditation by getting the impression of life.

Attention, that process, in which we can attract the energy of entering the entire energy through the breath by employing resolution power. The main purpose of meditating is to bring stability in the mind which is not often in mind and is easily distracted. An unstable mind is not eligible to diagnose and resolve any problem. On the contrary, this problem gives more confusion. A few benefits of different mental conditions are mostly unsuccessful. Mental peace should not be possible for everyone who will live. Our infinite desires are the cause of mental unrest. His mind lives in a human society that remains always playful. If you want peace while living in human society, you will have to take care of meditation, otherwise, it will escape circumstances and problems. The situation will become a slave of you. If you are afraid, then your decision will end. Suicide will have to resort.

Mental peace should not be possible for everyone who will live. Our infinite desires are the cause of mental unrest. His mind lives in a human society that remains always playful. If you want peace while living in human society, you will have to take care of meditation, otherwise, it will escape circumstances and problems. The situation will become a slave of you If you are afraid, then your decision will end. Suicide will have to resort.

According to the Indian sages, the soul is a source of knowledge. This knowledge is flown only when the mind is completely quiet and introverted. Many doors closed with the instability of the mind, while quiet and introvert opened new dimensions of the mind. That is, the condition of the mind should be stable, concentrated, calm and introverted. Otherwise, the mind remains lost in vain fantasies. Mind is the measure to empty the mind from any image. This makes the mind tolerant, quiet, subtle and light. Peace continuously flows from daily experiments of meditation, in the mind, there is decency, desperation, courage and patience. Concentrated relaxation is free from stress. Hope is transmitted in a disappointed mind. Say in summary, the mind is received by a new refreshment. Meditation is medicine, which can experience ultimate peace.

Meditation receives both worldly and spiritual achievements. When it is an extrovert, it is worldly, when there is an introvert, it receives spiritual achievements. Both directions are necessary for the best life in the world. It increases its ability to concentrate every day on the same subject. The use of this science of meditation is done in the development of capabilities. Writers, artists, musicians, painters, singers, scientists have seen the ability to grow in such away.

Join the infinite source

Every person is doing meditation all the time, but not on a subject so that his underlying potential would wake up. The intellectuals who work with hands and mind-brain receive power and peace by both meditations. Carefully remove the alpha waves from the brain that brings peace and creativity to the mind. Sleeping and sleepiness for peace and mind can not be used to support drugs but their side effects are more. Carefully balance the functions of both the right and left of the brain. The brain’s metabolic process works correctly. Meditation has been seen amazing development in the potential of sensitivity and understanding of mind and intelligence and decision-making. Remind power, emotional sympathy and qualitative improvement in sleep. In vain concern and addiction are low.

All planets and Gods are within you. You have to know how to connect within to receive their grace.

Changing our habits and putting in new habits are very helpful. Why is there such a disregard to mind and ideas in spirituality? That is because the mind is the cause of happiness and sorrow. It is not a matter of no binding, no salvation, happiness is not sad. By meditating, the situation of the mind is found where the mind (peace) and nation (dedicated to God). Attention is the beautiful process by which you can find every single object of the world. The peace must be the ultimate peace. The only way is to join the infinite power! By whom you can enjoy energy full life by attracting prosperity, peace, health.

E= mc2

Teleportation

क्वांटम फिजिक्स में टेलिपोर्टेशन यह संकल्पना आज अपना स्वरुप साकार कर रही है। यह काफी संशोधन का विषय रहा है। इसी अविष्कार को लेकर विज्ञान जगत और चैतन्य आध्यात्म जगत में यह क्रांति है। इसी इनोव्हेशन में भारतीय सनातन संस्कृती का ज्ञान कैसे पिछे रह सकता है ? भारतीय सनातन पूर्णतः वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। हमारे वैदिक वैज्ञानिक ऋषि, मुनि, आचार्य इस बात से अनभिज्ञ नहीं थे। टेलीपोर्टेशन यह संशोधन कुछ ही स्तर पर नया है। अणु-परमाणु किसी एक स्थान से दुसरे अन्य स्थान के दूरी तक बिना किसी माध्यम के सहारे अपनी यात्रा को पूर्ण करना ही क्वांटम जगत में टेलिपोर्टेशन से प्रख्यात है। इसी खोज का परिचय हम भारतीय सनातन को पूर्व से ही होता आ रहा है। यहाँ आपको परिचित होना होगा ‘देवर्षी नारद” से। महर्षी नारद की भ्रमण करने की शैली तो आपको पता ही है। वह किसी एक जगह से अन्य जगह मन की, विचारों की गती से पहुंचते थे। यह वस्तुस्थिती है, क्वांटम जगत की कल्पना का! यह सिध्द करने की तैयारी है।

जग प्रसिध्द विज्ञान जगत की ‘मॅक्जिन ‘नेचर’ मे “टेलिपोर्टेशन ही संशोधन का विवरण” प्रकाशित हुए थे। अमेरिका और ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने अपना संशोधन प्रकाशित किया था। इन वैज्ञानिकों के मुताबिक लेझर तंत्रज्ञान की उपयोगिता से यह सफल हुआ है कि, दो अणु- परमाणु को एक जगह से अन्य जगह पर भेजना संभव और सिद्ध है। पर आज की परिस्थिति के साथ इस संशोधन में बदलाव भी होगें। विज्ञान की आज तक की सीख यही रही हैं, जो आध्यात्म जगत कहता आ रहा है, परिवर्तन ही नियम है। परिवर्तन को साथ लेकर चलना ही सफल होना है। विज्ञान हमे भौतिक तरीके से आधुनिक बनाता है, तो आध्यात्म विज्ञान हमे भीतर के ब्रम्हांड का ज्ञान करवाता है। इस लिए महत्व पूर्ण हैं, विज्ञान को आध्यात्म के साथ लेकर चलना ही संसार के अस्तित्व के लिए महत्व पूर्ण है।

तंत्रशास्त्र और क्वांटम फिजिक्स

अन्य संशोधन के आधार पर यह कुछ अनु परमाणु के कण बिना किसी माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित किये जा सकते हैं। क्वाटम उस कण को वस्तु रूप में नहीं स्वीकार करता हुआ ब्रम्हांडी ऊर्जा के रूप मे स्विकार करता है। इसी का रूपांतरण भी शक्य है। यह तत्वदृष्टी से मान्य कथन है। इसी कारणवश क्वाटम जगत कोई भी कल्पना, रोमांचकारी घटना को काल्पनिक नही मानकर उसे साकार रूप में देखने की चेष्टा करता है और क्वाटम टेलिपोर्ट्रेशन की चर्चा करता है। उनका दावा है की दो अलग-अलग परमाणु क्वांटम अवस्था में स्थानांतरित होना सहज प्रक्रिया हैं।

क्युकी, क्वाटम इलेक्ट्रोमेग्नेटीक ऊर्जा का अति सूक्ष्म अंश है। इसिलिए क्वांटम को कण नहीं अपितु ऊर्जा के सुक्ष्म अंश मे स्विकार किया जाता है। संपूर्ण ब्रम्हाड ही ऊर्जा का प्रतिक है। ब्रम्हाण्ड उत्त्पति का मूल बीज ऊर्जा ही है। यह ऊर्जा जब स्थूल आकार धारण करने लगती है, तब पदार्थ बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह सृष्टी सृजन की प्रक्रिया है। यह क्रिया भारतीय सनातन के तंत्रशास्त्र में निहित है, यह शास्त्र उस पैलू पर प्रकाश डालता है, जो सृष्टी सृजन की क्रिया जब आरंभ होती है, तब एक सूक्ष्म ऊर्जा अपना आकार धारण करने लगती हैं। “मातृका” बीज में यह परिवर्तन सफल होकर यह ऊर्जा उस बीज मे समाविष्ट होती है। इन्ही बीजो का विशिष्ट तांत्रिक पद्धती मार्ग से जब स्फोट होता है, तब यह प्रचण्ड ऊर्जा का उद्रेक होता है। इसी मातृका बीज की तुलना क्वाटम से करना उचित होगा। क्योकी, दोनों ही ऊर्जा के सूक्ष्म अवस्था के रूप में स्थित है।

पदार्थ विश्व मे स्फोट उस ऊर्जा प्राप्ती के लिए, और उस पदार्थ के अनु का विभाजन के लिए है। पर चैत्यन्य विश्व में मंत्र और मातृका इनका स्फोट होता है। पदार्थ विश्व की ऊर्जा न्यूक्लियर पॉवर प्लांट में अवतरित होकर उपयोग में आती है। तो चैतन्य विश्व में यह अद्भुत परिवर्तन कैसे होता होगा?

विज्ञान जगत की जहाँ समाप्ती होती है, वह से आध्यात्म जगत की शुरुवात होती है। जब साधक आध्यात्म मार्ग पर चलता है, तो धैर्य, संयम, श्रद्धा उस साधक के अंलकार होते है। साधक निरन्तर अपने लक्ष्य प्राप्ती की ओर अग्रसर होता है। साधक को चैतन्य जगत का अनुभव प्राप्त होता है। प्रचण्ड ऊर्जा का केंद्र और शक्ती विश्व कुंडलिनी जागृत होने का प्रचण्ड कार्य संपन्न होता है। यही शक्ती का उद्गम है। 150 साल गुलामी को झेलकर उसे ललकारना और स्वतंत्रता की देवी का आव्हान कर, प्रकट होना यह उस शक्ती का ही प्रताप है। परिवर्तन और क्रान्ती इसी ऊर्जा के माध्यम से पूर्ण हुआ है। क्वांटम पिजिक्स का यह मानना है, कि क्वांटम किसी एक स्थान से दूसरी जगह पर बिना किसी माध्यम से भ्रमण कर सकता है। यह बात तंत्रशास्त्र की दृष्टी से यदि देखा जाए तो, यह सामान्य बात है। क्वांटम विज्ञान और आधुनिक संशोधन इसी आधार पर प्रयोग कर रहे है। यह संशोधन सब के लिए खुला किया जाए तो, हमारा चमत्कारिक जगत मे प्रवेश हो जाएगा।

ध्रुवे तग्दतिज्ञानम्”। ( योगदर्शन 3 -28 )

ध्रुव तारा के केंद्र पर संयम करने से ब्रम्हाण्ड की गती का बोध होता है। कोई भी व्यक्ती, वस्तु कितने वेग से और कहाँ पहुँच शकती है? यह ज्ञान प्राप्त होता है। इसी प्रवास और प्रयोग विधी के लिए महर्षी अन्य सुत्र पर भी प्रकाश डालते हैं।

क्वांटम विज्ञान का कहना है, परमाणु को एक जगह से दुसरी अन्य जगह स्थलांतरित बिना किसी माध्यम से सफल हो सकता है। इसी परमाणु की जगह पर अगर किसी व्यक्ती का स्थलांतरण हो सकता है? वैज्ञानिक इस बात को भी मान्य कर रहे है। इसी का आधार वैज्ञानिक परमाणु पर केंद्रित कर रिसर्च में लगे हैं। परंतु भारतीय सनातन के तंत्र शास्त्र, तंत्र विज्ञान मे यही बात प्राचिन और नित्य प्रचलित थी। इसी क्षेत्र में अनेक व्यक्ती, योगी, गुरु, आचार्य इसी कला से अवगत थे। सामान्य जनता को प्रत्यक्ष जागृत बोध करवाने मे वो सक्षम थे। श्यामाचरण लाहिडी यह विव्दान व्यक्ति कुछ क्षणों मे इंग्लड को चले गए थे। यह पूर्णतः सत्य है। लाहिडी जी ने इग्लंड को जाने के लिए किसी भी प्रकार की फ्लाइट का आश्रय नहीं लिया था। वो बिना किसी माध्यम के सहारे क्वांटम जैसे स्थलांतरित हुए थे। इसी का शुद्ध प्रमाण है, योग-दर्शन के विभूति पाद के 28 नं के सूत्र में।”ध्रुवे तग्दतिज्ञानम्”।

स्कुकी ऐक्शन और क्वांटम वायरिंग

क्वांटम वैज्ञानिक टेलिपोर्टेशन के माध्यम से परमाणु की गति, ऊर्जा, चुंबकीय क्षेत्र इन्ही का विश्लेशन देते रहते है। इसी पर एक संशोधन कार्य Gut University of insberg और National instiutes of standards and techenolgy के तहत संपन्न हुआ था। क्वांटम की इसी प्रक्रिया को, आइनस्टाईन ने स्युकी एक्शन कहाँ था। इसी स्युकी एक्शन को तंत्र शास्त्र मे परलोकगमन, आकाशगमन कहते हैं। यहा टेलीपोर्टेशन की प्रक्रिया को समझना है, कि कोई भी व्यक्ती एक स्थान से अन्य किसी स्थान पर अदृश्य होकर अन्य स्थान पर प्रकट होने की प्रक्रिया को (NIST) के वैज्ञानिक को ने इसे ‘क्वांटम वायरिंग’ कहा था।

आने वाला युग वैज्ञानिक आध्यात्मवाद का ही होगा। आने वाले दिनों में विज्ञान क्षेत्र में अनेक बदलाव संभव है। यह बदलाव केवल भौतिक जगत में ही नहीं अपितु सूक्ष्म, चैतन्य जगत में यह परिवर्तन होगा। भारतीय सनातन गुह्य विद्या के आधार पर अनेक तांत्रिक मॉडेल सफल होने संभावनाए है। मानसशास्त्र और भौतिक शास्त्र मे आमुलाग्र बदलाव भी संभव है। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकेगा की, हमारे आंतरिक वृत्तीयो मे परिवर्तन लेकर आने वाली तांत्रिक पध्दती पर भी कार्य और संशोधन शुरू है। यही परिवर्तन का शंखनाद है।

मैं आव्हान करता हूँ। हमे आज जरूरत है, शुद्ध सात्विक ज्ञान, विद्या, शक्ती की। भारतीय सनातन शाश्वत है। हमे हमारी संस्कृती का उद्धार करना होगा। उसके भीतर के ज्ञान की उपासना करनी होगी। आने वाला समय वैज्ञानिक आध्यत्मवाद का ही होगा। इसी प्रकार के संशोधन और उनके परिणाम प्रत्यक्ष देखने के लिए हमे विद्वान और योगी, आचार्य की नितांत आवश्यकता है। अपने विचारो मे चैतन्य लेकर आना, विचारो को योग्य दिशा देना, जिवन के लक्ष्य को समझना, यही तो आध्यात्म का परम लक्ष्य है।

आध्यात्म शिक्षा के मुल्यो को सहेज कर उनका पालन करना अपने आप में मानवता की सेवा है। भारतीय सनातन के साहित्य की आज जरूरत है। उस साहित्य पर अनेक संशोधन की नितांत आवश्यकता है। महर्षि पतंजलि जी का योग दर्शन ही संपूर्ण जीवन का यथार्थ दर्शन करवाता है। इन सुत्रो मे जीवन का हर एक पैलु सत्य प्रतित होता है। संस्कृत भाषा पर संशोधन हमे पूर्ण स्वास्थ और डिप्रेशन जैसी बिमारीयो से लेकर थाइराईड जैसे रोगो को दूर रख सकते हैं। हमारा मानवी जिवन और शरिर का बोध समझने के लिए आयुर्वेद है। इन सभी विद्याओ पर अध्ययन आवश्यक। जरूरत है भारतीय सनातन को प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचे। सनातन ही शुद्ध, शाश्वत और विचारों से परे है। इस विद्या का स्विकार किया जाए। यही मानवता की सेवा है। By

अमृतस्य भोजन!

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दनः

आरोग्य का अर्थ होता है, संपन्न बनना। अपनी शक्तीयो को बढ़ाकर योग्य उपयोग करना। आरोग्य का अर्थ केवल भौतिक शरिर से संपन्न होने तक सीमीत नहीं है। आरोग्य का सही अर्थ होता है, मानसिक संपदा, सामाजिक आरोग्य अर्थात (किर्ती, यश), और आत्मसमाधान इन चारों स्तर पर आरोग्य का स्थान रहना चाहिए। इसी कड़ी में महत्वपूर्ण और आरोग्य व्यवस्था का गर्भ है ‘प्राण’। इसी प्राण का रक्षण करना परम आवश्यक है। इसलिए हमे प्राण के विस्तार को यहां समझना होगा। इसलिए वेद, उपनिषद का आधार लेना महत्वपूर्ण है।
‘सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपाल नन्दनः इस संस्कृत मंत्र का अर्थ होता है, ‘श्रीभगवदगीता ही वेदो का सार है। तभी श्रीमद्भगवद्गीता मे आरोग्य से संबधीत मार्गदर्शन का समावेश तो स्वभाविक है। यह समस्त पूर्णमद पूर्णमिद का सार है। आरोग्य का सत्य विवेचन “श्रीगीता” जी में वर्णित हुआ है। हमारा शरिर आरोग्य की दृष्टी से प्रथम स्थान प्राप्त करता है, इस स्तर पर श्रीगीता जी का ज्ञान को आत्मभुत करना है, आत्मसात करना है। इसलिए “तत्त्वत:” और “निरंतर” अभ्यास यह दो महत्वपूर्ण स्थान है। इनका उल्लेख श्रीगीता जी मे आपको मिलेगा। इस लिए प्राणशक्ती को हमे समर्पित होना होगा। प्राण शक्ती को तत्वतः समझना होगा। आरोग्य प्राप्ती के लिए केवल जिम, उपवास, डाईट, प्रोटीन इन सब चिजो पर आरोग्य आधारित नहीं है। जीवन जीने के लिए ऊर्जा अर्थात् अन्न तो महत्वपूर्ण है।

इस अन्न ऊर्जा उदगम स्त्रोत श्री गीता जी के तिसरे अध्याय मे वर्णन किया है,

अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ।।३-१४।।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ।।३-१५।।

अन्न का अपना एक चक्र है। यही अन्न सुर्य से ऊर्जा ग्रहण कर यही ऊर्जा अन्न के रूप में सभी जीवों को उपलब्ध करायी जाती है। सुर्यशक्ती के अभाव मे जीवन शून्य है। यही ऊर्जा और शक्ती को अपनी मर्यादा तक इसे स्टोरेज किया जा सकता है। जैसे बॅटरी की अपनी सीमीत क्षमता होती हैं। बाद मे वह बॅटरी चॉर्जिग करनी होती है। यही सुर्यशक्ती, पेड-पैधा के रूप मे बॅटरी है, यह सुर्य शक्ती पेडो-पौधो वनस्पतीयो मे अन्न के रूप स्टोरेज हुई है। यही पेड-पौधे वनस्पती यही स्टोरेज किया हुआ अन्न सब मानव जाति को उपलब्ध कराते है। पेड पौधे, वनस्पति हमारे पूर्वज है। इसलिए उन्हें धन्यवाद किया जाना चाहिए। उनका आदर-सत्कार अवश्य होना चाहिए। पेड पौधों उपकारक है। यही वनस्पती अपने अन्न को किस प्रकार तैयार करती है? यह गुढ़ रहस्य तो है ही! मानव जीवन वनस्पतीयो पर आधारित है, जीवन में मुख्य है श्वास। वनस्पती केवल श्वास तक सिमित नहीं है, यह हमे औषधी भी उपलब्ध कराती है। इस लिए आयुर्वेदिक औषधीयाँ अन्न के समान सेवन कि जा सकती है।

आयुर्वेद का विज्ञान उस कॉसमिक मेडीसीन पर काम करता है, सुर्य से प्राप्त कि हुई जिवनी शक्ती, वनस्पतीयो मे संग्रहीत कि हुई सुर्य शक्ती को ज्यादा से ज्यादा कैसे उपयोग में लेवे इसलिए आयुर्वेद मे गुटी, वटी, भस्मे, आसव और अरिष्ट जैसी विधी को सेवन करने का महत्व है। आयुर्वेद में माँ प्रकृती को धन्यवाद करने के भाव को सबसे उच्च स्थान प्राप्त है। च्यवनप्राश यह उत्कृष्ठ उदाहरण है। प्रकृती कुछ समय तक ही आंवला को उपलब्ध कराती है। आंवला के भीतर की शक्ती, रसायन के द्वारा हम साल भर स्वाद ले सकते है। इसी कारण वश च्ववनप्राश बनाया जाता है। यही एक तरिका है उस सुर्यशक्ती को ग्रहण करने का ! यही सुर्यशक्ती हमे तारुण्य, उत्साह प्रदान करती है। जीवन को जीना ही मनुष्य काम कर्म है। मनुष्य ने कर्म की सीमाओ का उल्लंघन नही करना चाहिए। निसर्ग, प्रकृती शक्ती के नाश को हमें रोकना है। पेड़, पौधे, वनस्पतीयो को यही नहीं नष्ट करने का कार्य चलता रहे तो उस सुर्यशक्ती का अन्न में कैसे रूपांतर होगा??

हरित क्रांति के बाद अंग्रीकल्चर इंडस्ट्री मे आमुलाग्र बदलाव देखे जा चुके है। खेती मे रासायनिक खाद, औषधी का उपयोग बढ़ने लगा। खेती शास्त्र पुर्णतः इन चिजो पर आधारीत है। धरती के भीतर की उष्णता को अनेकों प्रकार से बढ़ाया जा रहा है, जिस वायु पर जिवन आधारित है, उस प्राण वायु को दुषित करने का कृत्य मानव द्वारा ही संपन्न किया जा रहा है।

इसी प्राण की कमतरता के अभाव से अनेक रोगो का प्रादुर्भाव बढ़ रहा है। रोग उत्पन्न हो रहे हैं। कर्म करना जीवन का मर्म है। माँ प्रकृती के अनुकुल कर्म करना इसी कर्म को यज्ञ कहते है। यही यज्ञ पुण्ययज्ञ में परिवर्तीत होता है। इस यज्ञ पर वर्षा बारिश आधारीत होती हैं। वर्षा ऋतु का असमतोल बड़े संकट का कारण है। इंड्रस्टी से वेस्टेज वॉटर जब खेती में डाला जाता है, यह अन्न विष का रूप धारण करने लगता है। विषयुक्त अन्न का संक्षिप्त वर्णन श्रीमद्भगवत गीता में हुआ है। इस अन्न का त्याग करना चाहिए। श्री गीताजी मे अन्न को तीन भागों में विभाजीत किया है,

  1. सात्विक
  2. राजसिक
  3. तामसिक

इन तिनो मे किसी एक अन्न का सेवन करने पर उसी प्रकार की प्रकृती बनती है। अन्न द्वारा प्रकृती निर्माण कार्य संपन्न होता है। इन तीनों प्रकृती को आगे वात, पित्त, कफ मे विभाजीत किया है। इसलिए अन्न को आदर के साथ ग्रहण किया जाना उत्तम है। अति सेवन का त्याग करना उचित है। मनुष्य के शरिर प्रकृती को आरोग्य, वीर्यशक्ती, ऊर्जा को बढ़ाने वाला रसयुक्त अन्न शरिर की सात्विकता बढ़ाते हैं। इस अन्न से सकारात्मक शक्ती बढ़ाती हैं। मसाला युक्त, अति कड़वा, अति तीखा, गरम, सुखा अन्न रोग उत्पत्ती बढ़ता है। यह अन्न राजसिक है। और आलस्य से पूर्ण, बासा अन्न तामसिक हैं। इसी प्रकार से गीता, उपनिषिद, वेदों में आरोग्य मार्गदर्शन किया है। श्री गीता जी में मानसिक शांती के उपर विशेष ध्यान दिया है। मानसिक स्वास्थ को संतुलित रखने के लिए,

ॐ इति एकाक्षरे ब्रम्ह व्याहरन्

प्रणव को ही, महर्षी पतंजलि ने सुत्रमे बताया है,

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥

ईश अनुग्रह द्वारा हम अपनी बाधाओं को दूर कर सकते है । यह कुछ ही शब्द मे आपको समझाने कि कोशीश हो रही है। विघ्न बाधा, रोग, नकारात्मकता अगर है, तो उसे किस प्रकार से दूर किया जाना चाहिए? नकारात्मक तत्व को दूर करने के लिए आपने कौन सी अच्छी आदतो का स्वीकार किया जाना चाहिए? इसलिए हमे सोचना है, मै चाहता क्या हूँ? इस लिए भगवद् गीता वह माध्यम है, जो आपकी उंगली पकड़कर चलना सिखाती है। आपको समय समय पर मार्गदर्शन देती है। भारतीय शास्त्र अपने आप मे समृद्ध एंवम सुमेरु पर्वत है। जहाँ ज्ञान की गंगा सतत बहती है। सभी प्राचिन भारतीय शास्त्र ही एक दुसरो के पुरक रहते है। आयुर्वेद यह जीवन शाखा है, इसलिए उसकी मुख्य तत्वो का स्विकार सभी शास्त्रो में किया जाता है।

योग और आयुर्वेद की यह जोडी प्रचलित हैं। पर न्यायशास्त्र, सांख्य दर्शन, वैशेषिक दर्शन यह सभी दर्शन शास्त्र आयुर्वेद शास्त्र से साम्य साधर्म रखते है। भारत वर्ष की पहचान ही श्रीमद् भगवद गीता है। जो पूर्ण ब्रम्हाण्ड को मागदर्शन करती है। यह प्रदर्शन भारत के ज्ञान का हैं। इसलिए भारत जगद्‌गुरू है। आयुर्वेद मे एक विशिष्ट संकल्पना है वह है अग्नी’।अग्नी केवल अन्न पाचन का कार्य ही नहीं करती अपितु शारिरिक और मानसिक आरोग्य को शक्ती प्रदान करती है।

आचार्य चरकजी, ने अग्नी की महता का बखान किया है,

आयुर्वर्णो बलं स्वास्थं उत्साहोपचयौ प्रभा ।

ओजस्तेजोग्नयः प्राणाः चोक्ता देहाग्निहेतुकाः ।।

शान्तेऽग्नौ म्रियते युक्ते चिरं जीवत्यनामये ।।…चरक

आयु, बल, स्वास्थ, उत्साह, उत्तम शरिर सहनन, आभा, ओजस का अर्थ है’ सर्वश्रेष्ठ शरिरशक्ती तेज इन सभी का मूल तत्व है’ अग्नी’
यही अग्नी अगर बुझ गयी तो वह है’ मृत्यु’। उत्तम अग्नी निरामय आयुष्य का आधार है।



अग्निं रक्षेत प्रयत्नतः ।

आयुर्वेद के अनेक संहिता मे उल्लेख हुआ है, हमे अग्नि का रक्षण संरक्षण करना होगा।

भगवत गीता और अग्नि।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।

प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।। ..(15_14)

इस श्लोक के माध्यम से भगवान अपना बोध कराते हैं। भगवान मनुष्य अथवा अन्य जीवों में स्वयं अग्नी रूप मे वास करते है। प्राण अपान की सहायता से चतुर्विध अन्न का पाचन करते हैं। इसलिए यह महत्वपूर्ण है, की आप अन्न को किस भावना से ग्रहण करते हैं। क्युकी यह केवल अन्न नहीं है, यह ऊर्जा है। यह साधना है, अन्नमय कोश की। जिस पर आपका मुलाधार चक्र गतिमान होता है। इस लिए अन्न को’ पूर्णब्रम्ह’ का दर्जा प्राप्त है।

तत्राग्निहेतुः आहारात् न हि अपक्वाद् रसादयः ।।
चरक चिकित्सास्थान

अग्नि को प्रदिप्त रखना है, तो आहार को योग्य करना होगा। आहार ही दुषित होगा तो आग्नि उस दुषित अन्न को कैसे पचा सकेगा? उस अन्न से कैसे शरिर का पोषण होगा? इसी कारण से रोगप्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाती है। आरोग्य दिर्घकाल तक संरक्षित रखने के लिए पाचन योग्य होना अनिवार्य है। आयुर्वेद शास्त्र मे 13 अग्नी बताई है। जिसमे जठराग्नी महत्वपूर्ण है। जठराग्नी आधार है, अन्य अग्नी का। जैसे जठराग्नी उत्तम है तो अन्य अग्नी भी उत्तम रहती है।

1. जठराग्नी :- जठर मे छोटी आंत की सुरुवात मे राह अग्नी सेवन किए गए अन्न का पाचन करता है

2. धात्वाग्नीयह संख्या में सांत है। हर एक धातु का आपना अग्नी है। इसी माध्यम से शरिरमे सात धातु योग्य प्रमाण मे तैयार होते है।

3. भूत्वाग्नी :
यह पाँच है। पार्थिवाग्नी यह आहार के पार्थिव भाग का पाचन करता है। आप्याग्नी आहार में स्थित जल का पाचन का कार्य करता है। और प्रत्येक महाभूत, अग्नी स्वयं ही गुणो से युक्त आहार पाचन का कार्य करता है। जठारग्नि और भूताग्नि से के व्दारा आहार का योग्य प्रकार से पाचन होने पर उस आहार का रूपांतर तेजोमय, परम सुक्ष्म और आहार का सारस्वरूप होता है।

मानवी शरिर मे हर एक स्वतंत्र इन्द्रिय, स्वतंत्र पेशी को पोषित करने वाले गुण होते है। आहार रस हमारे हदय से संपुर्ण शरिर में प्रवाहित होता है। इसलिए हृदय महत्वपूर्ण स्थान पर आरूढ है। इसी स्थान से शरिर धातु की पुर्ती करता है, और शरिर धारण होता है। यह आहार रस हृदय से संपूर्ण शरिर में प्रवाहित करने की जिम्मेदार व्यान वायु पर होती है। व्यान वायुका स्थान संपूर्ण शरिर मे होता है, इसलिए व्यान वायु आहार रस सूक्ष्म से सूक्ष्म पेशी तक अखण्ड प्रवाह से प्रवाहित होता रहता है।

मन और आरोग्य

आरोग्य को संभालना है तो मन को नियंत्रित करना आवश्यक है। आयुर्वेद मे मन के गुण अवयव का बखान किया है। जिस प्रकार शरिर प्रकृती होती है, उसी प्रकार से मन की प्रकृती आधारित होती है। प्रकृती को संभालना सत्व, रज, तम व तत्वो पर मानसिक प्रकृती का चयन होता है।

सत्त्वं प्रकाशकं विद्धि रजश्चापि प्रवर्तकम् ।
तमो नियामकं प्रोक्तं अन्योन्यमिथुनप्रियम् ।। काश्यपसंहिता

सत्व गुण में ज्ञान प्रकाश का उद्रेक होता है। सत्व गुण के अधिपत्य से वस्तु का यथार्थ स्वरूप का ज्ञान करता है। रज गुण गती, प्रवृत्त करने का कार्य करता है तो, तमगुण नियंत्रण प्रदाता होता है। इन तीनो गुणो का समन्वय ही उत्तम आरोग्यका प्रतिक है। सत्व गुण मन का होता है। इसी लिए सात्विक मन रहना शरिर और मन संतुलन के लिए उत्तम है।

त्रिविधं सत्त्वमुद्दिष्टं कल्याणक्रोधमोहजम् ।
श्रेष्ठमध्याधमत्वं च तेषां प्रोक्तं यथाक्रमम् ॥
.काश्यपसंहिता लक्षणाध्याय.

कल्याण अंश से युक्त मन सात्विक श्रेष्ठ माना जाता है। क्रोध युक्त मन रजसिक है, तो मोहयुक्त मन तामसिक है। अनिश्चितता, निर्णय नही ले पाना तामसिकता प्रधान होता है।

सात्विक गुण

सात्त्विकास्तु आनृशंस्यं संविभागरुचिता तितिक्षा सत्यं धर्म आस्तिक्यं ज्ञानं बुद्धिमेंधा स्मृतिधृतिरनाभिषड्श्च।।
..सुश्रुत शारीरस्थान

सात्विक मन संकल्प शक्ती से ओतप्रोत रहता है। संकल्प शक्ती सद्बुध्दी प्रदाता है। दिव्य गुणो का स्फुरण सत्व गुण का लक्षण है। सत्व गुण का अर्थ होता निर्णय लेने में तत्परता, योग्य लक्ष्य निर्धारण रखना, दृढ निश्चयी यह सब योग्यता का पात्र होता है। सकारात्मक सोच का परिणाम हर विपरित स्थितीमे संतुलन बनाए रखता है।

राजसिक गुण

सात्त्विकास्तु आनृशंस्यं संविभागरुचिता तितिक्षा सत्यं धर्म आस्तिक्यं ज्ञानं बुद्धिर्मेधा स्मृतिधृतिरनाभिषड्श्च ।

..सुश्रुत शारीरस्थान

राजसिक भाव की वृत्ति वाले मनुष्य मे चंचलता बनी रहती है। योग्य निर्णय लेने में अनिश्चितता बनी रहती है। इन मनुष्यो में क्रोध अधिक होता है संयम,धैर्य शक्ती की कमी होती है।

तामसिक गुण

दुःखबहुलताऽटनशीलताऽधृतिरहङ्कार आनृतिकत्वमकारुण्यं दम्भो मानो हर्षः कामः क्रोधश्च ।

इन व्यक्तियो मे नैराश्य, डिप्रेशन चरम सिमा पर होता है। आलस्य, प्रमादी बनना, आलस्ययुक्त दिनचर्या के धनी यह व्यक्ती होते है।

श्री मद्भगवतगीता में तीनो प्रकृती का वर्णन :

आयुःसत्त्वबलारोग्य-सुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ।।(17_8)

अपनी क्षमता से पूर्ण आहार का सेवन करना, सात्विकता को अखण्ड रखने को (स्थिर आहार) कहा है। स्थिर आहार शरिर मे बल, बुध्दी, मेधा, आरोग्य, की प्राप्ती कराने वाला होता है।

कट्वम्ल-लवणात्युष्ण तीक्ष्ण-रूक्ष-विदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ।।
(17_8)

तिखा, कड़वा, अति कशैला, तीक्ष्ण आहार शरिर मे चंचलता, दुःख रोग कारक होता है।

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ।।
(17_10)

आधा कच्चा रस मुक्त, दुर्गन्ध युक्त बासा भोजन अपवित्र है। उसका त्याग करना ही योग्य है।

आयुर्वेद और गीता का दिव्य समन्वय ज्ञान है। इस ज्ञान की जरूरत है, जीवन मे इस ज्ञान को पूर्णत जीने की आयुर्वेद यह शक्ती है, तो भगवद गीता गुरु मण्डल है, इन दोनो का समन्वय ही. परम शिव तत्व की प्राप्ती है। अन्तमे हमे एक ही संदेश प्राप्त होता है, “योगस्थ गुरु कर्माणि”। हमारे सब दुखो का कारण एक ही है। हमारा स्वयं पर का विश्वास अविश्वास में परिवर्तित हुआ है। हमे अपनी शक्तिया ज्ञात नही है। हम उलझे हुए रहते हैं। भगवत गीता यह हमे ज्ञान प्रदान करती है जो भीतर तमोगुण हैं, उस तमोगुण पर रजोगुण से अंकुश रखा जाए। रजोगुण पर सत्व गुण से अंकुश रखा जाए। परम् पुरूषार्थ यही हैं सत्व गुण पर आध्यात्म से जीता जाए। हमारा स्वरुप ज्योर्तिमय है। हम वस्तु से, किसी कारण से जहा है, वह वस्तु स्थिति नही हैं। हमे खोज करनी है मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? सबसे पहले हम एक दिव्य ज्योति है। फिर हमारा शरीर पांच तत्वों से बनकर एक आकार और स्वरुप धारण करने लगता हैं। फिर हम प्राण बनकर उभर आते हैं। हमारे भीतर का वातावरण हमे प्राण वायु देकर तुष्ट और पुष्ट करता है, हम चेतनामय बनते जाते हैं। पृव्थि से बीज , बीज का पौधा जब धरती को चीर कर प्रकाश की ओर बढ़ता जाता है। वह अमृतस्य भोजन का अधिकारी बन जाता हैं। वह ऊर्जा अन्न रूप धारण कर धरती से प्रसाद बनकर ग्रहण करने योग्य बन जाता हैं।वह उस तपस्या का फल स्वरुप होता हैं। वह ऊर्जा रूपी अन्न शरीर में जाकर रस बनकर हमे ओज, बल से परिपूर्ण करता है, अन्न ही औषधि बन जाता है।

A latent light

।। तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः।।

हमारा जीवन जीने के लिए अन्न और जल जितना महत्व पूर्ण है, उतना ही महत्व पूर्ण है, वायु। क्या हम सिर्फ वायु के सहारे जिंदा रह सकते है क्या ? बिल्कुल ही नहीं। हम शरीर में नासिका के द्वारा वायु खींचते है, नही! बल्कि नासिका रंध्र से वायू के साथ प्राण तत्व भी भीतर जाता है। इसी प्राण तत्व के आधार पर ही शरीर अपनी संपूर्ण गतिविधियां पूर्ण करता है। हमारा जीवन अन्न और जल पर ही आश्रित नही हैं। शरीर के भीतर गई हर एक श्वास के साथ यह प्राण शक्ति हमारा साथ देती है। प्राण शक्ति चैतन्य रूप में उभरती है। यही शक्ति कुण्डलिनी स्वरुप धारण कर कपाल भेदन करती हुई परम गति को प्राप्त होती है। इसी लिए महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के चतुर्थ पाद में प्राण के विस्तार को ही प्राणायाम कहा है। प्राणायाम के नियमित अभ्यास से प्राणशक्ति में वृद्धि होती है। प्राणशक्ति का स्वरुप महर्षि पतंजलि जी ने सूत्र देकर प्रकाश डाला है। अथर्व वेद के प्राण सूक्त में प्राण की महिमा बताई है।

जो हमारे वायु मंडल में ऋण आवेषित कण होते है वह कण भीतर जाती हुई वायु के माध्यम से रक्त में प्रवेश करता है, यह श्वसन प्रक्रिया का एक अंग है। यही माध्यम हैं विजातीय द्रव्य को बाहर फेंकने का। परंतु प्राणायाम यह नहीं है, डीप ब्रीदिंग (गहरा श्वास-प्रश्वाँस लेने की प्रक्रिया) प्राणायाम है। प्राणायाम जानने से पूर्व ‘प्राण’ शब्द को जानना होगा। संस्कृत में ‘प्राण’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से हुई मानी जाती है। अन् धातु-जीवनी शक्ति चेतना वाचक है। इस प्रकार ‘प्राण’ शब्द का अर्थ चेतना शक्ति होता है। प्राण और जीवन प्रायः एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। प्राणायाम शब्द के दो खंड हैं एक ‘प्राण’ दूसरा ‘आयाम’ है। प्राण यहां जीवन तत्त्व हैं, और आयाम का अर्थ है विस्तार। प्राण शब्द के साथ प्राण वायु जोड़ा जाता है। तब उसका अर्थ नाक द्वारा साँस लेकर फेफड़ों में फैलाना तथा उसके ऑक्सीजन अंश को रक्त के माध्यम से समस्त शरीर में पहुँचाना भी होता है। यह प्रक्रिया शरीर को जीवित रखती है। अन्न और जल के बिना कुछ समय तक गुजारा हो सकता है, परंतु साँस के बिना तो दम घुटने से कुछ समय में ही जीवन का अंत हो जाता है। प्राण तत्त्व की महिमा जीवन धारण के लिए विराट की संकल्पना है।

प्रणायाम पूरे अष्टांग योग का ही प्राण है। प्राण वह ऊर्जा है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। क्युकी यही ऊर्जा सब प्राणी, वनस्पति यो में सुक्ष्म और सशक्त रूप में पाई जाती हैं। जीवधारियों की जड़ और चेतन का‌ समन्वित रुप एक ज्ञान है, और दूसरा क्रिया है। दोनों को ही गतिशील रखने के लिए संव्याप्त प्राण ऊर्जा से पोषण मिलता है। इसी आधार पर जीवधारियों का अस्तित्व है। प्राण शक्ति की गरिमा सर्वोपरि होने और उसी के आधार पर निर्वाह करने के कारण जीवधारियों को, प्राणी कहते हैं। प्रकृति अनुदान के रूप में हर प्राणी को मात्र उतनी ही प्राण ऊर्जा देती है, जिससे वह अपने जीवित और गतिमान रह सके। इसके अतिरिक्त यदि किसी को कुछ महत्त्वपूर्ण प्राप्त करना होता है, तो उसके लिए उसे विशेष पुरुषार्थ करना पड़ता है। उसे संकल्प बल से ब्रह्मांड चेतना में से प्राण ऊर्जा की अभीष्ट मात्रा प्रयत्न पूर्वक खींचनी पड़ती है और साँस के सहारे जिस तरह ‘ऑक्सीजन’ समस्त शरीर में पहुँचाई जाती है, उसी प्रकार वह प्राण ऊर्जा की अतिरिक्त मात्रा भी पहुँचानी पड़ती है। इस प्रकार योगशास्त्रानुमोदित विशेष क्रिया-प्रक्रियाओं द्वारा उस अतिरिक्त प्राण को अभीष्ट अवयवों एवं संस्थानों तक पहुँचाना पड़ता है, प्राण में निहित ऊर्जा, ओज, तेज, वीर्य और जीवनदायनी शक्ति। वही आयाम है, विस्तार, फैलाव, अवरोध या नियंत्रण। अंतः प्राणायाम का अर्थ हुआ है, प्राण अर्थात् श्वसन का विस्तार, और फिर उसका नियंत्रण।इस प्रकार ऊर्ध्वगति प्राप्त होकर आध्यात्मिक प्रयोजन पूर्ण होता है।

सृष्टि में जो चैतन्यता है, उसका बीज ही प्राण है। यही प्राण तत्व सृष्टि में गतिमान हो रहा है। यही संसार की उत्पत्ति का कारण है। समस्त सृष्टि कल्प के आदि और अंत में आकाश रूप में परिणति हो जाती एवं सभी शक्तियाँ प्राण में ही विलीन हो जाती हैं। नई सृष्टि उत्त्पति में प्राणत्व ही अभिव्यक्त होकर विभिन्न संरचनाओं के रूप में अपना परिचय देता है। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण एवं अणुओं की चुंबकीय शक्ति में प्राण शक्ति ही विद्यमान है। चेतना जीवों की हलचलों में वही प्रेरणा प्रदाता है, तो उत्पादन, अभिवर्धन का मूल प्राण स्पंदन ही है। यही जीवों को नवीन सृष्टि के लिए परस्पर आबद्ध करता। काम की प्रचंड शक्ति प्राण का ही एक भाग है। इसका निम्नस्तरीय स्तर है-काम-वासना अर्थात् भीतर बहुत मात्रा में क्रोध, और जुड़ाव है। प्राण शक्ति की उपासना सर्वश्रेष्ठ है। प्राण वह ब्रम्हाण्डीय द्वार है जो आपको भीतर का दर्शन कराता हैं।

विचारों की प्रखरता एवं वाणी की तेजस्विता प्राणतत्त्व आधर पर ही प्रकट होते है। विचार इसी से सशक्त बनते तथा दूसरों पर प्रभाव छोड़ते हैं। विचारक, मनीषी, संत महापुरुषों के विचार एवं उपदेश निकट के ही नहीं अपितु दूरदर्शी होते हैं। उन्हें श्रेष्ठता की ओर बढ़ चलने की प्रेरणा देते हैं। यह प्राण शक्ति का ही प्रभाव है, जो अपने विचारों के अनुसार अन्यों को चलने, अनुगमन करने को बाध्य करती है। प्राणायाम साधना का लक्ष्य इस तत्त्व को जानना तथा उस पर नियंत्रण प्राप्त करना है। नियंत्रित प्राण इतनी बड़ी संपदा है जिसके समक्ष संसार की सभी भौतिक संपदाएँ छोड़ी जा सकती हैं। उस महाशक्ति से प्रकृति को भी वशीभूत किया जा सकता है।

वेदों में प्राण शक्ति महिमा बताई है, जिसमें जिज्ञासु ऋषि से पूछता है,

“कस्मिंतु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञतो भवति” ?

ऐसी कौन-सी वस्तु है जिसका ज्ञान होने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है। ऋषि उत्तर देते हुए कहते हैं कि “यह प्राण तत्त्व ही है जिसे जान लेने के बाद कुछ जानना अवशेष नहीं रहता।”

इसी कारण श्रुति कहती है कि “प्राण तत्त्व को समझने उस पर नियंत्रण प्राप्त करने से प्रकृति के समस्त रहस्यों को अनुभव किया जा सकता है। प्राण पर विजय प्राप्त कर लेने का अर्थ है-प्रकृति पर विजय प्राप्त करना, प्रकृति की अन्य शक्तियाँ प्राण संपन्न व्यक्ति की अनुगामिनी होती हैं।

अनंत प्राण समुद्र की यह सबसे निकट की तरंग है। इस पर यदि नियंत्रण किया जा सके तो उस प्राण के महासमुद्र से संपर्क जोड़ा जा सकता है।

प्राण समस्त प्राणियों में जीवनी शक्ति के रूप में प्राण शक्ति विद्यमान है। वैचारिक प्रखरता उसकी उच्चतम अभिव्यक्ति हैं। इसके अतिरिक्त भी प्राण की वृत्तियाँ हैं जिन्हें हम जन्म-जात प्रवृत्ति अथवा ज्ञान रहित चित वृत्ति भी कहते हैं। इन्ही वृत्ति के निरोध को महर्षि पतंजलि जी ने योग कहा है। योग है चित्त की वृत्तियों का निरोध। जब हम प्राण तत्व में विद्यामन अनंत तत्व को भीतर स्थापित करेगे तो उस अनंत की शक्तियां आपके भीतर आएगी। यही वह स्थिति है जिसे वेद कहते है,

। यथा पिंडे तथा ब्रम्हांडे।

इसी शरीर के भीतर ब्रम्हांड मौजूद है। आपको जागरूकता चाहिए।अचेतन मन द्वारा संचालित प्रवृत्तियों में भी प्राण तत्त्व की ही अव्यक्त भूमिका होती है। शरीर की समस्त क्रिया प्रणाली इसी के द्वारा संचालित हैं। विश्व में अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर एक अखंड ऊर्जा का प्रवाह दिखाई पड़ती है। वही भौतिक संसार के विभिन्न रूपों में व्यक्त होता हैं। प्रत्येक वस्तु इस अनंत प्राण की एक भँवर है। लाखों प्रकार के जीव प्राण की विभिन्न स्तर की अभिव्यक्तियाँ हैं। सूक्ष्म जगत् में भी प्रविष्ट करने पर वह अखंडता दिखाई पड़ती है। ईथर को संपूर्ण जड़ जगत् को सूक्ष्मावस्था माना जाता है। वह प्राण की स्पंदनशील सूक्ष्म स्थिति है। यह सबमें व्याप्त है। यह ब्रह्मांड व्यापी सूक्ष्म प्राण शक्ति ही है, अध्यात्म साधनाओं के माध्यम से ग्रहण, आत्मसात् करने पर प्राण-प्रयोग बन जाती हैं। इसे ही खींचकर अपने विकसित सूक्ष्म शरीर धारण कर योगीजन दिव्य क्षमता संपन्न बनते हैं। अध्यात्म विज्ञान की यह विद्या आत्मिक कायाकल्प में व मानसिक क्षमताओं के अभिवर्धन में बड़ी सफलता पूर्वक प्रयुक्त की जा सकती है, इसे अपने जीवन में परीक्षित कर ऋषियों ने ग्रंथों में भी स्थानापन्न किया है। प्राणतत्त्व समस्त भौतिक और आत्मिक संपदाओं का उद्गम केंद्र है। सर्वत्र संव्याप्त है।

स्वामी विवेकानंद ने प्राण की विवेचना ‘साइकिक फोर्स’ के रूप में की है। इसका अर्थ मानसिक शक्ति हुआ है। यह मस्तिष्कीय हलचल हुई, पर प्राण तो विश्वव्यापी है। यदि समष्टि को मन की शक्ति कहें या सर्वव्यापी चेतना शक्ति का नाम दें, तो ही यह अर्थ ठीक बैठ सकता है। व्यक्तिगत मस्तिष्कों की मानसिक शक्ति की क्षमता प्राण के रूप में नहीं हो सकती। मन की सर्वव्यापी क्षमता में अदभुत सामर्थ्य होता है। मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं के रूप में प्राण शक्ति के प्रकट होने का प्रखर होने का परिचय प्राप्त किया जा सकता है, पर वह मूलतः अधिक सूक्ष्म है। प्राण के साथ वायु विशेषण भी लगा है और उसे प्राण वायु’ कहा गया है। उनका तात्पर्य ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि वायु विकारों से नहीं वरन् उस प्रवाह से है जिसकी गतिशील विद्युत तरंगों के रूप में भौतिक विज्ञानी चर्चा करते हैं। अणु, उष्णता, प्रकाश आदि की शक्ति धाराओं के मूल में संव्याप्त सत्ता कहा जा सकता है।

आधिदैविकेन समष्टिव्यष्टिरूपेण हरेण्यगर्भेण प्राणात्मनैवैतद् विभुत्वमाम्नायते नाध्यात्मिकेन । -ब्रह्मसूत्र शांकर भाष्य

समष्टि रूप हिरण्यगर्भ विभु है। व्यष्टि रूप आधि – दैविक अणु।

इस अणु शक्ति के आधार पर ही पदार्थ विज्ञान खड़ा है। विद्युत, प्रकाश, विकिरण आदि की अनेकानेक शक्तियों उसी स्रोत से क्रियाशिल रहती हैं। अणु के भीतर जो सक्रियता है वह सूर्य की है, यदि सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक न पहुँचे तो यहाँ सर्वथा अंधकार ही होगा। अणुओं की जो सक्रियता पदार्थों का आविर्भाव एवं परिवर्तन करती है उसका कोई अस्तित्व दिखाई न पड़ेगा। भौतिक विज्ञान ने इसे सूर्य द्वारा पृथ्वी को प्रदत्त-अणु शक्ति के रूप में पहचाना है और उससे विभिन्न प्रकार के आविष्कार करके सुख साधनों का आविर्भाव किया है। पर यह नहीं धारण करना चाहिए कि विश्वव्यापी शक्ति भंडार मात्र अणु शक्ति की भौतिक सामर्थ्य तक ही सीमाबद्ध है। वस्तुतः यह विपुल संपदा इससे भी कई गुना अधिक है, जड़-चेतन सभी में समान रूप से संव्याप्त है। जड़ जगत में शक्ति तरंगों रूप में संव्याप्त सक्रियता के रूप में प्राण का परिचय दिया जा सकता है और चेतन जगत में उसे संवेदना कहा जा सकता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया इसी संवेदना के तीन रूप हैं। जीवंत प्राणी इसी के आधार पर जीवित रहते हैं। उसी के सहारे चाहते, सोचते और प्रयत्नशील होते हैं। इस जीवनी शक्ति जितनी मात्रा जिसे मिल जाती है वह उतना ही अधिक प्राणवान कहा जाता है।

प्राणायाम जितना सरल और आसान प्रतीत होता है, उतना है नहीं। जब कोई व्यक्ति प्राणायाम की चेष्टा करता है तो लगने लगता है कि यह कोई हंसी-खेल नहीं है, बल्कि एक जटिल परन्तु सार्थक कला है। प्राणायाम कोई काल्पनिक क्रिया नहीं है अपितु तत्काल प्रभावशाली है। प्राणायाम की कई क्रियाएँ सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती चली जाती हैं। आज के दौर का व्यक्ति कुछ ज्यादा ही तनावपूर्ण हो गया है। संतुलित एवं शांतिमय जीवन जीना जैसे बहुत कठिन हो गया है। स्नायुविक और रक्त संचालन कुछ प्रणालियों को प्रभावित करने वाली चिंताएँ और रोग अपेक्षाकृत बढ़ गए हैं। व्यक्ति मानसिक समस्याओं से पीड़ित हैं तो कुछ व्यावहारिक कारणों से खुद को शांत व स्थिर बनाए रखने के लिए वह तरह-तरह के मादक द्रव्यों का सेवन करता है किंतु उनसे शांति नहीं मिलती बल्कि वह जीवन को नर्क बना लेता है। संभवतया धूम्रपान और मादक द्रव्यों से वह कुछ समय के लिए दुःख भूल जाएँ परंतु यह समस्या का हल नहीं है। वे शारीरिक और मानसिक विकार तो पुनः लौटकर आ जाते हैं। हमने प्रयोगात्मक रूप से देखा है कि जीवन में प्राणायाम जैसा सशक्त माध्यम अपनाने से हम कई समस्याओं को हल कर सकते हैं। प्राणायाम तर्क, वाद-विवाद से परे है। इसे सीखने के लिए उल्लास, धैर्य, आत्म-समर्पण, गुरु-निर्देश और सावधानी पूर्वक की गई चेष्टा की ज़रूरत होती है और यही इसे सार्थकता प्रदान करती है।

आयुर्वेद में भी वायु का विशेष और महत्त्वपूर्ण स्थान प्रतिपादित करते हुए महर्षि चरक ने चरक संहिता सूत्रस्थान 12/7 में स्पष्ट किया है कि वायु-शरीर और शरीर अवयवों को धारण करने वाला प्राण, उदान, समान, अपान और व्यान इन पाँच प्रकारों वाला, ऊँची और नीची सभी प्रकार की शारीरिक चेष्टाओं का प्रवर्तक, मन का नियंत्रक और प्रणेता, सभी इन्द्रियों को अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में प्रवृत्त कराने वाला, शरीर की समस्त धातुओं का व्यूह वाला, शरीर का संधान करने वाला है। वाणी का प्रवर्तक, स्पर्श और शब्द की प्रकृति, श्रवण और स्पर्शन इन्द्रिय का मूल, हर्ष और उत्साह, जठराग्नि करने को प्रदीप्त करने वाला, विकृत दोषों का शोषण करने वाला स्वेद, मूत्र, पुरीष आदि मलों को बाहर निकालने वाला, स्थूल और सूक्ष्म स्त्रोतों का भेदन करने बाला है। इस प्रकार अकुपित वायु, आयु या जीवन के अनुवृत्ति निर्वाह में सहायक है। यह भी कहा है कि प्राण को मातरिश्वा कहते हैं। वायु ही प्राण है। भूत, भविष्य और वर्तमान सब-कुछ प्राण में ही अधिष्ठित है।

आत्मा को महात्मा, देवात्मा और परमात्मा बनने का अवसर इस प्राण शक्ति की अधिक मात्रा उपलब्ध करने पर ही संभव होता है। चेतन की विभु सत्ता जो समस्त ब्रह्मांड में संव्याप्त है चेतन प्राण कहलाती है। उसी का अमुक अंश प्रयत्न पूर्वक अपने में धारण करने वाला प्राणी-प्राणवान एवं महाप्राण बनता है। आज जरूरत है इस प्राण शक्ति के आव्हान की। यही शक्ति हर समय श्वास के साथ अपना परिचय देती है। इसी शक्ति के अभाव में मृत्यु ही है। हमे प्राण शक्ति को शरीर के साथ साधना है। तोड़ देनी है खुद की सीमाएं और साध्य करना है वह लक्ष्य जिसे हम पाना चाहते है? अंत में हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?

A win win attitude

मानवी व्यक्तित्व में अन्तनिहित समग्रता!

पदार्थवादी दृष्टिकोण वाले बौद्धिक मनुष्य को जैव रासायनिक संयोगों का एक आकस्मिक समुच्चय ही मानते रहे हैं। उस स्थिति में सम्पूर्ण व्यक्तित्व की किसी विशिष्ट एक सूत्र का प्रश्न ही नहीं उठता। रंग, रक्त, शरीरस्थ रसों आदि की दृष्टि से निश्चित वर्गों का निर्धारण हो जाने पर तो यह और भी निश्चित माना जाने लगा कि जिस प्रकार कुछ तत्वों की निश्चित मात्रा एवं निर्दिष्ट प्रक्रिया में सयोग मे अमुक यौगिक विशेष फल तैयार हो जाता है, उसी प्रकार कुछ निश्चित तत्वों के संयोग में सफल हो जाने पर वर्ग विशेष के मनुष्य भी तैयार हो जाएंगे।

लेकिन विज्ञान प्रेमियों की इस कल्पना को ध्वस्त किया है, खुद वैज्ञानिकों ने। जैसे-जैसे जीवन के रहस्यों की खोज का क्रम बढ़ता गया, वैसे-वैसे वे तथ्य सामने आते गये, जिनसे स्पष्ट होता गया कि शरीर के ढाँचे वर्ण, कद, आकृति, रक्त हड्डियों आदि के हिसाब से तो वर्गीकरण ठीक हैं। किन्तु जीवन के गहरे आधारो के क्षेत्र में इस वर्गीकरण से काम नहीं चलेगा। चेतना की विद्यमानता प्रत्येक व्यक्तित्व को एक समग्र रूप देती है। जो दूसरे से बिल्कुल भिन्न है और इस लिये जिसे वर्गों में नहीं बांधा जा सकता क्योंकि हर व्यक्ति अपने आप में एक पूर्ण इकाई है। उस परमसत्ता का ही एक अंश है। अपना वर्ग उपवर्ग वह स्वयं है। इस लिए मनुष्य को अपने भाग्य का विधाता मानते है। व्यक्ति के संस्कार उसकी जन्म-जन्मान्तर की संचित सम्पदाए और साधन है। यह मान्यता भारतीय तत्व दर्शन की रही है। संस्कारों का यह सम्पुञ्जन बहुआयामी और अति विस्तृत होता है। संस्कार रूपी ये विशेषताए व्यक्ति की स्वयं उपार्जित क्षमताएं होती हैं । इन्हीं से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उसकी अपनी विशिष्टता घनीभूत रहती है।

दृश्यमान मानव शरीर की स्थूल संरचना में बहुत अधिक अन्तर नहीं होता। तो भी कोई दो व्यक्ति शत प्रतिशत एक जैसे नहीं होते। फिर अन्तरंग क्षेत्र तो और भी विस्तृत है। प्रत्येक व्यक्तित्व का अलग-अलग अनुठापन होता है। जो संस्कार समूहों की ही विशेषता होती है।
यह विशेषता ही मनुष्य की प्रवृत्तियों रुचियों और सामर्थ्य के रूप में प्रकट होती रहती है। कोई प्रचण्ड शरीर बल का स्वामी है, तो किसी में उसकी अल्पता होती है। कोई विलक्षण मेधा और स्मरण शक्ति से सम्पन्न है। तो किसी की बुद्धि में स्थूल बातों के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता हैं, और स्मरण शक्ति भी मन्द होती है। किसी के हृदय में करुणा का अथाह समुद्र उमड़ता रहता है, तो किसी को पर-पीड़न में ही पुरुषार्थ प्रतीत होता है । ये सभी भिन्नताएं ईश्वरीय अनुदान में किसी प्रकार के पक्षपात या विषमता का परिणाम नहीं है, वरन् जन्म-जन्मान्तरों से अमुक व्यक्ति द्वारा बढ़ाई जा रही विशेषताओं या खोयी जा रही क्षमताओं का ही और फल हुआ करती हैं। व्यक्ति विकास के स्तर को हमे समझना होगा।

जिस प्रकार मिट्टी में पत्थर प्रतीत होने वाली वस्तुओं के तल में इलेक्ट्रान-प्रोटान और उनकी आधारभूत विद्यतु-तरंगे सक्रिय रहती है। उसी प्रकार स्थूल दृष्टि से जो काय कलेवर के अवयव हाड़-मांस के बने दीखते हैं उनमें चेतन कोशिकाएं और उनके भी मूल में जीन्स क्रोमोसोम की निर्माणकारी चेतना प्रक्रियाएं क्रियाशील रहती हैं। प्रत्येक मनुष्य के अपने व्यक्तित्व की विशिष्ट छाप उन मूलभूत तत्वों तक में विद्यामान होती है। इस विशेषता का पता चला आणविक जैविकी के विकास से, जिसकी भव्य परिणति के रूप में पिछले दिनों दुनिया की प्रथम शिशु का प्रदुर्भाव हो सका है और जिसने परे संसार को रोमांचित कर दिया है।

आणिविक जैविकी की खोजों से यह तथ्य सामने आया कि जीवन की मूलभूत इकाई है, कोशिका ये इकाइयाँ अति सूक्ष्म होती हैं। ये प्राणिमात्र की देह इकाइयां हैं। एक कोशीय जीव अमीबा से लेकर विकसित मनुष्य तक किसी स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट युवक के शरीर में लगभग साठ हजार अरब कोशिकाएं होती हैं। इनमें से दस हजार अरब तो ऐसी इकाइयां ही हैं, जो स्वयं प्रक्रिया को परिचालित करती हैं। जितनी जगह में ‘मैं कोशिका है” छपा है, उतनी जगह में औसत आकार की पचास हजार कोशिकाए रखी जा सकती है। एक कोशिका का अपना सिस्टम है, जिनमे पाया गया है, की एक कोशिका में 8 GB तक का स्टोरेज रहता है। मानव शरीर ईश्वर द्वार बनाया गया कंप्यूटर है।

इनमें से प्रत्येक कोशिका एक शानदार कारखाना है। जो उत्पादन, कचरे के निष्कासन, सक्रियता, सुव्यवस्था एवं प्रशासन की सुनियोजित प्रणाली से क्रियाशील है। इस कारखाने के तीन मुख्य खण्ड होते हैं- पहला बाहरी खोल, जो एक पतली झिल्ली जैसा होता है, दूसरा साइटोप्लाज्म जैसे लसलसे पदार्थ से लबालव भाग और तीसरा केन्द्रक। यह केन्द्र ही प्रत्येक गतिविधि का नियन्त्रक होता है। केन्द्रक में ही डीएनए रहता है। जो मनुष्य के गुणसूत्रों तथा अन्य सूचनाओं का भंडार होता है। सच पूछा जाय तो कोशिका एक बड़ी झील है, इसे जीव-द्रव्य या प्रोटोप्लाज्म की झील कह सकते हैं। जीव चेतना को क्षीर सागर भी कहा जा सकता है। इसी क्षीर सागर के केन्द्र में है केन्द्रक या न्यूक्लिस रूपी विष्णु जिनकी नाभिवत् केन्द्रिका न्यूक्लिओलस में रहते हैं डीएनए रूपी ब्रह्मा । इन ब्रह्मा के चार मुँह हैं- डीएनए रूपी सीढी की पौड़ियों के चार यौगिक एडिनिन, ग्वैनिन, साइटोसिन और थाइमिन । एडिनिन और थाइमिन का सदा जोड़ा रहता है तथा साइटोसिन और ग्वैनिन का। इन चारों का क्रम ही समस्त जीवों की समानता या भिन्नता का मूल है।

चेतना विज्ञान

डीएनए का जो कुण्डली का फीता है। उसके उपयुक्तता के लिए सर्व व्याप्त चेतना से तादात्म्य स्थापित करने के और कोई उपाय भी नहीं। एक ही आत्मा सब में समाया हुआ है। एक ही सूर्य लहरों में प्रतिविम्बत हो रहा है। यह प्रतिविम्ब भिन्न-भिन्न में उसी रूप से फीका दिखाई पड़ता है। रुप आकार प्रकार की यह भिन्नता कोशिकाओं तक में देखी जा सकती है। चमड़ी का बाहरी हिस्सा चपटी कोशिकाओं से बना है। तो पाचन प्रणाली की कोशिकाएँ सिलेन्डर के आकार की होती। माँसपेशियों की कोशिकाएं आकुंचन प्रसारण में सहायक होती तो गुर्दे की मूत्र निर्माण – निष्कासन में सहायक होती हैं। किन्तु अन्य भी कोशिका हो उसमें वे विशिष्टताएं विद्यमान होती हैं जो व्यक्तित्व का सार हैं। उनका पुनरुत्पादन सम्भव है। इसी आधर पर वैज्ञानिक दावा करते हैं, कि यदि महात्मा गाँधी की त्वचा की कोशिकाएं लेकर उनके ऊतक कोषिकाये बना लिये गये होते तो तक कुछ दिनों बाद तकनीक विकसित होने पर उन्हीं ऊतक कोशिकाएं से हजारों गाँधी बनाये जा सकते थे। यदि आज रोनाल्ड रीग अथवा फ्रेंचर की त्वचा की कोशिकाएँ इसी प्रकार रख ली जाए, कल उन्हीं से अनेकों रीग अथवा अनेको नेता बनाये जा सकते हैं।

चेताना विज्ञान और अणु जैविकी के अन्वेषण में कदम-कदम पर पैदा होने वाली नई-नई कठिनाइयाँ एवं प्रतिक्रियाए वैज्ञानिक की इस सामर्थ्य सम्भावना को साकार कर सकेंगी अथवा नहीं यह खोज का विषय है। परंतु एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के आगे की छाप दूसरे व्यक्ति से और एक के स्वरों का ध्वनि-चित्रांकन दूसरो के स्वरों के ध्वनि चित्रांकन से भिन्न होते हैं। साथ ही एक मनुष्य के शरीर में विद्यमान खरबों कोशिकाओ में से प्रत्येक में उसकी आधार भूत विशेषताएं सुरक्षित होती है। इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य की सम्पूर्ण सत्ता में समग्रता है। वह चित्र विचित्र प्रवृत्ति प्रवाहों का आकस्मिक मेल नहीं है। उसकी भावनाएं भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्वों के यों ही एकत्रीकरण से नहीं पैदा होती, अपितु उसके रोम-रोम में अंग अंग में उन कोशिका ओं का सारभूत अंश विद्यमान होता है।

इसी तथ्य से एक अन्य निष्कर्ष भी सामने आता है। मृत्यु के बाद मनुष्य के मस्तिष्क के प्रोटोप्लाज्म के बिखर जाने और उसके सौ वे भाग का अश-विशेष के अन्य मनुष्य में प्रविष्ट हो जाने की बात कई वैज्ञानिक को के द्वारा उन प्रमाणों के सन्दर्भ में की जाती रही है जहाँ व्यक्ति अपने कथित पूर्व जन्म का कोई प्रमाणिक विवरण दे देता किन्तु कोशिका सम्बन्धी ये खोजें उस तर्क को कमजोर बनाती जब शरीर के किसी भी हिस्से की कोशिका में व्यक्ति की सभी मूलभूत विशेषताएं संरक्षित रहती हैं। तो मस्तिष्क की कोशिका का टोप्लाज्म बिखर कर घूमघूम कर दूसरे में प्रविष्ट होने के स्थान पर उन कोशिका के ही नये रूप में पहुँचने की सम्भावना है। अभी इसके अनेक रहस्य अज्ञात के गर्भ में ही हैं। इतना ही स्पष्ट हुआ कि हर नयी कोशिका अपनी जननी कोशिका से समस्त सूचनाए संकेत लेकर अपना नया कारखाना खोलती है। नुवंशिकी कूट भाषा अभी तक पूर्णतः जानी नहीं जा सकी है। रहस्य खुलने पर वह जानकारी जीव-कोशिकाओं में निहित चेतना अविच्छिन्नता पर भी प्रकाश डाल सकेगी। आणविक जैविकी की इन खोजों ने ये दो बात अब तक स्पष्ट हैं-सभी जीव-कोशिकाओं की मूलभूत रचना-प्रक्रिया एक है। इस व्यक्तित्व की वे इकाइयाँ होती हैं। उसकी सभी आधरभूत विशेषता इनमें सूत्र रूप में सन्निहित होती हैं। दोनों ही तथ्य भारतीय दर्शन के प्रतिपादन के अनुरूप हैं । वेदान्त दर्शन की मान्यता है कि एक ही चेतन-तत्व भिन्न-भिन्न दृश्यों के रूप में सर्वत्र दीखता है। साथ ही इन दृश्यों का बनना-बिगड़ना भी आकस्मिक नहीं है। यह एक सुनिश्चित सृष्टि प्रक्रिया का अंग है। अपितु उसी व्यवस्था के नियमों के अनुसार होता है।

चेतना का स्तर और डीएनए

हमारी चेतना का स्तर न तो आकस्मिक है और न अन्तिम या अपरिवर्तनीय। न तो इसका चाहे जैसे संयोग होता है न ही चाहे जैसा विघटन। इस सृष्टि में सभी कुछ सुव्यवस्थित और नियम बद्ध है और चेतना से परिपूर्ण है। वस्तुतः शरीर एक परिपूर्ण ब्रह्माण्ड है। प्राकृतिक परमाणु (जो साइटोप्लाज्मा निर्माण करते ) उसके लोक की रचना करते हैं और एटम मिलकर एक चेतना के रूप में उसे गतिशील रखते हैं। सूर्य, परमाणु प्रक्रिया का विराट् रूप है। इसलिये वही दृश्य जगत की आत्मा है, चेतना है, नियामक है, सृष्टा है। उसी प्रकार सारी सृष्टि का एक अद्वितीय स्रष्टा और नियामक भी है पर वह इतना विराट है कि उसे एक दृष्टि में नहीं देखा जा सकता । उसे देखने समझने और पाने के लिये हमें परमाणु की चेतना से प्रवेश करना पड़ेगा, योग साधना का सहारा लेना पड़ेगा, अपनी चेतना को इतना सूक्ष्म बनाना पड़ेगा कि आवश्यकता पड़े तो वह काल ब्रह्माण्ड तथा गति रहित परमाणु की नाभि सत्ता में ध्यानस्थ केन्द्रित हो सके। उसी अवस्था पर पहुँचने से आत्मा को परमात्मा स्पष्ट अनुभूति होगी।

चार यौगिक उसकी चार अक्षर वर्णमाला है। इन्हीं अक्षरों के क्रम और डीएनए की संख्या के उलट फेर से भिन्न-भिन्न चेतना संदेश तैयार हो जाते हैं और उन चेतना सन्देशों से ही बनता यह सारा चेतना संसार। गुणसूत्र के डीएनए के एक क्रम से व्यक्ति का काला रंग बनता है तो अन्य भिन्न-भिन्न क्रम से गोरा,या पीला। देह के प्रत्येक अवयव और उनकी विशिष्टताओं का निर्माण इन्हीं डीएनए के हेर-फेर से हुआ करता है। कोशिकाओं के भीतर का डीएनए ही प्रोटीनों के संश्लेषण का निर्देशक है। इन प्रोटीनों से बनते हैं एंजाइम । प्रत्येक जैव-रासायनिक क्रिया का प्रारम्भ, विकास या अन्त इन्हीं एंजाइमों का खेल है। दुनिया में प्राणियों की बोलियाँ भिन्न-भिन्न हैं। एक प्राणी दूसरे वर्ग के प्राणी की बोली कम समझ पाता है। मनुष्य ने तो भिन्न मत भाषाएँ विकसित की हैं और जिस भाषा-बोली का उसे ज्ञान नहीं उसका आशय अभिप्राय वह नहीं समझ पाता। कई बार तो मनोदशा और ज्ञान स्तर की भिन्नता से एक ही भाषा के बोलने वाले दो व्यक्ति एक दूसरे का अभिप्रायः ठीक-ठीक नहीं समझ पाते। अपितु सभी जीवों की रासायनिक भाषा एक है और प्रत्येक जीव कोशीका उससे भली भांति अवगत है। उस भाषा का जो अर्थ जीवाणु कोशिका के लिए है वही अर्थ मानव कोशिका के लिए, इन सबसे यही स्पष्ट होता है कि सभी प्राणियों में क्रियाशील मूलभूत चेतना एक ही है और उनकी संरचना के आधारभूत सूत्र एक में हैं।

भारतीय तत्वदर्शी प्रखर साधनाओं द्वारा इसी एकमेव अद्वैत चेतन सत्ता और उसके लिए, क्रियाकलापों की जानकारी में समर्थ होते रहे हैं। तभी वे सूक्ष्म जगत में उभरने वाली हलचलों की जानकारी प्राप्त करने में समर्थ होते। इसलिए अंत में हमे हमारे जीवन का लक्ष्य तय करना होगा? हमे उस यात्रा के लिए तैयार होना हैं, जो भीतर के चिदाकाश का द्वार तक लेके जाती है। हमे तैयार होना है, उस सवाल के लिए “मैं चाहता क्या हूं??

आयु + वेद = आयुर्वेद

मां प्रकृति का धन्यवाद करना सीखाता, “आयुर्वेद”

मां प्रकृति ने मनुष्य के लिए हर वस्तु उत्पन्न की है। जीवन को जीने के लिए प्राण वायु, शक्ती के लिए अन्न। मां प्रकृति हमारी हर एक जरूरत को पूर्ण करती है। वो कभी आपदा के रुप में कहर बनकर टूट पड़ती है तो भी हमारी मदद करती हैं। परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। मां प्रकृति की सबसे सुंदर और जटिल संरचना है मानव शरीर। मानवी शरीर को स्वास्थ रखना हमारे हाथों में है। इस स्वस्थता को प्रदान करती है मां प्रकृति। मां प्रकृति के नजदीक रहकर हम खुद को और समस्त मानव जाति को निरोगी रख सकते है, इस बात में कोई संशय नहीं हैं। मां प्रकृति ने हमें ज्ञान प्रदान कराती है। मानव शरीर से जुड़ा हुआ ज्ञान है आयुर्वेद। औषधि उपचार के लिए जड़ी-बूटियाँ भी प्रदान की हैं। इस आधार पर चिकित्सा को सर्व सुलभ, प्रतिक्रियाहीन तथा सस्ता बनाया जा सकता है। जड़ी बूटी चिकित्सा बदनाम इसलिए हुई कि उसकी पहचान भुला दी गयी- विज्ञान जुठला दिया गया। सही जड़ी-बूटी उपयुक्त क्षेत्र से, उपयुक्त मौसम में एकत्र की जाय; उसे सही ढंग से रखा और प्रयुक्त किया जाय तो आज भी उनका चमत्कारी प्रभाव देखा जा सकता है।

हम कुछ ही गिनी चुनी जड़ी-बूटियों से ८० प्रतिशत लगभग रोगों का उपचार सहज ही किया जा सकता है। ऐसी सरल, सुगम, सस्ती परन्तु प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति जन-जन तक पहुँचाने के लिए हमारे ऋषि मुनियों, गुरु ,अनेक आध्यात्मिक संस्थान , शोध कर्ता ने आयुर्वेद पर प्रस्तुती सादर कि है। आयुर्वेद में वर्णित अनेक जड़ी-बूटियों को भारतीय संस्कृती में प्राथमिकता दी गयी है, जो भारत में अधिकांश क्षेत्रों में पायी जाती हैं, अथवा उगायी जा सकती है। भारत की गुरु सत्ता, आचार्य अनेक संतो की यह इच्छा है कि, यह विधा विकसित हो और रोग निवारण के साथ-साथ जन-जन को प्राण शक्ति संवर्धन का लाभ भी प्राप्त हो । ऋषियों द्वारा विकसित इस विद्या का लाभ पुनः जन-जन को मिले। आने वाले समय में न तो संसाधनों की कमी रहने वाली है, न की तकनीकी दृष्टि से विकसित सुविधा साधनों की हमें आशा रखनी चाहिए कि महाविनाश की सारी तैयारियों के बावजूद विवेक का वर्चस्व बना रहेगा एवं अज्ञान, अभाव को दूर कर एक सद्भावनापूर्ण समाज विकसित होगा। एक आशंका फिर भी मन में रहती है कि वर्तमान जीवन पद्धति चिन्तन की विकृति एवं आधुनिक विकास के चलते, क्या मां प्रकृति की संताने सभी प्राणियों में मनुष्य इस स्थिति में होगा कि साधनों का सदुपयोग कर सके ? स्वयं अपने आपको सर्वांगपूर्ण स्वस्थ एवं संतुलित बनाए रख सके ? मानव आज के विकास की राह में अंधा हुआ प्रतित होता हैं। गहराई से देखने पर काफी खोखला नजर आता है। उसकी जीवनी शक्ति मुरझाई सी गयी लगती है। थोड़ा सा मौसम का असंतुलन उसे व्याधिग्रस्त कर देता है। भ्रान्तियां, आवेश, उत्तेजना, अवसाद जैसे मनोविकारग्रस्त व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है। बाहर से स्वस्थ, सुडौल दीखते हुए भी व्यक्ति की जड़ें कमजोर दिखाई देती हैं। आहार उपलब्ध होते हुए भी वह आहार विष बनकर सामने आता है । इसे आधुनिक जीवन की नीति कहें या प्रगति की दिशा में भटकना, कुछ भी नाम दे लें; पर लगता यही है कि ये वे मजबूत कंधे नहीं हैं, जिन पर समाज, राष्ट्र, विश्व की सदी का बोझ लादकर आगे बढ़ा जा सकें।

आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने निदान के साधन इतने जुटा दिए है कि रोग की जाँच-पड़ताल अब अधिक समय नहीं लेती। पर “मनुष्य रोगी है,” यह वही मानने को तैयार न हो, वह बाहर से स्वस्थ दिखे भी न पड़े, तो समझना चाहिए की कहीं कोई गड़बड़ी है। आहार की अनियमितता, अस्त-व्यस्त रूप में आधुनिक औषधि का सेवन, चिन्तन क्षेत्र में भ्रान्तियों के भ्रम जाल ये सभी आज सारे मानव समुदाय को अस्वस्थ बनाये हुए हैं। लक्षण बाहर से दिखायी नहीं पड़ते ।अन्तविकार अन्दर से व्यक्ति को खोखला बनाते रहते एवं बाहर की लीपा-पोती से प्रकाश में नहीं आ पाते हैं। ऐसे में लगता है नया मानव तैयार करने के लिए ऐसी वैकल्पिक चिकत्सा पद्धति तलाशनी ही होगी, जो व्यक्ति को समग्र रूप से आरोग्य प्रदान करें, उसकी क्षीण होती जा रही जीवनी शक्ति को सहारा दे। चाहे प्रसंग अत्याधुनिक विकसित राष्ट्रों का हो अथवा अविकसित विकासशील तीसरी दुनिया के राष्ट्रों के नागरिकों का, सभी पर यह बात समान रूप से लागू होती है।

योग्य उपचार पद्धति का चयन!

सही उपचार पद्धति कौन सी हो ! इस पद्धति को कैसे समझे? इस लिए हमे हमारी मूल प्रकृति से जुड़ना होगा। उपचार से उपकार तक की यात्रा को विकसित करना होगा। रोगों के मूल तक जड़ों तक पहुंचना होगा तभी हम रोगों के जंजाल से मुक्त हो पाएंगे। इसलिए चिकित्सा एवं स्वास्थ्य के नामों पर जब भी विचार होता है, तो वह एक सीमित दायरे में घूमकर रह जाता है। ऐलोपैथी की सबसे बड़ी देन यही है, कि उसने रोगों के कारणों के बारे में आधुनिक ढंग से चिन्तन करना सिखाया। चिकित्सा पद्धति कितनी निरापद है, इस विवाद में पड़े बिना यह चर्चा करना मुख्य होगा, कि वर्तमान परिस्थितियों में एक विशाल समुदाय में उपचार का मंत्र किस तरह फुंका जाय की उपचार के नाम पर चारों ओर नजर दौड़ाते है, तो प्रकृति के आंगन में फलने-फूलने वाली औषधि के माध्यम से चिकित्सा ही हर दृष्टि से हानिरहित, सस्ती, सुगम एवं अधिक लाभकारी प्रतीत होती है। यहां आयुर्वेद एवं वनौषधि विज्ञान के अन्तर को समझना जरूरी है। आयुर्वेद के धन्वन्तरि काल से लेकर अब तक के विकास में अनेकों परिवर्तन होते हुए चले आए हैं। आज के आयुर्वेद के रूप को देखते हुए मन में ग्लानि सी होती हैं। जो संस्कृति अपनी दिव्य शक्ति से सम्पन्न जड़ी-बूटियों के कारण कायाकल्प कर सकने तक में सक्षम मानी जाती रही है, उसे आयुर्वेद पढ़ कर डिग्री प्राप्त करने वाले ही प्रयुक्त न कर, एलोपैथी की शरण लेते देखे जाते हैं। यह मात्र बौद्धिक, परावलम्बन एवं पश्चिम की अन्धाधुंध नकल ही नहीं है, शरीर को स्थायी हानि पहुंचाने की कीमत पर तुरन्त लाभ मिलने की, रोगी व चिकित्सक की दोनों की मिली भगत की नीति भी है ।

जीवनी शक्ति संवर्धक वनौषधियाँ यदि कहीं नजर आती हैं, क्या वो सही ढंग से एकत्र न हुई, घास-पात के साथ मिली ये औषधियां क्या असर करेंगी ? जबकि सभी जानते हैं कि तोड़े जाने के बाद ३ से ६ माह के बाद इनके सभी गुण-धर्म लगभग समाप्त प्राय हो जाते हैं। जबकि भारत के अनेक आध्यात्मिक संस्थान द्वारा इस आयुर्वेद के गौरव, वनौषधि विज्ञान की महत्ता समझायी जाती हैं। और उन्हें यथा शक्ति स्वाभाविक रूप में प्रयोग करने योग्य बना कर, सेवन विधि का प्रतिपादन किया जाय एवं यदि सम्भव हो, तो ऐसी पौधशालायें स्थान स्थान पर लगायी जाए ताकि उनके ताजे रूप में सेवन का प्रचलन बढ़े। यह नई क्रांति के रुप में उभरकर नया बिजनेस मॉडल हो सकता है।


आयुर्वेद मूलतः अथर्ववेद का उपांग है और पाँचवे वेद के रूप में प्रख्यात है। अग्निवेश इस विधा के प्रणेता माने जाते हैं, जिन्होंने आयुवेद का अध्ययन पुनर्वसु आत्रेय से किया था; किन्तु अथर्ववेद जिसके एक अंग के रूप में आयुर्वेद ने जन्म लिया, उसमें अथर्वा ऋषि के माध्यम से यह बताया गया है, कि समस्त जीव समुदाय के लिए विधाता ने प्रकृति जगत वनौषधियों का प्रावधान रखा है। गुण, कर्म भेद अलग अलग हो सकते हैं, किन्तु एक भी पौधा इस धरती पर ऐसा नहीं है, जिसमें औषधीय गुण न हो। विशिष्ट चिकित्सा हेतु सुरक्षित कुछ विष प्रधान जड़ी-बूटियों की चर्चा न करके शेष पर दृष्टि डाली जाय, तो सभी स्थानीय उपचार (लोकल एप्लीशन) से लेकर समग्र शरीर के उपचार में उपयोगी देखी जा सकती हैं। आयुर्वेद के सुविख्यात आठ तन्त्रों की चर्चा भी यहाँ प्रासंगिक नहीं है। क्योंकि हमारा मूल विषय है वनौषधियों के विभिन्न अनुपान भेद द्वारा एकौषधि अथवा सम्मिश्रण के रूप में प्रयोग से शरीर व मन की सर्वांगपूर्ण चिकित्सा !! शरीर तंत्र व उसकी कार्य विधि की थोड़ी भी जानकारी रखने वाला व्यक्ति, उस विषय पर प्रस्तुत किये जा रहे प्रतिपादन द्वारा स्वयं अपनी एवं अन्य की चिकित्सा करता रह सकता है। इसी कारण अधिक विस्तार में जाने की अपेक्षा यह उचित समझा गया कि सार संक्षेप में इस चिकित्सा का मूलभूत तत्त्वदर्शन एवं उसकी कार्यपद्धति प्रस्तुत कर दी जाय ।

आयुर्वेद प्रकरण के प्रारम्भ में एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण एवं रोचक प्रसंग चरक संहिता में आता है। हिमालय क्षेत्र में सभी ऋषियों सम्मति से महर्षि भारद्वाज, देवराज इन्द्र के पास धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चतुविध पुरुषार्थों के साधन के आधार- आरोग्य की हरने वाले रोगों से मुक्ति पाने का उपाय पूछने जाते हैं, और देवराज इन्द्र ने यह ज्ञात देव वैद्य अश्विनी कुमारों से एवं अश्विनी कुमारों ने इसे दक्ष प्रजापति से प्राप्त किया। दक्ष प्रजापति को इस विद्या की शिक्षा स्वयं ब्रह्मा ने दिया था। भरद्वाज मुनि को आयुर्विज्ञान के तीन मूल सूत्र समझाते हुए देवराज इन्द्र कहते हैं कि आयुर्वेद मूलतः तीन स्तम्भों पर टिका है,

आयुर्वेद के तीन स्तंभ,

१) प्राणियों के स्वस्थ एवं रुग्ण होने के क्या कारण हैं।

(२) स्वस्थ एवं रुग्ण जीवधारियों के लक्षण क्या हैं ?

(३) स्वस्थ रहने को औषधि (पथ्य एवं जीवनी शक्ति सम्बर्धक बलप्रदायी औषधि) तथा रोगी प्राणी की औषधि क्या है ?

सारे आयुर्वेद की व्याख्या इन तीन स्तम्भों पर चलती है। वनौषधि विज्ञान की व्याख्या भी इसी आधार पर की जा सकती है। औषधि ही क्यों ? रस, भस्म-खनिज आदि क्यों नहीं ? इस संबंध में यही कहना है, कि अपना उद्देश्य आयुर्वेद के मूलभूत स्वरूप का पुनर्जीवन करना है। यह सारी धरती देवताओं द्वारा ले जाये जा रहे अमृत कलश से बंद रूप में गिरे अमृत से उद्भूत वनस्पतियों से विभूषित है। हर वनस्पति अपने पाँचों अंगों में औषधीय विशेषताएँ लिए हुए है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय, तो उनमें जल, स्टार्च, रेजिन्स पेटाइड्स रेसे आदि के रूप में सक्रिय घटक एवं संभावित साइड इफेक्ट (दुष्परिणाम) को रोकने वाले संघटक भी विद्यमान हैं। इन औषधियों को ताजे रूप कल्क कर-पीसकर, चटनी के रूप में, घनसत्व के रूप में या छाया में सुखाकर अच्छी तरह पीसकर सुक्ष्मीकृत चूर्ण रुप में दूध, जल, मधु, मिश्री, मलाई, घी या अन्य किसी अनुपान के साथ दिया जाता है। सभी रूपों में ये अपना प्रभाव शीघ्र ही दिखाती हैं। सर्वथा हानिरहित इनका शरीर पर प्रभाव सही निशाने पर बैठने वाला एवं चिरस्थायि होता है, यह शोधकर्ता ओ के निष्कर्ष बताते हैं। अन्य अनेकों संस्थानों द्वारा किए गये प्रयोग परीक्षण भी इसकी साक्षी देते हैं। उनके विस्तार में न जाते हुए यहाँ शरीर व मन पर वांछित प्रभाव डालने वाली ४२ औषधियों एवं उनकी प्रयोग विधि की चर्चा की जा रही है। इस संक्षिप्त निर्देशिका से परिजनों को उपचार प्रक्रिया का तत्त्व दर्शन समझकर, उसे व्यवहार में उतारना आसान हो जायेगा ।

विभिन्न संस्थानों के लिए भिन्न-भिन्न औषधियां: वनौषधि चिकित्सा का मूल आधार है- सक्रिय संघटकों को नष्ट किए बिना उन्हें संस्थान विशेष के लिए उचित मात्रा में अनुपान भेद द्वारा जीवनी शक्ति संवर्धन हेतु मुख मार्ग से देना । जहाँ आवश्यक हो, वहां उन्हें स्थानीय उपचार हेतु भी प्रयुक्त करना। इस दृष्टि से शरीर के विभिन्न संस्थानों के अनुसार चयन की गयी ४२ औषधियों का वर्णन इस प्रकार है,

42 औषधि के भंडार

1. सुख, मसूड़े एवं दाँतों के लिए बकुल (मौलश्री) ।
2.कायफल वालों के लिए भृगराज ।
3. त्वचा सम्बन्धी विकार के लिए बाकुची ।
4. मस्तिष्क एवं मनः संस्थान के लिए ब्राह्मी जय माँसी, दन ।
5. नाड़ी संस्थान – ज्योतिष्मति ( मालकगनी ) ।
6. संधि मांसपेशियों संबन्धी रोगों के लिए निर्गुण्डी, रास्ना, सुष्ठी (सोठ)।
7. हृदय एवं रक्तवाही संस्थान- पुनर्नवा, शंखपुष्पी, अर्जुन फेफड़े तथा ऊपरी व निचला श्वास संस्थान-अडूसा, भारंगी कटकारि शिरीष।
8. ऊपरी पाचन संस्थान एवं यकृत (लीवर) आंवला, मुलेठी, शतपुष्पा शरपुखा, कालमेध।
9. पाचन संस्थान नागकेसर एवं जननसंस्थान-गोर, वरुण, अशोक सोध।
10. रक्त होइफ, संक्रमण नाशक-दितीय सारियाँ, खदिर चिरायता

प्रसंगवश यहाँ एक दो बातों का खुलासा कर देना ठीक रहेगा। आयुर्वेद में होता यह है, की डॉक्टर एक ही औषधि को सभी रोगों को रामबाण दवा बता देते हैं। इस तरह वह कहीं भी नहीं रहती। स्वाभाविक है कि उसमें वे सक्रिय घटक है जिस कारण वह कई रोगों के कई लक्षणों पर अपना अचूक प्रभाव दिखाती है। किन्तु इससे यह नहीं प्रमाणित हो जाता कि वह उन सभी रोगों में काम में लायी जा सकती है। उसमें कौन से ऐसे सक्रिय औषधि तत्व है, यह फाइटोकेमीकल एनालिटीकल विधियों द्वारा पता लगाकर किसी रोग विशेष के साथ उसे प्रयुक्त किया जा सके, तो बहुत सीमा तक भ्रांतियां मिट सकती है। यह प्रयास औषधि निर्धारण में यहाँ किया गया है।

आवश्यकता पड़ने पर एक ही औषधि का सम्मिश्रण के प्रयोग सम्बन्धी एक और स्पष्टीकरण देना जरूरी है। किन्ही किन्ही
परिस्थितियों में व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक परिस्थितियों के अनुसार एक ही औषधि लम्बे समय तक प्रयोग करना ठीक होता है, कभी-कभी जरूरी होता है कि कुछ सम्मिश्रण प्रयोग किए जायें। इससे औषधि एक-दूसरे की कार्य क्षमता को और भी कई गुना बढ़ाती है एवं प्रभाव अधिक तीव्र व जल्दी होता है। औषधि यो के संघटक जब तक एक दूसरे से विच्छेदित नहीं होते, उनमें आपस में रासायनिक क्रिया नहीं होती। वे अपना प्रभाव समूचे रूप में मानव शरीर पर डालते हैं। अतः “ड्रग इटरएक्शन” जैसी संभावना यहाँ नहीं रह जाती। औषधियाँ जिन सक्रिय एल्केलाइड्स, पेण्टाएड्स व स्टार्च फाइवस आदि से मिलकर बनी होती हैं, वे परस्पर इस प्रकार एक दूसरे से मिले हुए रहते हैं, की एक ही औषधि का सेवन करने पर किसी तरह के हानिकारक प्रभाव की आशंका नहीं करनी चाहिए। एक ही जड़ी-बूटी में प्रोटागोनिस्ट ,एण्टागोनिस्ट तत्त्व विद्यामान रहते हैं। एण्टा गोनिस्ट निष्क्रिय औषधि तत्त्व साइड इफेक्ट्स को प्रभावी होने से पहले रोक देते हैं। इस प्रकार औषधि अपने आप में एक सम्पूर्ण आहार है। उचित मात्रा में उचित अनुपान के साथ लिए जाने पर उसके किसी भी प्रकार के दुष्परिणामों की अनावश्यक आशंका नहीं करनी चाहिए।

“वेहीकल” यानी वे पदार्थ, जो औषधि के साथ दिए जाने पर सक्रिय (एक्टिव इन्ग्रेडीएन्ट्स ) को शरीर में अपने लक्ष्य तक पहुंचाए। अनुपान उसी या अन्य किसी औषधि का क्वाथ भी हो सकता है, अथवा जल, दूध, घी, दही, मधु, मिश्री, मलाई, मक्खन या अन्य किसी तरल पदार्थ के रूप में भी हो सकता है । अनुपात इसलिए अनिवार्य है कि वह औषधि अपने सही रूप में सही स्थान पर पहुंचे। वस्तुतः अनुपान औषधि की क्रियाशीलता को बढ़ा देते हैं। सामान्यता ठण्डा या गुनगुना जल अनुपान रूप में प्रयोग करते है। गौ का दुदूध भी एक आदर्श अनुपान तथा स्वयं में एक सम्पूर्ण आहार है। लैक्टिक इन्जाइम्स व उसमें विद्यमान वसा के छोटे-छोटे कणों का बोल औषधि को “पेनिटेट्रिंग” प्रवेश योग्य बना देता है। दूध में लगभग २१ प्रकार के इनलाइम्स पाये जाते हैं। ये जड़ी-बूटियों के एल्केलाइड्स ,ग्लाइकोसाड्स व पेप्टाइड्स को सूक्ष्मीकृत करने की क्षमता रखते हैं। दूध गर्म करके थोड़ा ठण्डा करके लिया जाय, तो उचित है।

हनी वस्तुतः फूलों का स्वरस है। बाद में मधुमक्खियों द्वारा सक्रिय हारमोन्स के माध्यम से और भी अधिक गाढ़ा इन्जाइम बना दिया जाता है। जहाँ फूलों के स्वरस में पानी का अनुपात लगभग सत्तर प्रतिशत होता है, वहाँ मधुमक्खियों के शरीर से गुजर कर आने के बाद वह मात्र दस प्रतिशत रह जाता है। ऐसे द्रव्य पदार्थ के साथ ली गई औषधि पेट से तुरन्त रक्तवाही नलियों में होकर अपने-अपने क्षेत्र में पहुंच जाती है। हनी को जब भी लें, उसे ठण्डी स्थिति में ही लें। जल के साथ मिला कर लें। समान मात्र में जल के साथ गर्म अवस्था में मिलाने पर तथा घी के साथ समान मात्रा में दिए जाने का शरीर पर विष के समान प्रभाव पड़ता है, अतः इस सम्बन्ध में सावधानी बरती जानी चाहिए ।

मक्खन, घी, दही, मलाई आदि दूध के परिवर्तित रूप है। आवश्यकता पड़ने पर उन्हें भी प्रयुक्त किया जा सकता है। मिश्री की चाशनी भी हनी के समान एक श्रेष्ठ “वेहीकल” है जो औषधि की घुलनशीलता को बिना उसके गुण धर्म बदले बढ़ा देती है। किन्हीं किन्हीं परिस्थितियों में इसे भी अनुपान रूप में प्रयोग किया जाता है। अनुपान के कार्यों के सम्बन्ध में चरक सूत्र स्थान (३२० अ० २७ ) में कहा गया है कि “अनुपान तृप्त करता है, देह एवं इन्द्रियों की कमी को पूर्ण करता है, बल व जीवन देता है, खाये हुए आहार को सर्वत्र शरीर में फैलाने का कार्य करता है व उसे शरीर के साथ एकभाव कर देता है। अनुपान सेवन की गयी औषधि को अलग कर आमाशाय व उससे आगे पक्वआशय की ओर से जाता है। यह अन्न को गीला कर आसानी से अवशोषित हो शरीर में संव्याप्त हो जाने वाला कर देता है। इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि जो पेय आहार की सीमा में नहीं आता है, जिसमें स्वयं के औषधि गुण न हों और धातुओं का विरोधी न हो, वही सर्व श्रेष्ठ अनुपान है। आयुर्वेद केवल एक पद्धति नहीं है, अपितु यह जीवन जीने का नया तरीका है। जहां आपको ज्ञान प्रदान किया जाता है वही आयुर्वेद को अपनाना ही आज की जरुरत है।

चेतना विकास और विज्ञान

।अथ योगानुशासनम्।

मनुष्य का जीवन साधना पथ हैं। साधना के साथ आपको खुद को साधना होता हैं। परम शक्ति का यह उपहार है मनुष्य जीवन। जिसका हर एक कार्य, कर्म, विचार उस ब्रम्हांडिय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता हैं। क्यूकि परम शक्ति बाहर नहीं अपने भीतर हैं। यह केवल बात करने का कार्य नही है। यह अनुभव करने का कार्य हैं। “अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः” इस सूत्र से यात्रा को शुरूवात करनी होती हैं। योग दर्शन महर्षि पतंजलि कृत यह दिव्य ग्रंथ योग के हर एक पैलु को स्पष्ट करता है। योग का अर्थ होता है जुड़ना। उस परम् सुंदर शक्तिशाली तत्व से। यह शास्त्र ज्ञान प्रदान करता है, हर एक एक स्थिति योग है। योग ही अनुशासन है। इस लिए महर्षि कहते हैं “अथ योगानुशासनम्”। इसी सूत्र से आरंभ होता यह शास्त्र का। योग वास्तव में एक ‘सार्वभौम् विश्व मानव धर्म’ है। योग की दृष्टि में धर्म एक विज्ञान है किंतु योग को किसी धर्म विशेष से न जोड़ते हुए उसका अध्ययन करें तो पाएँगे कि हम अपने किसी धार्मिक अंग का ही पठन-पाठन कर रहे हैं और अपनी आस्था एवं धार्मिक भावनाओं को मानव जाति के कल्याण व उत्थान के लिए दृढ़ कर रहे हैं। इस प्रकार हम योग के रहस्य को स्पष्ट रूप से समझने का प्रयास कर सकते हैं।

जिन ऋषियों ने आत्मा का दर्शन कर लिया था यह उनके द्वारा प्रतिपादित विधियों का निर्देशन है। और आध्यात्मिक प्रणाली का क्रमिक दर्शन कराता है। एवं साधक को अपने लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ होता है। इस प्रकार व्यावहारिक रूप में योग दीक्षात्मक दर्शन एवं सार्वभौम् धर्म का प्रतीक है। आज जनमानस का मानना है कि महर्षि पतंजलि ने योग का निरूपण किया जबकि योग के प्रथम गुरु भगवान शिव ही हैं। कुछ लोगों का मानना है। कि हिरण्य-गर्भ रचित योगसूत्र जो अब लुप्त हो गए हैं, उन्हीं के आधार पर पतंजलि योग दर्शन की रचना हुई। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग का प्रतिपादन किया जो कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि के रूप में गृहीत है। भारतीय वाङ्ममय में योग पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है।

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं,

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।

कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।

(6/46)

हे अर्जुन! तू योगी बन जा। क्योंकि तपस्वियों, ज्ञानियों और सकाम कर्म में निरत् जन इन सभी में योगी श्रेष्ठ है।

श्रीमद्भागवत महापुराण में अपने सखा उद्धव को उपदेश देते कहते हैं -हुए श्री कृष्ण,


जितेन्द्रियस्य युकृस्य जितश्रवासस्य योगिनः ।

मयि धारयतश्चेत उपतिष्ठन्ति सिद्धयः ।।

( 11/15/1)

प्रिय उद्धव! जब योगी इन्द्रिय, प्राण और मन को वश में करके अपना चित्त मुझमें लगाकर मेरी धारणा करने लगता है, तब उसके सामने बहुत सी सिद्धियाँ उपस्थित हो जाती हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि, योग के द्वारा सभी सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशिता, वशिता, कामावसायिता नाम की अष्टसिद्धियाँ) स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। परंतु योग की चरम उपलब्धि मात्र सिद्धि प्राप्ति के संकुचित प्रकोष्ठ को अधिगत् करना नहीं, वरन् आत्मज्ञान, आत्म दर्शन आत्म सुख और आत्मबल की प्राप्ति है।

योग की विभिन्न पद्धतियों एवं उपासना की अनेकानेक विधियों का प्रमुख लक्ष्य चित्त को राग, द्वेष आदि मल से रहित उसमें सत्वगुण का उद्रेक करके वृत्तियों को निर्मलता प्रदान करना है। योग स्वरूप-बोध से स्वरूपोपलब्धि तक की यात्रा है। अंतःश्चेतना की जागृति का योग अन्यतम साधन है।

चरित्र निर्माण में योग का जो महत्त्व है वह भी स्पष्ट है। मानव में निहित सात्विक तत्व जब योग साधना द्वारा जागृत हो उठते हैं तब वह मानवीय गुणों से मण्डित हो जाता है। क्षमा, दया, करुणा, ज्ञान-दर्शन और वैराग्य की अभिवृद्धि ही चरित्र निर्माण की भित्तियाँ हैं।

मनुष्य के व्यक्तित्व की अखंडता ही सर्वोपरि है। खंडित मनुष्य का तात्पर्य है तन, मन एवं भाव के बीच समरसता एवं सामंजस्य का न होना। खंडित मनुष्य सुविधापूर्ण हो सकता है, लेकिन न वह शांत होगा, न आनंदित। खंडित मनुष्य उपयोगी हो सकता है, लेकिन उल्लासपूर्ण नहीं। अतीत में मनुष्य के खंडों को ही स्वीकार किया गया है। मनुष्य बहुआयामी है। हम उसके एक आयाम को स्वीकार कर सकते हैं और दूसरे आयामों को इनकार कर सकते हैं। सच तो यह है कि यह तर्क के अनुकूल पड़ता है, क्योंकि उसके खंड एकदूसरे के विपरीत मालूम होते हैं। जैसे मस्तिष्क है, वह तर्क से जीता है और हृदय भाव से। जिन्होंने मस्तिष्क को स्वीकार किया उन्हें अनिवार्यरूपेण, उनके ही तर्क की निष्पत्ति के अनुसार, भाव को अस्वीकार कर देना पड़ा, लेकिन मनुष्य अगर मस्तिष्क ही रह जाए। और उसमें भाव के फूल न खिलते हों, केवल वह गणित और तर्क और हिसाब ही लगाता हो, तो वैसा मनुष्य यंत्रवत् होगा।

वैसे मनुष्य के जीवन में उल्लास नहीं हो सकता, काव्य नहीं हो सकता, संगीत नहीं हो सकता। वैसा मनुष्य संपदा एवं पद-प्रतिष्ठा तो अर्जित कर सकता है, वह बहुत कुशल भी हो सकता है, लेकिन उसकी जिंदगी सूखी होगी, उसकी जिंदगी में कभी आह्लाद का या विषाद का कोई आर्द्र भाव प्रकट नहीं हो सकता है और उसका हृदय एक मरुस्थल होगा, जिसमें हरियाली नहीं होगी और जिसमें पक्षी गीत नहीं गाएँगे। ऐसे व्यक्ति की दृष्टि बड़ी संकुचित, बड़ी संकीर्ण होती है। वह पदार्थ के अतिरिक्त और कुछ स्वीकार न कर सकता; क्योंकि पदार्थ ही उसकी पकड़ में आता है। वह अपने को जानने की बात ही भूल जाता है। आँख के लिए दर्पण चाहिए जो अपने को देखे। उसी दर्पण का नाम काव्य है। काव्य हमें अपनी झलक दिखाता है। काव्य हमें अपनी सुगंध देता है। काव्य हमारे भीतर के भाव का उद्रेक है, भाव की तरंग है।

काव्य और विज्ञान

काव्य हमारी अपने से पहली प्रतीति, पहला साक्षात्कार है। काव्य से रहित व्यक्ति सही अर्थों में जीवंत नहीं उसका विकास होने की संभावना थी, लेकिन वह चूक गया है और आज यह दुर्भाग्य बहुत गहन हो गया है; क्योंकि हम विज्ञान की तो शिक्षा देते हैं, हम प्रत्येक व्यक्ति को संदेह में कुशल बनाते हैं, सोच और विचार में निष्णात करते हैं। काव्य के बिना हमारे जीवन में, वह जो दृश्य और अदृश्य के बीच का सेतु है, निर्मित नहीं होगा। काव्य का अर्थ इतना सीमित नहीं है, जितना साधारणतः समझा जाता है। काव्य में वह सब है, जो तर्क से नहीं जन्मता, फिर चाहे संगीत हो, फिर चाहे नृत्य हो, चाहे मूर्तिकला हो, चाहे स्थापत्य हो। जो भी सिर्फ तर्क के अनुसार नहीं पैदा होता है, जिसमें तर्क से कुछ ज्यादा है। तर्क से परे एवं पार है, वही काव्य है और जब तक काव्य नहीं है, तब तक धर्म की कोई संभावना नहीं है। इसलिए काव्य विज्ञान के ऊपर की सीढ़ी है। विज्ञान संसार का पदार्थ है, और विज्ञान सभी की समझ में आ जाता है। काव्य तो फूल है, चाहो तो इससे इनकार कर सकते हैं। सौंदर्य है, अस्वीकार करने में कठिनाई नहीं है। काव्य के लिए हृदय को भावपूर्ण होने की कला आनी चाहिए। काव्य के लिए मस्तिष्क को कभी-कभी दूर हटाकर रख देने की क्षमता आनी चाहिए। जैसे कभी जब आकाश में बादल घिर जाएँ और मोर नाचने लगें तो हमारा मन भी उस नृत्य में सम्मिलित हो जाता है और जब कभी दूर से रात के अंधेरे में कोयल की आवाज आए, तो अपने हृदय को खोलकर अपने हृदय के भीतर उसे आमंत्रित करना आना चाहिए।

काव्य विज्ञान से ऊपर, विज्ञान से श्रेष्ठतर है। विज्ञान की उपयोगिता है, उपादेयता है। इसलिए विज्ञान का कोई विरोधी नहीं है, परंतु उसकी उपयोगिता चरम मूल्य नहीं है। उसकी उपयोगिता हमारे लिए है। हमसे ऊपर नहीं है। हम उसके ऊपर हैं और विज्ञान की उपयोगिता इसीलिए है, ताकि हम काव्य के जगत् में प्रवेश कर सकें। यदि हम यह समझ सकें, तो विज्ञान वरदान बन सकता है। अब तक तो यह अभिशाप सिद्ध हुआ है अपितु नही यह आपके हाथो में ही हैं। विज्ञान हमें ज्यादा समय देता है, क्योंकि जिस काम में घंटों लगते थे, वह यह क्षणों में कर देता है। विज्ञान हमारे जीवन को लंबा कर देता है। विज्ञान हमारे पास इतनी क्षमता जुटा देता है कि हम चाहें तो नाचें, चाहें तो गाएँ, चाहें तो विश्राम करें, ध्यान करें। विज्ञान समृद्धि देता है, लेकिन समृद्धि की एक ही महत्ता हो सकती है कि अंतर्यात्रा शुरू हो सके। इसलिए विज्ञान का विरोध नहीं है, परंतु काव्य आत्मसात् हो। हमें के विज्ञान पर ठहरना नहीं है। विज्ञान से ऊपर काव्य का रंग है। विज्ञान अगर मंदिर बना सके तो अच्छा, लेकिन इस मंदिर का जो अंतर्-गर्भ होगा, जो गर्भगृह होगा, वह तो काव्य का ही हो सकता है। अगर यह मंदिर ही मंदिर हो के और इसमें कोई गर्भगृह न हो, जहाँ परम अतिथि को आमंत्रित किया जा सके, जहाँ परम देवता को विराजमान किया जा सके, तो यह मंदिर खाली है, यह मंदिर अर्थहीन है। इस मंदिर का कोई प्रयोजन नहीं है। इसे बनाना व्यर्थ है। काव्य में इसकी सार्थकता होगी।

विचार बाह्य यात्रा का साधन है, भाव अंतर्यात्रा का साधन है। दोनों का अपना उपयोग है, लेकिन हमें दोनों के पार होना है, उसे कभी न भूलना चाहिए। एक क्षण को विस्मरण नहीं होना चाहिए। न तो हम मस्तिष्क हैं, न हम हृदय है। जब हम मस्तिष्क के पीछे खड़े हो जाते हैं, तो तर्क (निर्मित होता है। विज्ञान का जन्म होता है, गणित बनता है। और जब हम भाव के पीछे खड़े हो जाते हैं तो काव्य की तरंगें उठती हैं, संगीत जन्मता है। जब हम दोनों से मुक्त होकर स्वयं को जानते हों, तो धर्म का उद्भव होता है। तब हमारे भीतर सत्य को प्रतीति होती है। सत्य की प्रतीति ही हमें संत बनाती है। नियम, व्रत, उपवास से कोई संत नहीं होता है। सत्य को जो जान लेता है, अपने भीतर विराजमान, पहचान लेता है, अपने भीतर के देवता को अंतर्-देवता से जिसका परिचय हो जाता है, वही संत है। संतत्त्व तो है साक्षी का अनुभव नहीं मैं मन हूँ, नहीं मैं हृदय हूँ, नहीं मैं देह हूँ, नहीं मैं बाहर हूँ, नही मैं भीतर हूँ। मैं उस अद्वैत परम सत्ता का प्रतिक हूँ। जहाँ दोनों का अतिक्रमण हो गया है। जहाँ सिर्फ शुद्ध चैतन्य हो जाना है। जिस पर कोई बंधन नहीं हैं, न विचार के, न भाव के। जहाँ गणित भी खो गया और जहाँ काव्य भी खो गया। जहाँ सब परम शांत है। पतंजलि योग सूत्र “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” की साक्षात प्रतीति होती है। जो एक परम स्थिति है। समाधि अवस्था है। “विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः” जहां हमारे निरोध के संस्कार भी क्षीण हो जाते है। परम चिदाकश का अंश रूप में प्रकाश का साक्षात्कार होता है। अर्थात अंतिम स्थिति की प्राप्ति

जहाँ परम मौन घटित हुआ है, उस परम मौन के कारण ही हमने संतों को मुनि कहा है। यह मनुष्य की त्रिमूर्ति है विज्ञान, काव्य, धर्म। ये मनुष्य के तीन चेहरे हैं। हमें किसी एक तत्त्व से नहीं बँधना चाहिए। हमें तीनों को जानना है और तीनों से मुक्त भी होना। हमे तीनो शक्तियों को समर्पित होना हैं। सकारात्मक भाव लेकर यह यात्रा को पूर्ण करना होता हैं। गुरु का परम तेज, शक्ति, और ज्ञान का मिलन होता हैं।

इन तीनों को जानना और जानने वाला सदा ही अतिक्रमण कर जाता है, जानने वाला कभी भी दृश्य नहीं बनता, द्रष्टा ही रहता है। उसे दृश्य बनाने का कोई उपाय नहीं है। इसके पश्चात तुम्हारी मंजिल पूरी होती है। यही मनुष्य का अखंड रूप है। यह भविष्य का मनुष्य है, जिसके आगमन की प्रतीक्षा की जा रही है; क्योंकि अगर वह नहीं आया, तो पुराना मनुष्य सड़ गया है। पुराना मनुष्य खंडित है। एक-एक हिस्से को लोगों ने जकड़ा है। पश्चिम ने पकड़ा विज्ञान को, पूरब ने पकड़ा धर्म को, दोनों मूर्च्छित हालात में हैं, अर्द्धजीवित हैं। पश्चिम मर रहा है, क्योंकि शरीर तो है, धन है, पद है, पर आत्मा नहीं है और पूरब मर रहा है, क्योंकि आत्मा की बातचीत तो है, लेकिन देह खो गई है। दीनता है, दरिद्रता है, भुखमरी है। पेट भूखा है, आत्मा की बात भी करें, तो कब तक करें और कितनी ही समृद्धि हमारे पास हो, अगर आत्मा ही नहीं है तो हम ही नहीं हैं। यह हमारी समृद्धि केवल हमें अपनी दरिद्रता की याद दिलाएगी और कुछ भी नहीं।

पश्चिम बाहर से समृद्ध है, पर भीतर से दरिद्र है। पूरब ने भीतर की समृद्धि में बाहर की दरिद्रता मोल ले ली है। यह खंड-खंड का चुनाव है। यह चुनाव अशुभ हुआ। नास्तिक और आस्तिक, दोनों को भीतर जोड़ देना चाहिए। पूरब और पश्चिम को छोड़कर सरक जाएँ। नई सुबह हो रही है। नया दिन आ रहा है। नए मनुष्य का दिन आ रहा है। यह नए मनुष्य की घोषणा है।

सूर्य नमस्कार

सूर्य रश्मि चिकित्सा

सूर्य का महत्त्व समझाने के लिए हमारे धर्म ग्रंथों में अनादि काल से वर्णन है। परंतु एक बात पक्की है कि यह हमें प्राचीन समय से अपनी ओर आकर्षित करता आया है। हम पिछले युगों में जाएँ या आज के युग की बात करें, सूर्य हमेशा जीवनदायिनी ऊर्जा देता आया है। सूर्य के बारे में जानने के लिए आज का वैज्ञानिक दिन-रात एक कर रहे हैं, जबकि हमारे ऋषि-मुनि इसकी दिव्यता और उसका उपयोग करना भी जानते थे। सूर्य मात्र हमारे शरीर को ही नहीं हमारे सूक्ष्म शरीर को भी अपनी चैतन्य शक्ति से जीवंतता प्रदान करता है। वैज्ञानिक इसे आग का गोला कहें अथवा कोई ग्रह परंतु प्राचीन काल में ही इसके अनेक रहस्यों को हमारे मनीषियों ने समझ लिया था और उसका उपयोग करने
की कला को जन-कल्याण तक पहुँचाया था परंतु अब सूर्य का ज्ञान लुप्तप्राय है।

यहाँ पर हम थोड़ी सी चर्चा सूर्य के रहस्य को समझाने के लिए करना चाहते हैं, ताकि हम जब सूर्य नमस्कार करें तो हमारे मन में श्रद्धा, लगन और आस्था प्रकट हो और हम उससे लाभान्वित हो सकें।
पाठकगण शायद जानते हों कि बनारस में एक बहुत बड़े संत हुए हैं।
जिनका नाम था स्वामी विशुद्धानंद परमहंस और उनके शिष्य थे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राचार्य गोपीनाथ कविराज। चूँकि कथानक काफ़ी विस्तृत है, अतः हम सिर्फ इतना बताना चाहेंगे कि उन्होंने हिमालय के किसी गुप्त आश्रम (ज्ञानगंज आश्रम) में जाकर 12 वर्ष की कठिन साधना की। इसके बाद सन् 1920 के आस-पास वापस बनारस आकर सूर्य विज्ञान का चमत्कार इस पूरे विश्व को बताकर आश्चर्यचकित कर दिया था। लोगों ने दाँतों तले अंगुलियाँ दबा लीं थीं। सैकड़ों शिष्यों के सामने वे सूर्य विज्ञान द्वारा एक वस्तु को दूसरी वस्तु में रूपांतरित कर दिया करते थे, जैसे कपास को वे फूल, पत्थर, ग्रेनाइट,हीरा, लकड़ी आदि कुछ भी बनाकर दिखा देते थे। यहाँ तक कि उन्होंने एक बार मृत चिड़िया को जीवित कर दिया था। यह आश्रम आज भी हिमालय में स्थित है। यह वृत्तांत लेखक पॉल वंटन की पुस्तक मे है। यह दृष्टांत बताने के पीछे यह उद्देश्य हैं की सूर्य के प्रति आपकी जिज्ञासा और आस्था बढ़े। ताकि हम उस सुर्य से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर सकें।

सूर्य नमस्कार की एक आवृत्ति में 12 स्थितियाँ हैं। प्रत्येक आसन का -अपना एक मंत्र है। प्रत्येक क्रिया का अपना एक लाभ है। हम तो इतना कहेंगे कि नया जीवन चाहिए, तो सूर्य नमस्कार कीजिए।
प्रतिदिन नियम से किया जाने वाला सूर्य नमस्कार अन्य व्यायामों की अपेक्षा ज्यादा लाभकारी है। सूर्य देव का वर्णन हम जितना करें, कम है। अतः हम सूर्य देव को नमस्कार करने की पद्धति का वर्णन करेंगे।
सूर्य नमस्कार करने का मुख्य कारण संभवतया उसके द्वारा जीवनदायिनी ऊर्जा मिलना और उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना रहा है। सूर्य में स्थापित अकृत्रिम प्रतिमा को या यूँ कहें कि सूर्यदेव को अर्ध्य समर्पित करने का प्रचलन आदिकाल से रहा है, जब इस भारत-भूमि के प्रथम चक्रवर्ती राजा भरत सूर्य में स्थित जिनालयों को नमस्कार किया करते थे। किन्हीं कारणों से इसका प्रचार-प्रसार अधिक नहीं हो पाया परंतु दक्षिण भारत के आचार्यों ने इसे आत्मसात् किया और इस विद्या को जीवंत रखा। जब वे शेष भारत के तीर्थों पर भ्रमण हेतु आते तो वहाँ भी नित्यकर्म में सूर्य नमस्कार करते थे। तीर्थ स्थानों की जनता उन्हें देखकर सूर्य नमस्कार की विधि का अनुसरण करती थी। इस प्रकार पुनः संपूर्ण भारत वर्ष में सूर्य नमस्कार का प्रचार-प्रसार हुआ।

शिवाजी महाराज को उनके गुरु समर्थ रामदास ने सूर्य नमस्कार की विधि सिखाई जिसका उन्होंने अभ्यास किया और परिणामस्वरूप उनका शरीर एवं चरित्र इतिहास में अद्वितीय है। शिवाजी महाराज ने अपने सैनिकों को सूर्य नमस्कार की विधि सिखाई और इस प्रकार सूर्य नमस्कार की विधि का प्रचार-प्रसार बढ़ा। ‘सूर्य नमस्कार’ के द्वादश आदर्श बीज मंत्र एवं क्रिया मंत्र होने के कारण बारह अंकों के सूर्य नमस्कार की वैज्ञानिकता बढ़ जाती है।

महत्त्व हमारे ऋषियों ने मंत्र और व्यायामसहित एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जिसमें सूर्योपासना का भी समन्वय हो जाता है। इसे सूर्यनमस्कार कहते हैं। इसमें कुल १० आसनों का समावेश है। हमारी शारीरिक शक्ति की उत्पत्ति, स्थिति तथा वृद्धि सूर्य पर आधारित है। जो लोग सूर्यस्नान करते हैं, सूर्योपासना करते हैं वे सदैव स्वस्थ रहते हैं। सूर्यनमस्कार से शरीर की रक्तसंचरण प्रणाली, श्वास-प्रश्वास की कार्यप्रणाली और पाचन प्रणाली आदि पर अधिक प्रभाव पड़ता है। यह अनेक प्रकार के रोगों के कारणों को दूर करने में मदद करता है। सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास से शारीरिक और मानसिक स्फूर्ति के साथ विचारशक्ति और स्मरणशक्ति तीव्र होती है। पश्चिमी वैज्ञानिक गार्डनर रॉनी ने कहा: “सूर्य श्रेष्ठ औषध है। उससे सर्दी, खाँसी, न्यूमोनिया और कोढ़ जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।” डॉक्टर सोले ने कहा : “सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है उतनी संसार की अन्य किसी चीज़ में नहीं।”

आदित्य ह्रदय

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।

केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ।।



सवितृमण्डल के भीतर रहनेवाले, पद्मासन में बैठे हुए, केयूर, मकर कुण्डल, किरीटधारी तथा हार पहने हुए, शंख-चक्रधारी, स्वर्ण के सदृश देदीप्यमान शरीवाले भगवान नारायण का सदा ध्यान करना चाहिए।’ (आदित्य हृदय : १३८)

गायत्री मंत्र के भाष्य का विस्तार चार वेद हैं। वेद के हर एक मंत्र एक एक छंद ,ऋषि और देवता है। उनका स्मरण कर विनियोग करना आवश्यक है। इसी तरह गायत्री मंत्र के भी छंद गायत्री है, ऋषि विश्वामित्र, और देवता सविता है। सविता का अर्थ होता है “सुर्य”। गायत्री ही सुर्य की अधिष्ठात्री देवता हैं। सूर्य उपासना को ” सूर्य नमस्कार” के नाम से जाना जाता हैं। मानवी शरीर प्रकृति का अद्भुत वरदान है। इसी शरीर में मातृसत्ता का जागरण होता हैं। इस मातृभाव को हमे सहेज कर रखना होगा। इस शरीर को निरोगी रखना का हमारा परम कर्तव्य हैं। शरीर के भीतर मौजूद अनंत ऊर्जा को योग्य रूप देना होगा। सूर्य उपासना का अंतिम चरण सूर्य ध्यान होता हैं। जो गायत्री के उस मातृशक्ति को शरीर के उन अंगों पर स्थापित करना होता है। मातृशक्ति उपासना का श्रेष्ठ उदाहरण और क्या हो सकता हैं? सूर्य तेज अग्नि का प्रतीक है। ध्यान इस सुंदर प्रक्रिया में प्रकाश के तेजोवलय से समन्वय स्थापित करने पर ही गायत्री की पूर्णाहुति संपन्न होती है। यज्ञाग्नि में आहुति देने से गायत्री पुरश्चरण का अभिन्न अंग माना जाता है। सूर्य उपासना केवल कल्पना नहीं अपितु सविता और सावित्री को शरीर में स्थापित करने का अनोखा विज्ञान है। अग्नि तत्व का प्रतीक है “सूर्य देवता”, और चेतन का स्थूल रूप है “सविता”। इस सूर्य नमस्कार का मुख्य उद्देश है, इस जड़ शरीर के द्वारा चेतनात्मक प्रशिक्षण संस्कारो को जाग्रत करना है। ब्रम्ह तेज को सविता कहा जाता है। यह सविता शक्ति ब्रम्हाण्डीय चेतना का रूप हैं। यह प्रखर तेज सविता सर्वत्र व्याप्त है। उस परम शक्ति आत्मचेतना से घनिष्ठता साध्य करने के लिए प्रतीक रूप में सूर्यस्वरुप अग्निपिंड की उपासना अनिवार्य हैं। सूर्य उपासना यह ब्रम्ह तेज अवतरण की प्रक्रिया का वह बीज है, जिसे आत्मचेतना को दिव्य भूमि पर अंकुरित करना होता है। पृथ्वी को आत्मा और सुर्य को ब्रम्ह तेज की उपमा दी गईं है। पृथ्वी और सुर्य का समन्वय “सुर्य नमस्कार” साधना से ही संभव है। जिसे कुण्डलिनी विज्ञान में मूलाधार से चेतना सुषुम्ना मार्ग से होती हुई कपाल तक की जागरण प्रक्रिया है “सुर्य नमस्कार”। पृथ्वी पर जो जीवन का आधार है, वह केवल सूर्य की ऊर्जा से प्राप्त हुआ है। सूर्य इस जगत की आत्मा है।

जिस प्रकार से पृथ्वी पर सूर्य केंद्र से जीवनी शक्ति का वर्षाव होता है, वैसे ही आत्मारूपी इस शरीर पर ब्रम्ह तेज प्राण सत्ता का वर्षाव होता हैं, सुर्य नमस्कार से। इसी उपासना से अंतः करण शुद्धता होती हैं। इस में कोई संशय नहीं है। वह सुर्य शक्ति अर्थात् सविता, यहीं प्रत्यक्ष में “ब्रम्हतेज” हैं। शास्त्रोंकारो ने गायत्री सद्बुद्धि , रितंभरा प्रज्ञा की देवता है तो प्राण और सविता इसी प्रयोजन की पुर्तता करते है। शास्त्र वचन में इसे त्रिकोण भूमिति जैसा सम्बध जताया है।

“यो वै सः ऐषा सा गायत्री”।

शतपथ (1/3/5/15)

जो प्राण हैं वही “गायत्री” अंतः चेतना है।

“प्राण एव सविता विद्युदेव सविता”

शतपथ (7/7/9)

प्राण भी सविता है, विद्युत भी सविता है।

यहा कुछ समझने वाली बात यह हैं , की सविता अर्थात तेज भौतिक अग्नि वा प्रकाश यह तो हैं, इसका मुख्य उद्देश है, अंतः चेतना ब्रम्हतत्व स्वरूप हैं। सविता के उस परम तेजस्वी तेज ब्रम्ह तत्त्व के शिवाय और दूसरा कोई तेज नही हो सकता है। यही चेतना रूपी प्रकाश सविता सूर्य विश्व जीवन के ज्ञान का केंद्र माना जाता हैं, साथ ही साथ भौतिक विज्ञान का भी केंद्र यही हैं। इसकी धारना करना मुनष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन है। चार वेद में जो मंत्र,ऋचा आदि हैं वह अंतः चेतना सविता शक्ति का विवेचन ही हैं। सूर्य उपासना, सुर्य नमस्कार यह तप साधना हैं। तपग्नी के साथ श्रद्धा का अनोखा स्थान इस उपासना को संपन्न बनाते हैं। यही सविता देवता सब के उपास्य, लक्ष्य और इष्ट हैं। जो प्रत्येक श्वास से मित्र बनकर कुंभक में हिरण्यगर्भ का दर्शन मेरुदंड में चेतना का संचार होकर आदिदेव भास्कर को नमन कर रेचक श्वास के साथ अपनी प्रतीति प्रदान कराता है। इसके लिए पुरुषार्थ का अनोखा जोड़ अनिवार्य है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने सविता देवता की उपासना पद्धति का वर्णन किया है। सूर्यध्यान में अवर्णित भाव को पल्लवित किया है, “मैं ओमकार स्वरूप भगवान को नमस्कार करता हूं। हे भगवान! आप समस्त विश्व की आत्मा और काल स्वरूप हो। समस्त प्राणी चर अचर में आपका ही निवास हैं। यह सुंदर भाव भगवान को अर्पित किए है।

सूर्य उपासना

यही सूर्य देवता असमान्य रहस्यमय शक्ति का उपयोग यंत्र के माध्यम से उपभोग लिया जा रहा है। अपारंपरिक ऊर्जा का स्रोत के रूप में इस ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा हैं। यह केवल ऊर्जा का ही नहीं अपितु अनेक शक्तियों का भण्डार है। जिसमे भौतिक विज्ञान के light theropy और ultra sound theropy ( मंत्र विज्ञान ) का ज्ञान समाया है। अगणित जीवनीशक्ति को निरोगी जीवन जीने के लिए महत्व पूर्ण है। इस का संपर्क संबंध स्थापित करके सानिध्य प्राप्त कराने में सक्षम हैं। यह शक्ति भौतिक प्रयोजन अंतः विकास गायत्री शक्ति कहलाती हैं। सुर्य नमस्कार का यह चक्र उस धन्यवाद के भाव को प्रज्वलित करता है जो,

नमस्ते देवी गायत्री , सावित्री त्रिपदेक्षरे

        (वशिष्ठ संहितार्थ वांत्रिक)

यह तीनों पदों की गायत्री , सावित्री देवी तुम्हे नमन।

यह सुर्य उपासना की अलग अलग श्वास पूरक , रेचक से लेकर भिन्न भिन्न शारिरिक स्थितिया वैज्ञानिक आधार हैं। नमस्कारासन से भुंजगासन से हस्तोतादासन अन्य अनेक योगासन की दिव्य श्रृंखला षटकुक्षी है। षटकुक्षी का अर्थ होता हैं , षटचक्रों का जागरण। सुर्य उपासना सुर्य नमस्कार से शरीर के भीतर के शक्ति केंद्र का जागरण होता हैं। मां कुण्डलिनी षटचक्रों का भेदन करती ब्रम्हारंध्र में गमन करती है। इस लिए यह षटकुक्षी का द्वार कहा जाता है। मंत्र के साथ जब यह साधना 12 अंगों में पूर्ण की जाती है तो, प्राण शक्ति का उत्थापन इस विद्या के द्वारा किया जाता है। इन्ही मंत्रो में प्राणशक्ति अभिभूत है। परिणामी साधक जब सिद्धि मार्ग पर अग्रसेर होता है, तो परब्रम्ह महाप्राण वह अपने वह अपने शरीर में अंतः करण में धारण करने की विधि है सुर्य नमस्कार। जब यह महाप्राण शरीर क्षेत्र में अवतरित होता हैं तो, साधक को आरोग्य, आयुष्य तेज ,ओज, बल, पराक्रम पुरूषार्थ प्राप्त होता हैं। मन क्षेत्र में उत्साह , स्फूर्ति, प्रफुल्लता ,साहस , एकाग्रता, स्थिरता , धैर्य, संयम इ. दिव्य गुणों का साक्षीदार बनाता है। परमात्मा का प्रधिनिधि सम्मान साधक को प्राप्त होता है। यही आत्मकल्याण ध्येयप्राप्ति का राजमार्ग है। सुर्य उपासना साक्षात महाप्राण को साधना ही है, यही सर्वत्र चर अचर हैं।